श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ७/७२-७६ अर्थात् “द्वापर युगमें भगवान् विष्णुकी पूजा नारद पञ्चरात्रादि शास्त्रोंकी विधिके अनुसार करनी चाहिये। कलियुगमें केवल नामके द्वारा श्रीहरिकी पूजा होती है।” 'कृष्णमन्त्र' और 'कृष्णनाम' सम्बन्धमें श्रीजीवगोस्वामी प्रभु भक्तिसन्दर्भमें (२८४ संख्या)— “ननु भगवन्नामात्मका एव मन्त्राः; तत्र विशेषेण नमः शब्दाद्यलङ्कृताः श्रीभगवता श्रीमदृषिभिश्चाहितशक्तिविशेषाः, श्रीभगवता सममात्मसम्बन्धविशेषप्रतिपादकाश्च। तत्र केवलानि श्रीभगवन्नामान्यपि निरपेक्षाण्येव परमपुरुषार्थफलपर्यन्तदानसमर्थानि। ततो मन्त्रेषु नामतोऽप्यधिकसामर्थ्ये लब्धे कथं दीक्षाद्यपेक्षा? उच्यते-यद्यपि स्वरूपतो नास्ति, तथापि प्रायः स्वभावतो देहादिसम्बन्धेन कदर्यशीलानां विक्षिप्तचित्तानां जनानां तत्सङ्कोचीकरणाय श्रीमदृषिप्रभृतिभिरर्चनमार्गे क्वचित् क्वचित् काचित् काचिन्मर्यादा स्थापितास्ति।” “यदि कहो, — 'मन्त्रसमूह तो भगवन्नामात्मक है; मन्त्रकी विशेषता यह है कि मन्त्र भगवन्नामके साथ 'नमः', 'स्वाहा' शब्दादिके द्वारा भूषित अर्थात् नामानुगत्य भावयुक्त है। मन्त्रोंमें भगवान्की इच्छासे श्रीनारदादि ऋषियोंने शक्तिविशेष समर्पित की है। मन्त्रसमूह श्रीभगवान्के साथ मन्त्रोच्चारणकारीका सम्बन्धविशेष स्थापित करते हैं। मन्त्रमें भगवान्के जो अन्यभाव-अपेक्षारहित नामसमूह हैं (अर्थात् नमः, स्वाहा आदि शब्दोंसे अलङ्कृत ना होकर भी तथा ऋषियोंके द्वारा समर्पित शक्तिकी अपेक्षा ना रखते हुए भी), वे ही परमपुरुषार्थफल (श्रीकृष्णप्रेम) तक दान करनेमें समर्थ हैं। ऐसा होनेपर नामकी अपेक्षा मन्त्रको अधिक समर्थ कहकर नामकीर्तनकारीकी उस मन्त्रमें दीक्षाकी अपेक्षा क्यों है?' इसके उत्तरमें कह रहे हैं- 'यद्यपि नामकारीकी दीक्षाकी अपेक्षा स्वरूपतः नहीं है, तथापि प्रायः ही स्वाभाविक भोगपर देहादि सम्बन्ध रहनेके कारण बुरे स्वभावसे विक्षिप्तचित्तवाले मानवगणकी उस-उस बुरे स्वभाव और चित्तकी चञ्चलताको सङ्कुचित करनेके लिये श्रीनारदादि ऋषिओंने अर्चनमार्गमें कहीं-कहीं मन्त्रमें कुछ-कुछ मर्यादाकी स्थापना की है।' बद्धजीवके जड़-अहङ्काररूप भोगकी निवृत्तिके लिये मन्त्रसिद्धिकी आवश्यकता है। 'नमः' शब्दमें 'म'कारका अर्थ - अहङ्कार है; 'न'कारका अर्थ-तन्निवृत्ति (उससे निवृत्ति) है, अर्थात् मन्त्रसिद्धिके फलसे जीवको अप्राकृत अनुभूति लाभ होती है। श्रीरूपगोस्वामी प्रभुने भी 'नामाष्टक'में - 'अयि मुक्तकुलैरुपास्यमानं' कहकर हरिनामको आह्वान किया है॥७२-७४॥ एत बलि' एक श्लोक शिखाइल मोरे। कण्ठे करि' एइ श्लोक करिह विचारे ॥ ७५ ॥ अनुवाद- यह कहकर मेरे गुरुदेवने मुझे एक श्लोक सिखलाया और कहा कि इसे कण्ठस्थ करके इसपर विचार करो ॥ ७५ ॥ हरेर्नाम श्लोक :- बृहन्नारदीय वचन (३८/१२६) - हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलम्। कलौ नास्त्येव नास्त्येव नास्त्येव गतिरन्यथा ॥ ७६ ॥ अनुवाद - कलियुगमें हरिनाम ही, हरिनाम ही, हरिनाम ही एकमात्र साधन है, इसके अतिरिक्त अन्य कोई गति नहीं है, नहीं है, नहीं है ॥ ७६ ॥ ४०६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत