भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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७/७४ ] सम्पूर्ण अभिन्न है। नाम और नामी अभिन्न होनेके कारण वास्तववस्तु श्रीकृष्ण जिस प्रकार नित्य, शुद्ध, पूर्ण, मुक्त, चैतन्यरसविग्रह और अप्राकृत चिन्तामणि हैं, वैकुण्ठनाम भी ठीक उसी प्रकार है। कृष्णेतर प्राकृत नामसे पृथक् होनेपर भी श्रीकृष्णनाम स्वयं वैकुण्ठवस्तु है। इस नाममें तर्कपन्थियोंका कोई अधिकार नहीं है। एकमात्र नामभजनसे ही स्थूल और सूक्ष्म, औपाधिक धर्म-द्वय निरस्त होता है। इसलिये तर्कपन्थाकी प्रबलताके समय अन्य प्रकारके कुण्ठ-धर्मसमूह (जागतिक धर्म) भी तर्कपन्थामें बाधक होते हैं। केवल स्वयं नाम ही तर्कपन्थियोंके तर्कातीत नामी वस्तु हैं। वैकुण्ठवस्तुका नाम ही प्राकृत भोगचिन्तापर मननधर्मोंसे जीवोंको त्राण करनेमें समर्थ कहा गया है—इसलिये यह सर्वमन्त्रोंका सार है। जड़वस्तुका नाम, रूप, गुण, भाव और क्रिया—ये सभी तर्कपन्थाके अधीन हैं, किन्तु वैकुण्ठवस्तु उस प्रकार नहीं है। उस वैकुण्ठनामका अप्राकृत रूप, गुण, परिकर-वैशिष्ट्य और लीला अद्वयज्ञानमें अवस्थित है। मायावादी लोग इन्द्रिय-ज्ञानसे वस्तुके नाम, रूप, गुणमें भेद मानकर द्वैतविचारके हेयत्वमें अधःपतित होते हैं। इसलिये उनके उपदेष्टा “सदेव सौम्येदमग्र आसीत्” अर्थात् “हे सौम्य! वे (सब कारणोंके कारण परात्पर-तत्त्व) अन्य किसी वस्तु अथवा जीवोंकी सृष्टिसे पूर्व अवस्थान करते हैं”, और “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” अर्थात् “यह सब कुछ ही ब्रह्म है” आदि महावाक्योंके द्वारा उनको प्राकृत-विचारसे मुक्त करते हैं। श्रीनामाश्रयके अतिरिक्त नामापराधके द्वारा कभी भी इन्द्रियोंके भोगमय तर्कपन्थासे छुटकारा नहीं पाया जा सकता॥७४॥ मन्त्रमाहात्म्य (नारदपञ्चरात्रमें)— “त्रयो वेदाः षडङ्गानि छन्दांसि विविधाः सुराः। सर्वमष्टाक्षरान्तःस्थं यच्चान्यदपि वाङ्मयम्। सर्ववेदान्तसारार्थः संसारार्णवतारणः॥” अर्थात् “अष्टाक्षर मन्त्रके अन्दर ही तीनों वेद, उनके छह अङ्ग (शिक्षा, कल्प, निरुक्त, व्याकरण, ज्योतिष और छन्द), विविध छन्द (वैदिक साहित्य) और सभी देवता तथा जो कुछ और भी अन्य वाङ्मय है, वह सब समाहित है। यह अष्टाक्षर मन्त्र सभी वेदान्तोंका सार है और संसार समुद्रसे तारनेवाली नौका है।” (कलिसन्तरणोपनिषद्)— “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥ इति षोड़शकं नाम्नां कलिकल्मषनाशनम्। नातः परोपायाः सर्ववेदेषु दृश्यते॥” अर्थात् “हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे, हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे; ये सोलह नाम कलिके समस्त दोषोंका नाश करनेवाले हैं और इससे श्रेष्ठ उपाय सभी शास्त्रोंमें देखनेपर कहीं भी दिखलायी नहीं देता।” मुण्डकोपनिषद्भाष्ये श्रीमध्वधृतवचनम्— “द्वापरीयैर्यजैर्विष्णुः पञ्चरात्रैश्च केवलम्। कलौ तु नाममात्रेण पूज्यते भगवान् हरिः॥” सातवाँ अध्याय | ४०५