श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें७/८४-८५ ] अस्मितामें (अर्थात् इस नश्वर देहमें 'मैं' के भावमें) बुभुक्षु (भुक्तिकामी) और मुमुक्षु (मुक्तिकामी) का धर्म अवस्थित है। परन्तु भगवत्प्रेम आत्माका नित्य, अविकृत धर्म है; इसलिये भुक्ति-मुक्तिरूप चतुर्वर्गके प्रयोजन-विचारका मूल्य प्रेमकी तुलनामें कुछ भी नहीं है॥८४॥ अमृताणुकणिका-शास्त्रमें चार पुरुषार्थ वर्णित हैं-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। धर्म-अर्थ-कामरूपी त्रिवर्गसे प्राप्त जड़सुखसे चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्षके द्वारा प्राप्त ब्रह्मसुखका अपूर्व वैशिष्ट्य है। यह ब्रह्मसुख निर्विशेष ब्रह्मानन्द है। निर्विशेष ब्रह्ममें स्वरूपशक्तिका विलास नहीं होनेसे आनन्दकी वैचित्री नहीं है। आस्वादन-चमत्कारिताकी वैचित्री भी नहीं है। यह ब्रह्मसुख केवल आनन्दसत्ता मात्र है। इसलिये ब्रह्मानन्द लोभनीय होनेपर भी परम लोभनीय वस्तु नहीं है। वह वस्तु क्या है? जिस वस्तुमें ब्रह्मतत्त्वकी चरमतम अभिव्यक्ति है, वही परम लोभनीय वस्तु है। श्रुतिमें ब्रह्मको रसस्वरूप कहा गया है। ब्रह्मकी स्वाभाविक स्वरूपशक्तिकी अभिव्यक्तिके तारतम्यके अनुसार ही रसका भी तारतम्य होता है। रसका विकास जितना अधिक होगा आस्वाद्यका, आस्वादन-चमत्कारिताका और लोभनीयताका विकास भी उतना अधिक होगा। निर्विशेष ब्रह्ममें शक्तिका विकास न्यूनतम होनेके कारण रसका भी न्यूनतम विकास है। शक्तिके असमोध्र्व विकासके कारण श्रीकृष्णमें रसका चरमतम विकास है। इसलिये श्रीकृष्ण-माधुर्यका आस्वादनजनित आनन्द निर्विशेष-ब्रह्मानन्दकी अपेक्षा कोटि-कोटि गुना अधिक लोभनीय है। श्रीमद्भागवत (१/७/१०)- “आत्मारामश्च मुनयो निर्ग्रन्था अप्युरुक्रमे। कुर्वन्त्यहैतुकीं भक्तिमित्थम्भूतगुणो हरिः॥” अर्थात् “ब्रह्मानन्द-सुखमें मग्न एवं आत्मामें ही रमण करनेके कारण जिनकी अविद्याकी गाँठ खुल गयी है, वे मुनिगण भी क्रोध-मोह-अहङ्कारादिसे मुक्त होकर निष्काम भावसे अमित-विक्रम श्रीहरिकी भक्ति करते रहते हैं, क्योंकि भगवान् श्रीहरिके गुण ही ऐसे हैं जिससे वे आत्मारामगणोंको भी आकर्षित कर लेते हैं।” इस माधुर्यका आकर्षण इतना अधिक है कि पतिव्रता शिरोमणि लक्ष्मी भी इसके प्रति आकर्षित हो जाती हैं। श्रीकृष्णकी असमोध्र्व माधुरीका आस्वादन करनेका एकमात्र उपाय प्रेमाभक्ति है। ब्रह्म-सायुज्य-प्राप्त जीवोंमें भी इस प्रेमकी प्राप्तिके लिये भजनकी कथा सुनी जाती है। “मुक्ता अपि लीलया विग्रहं कृत्वा भगवन्तं भजन्ते। नृसिंहतापनी (२/५/१६) का शङ्करभाष्य।” मुक्त पुरुषोंके भगवद्भजनकी बात वेदान्तमें भी देखी जाती है। “आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्॥ ब्रह्मसूत्र ४/१/१२॥” इसके गोविन्द भाष्यमें लिखा है-किसी श्रुतिमें लिखा है-'मुक्तितक उपासना कर्त्तव्य है' और किसी श्रुतिमें लिखा है-'मुक्तिके बाद भी उपासना कर्त्तव्य है।' इस परस्पर विरुद्ध उपदेशकी मीमांसाके उद्देश्यसे ही व्यासदेवजीने इस वेदान्त सूत्रमें कहा है-'आप्रायणात्'-मुक्तिलाभ तक उपासना अवश्य ही करनी चाहिये। 'तत्रापि'-मोक्षावस्थामें भी अर्थात् मुक्तिलाभके बाद भी उपासना करनी होगी। 'हि'-क्योंकि, 'दृष्टम्'-श्रुतियोंमें सब समय ही उपासनाकी विधि दिखलायी देती है। मुक्तावस्थामें भी उपासनाका कारण यह है कि श्रुतियाँ कहती हैं-सर्वावस्थामें ही सब समय ही (इसलिये मुक्तावस्थामें भी) उपासना करेंगे, जैसे सौपर्ण सातवाँ अध्याय | ४०९