भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 418

[ ६/१०९-११३ विष्णुके सभी अवतारोंमें ही भक्तभाव :- अवतारगणेर भक्तभावे अधिकार। भक्तभाव हैते अधिक सुख नाहि आर॥१०९॥ अनुवाद—[सभी अवतार अंशी श्रीकृष्णके अंश हैं और अंशका कर्त्तव्य अंशीकी सेवा करना हैं, इसलिये] अवतारोंका भक्तभावमें ही अधिकार है। भक्तभावके सुखसे अधिक सुख कहीं भी नहीं है॥१०९॥ अनुभाष्य—विष्णुके सभी अवतारोंका श्रीकृष्णसेवाके उद्देश्यसे भक्तभावमें अवतीर्ण होनेका अधिकार है। ईश्वरभावकी अपेक्षा भक्तभावके द्वारा ही सेव्यकी सेवामें अधिक सुखका आस्वादन होता है॥१०९॥ श्रीसङ्कर्षण आदि-भक्तावतार :- मूल भक्त-अवतार श्रीसङ्कर्षण। भक्त-अवतार तँहि अद्वैते गणन॥११०॥ अनुवाद—श्रीसङ्कर्षण भक्त-अवतारोंके मूल हैं। श्रीअद्वैतकी भी गणना भक्त-अवतारोंमें की जाती है॥११०॥ अनुभाष्य—श्रीअद्वैतप्रभु विष्णुतत्त्व होनेपर भी उन्होंने श्रीचैतन्य महाप्रभुके पार्षदरूपमें सेवकलीलाका ही प्रदर्शन किया। अपनेमें सेवकाभिमानसे ही विष्णुतत्त्वका भक्तावतारत्व है। महावैकुण्ठमें श्रीसङ्कर्षण चतुर्व्यूहके ईश्वररूपमें अवस्थित होकर भी मूल-भक्तावतार हैं। श्रीसङ्कर्षणके एक अंश कारणजलमें शयन करनेवाले जो महाविष्णु हैं, उनके प्रकाशभेदके कारण ही हम निमित्त और उपादानमें ईक्षणके सम्बन्धमें जान सकते हैं, इसलिये महाविष्णुके अवतार श्रीअद्वैताचार्य विष्णुतत्त्व हैं। श्रीसङ्कर्षणके सभी प्रकाशभेद स्वयंरूप श्रीकृष्णकी सेवामें नियुक्त होनेके कारण, श्रीअद्वैतप्रभु भी श्रीगौर-कृष्णके सेवक अथवा भक्तावतार हैं॥११०॥ इति अनुभाष्ये षष्ठ परिच्छेद। छठे अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। श्रीअद्वैतप्रभुकी महिमा :- अद्वैत-आचार्य गोसाञिर महिमा अपार। याँहार हुङ्कारे कैल चैतन्यावतार॥१११॥ सङ्कीर्त्तन प्रचारिया सब जगत् तारिल। अद्वैत-प्रसादे लोक प्रेमधन पाइल॥११२॥ अद्वैत-महिमा अनन्त, के पारे कहिते। सेइ लिखि, येइ शुनि महाजन हैते॥११३॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यकी महिमा अपार है। उनकी हुङ्कारसे श्रीचैतन्यावतार हुआ, सङ्कीर्तनका प्रचार करके उन्होंने जगत्का उद्धार किया और उनकी कृपासे लोगोंने श्रीकृष्णप्रेमरूपी धनको प्राप्त किया। श्रीअद्वैतकी महिमा अनन्त है, कौन इसका वर्णन कर सकता है? मैंने तो जो महापुरुषोंसे सुना है, उसीका यहाँ वर्णन किया है॥१११-११३॥ ३७६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत