श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६/९५-९९ ] अनुवाद—शास्त्रोंमें इन सबको ‘भक्त-अवतार’ कहा जाता है। ‘भक्त-अवतार’ का पद सबसे श्रेष्ठ माना जाता है॥९५॥ अनुभाष्य—भगवान् अपना ऐश्वर्य प्रकाश करनेके लिये जब प्रपञ्चमें अवतीर्ण होते हैं, तब जीवको भजनकी शिक्षा देनेके लिये उनका जो आदर्श भक्तावतार होता है, वह सभी ईश्वरके अवतारोंकी लीलाओंकी अपेक्षा जीवके लिये सर्वश्रेष्ठ और मङ्गलप्रद है। ऐश्वर्य-प्रधान अवतारोंकी लीलाओंको प्राकृत बुद्धिसे देखकर जीव कभी मोहित होकर उनके अनुकरणके प्रयासमें दुर्गतिको प्राप्त करता है, किन्तु भगवान्के भक्तरूपमें अवतारोंके आदर्शको देखकर जीवका अहङ्कार वैसा कुफल उत्पन्न नहीं कर पाता। जैसे, आजकल अनेक व्यक्ति स्वयंको 'वासुदेवादि' अवतार घोषित करके प्रतिष्ठा पानेका प्रयास करते हैं, परन्तु ऐसे लोगोंको मरनेके बाद सियारकी योनि प्राप्त होती है। भक्तावतारोंके स्वरूपदर्शनमें विमूढ़ व्यक्तियोंकी अर्थात् जो उनको समझ नहीं पाते, उनकी ही इस प्रकार दुर्गति होती है। मिथ्या अहङ्कार बद्धजीवको भगवत्-ऐश्वर्यकी कामनामें प्रमत्त करके मायावादी बना देता है॥९५॥ अंशी श्रीकृष्णके प्रति अंशावतारका ज्येष्ठ-कनिष्ठ व्यवहार :- एकमात्र ‘अंशी’—कृष्ण, ‘अंश’—अवतार। अंशी-अंशे देखि ज्येष्ठ-कनिष्ठ-आचार॥९६॥ कनिष्ठ अंशावतारकी ज्येष्ठ अंशीके प्रति प्रभु-बुद्धि और कनिष्ठ अंशावतारका ज्येष्ठ अंशीके प्रति दासाभिमान :- ज्येष्ठ-भावे अंशीते हय प्रभु-ज्ञान। कनिष्ठ-भावे आपनाते भक्त-अभिमान ॥ ९७॥ अनुवाद—श्रीकृष्ण एकमात्र अंशी हैं और अन्य सभी अवतार उनके अंश हैं। अंशी और अंशमें ज्येष्ठ-कनिष्ठका आचरण देखा जाता है। ज्येष्ठ-भावसे अंशीमें प्रभु होनेका अभिमान होता है और कनिष्ठ-भावसे अंशका अपनेमें भक्ताभिमान होता है॥९६-९७॥ अनुभाष्य—खण्डित वस्तुको ‘अंश’ कहा जाता है और जिसका खण्ड होता है, उस वस्तुको ‘अंशी’ कहते हैं। अंशीका अंश, अखण्डका खण्ड—अंशी और अखण्डके अन्तर्गत हैं। प्रभु अंशी हैं और भक्त अंश हैं। इस ‘प्रभु’ और ‘भक्त’ के परस्पर सम्बन्धमें ज्येष्ठ-कनिष्ठ या बड़े-छोटेका विचार जुड़ा है। बड़ेका नाम ‘प्रभु’, छोटेका नाम ‘भक्त’ है। श्रीकृष्ण अंशी हैं, श्रीबलदेव और उनके समानधर्ममें अवस्थित महाविष्णुके सभी प्रकाश उनके अंश हैं। श्रीकृष्णका स्वयंमें प्रभु-अभिमान है और श्रीबलदेवादिका स्वयंमें भक्ताभिमान है॥९७॥ श्रीकृष्णके निकट भक्तका ही सर्वश्रेष्ठ सम्मान :- कृष्णेर समता हैते बड़ भक्तपद। आत्मा हैते कृष्णेर भक्त हय प्रेमास्पद॥९८॥ आत्मा हैते कृष्ण, भक्ते बड़ करि' माने। इहाते बहुत शास्त्र-वचन-प्रमाणे ॥ ९९॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी समानतासे श्रीकृष्णके भक्तका पद बड़ा है, क्योंकि भक्त श्रीकृष्णको छठा अध्याय | ३७३