श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें६/११४-११८ ] आचार्यप्रभुकी वन्दना :- आचार्यचरणे मोर कोटि नमस्कार। इथे किछु अपराध ना लबे आमार ॥ ११४ ॥ तोमार महिमा-कोटिसमुद्र अगाध। ताहार इयत्ता कहि, -ए बड़ अपराध ॥ ११५ ॥ जय जय जय श्रीअद्वैत आचार्य। जय जय श्रीचैतन्य, नित्यानन्द आर्य ॥ ११६ ॥ दुइ श्लोके कहिल अद्वैत-तत्त्वनिरूपण। पञ्चतत्त्वेर विचार किछु शुन, भक्तगण ॥ ११७ ॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यके चरणकमलोंमें मेरा कोटि बार नमस्कार है, आप मेरे अपराधको ग्रहण ना करें। आपकी महिमा तो करोड़ों समुद्रोंकी भाँति अगाध है और मैंने केवल इतना मात्र ही वर्णन किया—यह एक महान अपराध है। श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो, जय हो। श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। मङ्गलाचरणके बारह और तेरह, इन दो श्लोकोंके द्वारा मैंने श्रीअद्वैत-तत्त्वका निरूपण किया। अब पञ्चतत्त्वका कुछ विचार श्रवण करें ॥ ११४-११७ ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ ११८ ॥ इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे श्रीअद्वैततत्त्वनिरूपणं नाम षष्ठः परिच्छेदः। अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है ॥ ११८ ॥ श्रीचैतन्यचरितामृत आदिखण्डमें श्रीअद्वैत-तत्त्व निरूपण नामक छठे अध्यायका अनुवाद समाप्त। छठा अध्याय | ३७७