भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ ७/८३-८५ श्रीकृष्णनामका धर्म :- 'कृष्णनाम-महामन्त्रेर एइ त' स्वभाव। येइ जपे, तार कृष्णे उपजये भाव॥८३॥ अनुवाद—'श्रीकृष्णनाम महामन्त्रका यही स्वभाव है। जो इस महामन्त्रका जप करता है, यह उसमें श्रीकृष्णके प्रति प्रेम उत्पन्न कर देता है॥८३॥ अनुभाष्य—श्रीगुरुदेवके नाम गान करनेसे वही श्रीनाम शिष्यके कर्णकुहरमें (कानोंमें) प्रविष्ट होता है। श्रीगुरुदेवके अनुसरणमें सुने हुए श्रीनामको श्रद्धाके साथ हृदयमें स्थापितकर जपके द्वारा नामकी पूजा की जाती है। श्रीनाम पूजित होनेपर वे स्वयं ही अपने स्वाभाविक धर्मका विस्तारकर नामजपकारीको कीर्त्तनका अधिकार प्रदान करते हैं। उसी समयमें ही वे (नामजपकारी) नाम गान करके समग्र जगत्को शिष्य करनेमें समर्थ होते हैं। जगत् नामकीर्त्तनके शासन प्रभावसे श्रीकृष्णनाम-जप आरम्भ करता है। जपते-जपते जपकारीकी हास्य, क्रन्दन, नृत्य और कीर्त्तनादि नामभजनकी प्रणाली परिस्फुट होती है। परन्तु कोई-कोई मूर्खतावशतः “हरेकृष्ण” सोलह नाम-बतीस अक्षरको महामन्त्र ना जानकर उसे केवल जप्यमन्त्र मानकर उस महामन्त्रके (उच्च) कीर्त्तनमें बाधा प्रदान अर्थात् निषेध करते हैं। इसलिये प्रेमको प्राप्त किये हुए व्यक्ति श्रीकृष्णनाम गान करके भक्तोंके साथ श्रीकृष्णनामका सम्यक् कीर्त्तन अर्थात् सभी मिलकर सङ्कीर्त्तन करते हैं; उस प्रकार कीर्त्तनके फलस्वरूप जगत्के सभी लोग श्रीकृष्णनामका उपदेश लाभ करते हैं। नाम-श्रवण, नाम-कीर्त्तनके साथ ही साथ नाम-स्मरण होता है। नाम और नामी अभिन्न होनेके कारण श्रीकृष्णनाम जपके प्रभावसे श्रीकृष्णवस्तुमें सेवाप्रवृत्तिका उदय होता है—इसीको ही 'भाव' नामसे कहा जाता है। जातभाव लोग अविद्या-बन्धनग्रस्त तथा अनर्थयुक्त नहीं होते हैं। वे लोग जातरति हैं, इसलिये भावके साथ चार सामग्रियोंके सम्मिलनमें उदित रसका आस्वादन करते हैं। भावकी घनीभूत अवस्था ही 'प्रेम' है। श्रीकृष्णनाम—महामन्त्र है। पाञ्चरात्रिक मन्त्रसमूह—'मन्त्र' नामसे जाने जाते हैं। भगवन्नाम 'महामन्त्र' के रूपमें प्रसिद्ध है॥८३॥ चतुर्वर्ग और श्रीकृष्णप्रेम :- कृष्णविषयक प्रेमा—परम पुरुषार्थ। यार आगे तृणतुल्य चारि पुरुषार्थ॥८४॥ पञ्चम पुरुषार्थ—प्रेमानन्दामृतसिन्धु। ब्रह्मादि आनन्द यार नहे एक बिन्दु॥८५॥ अनुवाद—श्रीकृष्णविषयक प्रेम प्राप्त करना ही परम पुरुषार्थ है, जिसके आगे धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष—ये चारों पुरुषार्थ तिनकेकी भाँति हैं। पञ्चम पुरुषार्थ श्रीकृष्णप्रेम आनन्दके अमृतका समुद्र है, जिसके एक बिन्दुके साथ भी ब्रह्मानन्दकी तुलना नहीं हो सकती॥८४-८५॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णप्रेम जीव-प्रयोजनका सर्वश्रेष्ठ भाव है। धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी जीवके प्रयोजनके साथ पञ्चम पुरुषार्थ प्रेमकी तुलना करनेपर तारतम्यसे भुक्ति-मुक्तिकामियोंके द्वारा प्राप्त वस्तुओंको नश्वर और नगण्य रूपमें जाना जा सकता है। नश्वर उपाधिगत ४०८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत