श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
अनुभाष्य - श्रीकृष्णप्रेमहीन अभक्तगण जो अपनी इन्द्रियोंकी चञ्चलता दिखाकर हास्य, क्रन्दन, नृत्य और गीत आदिमें उन्मत्त होते हैं, यह उनके अमङ्गल प्राप्तिका ही परिचय मात्र है। कृत्रिम शारीरिक और इन्द्रिय-चाञ्चल्य भजनशील साधकोंके लिये सम्पूर्णरूपसे परित्यागका विषय है। आत्माकी स्वाभाविकी वृत्तिके उदयमें जो भाव और प्रेम उपस्थित होता है, उससे ही हास्य, क्रन्दन, गान, नृत्य और उत्कण्ठा उदित होते हैं। ये सभी सेवोन्मुख भक्तकी अकृत्रिम (स्वाभाविक) चेष्टा है। अजातप्रेम व्यक्तियोंकी भक्तोंकी उच्चपदवी ग्रहण करनेकी धृष्टता जगत्में अनर्थ या जञ्जाल लाती है। श्रील जीवप्रभुकृत प्रीतिसन्दर्भ (संख्या ६६)में- “भगवत्प्रीतिरूपा वृत्तिर्मायादिमयी न भवति; किन्तु स्वरूपशक्त्यानन्दरूपा, यदानन्दापराधीनः श्रीभगवानपीति।” तथा (संख्या ६९)में- “तदेवं प्रीतिलक्षणं चित्तद्रवस्तस्य च रोमहर्षादिकम्। कथञ्चिज्जातेऽपि चित्तद्रवे रोमहर्षादिके वा न चेदाशयशुद्धिस्तदापि न भक्तेः सम्यगाविर्भाव इति ज्ञापितम्। आशयशुद्धिर्नाम चान्यतात्पर्य परित्यागः प्रीतितात्पर्यञ्च। अतएवानिमित्ता स्वाभाविकी चेति तद्विशेषणम्।” भगवत्-प्रेमरूपी वृत्ति कभी भी मायामयी नहीं, अपितु आनन्दरूपा स्वरूपशक्ति है; क्योंकि श्रीभगवान् भी आनन्द-पराधीन हैं। वैसा होनेपर इस प्रकार प्रीतिका लक्षण ही चित्तका द्रवित होना और उसके फलस्वरूप रोमहर्षादि विकारका प्रकट होना है। कुछ परिमाणमें चित्त-द्रवित या रोमहर्षादि होनेपर भी अन्तःकरण-शुद्ध ना होनेपर भक्तिका सम्यक् आविर्भाव नहीं हुआ है, ऐसा समझना होगा। 'अन्तःकरण-शुद्धि' का अर्थ श्रीकृष्णसेवासे इतर अन्य तात्पर्यका परित्याग और श्रीकृष्णसे प्रीति-तात्पर्य है। इसलिये 'अहैतुकी' और 'स्वाभाविकी' इसका विशेषण है॥८८॥ स्वेद, कम्प, रोमाञ्चाश्रु, गदगद, वैवर्ण्य। उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व, हर्ष, दैन्य ॥८९॥ एतभावे प्रेमा भक्तगणेरे नाचाय। कृष्णेर आनन्दामृतसागरे भासाय ॥ ९० ॥ अनुवाद - स्वेद अर्थात् शरीरमें पसीना आना, कम्प, रोमाञ्च अर्थात् रोमावली पुलकित होना, नेत्रोंसे अश्रु बहना, वाणी गद्गद् होना, वैवर्ण्य अर्थात् रङ्गका परिवर्तित होना - ये सात्त्विकभाव और उन्माद, विषाद, धैर्य, गर्व, हर्ष और दैन्य - ये व्यभिचारीभाव, इस भावोंमें प्रेम भक्तोंको नचाता है और उन्हें श्रीकृष्णके आनन्दामृतरूपी समुद्रमें डुबो देता है ॥ ८९-९० ॥ शिष्यके प्रति गुरुका कर्त्तव्योपदेश :- भाल हैल, पाइले तुमि परमपुरुषार्थ। तोमार प्रेमेते आमि हैलाङ कृतार्थ ॥ ९१ ॥ नाच, गाओ, भक्तसङ्गे कर सङ्कीर्त्तन। कृष्णनाम उपदेशि' तार' सर्वजन ॥ ९२ ॥ अनुवाद - यह बहुत अच्छा हुआ कि तुमने परमपुरुषार्थ श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त किया है और
[ ७/९१-९४ तुम्हारे इस प्रेम प्राप्त होनेसे मैं भी कृतार्थ हो गया हूँ। अब नाचो-गाओ और भक्तोंके साथ सङ्कीर्तन करो। इस प्रकार सभीको श्रीकृष्णनामका उपदेश देकर उनका उद्धार करो॥'९१-९२॥ अनुभाष्य-जिन लोगोंने श्रीगुरुदेवकी दृष्टिमें अधिकार प्राप्त किया है, उन्हींको ही श्रीगुरुदेव सजातीय-आशयस्निग्ध भजनपरायण हरिभक्तोंके साथ नृत्य, गीत और सङ्कीर्तनादिमें अधिकार प्रदान करते हैं। वे लोग ही श्रीगुरुदेवका पदानुसरण करके अपने भजन-ज्ञानसे जगत् उद्धार कार्योंमें नियुक्त होते हैं। अनधिकारी व्यक्ति निर्जनमें श्रीकृष्णनाम जप करेंगे। इस प्रकार उपासनामें अन्यके साथ सङ्गादि नहीं है। अधिकार होनेपर ही जनसङ्ग अशुभफल नहीं ला सकता; पक्षान्तरमें, बहिर्मुखलोग भी नामकी कृपा प्राप्त करनेमें समर्थ होते हैं। इस प्रसङ्गमें-“नैतत् समाचरेज्जातु मनसापि ह्यनीश्वरः”* या “अनासक्तस्य विषयान् यथार्हमुपयुञ्जतः। निर्बन्ध कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते॥”** आदि श्लोक आलोच्य हैं॥९२॥ एत बलि' एक श्लोक शिखाइल मोरे। भागवतेर सार एइ-बले बारे बारे॥९३॥ अनुवाद-श्रीगुरुदेवने यह कहकर मुझे एक श्लोक सिखलाया और बार-बार कहा कि यह श्लोक श्रीमद्भागवतका सार है॥९३॥ महाभागवतकी अवस्था :- श्रीमद्भागवत (११/२/४०) एवंव्रतः स्वप्रियनामकीर्त्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः। हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः॥९४॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णसेवा-व्रतधारी पुरुष अवशचित्त होकर अर्थात् अब उसका चित्त उसके वशमें नहीं है, प्रियतम श्रीकृष्णके नामकीर्त्तनमें राग उत्पन्न होनेके कारण शिथिल-हृदय हो जाता है। वह लोक-व्यवहारकी अपेक्षासे रहित होकर उन्मत्तकी भाँति कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता और कभी गान-नृत्य करता है॥९४॥ अनुभाष्य-वसुदेवजीके द्वारा श्रीनारद मुनिसे भगवद्धर्म सुननेकी इच्छा करनेपर उन्होंने ऋषभदेवके नौ पुत्र नवयोगेन्द्र और विदेहराज निमिके उपाख्यानका वर्णन किया। इस प्रसङ्गमें नवयोगेन्द्रोंमें अन्यतम 'कवि'ने निमि महाराजसे कहा- *“श्रीकृष्णसे अतिरिक्त किसी प्राणीको श्रीकृष्णकी लीलाओंका (वाक्य अथवा कर्मके द्वारा तो दूरकी बात है) मनसे भी कभी भी आचरण नहीं करना चाहिये।” (भाः १०/३३/३१) **“विषयोंमें अनासक्त होकर अपनी भक्तिके अनुकूल यथा-उपयुक्त विषय-भोग करते हुए श्रीकृष्णकी भक्तिके सम्बन्धमें विशेष आग्रह रखना 'युक्त-वैराग्य' कहलाता है।” (भःरःसिः १/२/२५५) ४१२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
एवंव्रतः (श्रवणकीर्त्तनादिरूपं सेवनव्रतं यस्य सः) स्वप्रियनामकीर्त्या (स्वस्य प्रियस्य भगवतः नामकीर्त्तनादिना) जातानुरागः (जातः अनुरागः यस्य सः जातरतिः, अतएव) द्रुतचित्तः (उत्कण्ठितहृदयः) उन्मादवत् लोकबाह्यः (लोकानां बाह्यः हास्यनिन्दास्तुत्यादिषु अपेक्षारहितः सन्) उच्चैः हसति, अथो रोदिति, रौति (क्रोशति), गायति, नृत्यति च। श्लोक-भावानुवाद—जिसने श्रीकृष्णविषयक श्रवण-कीर्तनादि सेवाव्रत धारण किया है, अपने प्रियतम श्रीकृष्णके नाम-कीर्तनादिसे वह जातरति भक्त हृदयमें प्रबल उत्कण्ठाके कारण लोगोंके हास्य-निन्दा-स्तुति आदिसे अनपेक्षित उन्मत्तकी भाँति कभी उच्च हास्य, कभी रोदन, कभी चीत्कार, कभी गान और नृत्य करता है॥९४॥ अमृतानुकणिका—'एवंव्रत'-इस प्रकार भजन करते-करते उसके फलस्वरूप प्रेमभक्तियोगमें संसार-धर्मसे अतीत चेष्टाएँ-इस प्रकार व्रत जिनका है, उन्हें यहाँ एवंव्रत कहा गया है। भक्तिके अङ्गोंमें भी नाम-सङ्कीर्तन सर्वोत्कृष्ट है। 'स्वप्रियनामकीर्त्या'—अपने प्रिय नामके कीर्तनके द्वारा। स्वप्रिय नाम शब्दके दो प्रकार अर्थ हो सकते हैं—अपने प्रिय जो श्रीकृष्ण हैं उनका नाम अथवा अपना प्रिय जो भगवत्-नाम; श्रीहरिके असंख्य नाम हैं, उनमेंसे जो नाम जिस भक्तको सर्वपेक्षा प्रिय है, वही नाम। जैसे श्रीहरिभक्तिविलास (११/३०४)— “सर्वार्थशक्तियुक्तस्य देवदेवस्य चक्रिणः। यथाभिरोचते नाम तत् सर्वार्थेषु कीर्त्तयेत्॥” अर्थात् “भगवान् देवादेव चक्रधारी सर्वार्थ-शक्तिविशिष्ट हैं, इसलिये अपने अभिरुचि अनुरूप उनके नामोंका कीर्तन विषय-सिद्धि हेतु करना चाहिये।” इस श्लोककी टीकामें श्रीसनातन गोस्वामी लिखते हैं— “यस्य च यन्नाम्नि प्रीतिः तेन तदेव सेव्य, तेनैव तस्य सर्वार्थसिद्धिरित्याह।” अर्थात् “जिसकी जिस नाममें प्रीति है, वही उसके सेव्य हैं और उन्हींसे उसकी सर्वार्थ सिद्धि होती है।” निरन्तर नामकीर्तनके फलसे चित्तकी समस्त मलिनता पूर्णतया दूर होकर जिसके चित्तमें प्रेमका आविर्भाव होता है, उसे ही जातानुराग अथवा जातप्रेम भक्त कहते हैं। “नित्यसिद्ध कृष्णप्रेम साध्य कभु नय। श्रवणादि-शुद्ध चित्ते करये उदय॥” 'द्रुतचित्त'—प्रेमके उदय होनेपर श्रीकृष्ण दर्शन प्राप्तिकी भक्तके हृदयमें बलवती उत्कण्ठा जाग्रत होती है। बलवती तीव्र उत्कण्ठारूप अग्निके तापसे भक्तका चित्त द्रवीभूत हो जाता है। उस तीव्र उत्कण्ठाके फलस्वरूप श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य किसी विषयमें भक्तका अभिनिवेश नहीं रहता। इसलिये वह 'लोकबाह्य'—लोकापेक्षाशून्य अर्थात् मान-अपमान आदि विषयमें असावधान हो जाता है। 'मेरे इस प्रकार आचरणको देखकर लोग क्या कहेंगे?'-इस प्रकारका विचार उसके मनमें नहीं आता। 'उन्मादवत्'—पागलके जैसे। किसी भी प्रकारसे लोकापेक्षा ना करके जो मनमें आये, वही जो व्यक्ति बोलता अथवा करता है, उसको ही लोग साधारणतः उन्मादी या पागल कहते हैं। जातप्रेम भक्तका लक्षण भी उसी प्रकार है, किन्तु वह उन्माद नहीं है। उन्मादित व्यक्तिका और जातप्रेम भक्तका भेद इस प्रकार है—उन्मादित व्यक्तिकी लोक-अनपेक्षा उसकी मस्तिष्ककी विकृतिका फल है। किन्तु जातप्रेम भक्तकी लोक-अनपेक्षा मस्तिष्ककी विकृतिका फल नहीं, परन्तु श्रीकृष्ण विषयमें ऐकान्तिक निविष्ट-चित्तताके कारण अन्य समस्त विषयोंसे अनाकृष्ट
[ ७/९४-९६ होकर श्रीकृष्ण विषयमें चित्तवृत्तिसमूह केन्द्रीभूत होनेका फल है। यद्यपि बाह्य दृष्टिसे दोनोंके लक्षण प्रायः एक जैसे दिखायी देते हैं, तथापि जातप्रेम भक्तको उन्माद ना कहकर उन्मादवत् कहा गया है। जातप्रेम भक्तका हृदय प्रायः श्रीकृष्णकी किसी-न-किसी एक लीलामें आविष्ट रहता है। आविष्ट अवस्थामें उसकी अनुभूति इस प्रकार होती है—जैसे वह श्रीकृष्णकी लीलास्थानमें निकट ही है और लीलाके अनुकूल आचरण भी कर रहा है। उस समय उसको यह ज्ञान नहीं रहता कि वह इस प्राकृतिक ब्रह्माण्डमें है, इसलिये इस जगत्का कोई भी विषय उसे अपनी ओर आकर्षित नहीं कर सकता। 'हसति'—हास्योद्दीपक किसी भी लीलाकी स्फूर्तिसे जातप्रेम भक्त कभी भी 'हो-हो' शब्दसे उच्च स्वरसे हँसने लगता है। जैसे बालक श्रीकृष्णने माखनचोरी करनेके लिये किसी गोपीके घरमें प्रवेश किया। गृहस्वामिनी वृद्धा गोपी उनकी आहट पाकर 'माखन चोरको पकड़ो', 'माखन चोरको पकड़ो', कहती हुयी दौड़ती हुई आयी। उसके शब्दोंको सुनकर श्रीकृष्ण भयसे भागनेकी चेष्टा करने लगे। जातप्रेम भक्तके चित्तमें इस लीलाकी स्फूर्ति होनेपर भागते हुए श्रीकृष्णको साक्षात् अनुभव करके वह हास्यको संवरण नहीं कर पाता और हँसने लगता है। 'रोदिति'—और कभी ऐसी लीलाकी स्फूर्तिमें जब वह श्रीकृष्णके साक्षात् दर्शन करता है, तो स्फूर्तिके तिरोहित होनेपर साक्षात् श्रीकृष्णको नहीं देख पानेके कारण दुःखसे हाय-हाय श्रीकृष्ण कहाँ गये, अभी तो यहाँ थे, अब कहाँ चले गये? मैने तो अपने हाथमें एक महानिधि प्राप्तकी थी, किस स्थानपर और किस प्रकारसे वह मेरे हाथसे छूट गयी, क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? आदि बोलते-बोलते वह आर्त्तिमें रोने लगता है। 'रौति'—कभी श्रीकृष्ण विरहमें अधीर होकर “हे प्रभु! आप कहाँ हो? एक बार दर्शन दे दो, मेरी बातका उत्तर तो दो, आदि बोलते हुए वह कभी चीत्कार करता है। 'गायति'—कभी श्रीकृष्णके रूप, गुण, लीला आदिका गुणगान करते हुए श्रीकृष्णको साक्षात् रूपमें अनुभव करता है। 'नृत्यति'—श्रीकृष्णको साक्षात् रूपमें अनुभव करके आनन्दके उद्रेकके कारण नृत्य करने लगता है। यहाँ यह स्मरण रखने योग्य है कि जातप्रेम भक्तका हास्य-रोदन-नृत्य-गीत आदि उसकी इच्छाके अधीन नहीं है। भूतग्रस्त व्यक्तिका जैसे अपने ऊपर कोई वश नहीं होता, जातप्रेम भक्त भी अपनी इच्छासे ऐसा आचरण नहीं करता। बाजीगर जैसे पुतलियोंको नचाता है, प्रेम भी वैसे ही जातप्रेम भक्तको नृत्य कराता है। विवश चित्तसे भक्त यह सब करता है, अथवा प्रेमके उदय होनेपर जो अनिर्वचनीय आनन्दका आविर्भाव होता है, उसकी ही प्रेरणासे भक्त कभी हँसता, कभी रोता, कभी चीत्कार करता है॥९४॥ गुरुकी आज्ञासे भजनमें दृढ़ चेष्टा :— एइ ताँर वाक्ये आमि दृढ़ विश्वास धरि'। निरन्तर कृष्णनाम सङ्कीर्त्तन करि॥९५॥ भजनके फलस्वरूप स्वतः कर्तृत्वमय श्रीनाम-प्रभुकी कृपा :— सेइ कृष्णनाम कभु गाओयाय, नाचाय। गाहि, नाचि नाहि आमि आपन-इच्छाय॥९६॥ ४१४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/९५-९७ ] अनुवाद—अपने गुरुदेवके इस वाक्यमें दृढ़तापूर्वक विश्वास रखकर मैं निरन्तर श्रीकृष्णनामका सङ्कीर्तन करता हूँ। वही श्रीकृष्णनाम कभी मुझसे गान कराता है, तो कभी मुझे नचाता है। मैं अपनी इच्छासे यह नृत्य-गीतादि नहीं करता हूँ॥ ९५-९६॥ अनुभाष्य—श्रीगुरुदेवके वचनोंपर विश्वास ना कर पानेके कारण जो व्यक्ति अपने अधिकारका विपर्यय करते हैं, वे नाम-सङ्कीर्तनमें अधिकार प्राप्त नहीं कर पाते। “यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ। तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशन्ते महात्मनः॥” अर्थात् “जिनकी श्रीभगवान्में पराभक्ति है और श्रीभगवान्के समान ही श्रीगुरुदेवके प्रति भी शुद्धभक्ति है, उसी महात्माके हृदयमें श्रुतियोंके सभी मर्मार्थ प्रकाशित होते हैं।” इस श्रुतिवाक्यका समर्थन करते हुए श्रीगौरसुन्दरने श्रीकृष्ण-सङ्कीर्तन प्रारम्भ किया था। आनुगत्य धर्मकी रीतिके अनुसार उन्होंने गुरुदेवकी अवज्ञा ना करते हुए निरन्तर ही नामसङ्कीर्तन किया। वैसे श्रीकृष्णनाम-प्रभुके कीर्तनने स्वयं इच्छा-शक्तिका सञ्चालन करते हुए श्रीगौरसुन्दरकी नृत्य-गीत करनेमें रुचि उत्पन्न की थी। श्रीगौरसुन्दरने श्रीनामको कोई जड़पदार्थ समझकर उसके प्रति अनुग्रहपूर्वक कीर्तन नहीं किया। जो लोग अपनी इन्द्रियोंकी चञ्चलता-वशतः श्रीकृष्णनामको अपने खिलौनेकी भाँति समझते हैं और श्रीनामसेवाके बदले नामके प्रभु बनकर कर्तृत्व दिखाना चाहते हैं, वे लोग भजनके बदले कर्मफलभोगमें वशीभूत होकर पित्तवृद्धि करवाकर शारीरिक अस्वस्थताको आमन्त्रित करते हैं। (महाप्रभुकी उक्ति)—'मैं हिताहित-विवेकहीन मूर्ख हूँ। वेदान्तका शुद्ध अर्थ अन्वेषण करते समय श्रीशङ्कराचार्यके द्वारा प्रचारित मायावाद-कुतर्क आकर मेरी नैसर्गिक भजनवृत्तिको नष्ट कर देगा—इसी आशङ्कासे मैंने जाना कि मेरा शाङ्कर-व्याख्यायुक्त वेदान्तमें अधिकार नहीं है। इसलिये मैं श्रीकृष्णमन्त्र जपके द्वारा ही संसारके अनर्थोंसे निवृत्त होकर मुक्तकुलोंके उपास्य श्रीकृष्णनामको ग्रहण करता हूँ जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्णके चरणकमलोंकी प्राप्ति होती है। विवादमय कलिकालमें नामग्रहणके अतिरिक्त दूसरा कोई धर्म नहीं है। श्रीगुरुदेवसे यह सब आज्ञा प्राप्त करके नामग्रहणके फलसे मैं उन्मत्तप्रायः हो गया था। बादमें पुनः उनसे प्रश्नकर मैं यह जान पाया कि धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष-फल-आकाङ्क्षाकारियोंकी क्षुद्र आशाकी अपेक्षा परम-कल्याणकारी परमपुरुषार्थरूप प्रेमाधिकार प्राप्त होनेपर जीवका जो कल्याण होता है, उसकी तुलना नहीं है। जात-प्रेम व्यक्ति अपने स्वभावसे लोकलज्जाकी उपेक्षाकर उच्चस्वरसे हास्य, रोदन, गान और नर्तनादिके साथ श्रीकृष्णकीर्तन करते हैं, इसीको ही मैं 'भागवतजीवन'के (भक्तके जीवनके) रूपमें जानता हूँ। मैंने कृत्रिमरूपसे कपटताका आश्रयकर कोई कार्य नहीं किया। गुरुदेवके वाक्योंमें दृढ़विश्वासयुक्त होकर श्रीकृष्णकीर्तन करता हूँ। श्रीनामने ही मुझे कौपीनधारी वैदान्तिकोंके गाम्भीर्यके प्रतिपक्षमें (विरोधमें) गायक और नर्तक बना दिया। इसमें मेरा स्वतःकर्त्तृत्व या प्रेरणा अल्पमात्र है—यह सब कुछ श्रीनामप्रभुकी कृपा ही है॥ ९५-९६॥ ब्रह्मानन्द और श्रीकृष्णप्रेमानन्दका पार्थक्य :— कृष्णनामे ये आनन्दसिन्धु-आस्वादन। ब्रह्मानन्द तार आगे खातोदक-सम ॥ ९७॥ सातवाँ अध्याय | ४१५
[ ७/९७-१०१ अनुवाद—श्रीकृष्णनाममें जिस आनन्द-समुद्रका आस्वादन होता है, ब्रह्मानन्द उसके सामने एक छोटेसे गड्ढेमें पड़े जलके समान है॥९७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'खातोदक'—गड्ढेमें थोड़ासा जल॥९७॥ अनुभाष्य—आदिलीला ६/४३-४४ संख्या द्रष्टव्य है॥९७॥ हरिभक्तिसुधोदय (१४/३६)— त्वत्साक्षात्कारणाह्लाद-विशुद्धाब्धिस्थितस्य मे। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यापि जगद्गुरो॥”९८॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे जगद्गुरो! मैं आपके स्वरूपका साक्षात्कार पाकर आनन्दरूप विशुद्धसमुद्रमें अवस्थान कर रहा हूँ और अन्य सभी सुख मुझे गोष्पदके समान लग रहे हैं। ब्रह्ममें लीन होनेपर जीवको जो सुख मिलता है, वह भी गोष्पदके समान है। गोष्पद अर्थात् गायके खुरसे जो गड्डा बनता है, उसमें जितना जल आ सकता है, वह समुद्रकी तुलनामें अत्यन्त क्षुद्र है॥९८॥ अनुभाष्य—हे जगद्गुरो! त्वत्साक्षात्करणाह्लादविशुद्धाब्धिस्थितस्य (तत् तव साक्षात्कारणेन दर्शनजनितेन यदाह्लादः स एव विशुद्धः मलरहितः अब्धिः समुद्रः तस्मिन् स्थितस्य) मे (मम) ब्राह्माणि (ब्रह्मानुभव-जनितानि) सुखानि अपि गोष्पदायन्ते (गोष्पदविलस्थ-जलवत् प्रतीयन्ते)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥९८॥ संन्यासियोंकी चित्तवृत्तिका क्रमशः परिवर्तन और प्रश्न :— प्रभुर मिष्टवाक्य शुनि' संन्यासीर गण। चित्त फिरि' गेल, कहे मधुर वचन॥९९॥ तथापि भक्तिमें सामान्य, किन्तु मायावादमें दृढ़ श्रद्धा :— “ये किछु कहिले तुमि, सर्व सत्य हय। कृष्णप्रेमा सेइ पाय, यार भाग्योदय॥१००॥ कृष्णे भक्ति कर—इहाय सबार सन्तोष। वेदान्त ना शुन केने, तार किवा दोष॥”१०१॥ अनुवाद—महाप्रभुके इस प्रकार मधुर वाक्योंको सुनकर संन्यासियोंका हृदय परिवर्तित हो गया और वे मधुर वचनोंसे कुछ कहने लगे—“आपने जो भी कुछ कहा, वह सब सत्य है। जिसका भाग्योदय होता है, वही श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करता है। श्रीकृष्णभक्ति करो, हम सभीका यही मत है, किन्तु आप वेदान्तका श्रवण क्यों नहीं करते हैं, उसमें क्या दोष है?”॥९९-१०१॥ अनुभाष्य—मायावादी लोग श्रीशङ्करपादके शारीरक-भाष्यके उद्दिष्ट शास्त्रको ही 'वेदान्त' कहते हैं; अर्थात् 'वेदान्त' कहनेपर शाङ्करमतावलम्बी उनके आचार्यकृत केवलाद्वैत-मतमूलक भाष्यतात्पर्य-युक्त उपनिषत् और ब्रह्मसूत्रको लक्ष्य करते हैं। सदानन्दयोगी-कृत 'वेदान्तसार' में—“वेदान्तो नाम उपनिषत्प्रमाणम्, तदुपकारीणि शारीरक-सूत्रादीनि च॥” ४१६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
वस्तुतः ‘वेदान्त’ कहनेपर ‘केवलाद्वैतवाद’ को ही केवल नहीं समझना है। चारों वैष्णवाचार्य भी वेदान्ताचार्य हैं, किन्तु वे शङ्करमतावलम्बी मायावादी नहीं हैं। भेददर्शन-रहित होकर केवलाद्वैत-विचारसे जो अहंग्रहोपासना करते है, उस प्रकारके मायावादपन्थी शुद्धाद्वैत, शुद्धद्वैत, विशिष्टाद्वैत, द्वैताद्वैत एवं अचिन्त्यभेदाभेदको स्वीकार नहीं करते; अपितु केवलाद्वैत-विचार ही निर्दोष वेदान्तमत है—ऐसा विश्वास करते हैं। प्राकृत शरीर तथा मनके द्वारा जो श्रीकृष्णकी अनित्य सेवा होती है, उससे मायावादी लोग सन्तुष्ट होते हैं, अर्थात् वे लोग श्रीकृष्णभक्तिको मात्र कर्मानुष्ठान-विशेषके रूपमें जानते हैं, इसलिये वह भी ‘अभक्ति’ है, ऐसा कहनेमें उन्हें सन्तोष होता है॥१०१॥ एत शुनि' हासि' प्रभु बलिला वचन। “दुःख ना मानिह यदि, करि निवेदन॥”१०२॥ अनुवाद—यह सुनकर महाप्रभुने हँसकर कहा—“यदि आप लोगोंको बुरा ना लगे, तो मैं कुछ निवेदन करना चाहता हूँ।”॥१०२॥ मायावादी संन्यासियोंकी नम्रता :- इहा शुनि' बले सर्व संन्यासीर गण। “तोमाके देखिये यैछे साक्षात् नारायण॥१०३॥ तोमार वचन शुनि' जुड़ाय श्रवण। तोमार माधुरी देखि' जुड़ाय नयन॥१०४॥ तोमार प्रभावे सबार आनन्दित मन। कभु असङ्गत नहे, तोमार वचन॥”१०५॥ अनुवाद—यह सुनकर सभी संन्यासी कहने लगे—“आप देखनेमें साक्षात् नारायणकी भाँति हो, आपके वचन सुनकर हमारे कानोंको आनन्द हो रहा है। आपके सौन्दर्यको देखकर हमारे नेत्र शीतल हो रहे हैं। आपके प्रभावसे सभीका मन आनन्दित हो रहा है। आप जो कुछ कहना चाहते हैं, वह कहिये, क्योंकि आपके वचन कभी असङ्गत नहीं हो सकते हैं॥”१०३-१०५॥ वेदान्तके सम्बन्धमें महाप्रभुका मत और व्याख्या :- प्रभु कहे, “वेदान्त सूत्र-ईश्वर-वचन। व्यासरूपे कैल ताहा श्रीनारायण॥१०६॥ अनुवाद—महाप्रभुने कहा—“वेदान्त-सूत्र साक्षात् ईश्वरकी वाणी है। स्वयं श्रीनारायणने व्यासके रूपमें इसकी रचना की है॥१०६॥ अनुभाष्य-‘सूत्र’— “अल्पाक्षरमसन्दिग्धं सारवत् विश्वतोमुखम्। अस्तोभमनवद्यञ्च सूत्रं सूत्रविदो विदुः॥”(स्कन्द और वायुपुराणमें) अर्थात् “अल्प अक्षरोंसे युक्त, निश्चित (सन्देहरहित), सारयुक्त, सब ओरसे स्पष्ट, अर्थ निर्धारणमें किसी भी प्रकारकी बाधासे रहित एवं निर्दोष (अतिव्याप्ति, अव्याप्ति और असम्भव—ऐसे दोषोंसे दूषित ना हो)—ऐसे वाक्यको सूत्रोंके ज्ञाताजन सूत्र कहते हैं।” सातवाँ अध्याय | ४१७
[ ७/१०६ वेदान्तसूत्र—(१) ब्रह्मसूत्र, (२) शारीरक, (३) व्याससूत्र, (४) बादरायण-सूत्र, (५) उत्तर- मीमांसा और (६) वेदान्तदर्शन आदि विभिन्न नामोंसे परिचित चार अध्याययुक्त, सोलहपादयुक्त सूत्राकारमें ग्रथित ग्रन्थ है। इस ग्रन्थमें प्रत्येक पादमें कुछ अधिकरण हैं। प्रत्येक अधिकरणमें पञ्चाङ्ग-न्याय वर्तमान है, —प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपयन और निगमन। और भाष्यमें— “एको विषय सन्देहः पूर्वपक्षावभाषकः। श्लोकोऽपरस्तु सिद्धान्तवादी सङ्गतयः स्फुटाः॥” अर्थात् “एक श्लोक तो सन्देहका विषय होकर पूर्वपक्षको प्रस्तुत करता है और दूसरा श्लोक सिद्धान्तका वर्णन करता है तथा सङ्गतियोंको स्पष्टरूपसे दिखलाता है।” विभिन्न भाष्योंके अनुसार, —इसके १६२-२२३ तक अधिकरण विभाग लक्षित होते हैं; और सूत्र संख्या—५२०-५६० तक है। ‘वेदान्त’ शब्दसे कोषकार ‘हेमचन्द्र’ कहते हैं—ब्राह्मणके साथ उपनिषद् अंश ही ‘वेदान्त’ है—वेदोंका अवशिष्ट अथवा वेदका शेषभाग अर्थात् वेदोंका अन्त। वेदका चरम उद्देश्य जिस शास्त्रमें प्रदर्शित हुआ है, वह भी ‘वेदान्त’ है। उपनिषत् प्रमाणस्वरूपमें जो शास्त्र व्यवहार होते हैं और उसके सहायक जो सूत्रादि हैं, वह भी ‘वेदान्त’ है। ‘वेदान्त-सूत्र’ को तीन प्रस्थानोंमें अन्यतम ‘न्याय-प्रस्थान’ कहा जाता है। उपनिषदोंको ‘श्रुतिप्रस्थान’ और गीता-भागवत-पुराणादिको ‘स्मृतिप्रस्थान’ कहा जाता है। श्रीनारायणके निःश्वाससे वेद प्रपञ्चमें आये। श्रीनारायणके द्वारा कहे गये वेदविस्तार-शास्त्रको ही ‘सात्वत-पञ्चरात्र’ कहा जाता है। श्रीनारायणके आवेशावतार श्रीव्यास अथवा किसी-किसीके मतमें (शः भाः ३/३/३२) ‘अपान्तरतमा’ ऋषिने वेदान्तसूत्रोंको गूँथा है। पञ्चरात्र और वेदान्तमें एक ही अभिमत प्रकाशित हुआ है, —यही श्रीगौरसुन्दरकी उक्ति है। श्रीव्यासरचित होनेके कारण इसको भी श्रीनारायणके ही वाक्यके रूपमें जानना होगा। श्रीव्यासदेवने सूत्र-रचनाके समय और भी सात ऋषियोंके द्वारा प्रणीत वेदान्त-मतकी समालोचना की हैं; जैसे—आत्रेय, आश्मरथ्य, ओडूलोग्मि, कार्ष्णाजिनि, काशकृत्स्न, जैमिनि और बादरी। इनके अतिरिक्त पाराशरी और कर्मन्दीभिक्षु—ये दोनों सूत्र भी श्रीव्यासदेवके रचित सूत्रके पूर्ववर्ती ग्रन्थ है। वेदान्तदर्शनके प्रथम दो अध्यायोंमें ‘सम्बन्ध’ ज्ञान, तृतीय अध्यायमें ‘अभिधेय’ साधन-भक्ति और चतुर्थ अध्यायमें ‘प्रयोजनफल’ भगवत्प्रेमकी कथा ही वर्णित हुई है। सूत्रकार व्यासके द्वारा रचित अकृत्रिम वेदान्तभाष्य ‘श्रीमद्भागवत’ है। इसके अतिरिक्त श्रीमद्भागवतके न्यूनाधिक अनुगत चार वैष्णवाचार्योंके प्रणीत भाष्य और उनके सम्प्रदायोंके अधस्तनोंके द्वारा रचित बहुतसी टीकाओंमें वेदान्तकी भगवद्भजन-तत्परता कही गयी है। विष्णुभक्तिरहित निर्विशिष्ट विचारवाले सम्प्रदायोंमें भी इस वेदान्तसूत्रका आदर परिलक्षित होता है। इस वेदान्तके मायिक विचारके द्वारा जो सभी भाष्यादि और उनके अनुगत टीका तथा सन्दर्भादि पाये जाते हैं, वे सब विष्णुसेवा-रहित, वास्तव-सत्यसे भेद-विचारयुक्त हैं॥१०६॥ अमृतानुकणिका—(भाः १/३/२१)— ‘ततः सप्तदशे जातः सत्यवत्यां पराशरात्।’ ४१८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१०६-१०९ ] 'इसके बाद सत्रहवें अवतारमें भगवान् श्रीहरि ही पराशरके द्वारा सत्यवतीके गर्भसे व्यासरूपमें अवतीर्ण हुए हैं।' भागवत (११/१६/२८) में श्रीकृष्णने कहा— 'द्वैपायनोऽस्मि व्यासानां' 'व्यासोंमें मैं श्रीकृष्णद्वैपायन व्यास हूँ।' विष्णुपुराण (३/४/५) में कहा गया है— 'कृष्णद्वैपायनं व्यासं विद्धि नारायणं स्वयंम्' 'श्रीकृष्णद्वैपायनको तुम साक्षात् नारायण ही समझो।' इन समस्त शास्त्र-प्रमाणोंके बलपर ही कहा है—व्यासरूपमें ही श्रीनारायणने ही वेदान्तसूत्रकी रचना की है॥”१०६॥ (१) ईश्वर-वाक्य—चारों दोषोंसे रहित :— भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा, करणापाटव। ईश्वरेर वाक्ये नाहि दोष एइसब ॥१०७॥ अनुवाद—भ्रम, प्रमाद, विप्रलिप्सा और करणापाटव, ये चार प्रकारके दोष भगवान्के वाक्योंमें नहीं होते हैं॥१०७॥ अनुभाष्य—आदिलीला २/८६ द्रष्टव्य है॥१०७॥ (२) अभिधा (मुख्या)-वृत्तिसे सविशेष-तत्त्व भगवान् ही वेदान्तके द्वारा जानने योग्य :— उपनिषत्-सहित सूत्र कहे येइ तत्त्व। मुख्यवृत्त्ये सेइ अर्थ परम महत्त्व॥१०८॥ गौणवृत्तिसे रचित असुरमोहन शाङ्कर-भाष्यके श्रवणसे सर्वनाश :— गौणवृत्त्ये येबा भाष्य करिल आचार्य। ताहार श्रवणे नाश हय सर्व कार्य॥१०९॥ अनुवाद—वेदान्तसूत्र उपनिषद्के प्रमाणों सहित जो तत्त्व कहते हैं, मुख्यवृत्तिके द्वारा उसका जो अर्थ किया जाता है अर्थात् जो स्पष्ट अर्थ है, वही अर्थ श्रेष्ठ है। गौण-वृत्तिके द्वारा श्रीशङ्कराचार्यने जिस भाष्यकी रचना की है, उसे श्रवण करनेसे वेदान्त-उपनिषद्का तात्पर्य प्रेमाभक्तिका नाश हो जाता है॥१०८-१०९॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'उपनिषद्'—ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वतर, ये ग्यारह वेदशिरोमणि उपनिषद् हैं। 'सूत्र'—चार अध्याय, सोलह पाद युक्त सूत्र अर्थात् ब्रह्मसूत्र है। ये दोनों ही शास्त्रोंमें प्रधान हैं॥१०८॥ अनुभाष्य—मुक्तिकोपनिषदमें (३०-३९) वर्णित १०८ उपनिषद्— “ईशकेनकठ-प्रश्नमुण्डकमाण्डुक्य-तित्तिरिः। ऐतरेयश्च छान्दोग्यं बृहदारण्यकं तथा॥ ब्रह्मकैवल्यजावालश्वेताश्वो हंस आरुणिः। गर्भो नारायणो हंसो बिन्दुनादशिरः शिखा॥ मैत्रायणी कौषितकी वृहज्जावालतापनी। कालाग्निरुद्रमैत्रेयी सुबालक्षुरिमन्त्रिका॥ सातवाँ अध्याय | ४१९
[ ७/१०८-१०९
सर्वसारं निरालम्बं रहस्यं वज्रसूचिकम्। तेजो नादध्यानविद्यायोगतत्त्वात्मबोधकम्॥ परिव्राट् त्रिशिखी सीता चूड़ा निर्वाणमण्डलम्। दक्षिण शरभं स्कन्दं महानारायणाद्वयम्॥ रहस्यं रामतपनं वासुदेवञ्च मुद्गलम्। शाण्डिल्यं पैङ्गलं भिक्षुमहच्छारीरकं शिखा॥ तुरीयातीतसंन्यासपरिव्राजाक्षमालिका। अव्यक्तैकाक्षरं पूर्णा सूर्याक्षाध्यात्मकुण्डिका॥ सावित्र्यात्मा पाशुपतं परंब्रह्मावधूतकम्। त्रिपुरातापनं देवी त्रिपुरा कठभावना। हृदयं कुण्डली-भस्मरुद्राक्षगणदर्शनम्॥ तारसारमहावाक्यपञ्चब्रह्माग्नि होत्रकम्। गोपालतपनं कृष्णं याज्ञवल्क्यं वराहकम्॥ शाठ्यायनी हयग्रीवं दत्तात्रेयं च गारुडम्। कलिजावालिसौभाग्यरहस्येकाश्रुमुक्तिका॥" अर्थात् ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डुक्य, तैत्तिरिय, ऐतरेय, छान्दोग्य, बृहदारण्यक, ब्रह्म, कैवल्य, जावाल, श्वेताश्वतर, हंस, आरूणि, गर्भ, नारायण, परमहंस, अमृतबिन्दु, अमृतनाद, अथर्व शिरा, अथर्व शिखा, मैत्रायणी, कौषितकी ब्राह्मण, वृहज्जावाल, कालाग्निरुद्र, मैत्रेय, सुबाल, क्षुरिका, मन्त्रिका, सर्वसार, निरालम्ब, राम रहस्य, वज्रसूचिका, तेजो बिन्दु, नाद बिन्दु, ध्यान बिन्दु, ब्रह्मविद्या, योगतत्त्व, आत्मबोध, नारद परिव्राजक, त्रिशिखी ब्राह्मण, सीता, योग चूड़ामणि, निर्वाण, मण्डल ब्राह्मण, दक्षिणामूर्ति, शरभ, स्कन्द, महानारायण, अद्वय तारक, शुकरहस्य, रामतापनी, वासुदेव, मुद्गल, शाण्डिल्य, पैङ्गल, भिक्षुक, महा, शारीरक, योग शिखा, तुरीयातीत अवधूत, संन्यास, परमहंस-परिव्राजाक, अक्षमालिका, अव्यक्त, एकाक्षर, अन्नपूर्णा, सूर्य, अक्षी, अध्यात्म, कुण्डिका, सावित्रि, आत्मा, पाशुप्रात ब्राह्मण, परब्रह्म, अवधूत, त्रिपुरातापनी, देवी, त्रिपुरा, कठ रुद्र, भावना, रुद्र हृदय, योग कुण्डलिनी, भस्म जावाल, रुद्राक्ष जावाल, गणपति, तारसार, महावाक्य, पञ्चब्रह्म, प्राणाग्निहोत्र, गोपालतापनी, कृष्ण, याज्ञवल्क्य, वराह, शाठ्यायनी, हयग्रीव, दत्तात्रेय, गरुड़, कलिसन्तरण, जाबालि, सौभाग्य लक्ष्मी, सरस्वती रहस्य, बह्वृच, दर्शन, नृसिंहतापनी और मुक्तिका-ये १०८ उपनिषद् हैं। 'मुख्यवृत्ति' अर्थात् अभिधा-वृत्ति है। जिस शक्तिके द्वारा कोष-व्याकरणादिमें प्रसिद्ध अर्थका बोध होता है, वह 'अभिधा' है। 'गौणवृत्ति' का अर्थ है लक्षणावृत्ति। जिस शक्तिके द्वारा किसी प्रयोजनके लिये अथवा बहुप्रयोगके कारण वास्तविक अर्थसम्बन्धीय अन्य अर्थका बोध होता है, वह 'लक्षणा-वृत्ति' है। 'भाष्य'-जैसे, “सूत्रस्थं पदमादाय वाक्यैः सूत्रानुसारिभिः। स्व-पदानि च वर्णन्त्ये भाष्यं भाष्यविदो विदुः ॥” अर्थात् “भाष्य तत्त्वको जाननेवालोंने उसे भाष्य कहा है जिसमें सूत्रमें स्थित पदोंको लेकर सूत्रका अनुसरण करनेवाले वाक्योंके द्वारा अपने पद (शब्दों) का वर्णन किया जाता है।”
४२० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१०८-१०९ ] उपनिषद् एवं सूत्रका प्रतिपाद्य सविशेष-तत्त्व ही श्रेष्ठ है-यह मुख्या (अभिधा) वृत्तिका अवलम्बन करके प्रदर्शित हुआ है। निर्विशेषवादी गौणी (लक्षणा) वृत्तिका अवलम्बन करके जो तत्त्वाभास प्रदर्शन करते हैं, वह 'तत्त्ववाद' के बदले 'मायावाद' नामसे प्रसिद्ध है। श्रीविष्णुस्वामीके शुद्धाद्वैत-विचारको दबाकर श्रीशङ्कराचार्यके केवलाद्वैतविचारका व्यापक प्रचार होने लगा। तब श्रौत-पथका अवलम्बनकर श्रीरामानुजाचार्यने 'विशिष्टाद्वैतवाद' और श्रीमध्वचार्यपादने 'तत्त्ववाद' के द्वारा अतात्त्विकोंके तर्कपन्थामूलक सिद्धान्तका खण्डन किया। महाप्रभुने अभिधा-वृत्तिका अवलम्बनकर वेदान्तके अर्थोंका आदर किया है। श्रीशङ्कराचार्यने लक्षणावृत्तिका अवलम्बनकर वेदान्तके जिन अर्थोंको अपने भाष्यमें लिखा है, उसके द्वारा सर्वनाश होता है। जैसे पद्मपुराणमें कहा गया है- “शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमम्। येषां श्रवणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि ॥ अपार्थं श्रुतिवाक्यानां दर्शयल्लोकगर्हितम्। कर्मस्वरूपत्याज्यत्वमत्र च प्रतिपाद्यते ॥ सर्वकर्मपरिभ्रंशात्रैष्कर्म्यं तत्र चोच्यते। परात्म-जीवयोरैक्यं मयात्र प्रतिपाद्यते ॥” अर्थात् “हे देवि सुनो ! मैं तामस शास्त्रका क्रमशः वर्णन करता हूँ, जिसके श्रवणमात्रसे ज्ञानियोंका भी अधःपतन हो जाता है। वेद वचनोंका लोकनिन्दित हीन अर्थ दिखलाते हुए इस शास्त्रमें कर्मका स्वरूपतः त्याज्यत प्रतिपादित किया गया है। इसी प्रकार सम्पूर्ण कर्मोंका त्याग करनेसे ही निष्काम कर्मसे प्राप्त होनेवाले ज्ञान (नैष्कर्म्य) की प्राप्तिका वहाँ वर्णन किया गया है। तथा मेरे द्वारा यहाँ परमात्मा और जीवके ऐक्यका प्रतिपादन किया गया है।” अन्त्यलीला, २/९४-९९ संख्या द्रष्टव्य है॥१०८-१०९॥ अमृतानुकणिका—शब्दकी तीन वृत्तियाँ हैं-मुख्य, लक्षणा और गौणी। किसी भी शब्दकी स्वाभाविक शक्तिके द्वारा जो अर्थ प्रतिपन्न होता है, शब्द उच्चारण करने मात्रसे ही उसका जो अर्थ मनमें उदित होता है, उसे शब्दका मुख्यार्थ कहते हैं। शब्दकी जिस वृत्ति या शक्तिके द्वारा जिस मुख्यार्थकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसे मुख्यवृत्ति कहते हैं। जैसे 'गौ'-शब्द उच्चारण करनेसे ही, गलकम्बल (गलेके नीचे झूलते मांसपिण्ड), पूँछ, सींग आदि चार पैरोंके जन्तु-विशेषका विचार मनमें आता है। यह जन्तु-विशेष ही गौ-शब्दका मुख्यार्थ है। और गौ-शब्दकी जिस वृत्तिके द्वारा इस अर्थकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसको गौ-शब्दकी मुख्यवृत्ति कहते हैं। जिस धातु और प्रत्ययके योगसे कोई शब्द निष्पन्न होता है, उस धातु और प्रत्ययके अर्थयोगसे शब्दके जो-जो अर्थ प्राप्त होते हैं, वे ही उस शब्दके मुख्यार्थ हैं। और जिस वृत्तिके द्वारा इस मुख्य शब्दकी प्रतीति उत्पन्न होती है, उसको ही मुख्यवृत्ति कहते है। मुख्यार्थको 'अभिधावृत्ति' का अर्थ भी कहा जाता है। 'अभिधा' - अभिधा न्यायमते शब्दशक्तिः। मीमांसामते विधिसमवेतविधिव्यापारीभूतपदार्थः। तस्या लक्षणम्-स मुख्योऽर्थस्तत्रस्तत्र मुख्योव्यापारोऽस्याभिधोच्यते। इति शब्दकल्पद्रुमधृत काव्यप्रकाशवचनम्॥ 'लक्षणावृत्ति' - मुख्य अर्थकी सङ्गति ना होनेपर वाच्यसम्बन्धविशिष्ट अन्य पदार्थकी सातवाँ अध्याय | ४२१
[ ७/१०८-१०९
प्रतीतिको लक्षणा कहते है। 'लक्षणा' - "मुख्यार्थबाधे शक्यस्य सम्बन्धे याऽन्यधीर्भवेत्। सा लक्षणा। अलङ्कारकौस्तुभ। २/१२।" जैसे “गङ्गामें घोष वास करते हैं"- यहाँपर गङ्गा-शब्दके मुख्यार्थसे भागीरथी नामक नदी विशेषको समझा जाता है। ऐसा होनेसे मुख्यार्थमें वाक्यका अर्थ इस प्रकार होगा- "भागीरथी नदीके बीचमें घोष वास करते हैं", किन्तु नदीके बीचमें वास करना सम्भव नहीं है। इसलिये मुख्यार्थकी सङ्गति नहीं होती। तभी गङ्गा-शब्दका अर्थ गङ्गा-तीर करना होगा, क्योंकि गङ्गा-तीरपर वास करना सम्भव है। गङ्गा-तीरका गङ्गाके साथ सम्बन्धविशिष्ट भी है। ऐसा होनेपर उक्त वाक्यका अर्थ होगा- “गङ्गाके तीरपर घोष वास करते हैं।" यह अर्थ लक्षणावृत्तिके द्वारा प्राप्त अर्थ कहलाता है। मुख्यार्थकी असङ्गति होनेपर ही लक्षणावृत्तिका आश्रय लेना होता है। मुख्यार्थकी सङ्गति होनेपर भी यदि लक्षणावृत्तिसे अर्थ किया जाय, तब उस लक्षणासे प्राप्त अर्थ असङ्गत होगा, क्योंकि इस प्रकार अर्थ करनेकी प्रथा शास्त्र द्वारा अनुमोदित नहीं है। लक्षणाके अनेक प्रकार भेद है। श्रीपाद जीव गोस्वामीने तीन प्रकारके लक्षणाका वर्णन किया है-अजहत्स्वार्था, जहत्स्वार्था और जहदजहत्स्वार्था। “अजहत्स्वार्था-न जहति पदानि स्वार्थं यस्यां सा; अर्थात् जो लक्षणासे पदोंके निज अर्थका परित्याग ना करे।" जैसे-कौओसे दहीकी रक्षा करो। इस प्रकारका आदेश यदि किसीको दिया जाय, तो वह व्यक्ति केवल कौओंसे दहीकी रक्षा करेगा, ऐसा नहीं है। बिल्ली, कुत्ता आदि जो कोई भी दहीको नष्ट करनेके लिये आयेंगे, उन सबसे दहीकी रक्षा करेगा। मूल उद्देश्य है, दहीकी रक्षा करना। यहाँपर कौआ-शब्दके मुख्यार्थकी सङ्गति नहीं होती है, क्योंकि मुख्यार्थ ग्रहण करनेसे केवल कौओंके उत्पातसे दहीकी रक्षा करनी है, अन्य किसी जन्तुके उपद्रवसे रक्षा नहीं करनी है, ऐसा आदेशका अभिप्राय नहीं है, क्योंकि फलस्वरूप दहीकी रक्षा नहीं होगी। इसलिये मुख्यार्थकी सङ्गति ना होनेपर कौआ-शब्दसे कौआ और कौओके समान उपद्रवकारी जन्तुओंसे दहीकी रक्षा करनी होगी। यहाँपर कौआ-शब्दका अर्थ कौआ तो है ही, परन्तु कौआ-शब्दसे दही नष्ट करने वाले अन्य जन्तुओंको भी समझना होगा। यहाँ कौआ-शब्द अपना अर्थ त्याग ना करके अर्थकी और भी व्यापकता धारण करता है। यह 'अजहत्स्वार्था' लक्षणाका दृष्टान्त है। “जहत्स्वार्था-जहति पदानि स्वार्थं यस्याम्; अर्थात् जिस लक्षणापें पदसमूह अपने अर्थका परित्याग करते हैं, उनको जहत्स्वार्था लक्षणा कहते है।" जैसे “मंचाः क्रोशन्ति"-मंच चीत्कार कर रहा है, यह वाक्यका मुख्यार्थ है, किन्तु यह सङ्गत नहीं है, क्योंकि मंच कभी चीत्कार नहीं कर सकता। तब मंच-शब्दके मुख्यार्थका त्याग करके अर्थात् मंच-शब्दका मंच अर्थ ना ग्रहण करके 'मंचस्थ-पुरुष' अर्थ ग्रहण करना होगा; मंचपर स्थित लोग चीत्कार कर रहे हैं, इस प्रकारसे अर्थ ग्रहण करना होगा। मंचपर विराजमान लोगोंका मंचके साथ सम्बन्ध है, इसलिये यहाँपर लक्षणा है और मूल शब्द मंचका त्याग किया है, इसे 'जहत्स्वार्था' लक्षणा कहते हैं। "जहदजहत्स्वार्था-वाच्यार्थैकदेशत्यागेनै कदेशवृत्तिर्लक्षणा; अर्थात् जिस लक्षणामें किसी भी शब्दके मुख्यार्थका एक अंश त्याग करके अन्य अंश ग्रहण करना होता है, उसको जहदजहत्स्वार्था लक्षणा कहते हैं।" मायावादियोंने तत्त्वमसि वाक्यका इसी जहदजहत्-लक्षणाका आश्रय लेकर अर्थ किया है। तत्त्वमसि-तत् (वह ब्रह्म) त्वम् (तुम)
४२२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/१०८-१०९ ] असि (हो)। तत् शब्दसे सर्वज्ञता आदि गुणविशिष्ट चैतन्यको (ब्रह्मको) लक्ष्य किया गया है; त्वम् पदसे अल्पज्ञ चैतन्यको (जीवको) लक्ष्य किया गया है। चैतन्य स्वरूपसे दोनोंमें कोई भेद नहीं है, किन्तु ब्रह्म सर्वज्ञ और जीव अल्पज्ञ है, इस कारण इनका अभेद स्थापन नहीं किया जा सकता। तत् और त्वम् शब्दके मुख्यार्थसे यहाँपर भेद ही प्रतिपन्न होता है, क्योंकि एक (ब्रह्म) होनेसे सर्वज्ञ और दूसरा (जीव) होनेसे अल्पज्ञ है। इस प्रकार इनमें बहुत भेद है। परन्तु दोनोंका अभेद प्रमाणित करनेके लिये तत् (ब्रह्म)-शब्दके मुख्यार्थसे सर्वज्ञत्व-अंश त्यागकर केवल चैतन्य-अंश ग्रहण करना है और उसी प्रकार त्वम् (जीव)-शब्दके भी मुख्यार्थसे अल्पज्ञत्व-अंश त्याग करके केवल चैतन्य-अंशको ग्रहण करना है। ऐसा करनेसे तत्-शब्दसे भी चैतन्य समझा जाता है और त्वम्-शब्दसे भी चैतन्य समझा जाता है; अर्थात् तत् और त्वम् इन दोनों शब्दोंका एक ही चैतन्य-अर्थ मिलता है। दोनोंको चैतन्य कहकर दोनोंके बीचमें कोई भी भेद नहीं रहता। इस प्रकार अर्थ करके मायावादी लोग तत्त्वमसि-वाक्यसे जीव और ब्रह्मका अभेदत्व प्रमाणित करते हैं। तत्-शब्दके मुख्यार्थ “सर्वज्ञ चैतन्य” से एक अंश “सर्वज्ञ” त्यागकर दूसरे अंश “चैतन्य” को ग्रहण किया और त्वम्-शब्दके भी मुख्यार्थ “अल्पज्ञ चैतन्य” से भी एक अंश “अल्पज्ञ” त्याग करके दूसरे अंश “चैतन्य” को ग्रहण किया। इसलिये यह 'जहदजहत्स्वार्था' लक्षणा हुआ है। और “चैतन्य” अर्थ ग्रहण करनेसे मुख्यार्थके साथ भी दोनों शब्दोंका सम्बन्ध रहनेपर यह लक्षणा भी हुआ। इसलिये तत्त्वमसि-वाक्यसे जीव-ब्रह्मके अभेदवाचक अर्थ करनेसे जहदजहत्स्वार्था लक्षणाका ही आश्रय लेना होगा। “गौणीवृत्ति-गौणी चाभिहितार्थलक्षितगुणयुक्ते तत्सदृशे-सर्वसंवादिनीते श्रीजीव; अर्थात् मुख्यार्थकी सङ्गति ना होनेपर मुख्यार्थका कोई भी एक गुण लेकर मुख्यार्थके सादृश्ययुक्त जो अर्थ ग्रहण किया जाता है, उसको गौणार्थ कहते हैं और जिस वृत्तिके द्वारा यह अर्थ प्राप्त होता है, उसे 'गौणीवृत्ति' कहते हैं।” जैसे, “सिंहोऽयम् देवदत्तः-यह देवदत्त एक सिंह है।” सिंह-शब्दके मुख्यार्थसे अत्यन्त विक्रमशाली पशुविशेषको समझा जाता है। देवदत्त एक मनुष्य है, उसके चार पैर नहीं हैं, उसकी पूँछ नहीं है, उसके रोम नहीं हैं, सिंहके जैसे उसके केशर नहीं है; इसलिये “देवदत्त एक सिंह है”—वाक्यसे “देवदत्त सिंहके समान एक पशु है” इस प्रकारका अर्थ सङ्गत नहीं होता। अर्थात् सिंह-शब्दका मुख्यार्थ यहाँ ग्रहण नहीं किया जा सकता। तब सिंह-शब्दका मुख्यार्थ त्यागकर सिंहके विक्रमशालीत्व गुणको ग्रहण करके सिंह-शब्दका अर्थ करना होगा-सिंहके समान विक्रमशाली। “यह देवदत्त सिंहके समान विक्रमशाली है”—यही इस वाक्यका अर्थ होगा। विक्रमशालीत्व-अंशमें सिंहके साथ देवदत्तका सादृश्य है। मुख्यार्थके एक गुणको लेकर यह अर्थ करनेपर इसको गौणीवृत्तिमूलक अर्थ कहा जाता है। किसी किसी व्याकरणमें गौणीवृत्तिको एक पृथक् वृत्ति स्वीकार नहीं किया है। उनके अनुसार गौणीवृत्ति भी एक प्रकारसे लक्षणा है। उनके मतमें लक्षणा दो प्रकारकी है-गौणी और शुद्धा। जिस अर्थमें मुख्यार्थके गुण सादृश्य मात्रको ग्रहण किया जाता है, वही गौणी-लक्षणासे प्राप्त अर्थ है। गुण सादृश्यके अतिरिक्त अन्य प्रकारके लक्षणाके द्वारा प्राप्त अर्थको शुद्धालक्षणालब्ध अर्थ कहा जाता है। उपरोक्त “सिंहोऽयम् देवदत्तः” वाक्यके अर्थ-प्रसङ्गमें सातवाँ अध्याय | ४२३
[ ७/१०८-११० मुख्यार्थ “विक्रमशाली पशुविशेष” से “पशुविशेष” अंश त्यागकर “विक्रमशाली” अंश ग्रहण किया है, इसलिये इस अर्थको जहदजहत्-लक्षणा अर्थ भी माना गया है। पूर्वोक्त आलोचनासे यह स्पष्ट समझा जाता है कि लक्षणावृत्ति और गौणीवृत्तिसे अर्थ करनेसे युक्ति और कल्पनाका सहारा लेना होता है। मुख्यवृत्तिमें युक्ति और कल्पनाकी सहायता ग्रहण करनेकी आवश्यकता नहीं है। साधारणतः जिस स्थानपर मुख्यवृत्तिसे अर्थ ग्रहण करनेसे शब्द अथवा वाक्यकी अर्थ सङ्गति नहीं होती, उसी स्थानपर ही लक्षणावृत्ति अथवा गौणीवृत्तिसे अर्थ ग्रहण करना होता है। जिस ग्रन्थमें भ्रम-प्रमादादि दोष रहते हैं, ग्रन्थकारकी मर्यादाकी रक्षाके लिये भ्रम-प्रमादादिको ढकनेके उद्देश्यसे उस ग्रन्थकी व्याख्यामें लक्षणावृत्ति या गौणीवृत्ति अवलम्बनका प्रयोजन होता है। किन्तु वेदान्तसूत्रमें ये सब दोष नहीं हैं, इसलिये लक्षणावृत्ति अथवा गौणीवृत्तिसे उसकी व्याख्याका कोई प्रयोजन नहीं है। जिस स्थानपर लक्षणा या गौणीवृत्तिसे व्याख्या करनेका प्रयोजन नहीं है, उस स्थानपर मुख्यवृत्तिसे ही वास्तव अर्थ प्राप्त होता है; उस स्थानपर अपनी कल्पनाके द्वारा लक्षणा या गौणीवृत्तिसे अर्थ करनेपर मुख्यार्थ जो वाक्यका वास्तविक अर्थ है, वह प्रच्छन्न हो जाता है। श्रीपाद शङ्कराचार्यने वेदान्त सूत्रका जो भाष्य किया है, उसमें उन्होंने मुख्यवृत्ति त्यागकर लक्षणा या गौणीवृत्तिसे ही सूत्रोंके अर्थ किये हैं। इससे सूत्रोंके मुख्यार्थ प्रच्छन्न हो गये और उनके कल्पित अर्थको ही प्रधान्य प्राप्त हुआ है। इसलिये शङ्कराचार्यके भाष्य सुननेपर वेदान्तके वास्तविक अर्थको नहीं जाना जा सकता। इसलिये उसको श्रवण करनेसे किसीका भी उपकार तो होगा नहीं, कल्पित व्याख्या सुननेसे वरन् यथेष्ट अपकार ही होगा॥१०८-१०९॥ ताँहार नाहिक दोष, ईश्वर-आज्ञा पाञा। गौणार्थ करिल, मुख्य अर्थ आच्छादिया ॥ ११०॥ अनुवाद—वास्तवमें श्रीशङ्कराचार्यका इसमें कोई दोष नहीं है, उन्होंने भगवान्के आदेशसे ही वेदान्तके मुख्य अर्थका आच्छादनकर गौणार्थका प्रचार किया है॥११०॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ये प्रधानशास्त्र (वेदान्तसूत्र और उपनिषद्) मुख्यवृत्ति अर्थात् अभिधावृत्तिके द्वारा जिस तत्त्वकी शिक्षा देते हैं, वही परम महत्वपूर्ण है। श्रीशङ्कराचार्यने इस शास्त्रकी मुख्यवृत्तिको छोड़कर गौणवृत्ति अर्थात् लक्षणावृत्तिके द्वारा केवलाद्वैतवाद-सिद्धान्तके आधारपर जो भाष्य लिखा है, उसे श्रवण करनेसे सभी परमार्थिक कार्योंका नाश होता है। यदि कहें कि साक्षात् शिवजीके अवतार श्रीशङ्करस्वामीने इस प्रकार अवैध कार्य क्यों किया? तो सुनो, ईश्वरकी आज्ञासे ही इस कार्यमें प्रवृत्त होनेके कारण उनका दोष नहीं है। जैसे पद्मपुराणमें श्रीमहादेवने पार्वतीजीसे कहा है— “मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते। मयैव कल्पितं देवी कलौ ब्राह्मणरूपिणा॥ ब्रह्मणश्चापरं रूपं निर्गुणं वक्ष्यते मया। सर्वस्वं जगतोऽप्यस्य मोहनार्थं कलौ युगे॥ वेदान्ते तु महाशास्त्रे मायावादमवैदिकम्। मयैव वक्ष्यते देवि जगतां नाशकारणात्॥” ४२४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
७/११०-११३ ] अर्थात् “देवि ! मायावाद अत्यन्त असत्-शास्त्र है। यह बौद्धमत है, वैदिक-वाणियोंकी आड़में प्रच्छन्न रूपसे आर्योंके धर्ममें प्रवेश कर गया है। मैं कलिकालमें ब्राह्मण-मूर्त्ति धारणकर इस मायावादका प्रचार करूँगा। मैं नास्तिकोंको मोहित करनेके लिये भगवान्को निराकार और निर्विशेष घोषित करूँगा। इसी प्रकार मैं वेदान्तकी व्याख्या भी मायावादके अनुसार करके जगत्के नाशके लिये उन्हें भगवान्से दूर कर दूँगा।” शिवपुराणमें भगवत्-वाक्य— “द्वापरादौ युगे भूत्वा कलया मानुषादिषु। स्वागमैः कल्पितैस्त्वञ्च जनान् मद्दिङ्मुखान् कुरु॥” अर्थात् “कलियुगमें मनुष्योंको वेदोंके काल्पनिक अर्थोंके द्वारा उन्हें मुझसे विमुख करो॥”१०८-११०॥ अमृताणुकणिका—गौड़ीय वेदान्त प्रकाशनसे प्रकाशित “जैवधर्म” का अठारहवाँ अध्याय और श्रीकेशवजी गौड़ीय मठसे प्रकाशित “मायावादकी जीवनी या वैष्णव विजय” ग्रन्थ द्रष्टव्य हैं॥११०॥ (३) चित्विलास-वैभवमय भगवान् ही श्रुति-प्रतिपाद्य :— ‘ब्रह्म’-शब्दे मुख्य अर्थे कहे—‘भगवान्’। चिदैश्वर्य-परिपूर्ण, अनूर्ध्व-समान॥१११॥ ताँहार विभूति, देह, —सब चिदाकार। चिद्विभूति आच्छादिया कहे ‘निराकार’॥११२॥ तत्त्ववस्तुको निराकार और विष्णु-शरीरादिको मायिक-विकार कहना ही ‘मायावाद’ :— चिदानन्द-देह, ताँर स्थान, परिवार। ताँरे कहे,—प्राकृत-सत्त्वेर विकार॥११३॥ अनुवाद—‘ब्रह्म’ शब्दका मुख्य अर्थ है ‘भगवान्’, जो चित्-ऐश्वर्यसे परिपूर्ण हैं और उनसे बड़ा अथवा उनके समान कोई नहीं है। उनकी विभूतियाँ (धाम-परिकरादि) और विग्रह (शरीर)—ये सभी चिन्मय हैं, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने उनकी चित्-विभूतियोंको आच्छादनकर उनको ‘निराकार’ बतलाया है। भगवान्का शरीर, धाम और परिकर, ये सभी चिन्मय हैं, किन्तु श्रीशङ्कराचार्यने इनको प्राकृत-सत्त्वका विकार कहा है॥१११-११३॥ अनुभाष्य—सदानन्दयोगीन्द्रकृत ‘वेदान्तसार’ में— “वस्तु सच्चिदानन्दमद्वयं ब्रह्म। अज्ञानादि-सकलजड़समूहः अवस्तु। अज्ञानन्तु सदसद्भ्यामनिर्वचनीयं त्रिगुणात्मकं ज्ञानविरोधिभावरूपं यत्किञ्चिदिति वदन्ति। इदमज्ञानं समष्टिव्यष्ट्यभिप्रायेणैकमनेकमिति च व्यवह्रियते। इयं समष्टिरुत्कृष्टोपाधितया विशुद्धसत्त्व-प्रधानम्; एतदुपहितं चैतन्यं सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्व-सर्वनियन्तृत्त्वादिगुणकं सदसद्व्यक्तमन्तर्यामिजगत्कारणमीश्वर इति च व्यपदिश्यते। सकलाज्ञानावभासकत्वादस्य सर्वज्ञत्वम्।” शाङ्कर-वेदान्तिक सदानन्दने अपने ‘वेदान्तसार’ ग्रन्थमें संक्षेपमें शङ्करमतका तात्पर्य लिखा है। यह अब शाङ्कर-सम्प्रदायका अतिमान्य प्रामाणिक आधार है। “सच्चिदानन्द अद्वयवस्तु ही ब्रह्म है; अज्ञानादि सभी जड़समूह ही अवस्तु है। ‘अज्ञान’ कहनेपर सत् और असत्से पृथक्, अनिर्वचनीय, त्रिगुणात्मक, ज्ञानविरोधी भावरूप जो कुछ हैं, उन्हीं सभीको समझना चाहिये। सातवाँ अध्याय | ४२५
[ ७/१११-११५ यह अज्ञान समष्टि और व्यष्टि भेदसे एक तथा अनेक रूपोंमें व्यवहृत होता है। यह समष्टि उत्कृष्ट उपाधिविशिष्ट होनेपर 'विशुद्धसत्त्व-प्रधान' नाम प्राप्त करता है। विशुद्धसत्त्व-प्रधान अज्ञानमें प्रतिफलित होनेसे सर्वज्ञ, सर्वेश्वर, सर्वनियन्ता, सदसदव्यक्त, जीवसमूहके अन्तर्यामी, जगत्के कारण 'ईश्वर' नामसे कहलाते हैं। 'ईश्वर'—सभी अज्ञानका प्रकाशक होनेके कारण 'सर्वज्ञ' हैं।” इनके मतमें, ईश्वरत्व प्राकृत-सत्त्वका अज्ञानसे उत्पन्न विकारमात्र है। जीव मलिन-सत्त्वप्रधान और व्यष्टि-उपाधिविशिष्ट है। मध्यलीला, २५/३३-३४ संख्या द्रष्टव्य हैं॥१११-११३॥ आदेशपालक शङ्करका दोष ना रहनेपर भी उनके भाष्यके श्रवणसे जीवोंका सर्वनाश :- ताँर दोष नाहि, तेंहो आज्ञाकारी दास। आर येइ सुने, तार हय सर्वनाश ॥११४॥ अनुवाद-वेदान्तका इस प्रकार भाष्य करनेमें श्रीशङ्कराचार्यका कोई दोष नहीं है, क्योंकि वे भगवान्के आज्ञाकारी दास हैं। किन्तु जो इस भाष्यका श्रवण करेगा, उसका सर्वनाश होगा॥११४॥ अनुभाष्य-मध्यलीला ६/१६९ संख्या द्रष्टव्य है॥११४॥ मायाधीश विष्णुको मायिक-मानना ही पाषण्डता :- प्राकृत करिया माने विष्णु-कलेवर। विष्णुनिन्दा आर नाहि इहार उपर ॥११५॥ अनुवाद-विष्णुके सच्चिदानन्दमय दिव्य कलेवरको प्राकृत अर्थात् पञ्चभौतिक माननेसे अधिक विष्णुनिन्दा नहीं हो सकती है॥११५॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विषयको पढ़ते ही जो अर्थ मुख्यरूपसे अर्थात् स्पष्टरूपसे प्रकाशित होता है, उसे 'मुख्यार्थ' कहा जाता है। बृहदारण्यक उपनिषद्में- “पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते” (५/१) अर्थात् “अप्राकृत सच्चिदानन्द भगवान् जो पूर्ण और अद्वयज्ञानतत्त्व हैं, उनसे जितने अवतार आविर्भूत होते हैं, वे भी पूर्ण और अद्वयज्ञानतत्त्व हैं।” श्वेताश्वतर उपनिषद्में- “विचित्रशक्तिः पुरुषः पुराणः” अर्थात् “आदिपुरुष भगवान्में विचित्र शक्तियाँ हैं”; “स वृक्षकालाकृतिभिः परोऽन्यो यस्मात् प्रपञ्च परिवर्ततेऽयम्। धर्मावहं पापनुदं भगेशं” (६/६), अर्थात् “पीपल वृक्षके समान जो संसार अथवा माया है, भगवान् उससे सम्पूर्णरूपसे अतीत हैं अर्थात् संसार वृक्षरूप माया उन्हें कभी भी स्पर्श नहीं कर पाती। वे केवल मायातीत नहीं हैं, अपितु वे मायाधीश हैं। माया उनकी ही बहिरङ्गा शक्ति है और उनके अधीन है। भगवान् स्वयं अप्राकृत गुणोंसे युक्त हैं और वे अपने भक्तोंको मायाके सभी दोषोंसे मुक्त करते हैं”; “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्” (३/८) ४२६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
अर्थात् “जिस प्रकार सूर्य उदित होकर रात्रिके समस्त अन्धकारको दूर करके प्रकाशित होता है, मैं भी उसी प्रकार भगवान्की कृपासे मायाके तमिस्र-अन्धकारसे मुक्त हुआ और तब उनके अप्राकृत स्वरूपके दर्शनका सौभाग्य प्राप्त किया”; “पतिं पतीनां परमं परस्तात्” (६/७) अर्थात् “वे सब ईश्वरोंके ईश्वर हैं और सर्वश्रेष्ठ हैं”; “महान् प्रभुर्वे पुरुषः” (३/१२) अर्थात् “वे सबके प्रभु और परम पुरुष हैं”; “परास्यशक्तिर्विविधैव श्रूयते”। (६/८) अर्थात् “उन परमेश्वरकी शक्ति नाना प्रकारकी सुनी जाती है”। ऋग्वेदमें- “तद्विष्णो परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः” अर्थात् “विष्णु परम भगवान् हैं और बुद्धिमान लोग उसके चरणोंका ध्यान करते हैं”; प्रश्नोपनिषद्में- “स ईक्षांचक्रे” (६/३) अर्थात् “उन्होंने भौतिक सृष्टिपर दृष्टिपात किया”; ऐतरेये उपनिषद्में- “स ऐक्षत” (१/१/१) अर्थात् “उन्होंने भौतिक सृष्टिपर दृष्टिपात किया”, “स इमाँल्लोकानसृजत” (१/१/२) अर्थात् “उन्होंने भौतिक जगत्की सृष्टि की”; तलवकार उपनिषद्में- “तद्धैषां विजज्ञौ तभ्यो ह प्रादु-र्बभूव” (३/२); -इस प्रकार बहुतसे वेद वाक्योंको पढ़ने मात्रसे ही षडैश्वर्य-परिपूर्ण, असमोर्ध्व, एक परतत्त्व भगवान् ही प्रतीत होते हैं। तब जो “अपाणिपादः” (श्वेः ३/१९) आदि आकार-निषेध वाक्य पाये जाते हैं, उनके द्वारा उन्हीं भगवान्के आकारको चिदाकार, उनके शरीर और विभूतियोंको चिद्विभूति-यही मात्र समझना होगा। मायावादियोंके प्रमुख आचार्योंने भगवान्की चिद्विभूतियोंको आच्छादनकर, उनको सत्त्वगुणका विकाररूप 'निराकार' कहकर स्थिर किया है। जब भगवान् स्वयं, उनका धाम और उनके परिकर, सभी प्रकृतिसे अतीत चिदानन्दस्वरूप हैं, तब उनको किस प्रकार प्राकृत-सत्त्वका विकार कहा जा सकता है? वास्तवमें अप्राकृत चिद्विभूतिमय उनका आकार ही सत्य है। इस प्रकार निराकाररूपमें वर्णन करनेमें श्रीशङ्कराचार्यका क्या दोष है? क्योंकि वे तो आज्ञाकारी दास हैं। जैसे नारद पञ्चरात्रमें-“माञ्च गोपय येन स्यात् सृष्टिरेषोत्तरोत्तरा।” अर्थात् “मेरे तत्त्वको तुम छुपाओ जिससे यह सृष्टि उत्तरोतर बढ़े।” किन्तु अन्य जो व्यक्ति इस प्रकार व्याख्या श्रवण करेंगे, उनका सर्वनाश होता है। विष्णुकलेवरको 'प्राकृत' माननेकी भाँति विष्णुनिन्दा और हो नहीं सकती॥१११-११५॥
[ ७/११५-११७ अनुभाष्य—सविशेष तत्त्ववस्तु ही विष्णु हैं। विष्णुकी प्रकृति ही प्राकृत जड़-जगत्की मूल है। विवर्तवाद विचारसे निर्विशेष-ब्रह्मकी प्रकृति या मायाशक्तिका वास्तविक अस्तित्व नहीं पाया जाता है। विष्णुमायाके सम्बन्धमें शास्त्रोंने बहुत वर्णन किया है। 'विष्णु'-मायासे उत्पन्न कोई देव-विशेष नहीं हैं। जो लोग इस प्रकार मानते हैं, उनकी विष्णुके विषयमें विपरीत धारणा है। विष्णुकी गणना प्राकृत-देवोंमें कभी भी नहीं हो सकती। जो लोग इस प्रकारसे भ्रान्त होते हैं, वे लोग ही विष्णुको प्राकृत देवताके रूपमें जानते हैं। श्रीभगवान्ने गीता (७/१४) में जीवोंके भवबन्धन-मोचनके लिये कहा है— “दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया। मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते॥” अर्थात् “यह जीव-विमोहिनी एवं त्रिगुणात्मिका मेरी बहिरङ्गा शक्ति निश्चय ही दुस्तरा है, परन्तु जो मेरा ही आश्रय ग्रहण करते हैं, वे इस मायाको पार कर जाते हैं।” विष्णु-वैकुण्ठ वस्तु हैं। उनको प्रकृतिसे उत्पन्न देवता माननेसे वस्तुनिर्देश-सम्बन्धमें अपराध होता है—यही उनकी निन्दा है। विष्णु-अधोक्षज वस्तु हैं, उन्हें प्राकृत वस्तुकी भाँति जड़-इन्द्रियोंके द्वारा जाना नहीं जा सकता। उनके देह-देहीके मध्यमें अद्वयज्ञान अवस्थित है (अर्थात् उनकी देह और उन देहीमें कोई भेद नहीं है)। प्राकृत वस्तुओंमें देह-देहीका भेद वर्तमान है। प्राकृत वस्तुएँ भोगकी सामग्री हैं, किन्तु विष्णु नित्यकाल भोक्ता हैं। 'भोक्ता' को 'भोग्य' माननेसे अपराध होता है और जीवोंकी नित्यसेव्य-वस्तुको जीवोंके समान सेवक-ज्ञानसे परिचय देनेसे उनकी निन्दा ही होती है। आदिलीला ७/११२-११३ संख्याका अनुभाष्य और मध्यलीला २५/३५-३९ संख्या द्रष्टव्य हैं॥११५॥ तत्त्व-वस्तु-बृहत्-अग्निसदृश, जीव-उनके चिङ्गारी-कण :— तत्त्व येन ईश्वरेर ज्वलित ज्वलन। जीवेर स्वरूप-यैछे स्फुलिङ्गेर कण॥११६॥ जीव-शक्ति, श्रीकृष्ण-शक्तिमान्-तत्त्व :— जीवतत्त्व-शक्ति, कृष्णतत्त्व-शक्तिमान्। गीता-विष्णुपुराणादि ताहाते प्रमाण॥११७॥ अनुवाद-वास्तविक तत्त्व यह है कि यदि भगवान्को जलती हुई अग्निकी भाँति कहा जाय, तो जीवका स्वरूप उस अग्निके स्फुलिङ्ग-कण अर्थात् चिङ्गारीकी भाँति है। जीवतत्त्व भगवान्की तटस्था शक्ति है और श्रीकृष्णतत्त्व शक्तिमान् तत्त्व है। गीता और विष्णुपुराणादि इसके प्रमाण हैं॥११६-११७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-ईश्वरके तत्त्वकी जलती हुई अग्निके साथ तुलना करनेसे अनन्त जीवोंकी उस अग्निकी चिङ्गारीके कण-स्वरूप तुलना की जाती है। तात्पर्य यह है कि, ईश्वर-चिन्मय, असीम, जलती हुई अग्निके समान हैं और अनन्त जीव उनसे चिङ्गारीके कण-स्वरूप पृथक् तत्त्व होकर निकले हैं। यहाँपर जीवके स्वरूप गठनमें मायाकी कोई क्रिया ४२८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
नहीं है, अर्थात् कोई प्राकृत कार्यकलाप नहीं है। यदि कहो कि इस प्रकार चित्कणोंके गठनका क्या प्रयोजन है? तो सुनो, ईश्वरकी विचित्र स्वरूपशक्तिकी दो प्रकारकी प्रवृत्ति है—असीम-क्रियाप्रवृत्ति और अणु-क्रियाप्रवृत्ति। असीम-क्रियाप्रवृत्तिसे ईश्वर-स्वरूप और चित्जगत्रूप वैकुण्ठतत्त्व है; इस प्रवृत्तिको 'चित्शक्ति' कहा जाता है। अणु-क्रियाप्रवृत्तिसे अणुचैतन्यरूप अनन्त जीव प्रकट होते हैं; इस प्रवृत्तिको 'जीवशक्ति' कहा जाता है। स्वरूप-शक्तिकी यदि ये दो वृत्तियाँ नहीं रहतीं, तो भगवान्की पूर्णतामें कमी आ जाती। पूर्णेश्वर्यमय भगवान्के शक्तिगत अणुक्रियारूप जीवका अस्तित्व अनिवार्य और अत्याज्य है। इसलिये जीवतत्त्वसे ही श्रीकृष्णतत्त्वमें शक्तिमत्ता (विलास) है। जीवतत्त्वके ना रहनेसे श्रीकृष्णकी पूर्ण-शक्तिमत्ता स्वीकृत नहीं होगी। ईशितव्यके (सेवकके) अभावसे ईशिताका (स्वामीका) अभाव होता है॥११७॥ श्रीमद्भगवद्गीता (७/५)— अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम्। जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत्॥११८॥ अनुवाद—[आठ भेदोंवाली जड़ा प्रकृतिसे] श्रेष्ठ जीवस्वरूपा मेरी एक अन्य प्रकृति जानो, जिसके द्वारा यह जगत् अपने कर्मके द्वारा भोगनेके लिये गृहीत होता है॥११८॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भूमि, जल, अग्नि, वायु और आकाश—ये पञ्चभूतरूप स्थूल-जगत् है तथा मन, बुद्धि और अहङ्कार-रूप लिङ्ग-जगत् है। इस आठ प्रकारसे विभक्त प्रकृति—'अपरा' अथवा 'जड़ा' है; इसका नाम 'माया-प्रकृति' है। इससे पृथक् मेरी और एक 'परा-प्रकृति' है। यही प्रकृति ही जीवस्वरूप होकर इस जगत्में परिपूर्ण है। तात्पर्य यह है,—भगवान् ही एक मात्र वस्तु हैं; उनकी एक 'स्वरूप' अथवा 'आत्म'-शक्ति है। उसी स्वरूप-शक्तिसे पृथक्-प्राय, अर्थात् उसकी छायाकी भाँति जो शक्ति प्रतीत होती है, उसका नाम 'माया-शक्ति' है। स्थूल और लिङ्गमय जड़ ब्रह्माण्डोंकी इस 'माया' से सृष्टि हुई है। जीवतत्त्व मायासे अतीत है। जीवकी शुद्धसत्ता, शुद्ध-अहङ्कार और मनोवृत्ति—सभी मायासे अतीत किसी परा-शक्तिसे गठित है, इसलिये 'जीव' के निर्माण कार्यमें मायाका कोई अधिकार नहीं था। माया-जगत्में प्रविष्ट जीवकी जो जड़-भावान्वित अणुबुद्धि और अहङ्कार प्रतीत हो रहा है, वही केवल मायाका कार्य है। इसी मायाके सम्बन्धसे शुद्ध होकर अपने स्वरूपमें जीवके अवस्थानको 'मुक्ति' कहा जाता है। मुक्ति होनेपर माया-निर्मित अहङ्कार तक नहीं रहता है और जीवकी स्वतःसिद्ध जो भी चिन्मयी वृत्ति है, वह सब शुद्धरूपमें कार्य कर सकती है। इसलिये जीव भगवान्की एक शक्तिविशेष है॥११८॥ अनुभाष्य—इयम् अपरा (अचित्प्रकृतिः जड़त्वात् निकृष्टा)। इतः (जड़प्रकृतेः) अन्यां परां (चिन्मयीं) जीवभूतां (जीवस्वरूपां) मे (मम) प्रकृतिं विद्धि (जानीहि)। हे महाबाहो, यया (चेतनया जीवाख्याया शक्त्या) इदं (जड़ं) जगत् धार्यते (स्वभोगाय गृह्यते)। श्लोक-भावानुवाद—अचित् प्रकृति जड़ होनेके कारण निकृष्टा है। मेरी अन्य एक जीव-स्वरूपा प्रकृतिको इससे श्रेष्ठ जानो। हे महाबाहो! जीव कहलानेवाली चेतन शक्ति इस जड़ जगत्को अपने भोगके लिये ग्रहण करती है॥११८॥
[ ७/११९-१२० चित्, जीव और माया-ये तीन प्रकारकी विष्णुशक्ति :- विष्णुपुराण (६/७/६०)- विष्णुशक्तिः परा प्रोक्ता क्षेत्रज्ञाख्या तथा परा। अविद्या कर्मसंज्ञान्या तृतीया शक्तिरिष्यते ॥ ११९ ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ११९ ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-विष्णुशक्ति-परा, क्षेत्रज्ञा और अविद्या नामक, तीन प्रकारकी है। विष्णुकी पराशक्ति ही 'चित्-शक्ति' है, क्षेत्रज्ञा-शक्ति ही जीवशक्ति है (जिसको मायारूपा 'अविद्या' से 'अपरा' अर्थात् भिन्ना कहा गया है) और कर्म नामक अविद्या-शक्तिका नाम 'माया' है ॥ ११९ ॥ अनुभाष्य-विष्णुशक्ति (विष्णोः स्वरूपशक्तिः) परा (चित्स्वरूपा) प्रोक्ता; तथा क्षेत्रज्ञाख्या (जीवशक्तिः च) परा प्रोक्ता; अन्या अविद्या कर्मसंज्ञा (कर्म यस्याः संज्ञा सा) तृतीया मायाशक्तिः इष्यते। श्लोक-भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ११९ ॥ ईश्वरको जीवकी भाँति अज्ञानमय-बोध ही मायावाद :- हेन जीवतत्त्व लञा लिखि' परतत्त्व। आच्छन्न करिल श्रेष्ठ ईश्वर-महत्त्व ॥ १२० ॥ अनुवाद-ऐसे जीवतत्त्वको शङ्कराचार्यने परतत्त्व (ब्रह्म) के रूपमें वर्णन किया है। इसके द्वारा उन्होंने सर्वश्रेष्ठ ईश्वरकी महिमाको आच्छादित कर दिया है ॥ १२० ॥ अनुभाष्य-ईश्वर, जीव और प्रकृतिस्वरूपको अनिर्वचनीय तथा अज्ञानके रूपमें लिखकर शङ्कराचार्यने ईश्वरके अलौकिक श्रेष्ठत्वका आच्छादन किया है। श्रीरामानुजपाद 'वेदान्तसार' में- “ननु 'आत्मा वा इदमग्रासीत्' इति प्राक्सृष्टेः एकत्वावधारणात् कथं सूक्ष्मचिदचिद्विशिष्टस्य नारायणस्य कारणत्वम् ? उच्यते-'यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते, येन जातानि जीवन्ति, यत्प्रयन्त्यभिसंविशन्ति' इति। परित्यक्तस्थूलाकाराणां सूक्ष्माकारापत्त्या ब्रह्मणि वृत्तिः प्रतिपाद्यते, न तु स्वरूपनिवृत्तिः; 'अक्षरं तमसि लीयते, तमः परे देवे एकीभवति' इति तमःशब्द-वाच्यायाः प्रकृतेः परमात्मन्येकीभाव-श्रवणात्। पृथग्ग्रहणरहितत्वेन वृत्तिरेकीभावः; स एव लय-शब्दार्थः; यथा-वृक्षे लीनाः पतङ्गाः, वने लीनाः सारङ्गाः।” यदि कहो, 'जगत् सृष्टिके पहले केवलमात्र आत्मा थीं' (बृः आः १/४/१), ऐसा होनेसे किस प्रकारसे सूक्ष्म चिदचित्-शक्तिविशिष्ट नारायणका जगत्के मूल-कारण होना सम्भव होता ? इसके उत्तरमें कहा जा सकता है, “जिनसे ये भूतसमूह उत्पन्न हुए हैं, जिनके द्वारा पालित और जिनमें प्रविष्ट होते हैं” (तैः भृः प्रथम अ.) इस तैत्तिरीय-वाक्यसे प्रमाणित होता है कि सभी जीव अपने स्थूल जड़ आकारका परित्यागकर मुक्तावस्थामें सूक्ष्माकार ग्रहणकर ब्रह्ममें अपनी-अपनी वृत्ति (अवस्थिति) प्रमाणित करते हैं, उनका स्वरूप ध्वंस नहीं होता, क्योंकि अविनाशी आत्मा तमः-शब्दवाच्या प्रकृतिमें लीन होनेपर प्रकृतिका ब्रह्मके साथ अभेद (एकीभाव) होता है। उस समय प्रकृतिके साथ ब्रह्मकी पृथक्ता ना रहनेके कारण प्रकृतिका सत्त्व ब्रह्ममें ही अवस्थान करता है। 'लय' शब्दसे इस प्रकार ही समझना होगा जैसे, वृक्षमें स्थित पक्षी अथवा वनमें स्थित मृगसमूह वृक्षमें अथवा वनमें लीन अथवा अन्तर्निविष्ट होते हैं ॥ १२० ॥ ४३० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत