भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ ६/८३ अनुभाष्य—जीव अपने स्वरूपको भूलकर स्वयंको भोक्ता मानकर श्रीकृष्णसेवासे विमुख होता है। अज्ञानके कारण कुछ लोग ऐसा सोचते हैं कि निरन्तर भगवत्सेवा ही उनका एकमात्र कार्य नहीं है, किन्तु वास्तवमें सभी प्राणी नित्यकाल उनके दास्यमें अवस्थित हैं। भगवत्सेवा ना करनेसे जीवका स्वभाव विपरीत होनेसे उसका अमङ्गल होता है। श्रीचैतन्य महाप्रभुका दासत्व ही अणुचित् जीवका स्वरूप-धर्म है। अपनी इस स्वरूपवृत्तिको भूलकर बद्धजीव जो अन्य चेष्टाएँ करता है, वे केवल संसारके भोगोंके आकर्षण मात्र हैं। चैतन्य उदय होनेपर उसके हृदयमें श्रीचैतन्य महाप्रभुका दास्य स्वभावतः ही प्रकाशित होता है। श्रीचैतन्यसेवाका त्यागकर बद्धजीवके कार्योंमें अन्य वस्तुओंके ऊपर उसका प्रभुत्व दिखलायी देता है, किन्तु उस समय भी वह श्रीचैतन्य महाप्रभुका 'अयोग्य' दासमात्र ही है॥८३॥ अमृताणुकणिका—सभी ही सर्वकारण-कारण श्रीकृष्णके दास और उपासक हैं। जो इस बातकी जितनी उपलब्धि कर पाते हैं, वे उतने ही मुक्त या स्वाधीन हैं। जो इसकी जितनी उपलब्धि नहीं कर पाते, वे उतने ही अमुक्त या पराधीन हैं। इस बात को गीतामें स्वयं भगवान् श्रीकृष्णने कहा है (गीता ९/२४)— “अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च। न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥” अर्थात् “मैं ही समस्त यज्ञोंका भोक्ता और प्रभु हूँ, किन्तु जो लोग मुझे स्वरूपतः नहीं जानते, वे संसारमें प्रत्यावर्त्तन करते हैं।” जीवमात्र ही जब श्रीकृष्णका नित्य दास है, तब श्रीकृष्णोपासना प्रत्येक जीवका नित्य धर्म है। श्रीकृष्णकी विस्मृतिके फलस्वरूप नित्य स्वभावसे विच्युत और विरूपग्रस्त होनेपर भी जीवका नित्यधर्म उसका परित्याग नहीं करता; तब वह विकृतस्वभावसे विकृतभावसे विपरीत गतिमें दिखलायी देता है। जो जितने परिमाणमें स्वभावके पथमें हैं, वे उसी परिमाणमें श्रीकृष्णकी उपासना करते हैं। प्रत्येक जीव ही श्रीकृष्णकी उपासना कर रहे हैं, तो भी जो स्वभावके पथकी विपरीत दिशामें चल रहे हैं, वे अविधिपूर्वक श्रीकृष्णकी उपासना कर रहे हैं। और जो जितना स्वभावके ठीक पथमें चल रहे हैं, वे उतनी विधिपूर्वक उपासना करके क्रमशः ऐकान्तिक, अव्यभिचारी, अद्वयज्ञानावलम्बी, एकायनस्कन्धी (वर्णाश्रमातीत) भागवतावस्था-लाभ एवं विधिकी पूर्ण पराकाष्ठा अनुराग या प्रेम लाभ करते हैं। स्वभावके पूर्णतम-राज्यमें और जो 'अविधि' (रागमार्गमें विधिका विचार ना करके केवल लोभके द्वारा ही प्रवृत्त होकर जो भक्ति) है, उसीमें विधिकी परिपूर्ण-तात्पर्यमयता और चरितार्थता है। गीतामें भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनसे कहा (गीता ९/२३)— “येऽप्यन्यदेवताभक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः। तेऽपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥” अर्थात् “हे कौन्तेय! जो लोग श्रद्धापूर्वक अन्य देवताओंकी आराधना करते हैं, वे भी अविधिपूर्वक मेरी ही आराधना करते हैं।” जगत्में श्रीकृष्णोपासकके अतिरिक्त और कोई उपासक नहीं हैं, विधिके साथ हो अथवा अविधिके साथ हो, सभी श्रीकृष्णको ही चाहते हैं। क्योंकि श्रीकृष्ण ही प्रत्येक चेतनस्वरूपके प्राण, आकर्षक और आनन्द-दायक हैं— ३७० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत