भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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[ ७/७२-७४ नामी, जो अभिन्न वस्तु हैं और मायाप्रयास-रहित व्यक्तियोंके लिये ही एकमात्र ज्ञेय (जानने योग्य वस्तु) है—यही गुरुपादपद्मसे प्राप्त दिव्यज्ञान है। श्रीगुरुपादपद्मके आश्रयसे पहले तक (श्रीकृष्ण और अपने) साम्बन्धिक-विचारसे मैं मूर्ख था, किन्तु सेवोन्मुख होकर ही बन्धमोक्षविदकी (बन्धनसे मुक्त होनेकी प्रक्रियाके ज्ञाताकी) चेष्टा अपनेमें देख पा रहा हूँ। 'कृष्णनाम'—शब्दसे यहाँपर नामाभास अथवा नामापराध उद्दिष्ट नहीं हुआ है॥७३॥ अमृतानुकणिका—वेदान्तका सार कृष्णमन्त्र ही समस्त साधनोंका सार है और वेदान्तका भी सार है। (हःभःविः-१/१५५-१५६)— “मन्त्रास्तु कृष्णदेवस्य साक्षाद्भगवतो हरेः। सर्वावतारबीजस्य सर्वतो वीर्य्यवत्तमाः॥ सर्वेषां मन्त्रवर्याणां श्रेष्ठो वैष्णव उच्यते। विशेषात् कृष्णमनवो भोगमोक्षैकसाधनम्॥” अर्थात् “समस्त अवतारोंके बीजस्वरूप साक्षात् भगवान् हरि श्रीकृष्णदेवके मन्त्रसमूह अत्यधिक प्रभाव सम्पन्न हैं। समस्त श्रेष्ठ मन्त्रोंमें वैष्णव मन्त्र ही श्रेष्ठ हैं, विशेषतः श्रीकृष्णमन्त्र भोग-मोक्षको प्रदान करनेवाला है।” (हःभःविः-१/१५८-१५९)— “कृष्ण एव परं ब्रह्म सच्चिदानन्दविग्रह। स्मृतिमात्रेण तेषां वै भुक्तिमुक्तिफलप्रदः॥ तत्रापि भगवत्तं स्वां तन्वतो गोपलीलया। तस्य श्रेष्ठतमा मन्त्रास्तेष्वप्यष्टादशाक्षरः॥” अर्थात् “श्रीकृष्ण ही सच्चिदानन्द विग्रह परब्रह्म हैं। श्रीकृष्ण स्मरणमात्रसे ही भुक्ति एवं मुक्ति प्रदान करते हैं। तथापि अपनी भगवत्ताका प्रकाश गोपलीलासे ही करते हैं। उनका ही श्रेष्ठतम मन्त्र—अष्टदशाक्षर मन्त्र है।” अष्टाक्षर मन्त्रके प्रसङ्गमें (हःभःविः-१/१३१) में भी कहा है कृष्णमन्त्र ही “सर्ववेदान्तसारार्थः” है।” महाप्रभु भङ्गीसे मायावादी संन्यासियोंको जतला रहे हैं कि श्रीकृष्णमन्त्र समस्त साधनोंका सार होनेसे ध्यान और वेदान्त-पाठादि साधन अङ्गोंका अनुष्ठान निष्प्रयोजनीय है, इसलिये वे ध्यान अथवा वेदान्तका पाठ नहीं करते हैं॥७२॥ कलियुगमें श्रीकृष्णनाम ही एकमात्र उपास्य :- नाम बिना कलिकालॆ नाहि आर धर्म। सर्वमन्त्रसार नाम,—एइ शास्त्रमर्म॥७४॥ अनुवाद—कलियुगमें नामके अतिरिक्त दूसरा कोई धर्म नहीं है। सभी मन्त्रोंका सार यह श्रीकृष्णनाम ही है, यही शास्त्रोंका निगूढ़ अर्थ है॥७४॥ अनुभाष्य—सत्य, त्रेता और द्वापर, इन तीनों युगोंमें श्रौतपन्थाका आदर था, किन्तु इस कलिकालकी प्रवृत्तिके साथ अश्रौत या तर्कपन्था उत्पन्न हुआ है। वास्तव-सत्यके (शिष्य-परम्पराके द्वारा) अवरोहणके विषयमें सन्देह करके इन्द्रियज्ञानकी प्रबलतामें जिस तर्कपन्थाकी उत्पत्ति हुई है, वह श्रुतिविरोधी है। श्रीकृष्णनाम वैकुण्ठवस्तु होनेके कारण वास्तव-वस्तु श्रीकृष्णके साथ ४०४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत