श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअनुभाष्य - श्रीकृष्णप्रेमहीन अभक्तगण जो अपनी इन्द्रियोंकी चञ्चलता दिखाकर हास्य, क्रन्दन, नृत्य और गीत आदिमें उन्मत्त होते हैं, यह उनके अमङ्गल प्राप्तिका ही परिचय मात्र है। कृत्रिम शारीरिक और इन्द्रिय-चाञ्चल्य भजनशील साधकोंके लिये सम्पूर्णरूपसे परित्यागका विषय है। आत्माकी स्वाभाविकी वृत्तिके उदयमें जो भाव और प्रेम उपस्थित होता है, उससे ही हास्य, क्रन्दन, गान, नृत्य और उत्कण्ठा उदित होते हैं। ये सभी सेवोन्मुख भक्तकी अकृत्रिम (स्वाभाविक) चेष्टा है। अजातप्रेम व्यक्तियोंकी भक्तोंकी उच्चपदवी ग्रहण करनेकी धृष्टता जगत्में अनर्थ या जञ्जाल लाती है। श्रील जीवप्रभुकृत प्रीतिसन्दर्भ (संख्या ६६)में- “भगवत्प्रीतिरूपा वृत्तिर्मायादिमयी न भवति; किन्तु स्वरूपशक्त्यानन्दरूपा, यदानन्दापराधीनः श्रीभगवानपीति।” तथा (संख्या ६९)में- “तदेवं प्रीतिलक्षणं चित्तद्रवस्तस्य च रोमहर्षादिकम्। कथञ्चिज्जातेऽपि चित्तद्रवे रोमहर्षादिके वा न चेदाशयशुद्धिस्तदापि न भक्तेः सम्यगाविर्भाव इति ज्ञापितम्। आशयशुद्धिर्नाम चान्यतात्पर्य परित्यागः प्रीतितात्पर्यञ्च। अतएवानिमित्ता स्वाभाविकी चेति तद्विशेषणम्।” भगवत्-प्रेमरूपी वृत्ति कभी भी मायामयी नहीं, अपितु आनन्दरूपा स्वरूपशक्ति है; क्योंकि श्रीभगवान् भी आनन्द-पराधीन हैं। वैसा होनेपर इस प्रकार प्रीतिका लक्षण ही चित्तका द्रवित होना और उसके फलस्वरूप रोमहर्षादि विकारका प्रकट होना है। कुछ परिमाणमें चित्त-द्रवित या रोमहर्षादि होनेपर भी अन्तःकरण-शुद्ध ना होनेपर भक्तिका सम्यक् आविर्भाव नहीं हुआ है, ऐसा समझना होगा। 'अन्तःकरण-शुद्धि' का अर्थ श्रीकृष्णसेवासे इतर अन्य तात्पर्यका परित्याग और श्रीकृष्णसे प्रीति-तात्पर्य है। इसलिये 'अहैतुकी' और 'स्वाभाविकी' इसका विशेषण है॥८८॥ स्वेद, कम्प, रोमाञ्चाश्रु, गदगद, वैवर्ण्य। उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥८९॥ एतभावे प्रेमा भक्तगणेरे नाचाय। कृष्णेर आनन्दामृतसागरे भासाय ॥ ९० ॥ अनुवाद - स्वेद अर्थात् शरीरमें पसीना आना, कम्प, रोमाञ्च अर्थात् रोमावली पुलकित होना, नेत्रोंसे अश्रु बहना, वाणी गद्गद् होना, वैवर्ण्य अर्थात् रङ्गका परिवर्तित होना - ये सात्त्विकभाव और उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व, हर्ष और दैन्य - ये व्यभिचारीभाव, इस भावोंमें प्रेम भक्तोंको नचाता है और उन्हें श्रीकृष्णके आनन्दामृतरूपी समुद्रमें डुबो देता है ॥ ८९-९० ॥ शिष्यके प्रति गुरुका कर्त्तव्योपदेश :- भाल हैल, पाइले तुमि परमपुरुषार्थ। तोमार प्रेमेते आमि हैलाङ कृतार्थ ॥ ९१ ॥ नाच, गाओ, भक्तसङ्गे कर सङ्कीर्त्तन। कृष्णनाम उपदेशि' तार' सर्वजन ॥ ९२ ॥ अनुवाद - यह बहुत अच्छा हुआ कि तुमने परमपुरुषार्थ श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त किया है और