भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 416

[ ६/९८-१०२ उनकी आत्मासे भी अधिक प्रिय हैं। श्रीकृष्ण भक्तको अपनेसे भी बड़ा मानते हैं, अनेक शास्त्र-वचन इस बातके प्रमाण हैं॥९८-९९॥ अनुभाष्य—श्रीकृष्णके समान होनेके विचारकी अपेक्षा श्रीकृष्णभक्त-पद अर्थात् भक्तोंकी श्रीकृष्णसेवा श्रेष्ठ है। क्योंकि श्रीकृष्णका स्वयंके प्रति जितना प्रेम है, उससे कहीं अधिक उनका अपने सेवकके प्रति प्रेम है। श्रीभागवत (९/४/६८) में—“साधवो हृदयं मह्यं साधूनां हृदयन्त्वहम्। मदन्यत्ते न जानन्ति नाहं तेभ्यो मनागपि॥” अर्थात् “साधु मेरा हृदय हैं और साधुओंका हृदय मैं हूँ। वे मेरे अतिरिक्त किसीको नहीं जानते और मैं भी उनके अतिरिक्त किसी अन्यको तनिक भी नहीं जानता हूँ।” यह श्लोक ही इसका प्रकृष्ट उदाहरण है॥९८॥ श्रीमद्भागवत (११/१४/१४)— न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥१००॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१००॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे उद्धव! ब्रह्मा, सङ्कर्षण, लक्ष्मी और स्वयं मैं, मुझे इतने प्रिय नहीं हैं, जितने मेरे भक्त तुम मुझे प्रिय हो॥१००॥ अनुभाष्य—अपने परमभक्त उद्धवसे श्रीकृष्णने कहा— मे (मम) भक्त भवान् (उद्धवः) यथा प्रियतमः आत्मयोनिः (ब्रह्मा) तथा न; शङ्करः तथा न; सङ्कर्षणः च न तथा प्रियतमः; श्रीः (लक्ष्मीः) तथा न, आत्मा तथा न एव (अहं श्रीमूर्त्तिरपि नैव प्रियतमा)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१००॥ भक्तभावमें ही श्रीकृष्णका स्वमाधुर्यास्वादन :— कृष्णसाम्ये नहे ताँर माधुर्यास्वादन। भक्तभावे करे ताँर माधुर्य चर्वण॥१०१॥ शास्त्रेर सिद्धान्त एइ,—विज्ञेर अनुभव। मूढ़लोक नाहि जाने भावेर वैभव॥१०२॥ अनुवाद—श्रीकृष्णकी समानता होनेसे उनके माधुर्यका आस्वादन सम्भव नहीं है। भक्तभावसे ही उनके माधुर्यका पूर्ण आस्वादन हो सकता है। यही शास्त्रोंका सिद्धान्त है, जिन्होंने श्रीकृष्णके माधुर्यका आस्वादन किया है, उन विज्ञ महापुरुषोंका यही अनुभव है। परन्तु मूर्ख लोग इस भावकी महिमाको नहीं जानते॥१०१-१०२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णमें समता बुद्धि करनेसे उनके माधुर्यका आस्वादन नहीं हो सकता॥१०१॥ इति अमृतप्रवाहभाष्ये षष्ठ परिच्छेद। छठे अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ। अनुभाष्य—जीवको सारूप्यादि मुक्तिमें अथवा विष्णुतत्त्वमें श्रीकृष्णके साथ साम्यभाव रहनेके कारण श्रीकृष्णदास्यके माधुर्यका यथारूप आस्वादन नहीं होता। भक्तभावमें श्रीकृष्णके साथ साम्यभाव (भोक्ताका भाव) नहीं रहनेके कारण, चर्व्य (चबाये जानेवाली) वस्तुके रसास्वादनकी ३७४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत