भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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६/१०१-१०८ ] भाँति श्रीकृष्ण-मधुरिमाकी पूर्ण उपलब्धि होती है। प्रभुत्वके लोभसे मूर्खतावशतः साधारण लोग दास्यभावकी पराकाष्ठाको अनुभव करनेमें स्वभावतः ही अक्षम हैं। विशेष अभिज्ञ व्यक्ति और शास्त्रोंमें प्रगाढ़रूपमें प्रविष्ट व्यक्ति ही इस सूक्ष्म विषयको समझ सकते हैं॥१०१-१०२॥ भक्तभाव लेकर ही श्रीनित्यानन्द-रामादि विष्णुवर्गका श्रीकृष्णमाधुर्यास्वादन :- भक्तभाव अङ्गीकरि' बलराम, लक्ष्मण। अद्वैत, नित्यानन्द, शेष, सङ्कर्षण॥१०३॥ कृष्णेर माधुर्यरसामृत करे पान। सेइ सुखे मत्त, किछु नाहि जाने आन॥१०४॥ अनुवाद-भक्त-भावको अङ्गीकार करके श्रीबलराम, श्रीलक्ष्मण, श्रीअद्वैताचार्य, श्रीनित्यानन्द प्रभु, श्रीशेष और श्रीसङ्कर्षण श्रीकृष्णके माधुर्यरसका पानकर उस सुखमें इतने मत्त हो जाते हैं कि उन्हें और किसी बातका ज्ञान ही नहीं रहता॥१०३-१०४॥ स्वयं श्रीकृष्णका भी अपने माधुर्यके आस्वादनके लिये भक्तभावमें श्रीगौररूपमें अवतार :- अन्येर आछुक कार्य, आपने श्रीकृष्ण। आपन-माधुर्य-पाने हइला सतृष्ण॥१०५॥ स्वमाधुर्य आस्वादिते करेन यतन। भक्तभाव बिनु नहे ताहा आस्वादन॥१०६॥ अनुवाद-औरोंकी बात क्या कहें, स्वयं श्रीकृष्णमें भी अपने माधुर्यके आस्वादनकी तृष्णा होती है। वे उसका आस्वादन करनेका प्रयास करते हैं, परन्तु भक्त-भावको अङ्गीकार किये बिना वे उसका आस्वादन नहीं कर पाते॥१०५-१०६॥ अनुभाष्य-आदिलीला ४/१३७-१५८ द्रष्टव्य हैं। भक्तोंकी भजनीय वस्तु श्रीकृष्णकी माधुरी है। वे किस प्रकारसे उस माधुर्यका आस्वादन करते हैं, भक्तभावको स्वीकार किये बिना उसे अनुभव करना असम्भव जानकर श्रीकृष्ण भी स्वयं भक्त बन गये॥१०५-१०६॥ भक्तभाव अङ्गीकरि' हैला अवतीर्ण। श्रीकृष्णचैतन्यरूपे सर्वभावे पूर्ण॥१०७॥ नाना-भक्तभावे करेन स्वमाधुर्य पान। पूर्वे करियाछि एइ सिद्धान्त व्याख्यान॥१०८॥ अनुवाद-इसलिये भक्तभावको अङ्गीकार करके श्रीकृष्ण सभी भावोंसे पूर्ण श्रीचैतन्य महाप्रभुके रूपमें अवतीर्ण हुए। मैंने पहले ही इस सिद्धान्तकी व्याख्या की है कि भगवान् विभिन्न भक्तोंके भावोंको ग्रहणकर अपने माधुर्यका आस्वादन करते हैं॥१०७-१०८॥ अनुभाष्य-शान्त, दास्य, सख्य, वात्सल्य और मधुर-इन पाँच विभिन्न रसोंका आस्वादन करनेके लिये उन-उन भावोंको अङ्गीकारकर श्रीगौरहरि सब प्रकारसे परिपूर्ण हैं। विभिन्न रसोंके आश्रित भक्तोंके भावोंको ग्रहणकर सभी भावोंसे पूर्ण होकर श्रीगौरचन्द्र अपने माधुर्यका पान करते हैं॥१०७-१०८॥ छठा अध्याय | ३७५