भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 452

[ ७/८४-८८ श्रुतिमें कहा है—'सर्वदा एनम् उपासित यावद्विमुक्तिः। मुक्ता अपि हि एनम् उपासते॥' प्रश्न हो सकता है कि मुक्तिके बाद भी उपासनाका विधान कहाँ लिखा है और फल भी क्या है? इसके उत्तरमें कह रहे है कि मुक्तिके बाद भी उपासनाका विधान ना होनेपर भी और विधान नहीं है—ऐसा कहकर फलकी बात ना उठनेपर भी वस्तुके सौन्दर्य प्रभावसे ही मुक्त व्यक्ति भजनमें प्रवृत्त होते हैं। जैसे पीलियाका रोगी मिश्री खानेके फलस्वरूप पीलिया ठीक हो जानेपर भी मिश्रीके मिठासकी ओर आकृष्ट होकर उसकी मिश्री खानेकी प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। तात्पर्य यह है कि भगवान्‌के सौन्दर्य, माधुर्य आदिके द्वारा आकृष्ट होकर मुक्त व्यक्ति भी भगवद्भजन करते हैं। “मुक्तोपसृप्यव्यपदेशात्॥” इस (१/३/२) वेदान्तसूत्रसे यही बात जानी जाती है। इस सूत्रके अर्थमें श्रीजीव गोस्वामीने लिखा है—“मुक्तानामेव सतामुपसृप्यं ब्रह्म यदि स्यात्तदेवाक्लेशेन सङ्गच्छते। अर्थात् ब्रह्ममुक्त-साधुओंकी उपसृप्य अर्थात् गति, इस प्रकार अर्थ करनेपर ही अक्लेशसे अर्थसङ्गति होती है। सर्वसम्वादिनी। १३० पृः।" उक्त सूत्रके माधवभाष्यमें भी कहा गया है, “मुक्तानां परमा गतिः।—ब्रह्म मुक्त पुरुषोंकी भी परमा गति है।” इन सबसे भी समझा जाता है—रसस्वरूप परब्रह्मकी उपासनाके लिये मुक्त पुरुषोंकी लालसा जाग्रत होती है। इस परम लोभनीय वस्तुके आस्वादनका एकमात्र उपाय प्रेम है, इसलिये यह चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षकी अपेक्षा भी श्रेष्ठ पुरुषार्थ है। इस श्रीकृष्णप्रेमरूपी पुरुषार्थके द्वारा जो वस्तु प्राप्त की जाती है, वह ही चरमतम काम्य वस्तु है, इसलिये यह पुरुषार्थ भी परम पुरुषार्थ है॥८४॥ श्रीकृष्णनामका फल :— कृष्णनामेर फल—'प्रेमा,' सर्वशास्त्रे कय। भाग्ये सेइ प्रेमा तोमाय करिल उदय॥८६॥ अनुवाद—सभी शास्त्र कहते हैं कि प्रेम ही श्रीकृष्णनामका फल है। परम सौभाग्यसे तुम्हारे भीतर यह प्रेम उदित हुआ है॥८५-८६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'धर्म', 'अर्थ', 'काम', 'मोक्ष',—ये चार प्रकारके पुरुषार्थ हैं। श्रीकृष्णप्रेम पञ्चम पुरुषार्थ है। इसके एक बिन्दुके साथ मोक्षकी प्रथमावस्था ब्रह्मानन्दादिकी तुलना नहीं हो सकती। धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष,—ये सब श्रीकृष्णनामके फल नहीं हैं। सभी शास्त्रोंके अनुसार श्रीकृष्णप्रेम ही श्रीकृष्णनामका एकमात्र फल है॥८४-८६॥ श्रीकृष्णप्रेमका धर्म :— प्रेमार स्वभावे करे चित्त-तनु क्षोभ। कृष्णेर चरण-प्राप्त्ये उपजाय लोभ॥८७॥ प्रेमार स्वभावे भक्त हासे, कान्दे, गाय। उन्मत्त हइया नाचे, इति-उति धाय॥८८॥ अनुवाद—प्रेमका यह स्वभाव है कि वह साधकके चित्त और शरीरको क्षोभित करके उनमें दिव्य लक्षणोंको प्रकाश करता है तथा उसके हृदयमें श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्तिका लोभ उत्पन्न करता है। प्रेमका स्वभाव ही ऐसा है कि भक्त कभी हँसता है, कभी रोता है, कभी गान करता है और कभी पागलकी भाँति नाचता तथा कभी इधर-उधर भागता है॥८७-८८॥ ४१० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत