श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६/८६-९५ अनुवाद—भक्त-अभिमानके मूल श्रीबलराम हैं, इसलिये यही भाव उनके अनुगत अंशोंमें भी रहता है। उनके एक अवतार श्रीसङ्कर्षण हैं और वे सदा अपनेको भक्त ही मानते हैं। उनके एक और अवतार श्रीलक्ष्मण हैं और वे प्रतिक्षण श्रीरामचन्द्रकी सेवामें तत्पर रहते हैं॥८६-८८॥ ३) उनके आदि-पुरुषावतार भी भक्ताभिमानी :- सङ्कर्षण-अवतार—कारणाब्धिशायी। ताँहार हृदये भक्तभाव अनुयायी॥८९॥ अनुवाद—सङ्कर्षणके अवतार कारणाब्धिशायी विष्णु हैं। उनके हृदयमें भी भक्त-भाव सदा विराजमान रहता है॥८९॥ ४) उनके अद्वैतावतार भी भक्ताभिमानी :- ताँहार प्रकाश-भेद—अद्वैत-आचार्य। कायमनोवाक्ये ताँर भक्ति सदा कार्य॥९०॥ वाक्ये कहे, ‘मुञि चैतन्येर अनुचर।’ ‘मुञि ताँर भक्त’—मने भावे निरन्तर॥९१॥ जल-तुलसी दिया करे कायाते सेवन। भक्ति प्रचारिया सब तारिला भुवन॥९२॥ अनुवाद—उनके प्रकाश श्रीअद्वैताचार्य हैं, जो तन, मन और वचनसे सदा भक्तिका ही कार्य करते हैं। वे वचनके द्वारा कहते हैं—‘मैं श्रीचैतन्यका दास हूँ’ और उनके मनमें सदा यही भाव होता है कि मैं उनका भक्त हूँ। श्रीकृष्णको गङ्गाजल और तुलसी अर्पण करके तनसे सेवा करते हैं और भक्तिका प्रचार करके त्रिभुवनका उद्धार करते हैं॥९०-९२॥ ५) उनके शेषावतार भी सेवकाभिमानी :- पृथिवी धरेन येइ शेष-सङ्कर्षण। कायव्यूह करि’ करेन कृष्णेर सेवन॥९३॥ श्रीकृष्णके सभी अंशावतार उनके भक्त :- एइ सब हय श्रीकृष्णेर अवतार। निरन्तर देखि सबार भक्तिर आचार॥९४॥ अनुवाद—शेष-सङ्कर्षण जो पृथ्वीको धारण करते हैं, वे कायव्यूह (छत्रादि रूप) धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। श्रीबलरामसे लेकर शेष-सङ्कर्षण तक, ये सब श्रीकृष्णके अवतार हैं और इन सबमें निरन्तर भक्तिका आचरण देखा जाता है॥९३-९४॥ अनुभाष्य—‘कायव्यूह’ अर्थात् दस देह धारणकर वे श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं। संख्या ७६ द्रष्टव्य है॥९३॥ ५) भक्तावतारकी सर्वश्रेष्ठ मर्यादा :- ए-सबाके शास्त्रे कहे ‘भक्त-अवतार’। ‘भक्त-अवतार’-पद उपरि सबार॥९५॥
३७२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत