श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 413, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें६/८३-८८ ] “कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निवृतिवाचकः। तयोरैक्यं परंब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते॥” (मःभाः उःपः ७१अः ४र्थ श्लोक) अर्थात् “कृष्-धातु-भू अर्थात् सत्तावाचक अथवा आकर्षक; ण-शब्द निवृति अर्थात् परमानन्दवाचक। कृष्-धातुमें ण-प्रत्यय करके उन दोनोंके ऐक्य 'कृष्ण'-शब्दसे परमब्रह्म प्रतिपादित हुआ है।” धर्मक्षेत्र भारतके 'ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्' मन्त्रके उपासक चार्वाक* और ऐसे ही विचार रखनेवाले विश्वके अन्य देशोंके दार्शनिक भी इसी आकर्षक-सत्ताको, इसी निवृति या आनन्दको अर्थात् वे अवैधरूपसे इन्हीं श्रीकृष्णको ही चाहते हैं; अविधिपूर्वक श्रीकृष्णकी ही उपासना करते हैं। वे श्रीकृष्णमायाको 'श्रीकृष्ण' कहकर भ्रमित होते हैं, इसलिये वे स्वाधीनता नहीं लाभ करते हैं॥८३॥ 'चैतन्येर दास मुञि, चैतन्येर दास। चैतन्येर दास मुञि, ताँर दासेर दास॥'८४॥ एत बलि' नाचे, गाय, हुङ्कार गम्भीर। क्षणेके बसिला आचार्य हैञा सुस्थिर ॥ ८५ ॥ अनुवाद—'मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ, श्रीचैतन्यका दास हूँ, मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ, मैं उनके दासका दास हूँ',—ऐसा कहकर गम्भीर हुङ्कार करते हुए श्रीअद्वैताचार्य नाचने, गाने लगते तथा कुछ क्षणके बाद वे स्थिर होकर बैठ जाते ॥ ८४-८५ ॥ श्रीबलदेव और उनके समस्त अंशावतार ही श्रीकृष्णदासाभिमानी :— भक्त-अभिमान मूल श्रीबलरामे। सेइ भावे अनुगत ताँर अंशगणे ॥ ८६ ॥ १) उनके सङ्कर्षणअवतार दासाभिमानी :— ताँर अवतार एक श्रीसङ्कर्षण। भक्त बलि' अभिमान करे सर्वक्षण ॥ ८७ ॥ २) उनके लक्ष्मणावतार दासाभिमानी :— ताँर अवतार आन श्रीयुत लक्ष्मण। श्रीरामेर दास्य तिँहो कैल अनुक्षण ॥ ८८ ॥ *चार्वाकका सिद्धान्त— “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत् यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्। भस्मि-भूतस्य देहस्य कुतः पुनागमनो भवेत्॥” अर्थात् जबतक जीओ, तबतक सुखपूर्वक जीओ। सुखपूर्वक जीनेके लिये स्वस्थ देह चाहिये, इसलिये प्रचुर मात्रामें घी पान करो और घीसे बने व्यञ्जन खाओ। यदि तुम्हारे पास घीके लिये धन नहीं है, तो ऋण लेकर भी घी पान करो। ऋण चुकानेकी चिन्ता मत करो, क्योंकि मरनेके बाद यह देह तो जलकर राख बन जायेगी और तुम्हारा पुनागमन कहाँ है, अर्थात् पुनर्जन्म तो होता नहीं। छठा अध्याय | ३७१