श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
६/१४-२१ ]
ही इनको बन्धन और मोक्ष प्रदान करनेवाली है। 'बन्धन' और 'मोक्ष', दोनों ही प्राकृत हैं। 'सर्वेश्वर' नामक कोई एक पुरुष नहीं है। 'काल' तत्त्व ही नहीं है, प्राणादि पाँच प्रकार इन्द्रियोंकी ही वृत्ति हैं।” आदि कुछ वेदान्तविरुद्ध विषय इस सांख्यस्मृतिमें दिखलायी देते हैं॥ १५॥ स्वयं-निमित्त और श्रीअद्वैतप्रभु-'उपादान'-कारण :- आपने पुरुष-विश्वेर 'निमित्त'-कारण। अद्वैत-रूपे 'उपादान' हन नारायण॥ १६॥ ईक्षणकर्त्तारूपमें निमित्त और श्रीअद्वैतप्रभुरूपमें उपादानरूपी स्रष्टा :- 'निमित्तांश' करे तँहो मायाते ईक्षण। 'उपादान' अद्वैत करेन ब्रह्माण्ड-सृजन ॥ १७॥ सांख्य-मत-खण्डन :- यद्यपि सांख्य माने, 'प्रधान'-कारण। जड़ हइते कभु नहे जगत्-सृजन ॥ १८॥ भगवान्की शक्तिसे ही प्रकृति क्रियाशील :- निज सृष्टिशक्ति प्रभु सञ्चारि' प्रधाने। ईश्वरेर शक्त्ये तबे हये त' निर्माणे ॥ १९॥ अनुवाद-कारणोदशायी नारायण जगत्के 'निमित्त' कारण होकर 'निमित्तांश' रूपमें मायापर दृष्टिपात करते हैं और वे श्रीअद्वैतरूपमें 'उपादान' कारण होकर 'उपादानांश' रूपमें ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं। यद्यपि सांख्यवादी लोग 'प्रधान' को जगत्का कारण कहते हैं, तथापि जड़ वस्तु प्रधानसे कभी भी जगत्की सृष्टि सम्भव नहीं है। भगवान् विष्णु अपनी सृजन करनेकी शक्ति प्रधानमें सञ्चारित करते हैं और तब वह उस ईश्वरकी शक्तिसे जगत्की सृष्टि करनेमें समर्थ होता है॥ १६-१९॥ अनुभाष्य-आदिलीला ५/५८-६६ संख्या; मध्यलीला २०/२५९-२६१, २७१, २७६ संख्या द्रष्टव्य हैं॥ १८-१९॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी दो मूर्तियाँ :- अद्वैत-आचार्य-कोटिब्रह्माण्डर कर्त्ता। आर एक एक मूर्त्ये ब्रह्माण्डर भर्त्ता॥ २०॥ भगवान्के अङ्ग अथवा अंशस्वरूप श्रीअद्वैतप्रभु :- सेइ नारायणेर मुख्य अङ्ग,-अद्वैत। 'अङ्ग'-शब्दे अंश करि' कहे भागवत ॥ २१॥ अनुवाद-कारणोदशायी नारायण श्रीअद्वैताचार्य रूपसे करोड़ों ब्रह्माण्डोंकी सृष्टि करते हैं और उतने ही गर्भोदशायी विष्णुरूपोंमें अपना विस्तार करके एक-एक ब्रह्माण्डका पालन करते हैं। वे श्रीअद्वैताचार्य नारायणके मुख्य अङ्ग हैं। भागवतके अनुसार 'अङ्ग' शब्दका अर्थ 'अंश' होता है॥ २०-२१॥
छठा अध्याय | ३४५
[ ६/२०-२६ अनुभाष्य—आदिलीला ३/६७ द्रष्टव्य है॥२१॥ श्रीमद्भागवतम् (१०/१४/१४)— नारायणस्त्वं न हि सर्वदेहिना- मात्मास्यधीशाखिललोकसाक्षी। नारायणोऽङ्गं नरभूजलायना- त्तच्चापि सत्यं न तवैव माया॥२२॥ अनुवाद—[ब्रह्माजीने भगवान् श्रीकृष्णसे कहा]—हे अधीश! आप सभी लोकोंके साक्षी हैं। जब आप प्रत्येक जीवकी आत्मा अर्थात् अत्यन्त प्रिय वस्तु हैं, तब क्या आप मेरे पिता नारायण नहीं हैं? 'नरजात जल' अर्थात् नरसे जलकी सृष्टि हुई, इसलिये उसे नार कहा जाता है और उसमें जो अयन अर्थात् शयन करते हैं, वे नारायण हैं। वे आपके अङ्ग अर्थात् अंश हैं। आपके अंश स्वरूप कारणाब्धिशायी, क्षीरोदशायी और गर्भोदशायी कोई भी मायाके अधीन नहीं हैं। वे सब मायाधीश और मायासे अतीत परमसत्य वस्तु हैं॥२२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—आदिलीला २/३० द्रष्टव्य है॥२२॥ अङ्ग या अंश होनेपर भी मायातीत :- ईश्वरेर 'अङ्ग', अंश—चिदानन्दमय। मायार सम्बन्ध नाहि, एड् श्लोके कय॥२३॥ 'अंश' ना कहकर 'अङ्ग' कहनेका तात्पर्य :- 'अंश' ना कहिया, केने कह ताँरे 'अङ्ग'। 'अंश' हैते 'अङ्ग', याते हय अन्तरङ्ग॥२४॥ अनुवाद—ईश्वरके अङ्ग अर्थात् अंश सभी चिदानन्दमय हैं और उनका मायासे कोई सम्बन्ध नहीं है—उपरोक्त श्लोकमें यह कहा गया है। श्रीअद्वैतको 'अंश' ना कहकर 'अङ्ग' क्यों कहा गया है? इसका कारण यह है कि 'अङ्ग' कहनेसे अधिक अन्तरङ्ग होना सूचित होता है॥२३-२४॥ अनुभाष्य—आदिलीला ३/६९-७० द्रष्टव्य हैं॥२३॥ 'अद्वैत' नामकी सार्थकता :- महाविष्णुर अंश—अद्वैत गुणधाम। ईश्वरे अभेद, तेञि 'अद्वैत' पूर्ण नाम॥२५॥ अनुवाद—महाविष्णुके अंश श्रीअद्वैत समस्त गुणोंके धाम हैं और वे उनसे अभिन्न हैं, इसीमें अद्वैत नामकी सार्थकता है॥२५॥ आचार्य-नामकी सार्थकता :- पूर्वे यैछे कैल सर्व-विश्वेर सृजन। अवतरि' कैल एबे भक्ति-प्रवर्त्तन॥२६॥ अनुवाद—सृष्टिके प्रारम्भमें जैसे उन्होंने समस्त जगत्की सृष्टि की थी, वैसे अब अर्थात् इस कलियुगमें अवतार लेकर उन्होंने जगत्को भक्ति-धर्ममें प्रवृत्त किया है॥२६॥ ३४६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/२६-३२ ] अद्वैतावतारमें श्रीकृष्णभक्ति-प्रचार ही उनका कार्य :- जीव निस्तारिल कृष्णभक्ति करि' दान। गीता-भागवते कैल भक्तिर व्याख्यान ॥ २७ ॥ भक्ति-उपदेश बिनु ताँर नाहि कार्य। अतएव नाम हैल 'अद्वैत-आचार्य' ॥ २८ ॥ अनुवाद-उन्होंने श्रीकृष्णभक्ति प्रदानकर जीवोंका उद्धार किया और गीता-भागवतकी व्याख्यामें भक्ति-धर्मका ही प्रचार किया। उन्होंने केवल भक्तिका उपदेश और आचरण किया, इसलिये उनका नाम 'श्रीअद्वैत-आचार्य' है॥ २७-२८॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैतप्रभु सेव्य विष्णुत्तत्त्व होनेपर भी जीवोंके मङ्गलविधान-कार्यरूप सेवा-प्रवृत्ति दान करनेके अतिरिक्त उनका और कोई आचरण नहीं है। केवल सेव्यके रूपमें अपनी लीलाका प्रचार करनेसे जगत्के भोगी लोग उसका अनुकरणकर निरीश्वर केवलाद्वैतवादी या अहंग्रहोपासक हो जायेंगे,—यह देखकर भगवान् विष्णुके सेवकके रूपमें लीला प्रकटकर इस आचार्यत्वका प्रदर्शन करना भी एक कार्य है। आचार्यका कृष्णसेवोन्मुखतारूप आचरणके अतिरिक्त अन्य कोई कार्य नहीं है। सेव्यके सेवरूपमें आचरण ही आचार्यत्वका हेतु है—यही नैमित्तिक अवतारकी लीलाविशेष है। आचार्यके पवित्र पद और वेशको कलुषितकर जो दुराचारी व्यक्ति भगवत्सेवाको छोड़कर अपने इन्द्रियतर्पणके ताण्डव नृत्यका प्रदर्शन करते हैं, श्रीअद्वैताचार्य उनका सम्पूर्ण रूपसे तिरस्कार करते हैं॥ २६-२८॥ वैष्णवेर गुरु तेंहो जगतेर आर्य। दुइनाम-मिलने हैल 'अद्वैत-आचार्य' ॥ २९ ॥ अनुवाद-वे सभी वैष्णवोंके गुरु और जगद्वासियोंके पूजनीय हैं। दोनों नामोंके मिलनेसे उनका नाम श्रीअद्वैत-आचार्य है॥ २९॥ अनुभाष्य-श्रीअद्वैताचार्य वैष्णव-जगत्के गुरु और सभीके सम्मानीय हैं। उनके चरणकमलोंके आश्रयमें भगवद्भक्त वैष्णव उनके आचरणका अनुसरण करके हरिसेवा करते हैं॥ २९॥ 'कमलाक्ष'-नामकी सार्थकता :- कमलनयनेर तेंहो, याते 'अङ्ग', 'अंश'। 'कमलाक्ष' बलि' धरे नाम अवतंस ॥ ३० ॥ वैकुण्ठमें विष्णु और वैष्णवोंका सारूप्य :- ईश्वर-सारूप्य पाय पार्षदगण। चतुर्भुज, पीतवास, यैछे नारायण ॥ ३१ ॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी गुण-महिमा :- अद्वैत-आचार्य-ईश्वरेर अंशवर्य। ताँर तत्त्व-नाम-गुण, सकलि आश्चर्य ॥ ३२ ॥ अनुवाद-वे कमलनयन भगवान्के अङ्ग और अंश हैं, इसलिये उनका नाम 'कमलाक्ष' भी है। भगवान्के परिकर सारूप्य अर्थात् उन्हींकी भाँति रूप प्राप्त करते हैं। वैकुण्ठमें नारायणके छठा अध्याय | ३४७
[ ६/३०-३९ परिकर उनके समान ही चतुर्भुजरूप हैं और वे भी पीताम्बर धारण करते हैं। श्रीअद्वैताचार्य नारायणके श्रेष्ठ अंश हैं, इसलिये उनके तत्त्व-नाम-गुण सभी अद्भुत और अलौकिक हैं॥ ३०-३२॥ श्रीअद्वैतप्रभुके द्वारा महाप्रभुको अवतीर्ण कराना :- याँहार तुलसीदले, याँहार हुङ्कारे। स्वगण सहिते चैतन्येर अवतारे ॥ ३३॥ याँर द्वारा कैल प्रभु कीर्त्तन प्रचार। याँर द्वारा कैल प्रभु जगत् निस्तार ॥ ३४॥ आचार्य गोसाञिर गुण-महिमा अपार। जीवकीट कोथाय पाइबेक तार पार॥ ३५॥ अनुवाद- जिन्होंने गङ्गाजल और तुलसीदल अर्पणकर श्रीकृष्णकी आराधना की और अवतरणके लिये सप्रेम-हुङ्कारसे श्रीकृष्णका आह्वान किया, जिसके फलस्वरूप श्रीकृष्ण श्रीचैतन्यरूपमें अपने परिकरों सहित अवतरित हुए तथा जिनके द्वारा महाप्रभुने सङ्कीर्त्तनका प्रचार करवाया और जगत्का उद्धार किया, उन श्रीअद्वैताचार्यकी गुण-महिमा अपार है। अतः क्षुद्र जीव उसे कैसे समझ सकता है ? ॥ ३३-३५॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/९१, ९५-१०८ संख्या द्रष्टव्य हैं॥ ३३-३४॥ श्रीगौरके एक अङ्ग-श्रीअद्वैत और दूसरे अङ्ग-श्रीनिताइ :- आचार्य गोसाञि चैतन्येर मुख्य अङ्ग। आर एक अङ्ग ताँर प्रभु नित्यानन्द ॥ ३६ ॥ उपाङ्गरूप अस्त्र-श्रीवासादि भक्त :- प्रभुर उपाङ्ग-श्रीवासादि भक्तगण। हस्तमुखनेत्र-अङ्ग चक्राद्यस्त्र-सम ॥ ३७॥ अङ्ग-उपाङ्गको लेकर श्रीगौरके द्वारा नाम-प्रेम-प्रचार :- ए़सब लइया चैतन्यप्रभुर विहार। ए़सब लइया करेन वाञ्छित प्रचार ॥ ३८ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके एक मुख्य अङ्ग श्रीअद्वैताचार्य हैं और दूसरे मुख्य अङ्ग श्रीनित्यानन्द प्रभु हैं। महाप्रभुके उपाङ्ग श्रीवासादि भक्त हैं। ये अङ्ग और उपाङ्ग उनके हाथ-मुख-नेत्रके समान मुख्य अङ्ग तथा चक्रादिके समान उनके अस्त्र हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुने इन सबके साथ लीला की और इनको साथ लेकर नाम-सङ्कीर्त्तन तथा श्रीकृष्णप्रेमका प्रचार किया ॥ ३६-३८ ॥ अनुभाष्य-आदिलीला ३/७१-७४ संख्या द्रष्टव्य है॥ ३६-३८॥ लौकिक रीतिके अनुसार श्रीअद्वैतके प्रति महाप्रभुका गुरुतुल्य व्यवहार :- माधवेन्द्रपुरीर इहाँ शिष्य, एइ ज्ञाने। आचार्य-गोसाञिरे प्रभु गुरु करि' माने ॥ ३९ ॥ ३४८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/३९-४१ ] लौकिक-लीलाते धर्ममर्यादा-रक्षण। स्तुति-भक्त्ये करे ताँर चरण-वन्दन॥४०॥ श्रीअद्वैतप्रभुकी महाप्रभुके प्रति प्रभु-बुद्धि— चैतन्यगोसाञिके आचार्य करे प्रभु-ज्ञान। आपनाके करेन ताँर 'दास'-अभिमान॥४१॥ अनुवाद—श्रीअद्वैताचार्यको अपने परम गुरुदेव श्रील माधवेन्द्रपुरीका शिष्य जानकर महाप्रभु उनको अपने गुरुके रूपमें मानते हैं। लौकिक लीलाकी मर्यादाकी रक्षा करते हुए, वे उनकी भक्तिपूर्वक स्तुति और चरण-वन्दना करते हैं। किन्तु श्रीअद्वैताचार्य महाप्रभुको अपना प्रभु (स्वामी) मानते हैं और स्वयंमें उनके दास होनेका अभिमान रखते हैं॥३९-४१॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीअद्वैतप्रभु-श्रील माधवेन्द्रपुरीके शिष्य हैं और उनके गुरुभाई श्रीईश्वरपुरी महाप्रभुके गुरु हैं। इस सम्बन्धसे महाप्रभु श्रीअद्वैताचार्यको 'गुरु' मानते हैं। वास्तवमें श्रीचैतन्य गोसाईं सर्वेश्वर हैं और श्रीअद्वैतप्रभु उनके दास। इस सम्बन्धसे श्रीअद्वैताचार्य प्रभु अपनेमें 'दास' अभिमान करते हैं॥३९-४१॥ अनुभाष्य—श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीमध्वाचार्य-सम्प्रदायके एक गुरु हैं। श्रीईश्वरपुरी और श्रीअद्वैतप्रभु दोनों श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य हैं। श्रीमध्व-परम्पराके अन्तर्गत श्रीगौड़ीय-वैष्णव-शाखाका वर्णन 'श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका', 'प्रमेयरत्नावली' में और श्रीगोपालगुरु गोस्वामीके ग्रन्थमें हुआ है। श्रीभक्तिरत्नाकरमें भी इसका उल्लेख देखा जाता है। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकामें श्रीमध्वशाखाका इस प्रकारसे वर्णन है— “परव्योमेश्वरस्यासीच्छिष्यो ब्रह्मा जगत्पतिः। तस्य शिष्यो नारदोऽभूत् व्यासस्तस्याप शिष्यताम्॥ शुको व्यासस्य शिष्यत्वं प्राप्तो ज्ञानावरोधनात्। व्यासाल्लब्धकृष्णदीक्षो मध्वाचार्यो महायशाः॥ तस्य शिष्योऽभवत् पद्मनाभाचार्य-महाशयः। तस्य शिष्यो नरहरिस्तच्छिष्यो माधवद्विजः। अक्षोभ्यस्तस्य शिष्योऽभूत्तच्छिष्यो जयतीर्थकः। तस्य शिष्यो ज्ञानसिन्धुः तस्य शिष्यो महानिधिः। विद्यानिधिस्तस्य शिष्यो राजेन्द्रस्तस्य सेवकः। जयधर्म मुनिस्तस्य शिष्यो यद्गणमध्यतः॥ श्रीमद्विष्णुपुरी यस्तु भक्तिरत्नावलीकृतिः। जयधर्मस्य शिष्योऽभूद्ब्रह्मण्यः पुरुषोत्तमः॥ व्यासतीर्थस्तस्य शिष्यो यश्चक्रे विष्णुसंहिताम्। श्रीमान् लक्ष्मीपतिस्तस्य शिष्यो भक्तिरसाश्रयः॥ तस्य शिष्यो माध् वेन्द्रो यद्धर्मोऽयं प्रवर्त्तितः। तस्य शिष्योऽभवत् श्रीमानीश्वराख्यपुरी यतिः॥ कलयामास शृङ्गारं यः शृङ्गारफलात्मकः। अद्वैतः कलयामास दास्यसख्ये फले उभे॥ ईश्वराख्यपुरीं गौर उरीकृत्य गौरवे। जगदाप्लावयामास प्राकृताप्राकृतात्मकम्॥” अर्थात् परव्योमेश्वर श्रीनारायणके शिष्य जगत्पति ब्रह्मा, ब्रह्माके शिष्य नारद और नारदके शिष्य श्रीवेदव्यास हुए। (शुष्क) ज्ञानके अवरोधन (अर्थात् श्रीलवेदव्यासके शिष्योंके मुखसे भगवान्के नाम, रूप, गुण और लीला सम्बन्धी श्लोकोंको श्रवण करनेके उपरान्त पालन किये जा रहे शुष्क ज्ञानपथमें बाधा पड़ने अर्थात् उसके प्रति अरुचि उत्पन्न होने) के कारण शुकदेवने श्रीव्यासदेवका शिष्यत्व स्वीकार किया। महायशस्वी मध्वाचार्यने भी श्रीव्यासदेवसे कृष्णमन्त्रकी दीक्षा प्राप्त की। श्रीमध्वाचार्यके शिष्य महाशय पद्मनाभाचार्य, पद्मनाभके नरहरि, नरहरिके माधव-द्विज, माधवके प्रिय अक्षोभ्य, अक्षोभ्यके जयतीर्थ, जयतीर्थके ज्ञानसिन्धु, ज्ञानसिन्धुके महानिधि, महानिधिके विद्यानिधि, विद्यानिधिके राजेन्द्र, राजेन्द्रके शिष्य जयधर्म मुनि हैं। जयधर्मके अनुगत शिष्योंमें श्रीविष्णुपुरी एक प्रधान आचार्य हुए हैं और इन्होंने 'भक्ति-रत्नावली' छठा अध्याय | ३४९
[ ६/३९-४४ नामक ग्रन्थकी रचना भी की है। जयधर्मके (एक अन्य) शिष्य पुरुषोत्तम, पुरुषोत्तमके शिष्य ब्रह्मण्यतीर्थ, ब्रह्मण्यतीर्थके शिष्य वे व्यासतीर्थ हुए, जिन्होंने 'विष्णुसंहिता' की रचना की। व्यासतीर्थके शिष्य भक्तिरसके आश्रय लक्ष्मीपति, लक्ष्मीपतिके शिष्य वे श्रीमाधवेन्द्रपुरी हैं, जिनसे प्रेम-भक्तिरूप धर्मका प्रवर्तन हुआ है। श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य यति श्रीईश्वरपुरीने उस कल्पवृक्षके शृङ्गार फलस्वरूप होकर शृङ्गाररसको प्रकाशित किया। इन्हीं श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य श्रीअद्वैताचार्यने दास्य और सख्य नामक दो फलोंको प्रकाशित किया। श्रीगौरचन्द्रने ईश्वरपुरीको गौरवसहित (गुरुरूपमें) वरणकर प्राकृत और अप्राकृतमय जगत्को प्रेममें प्लावित कर दिया॥३९॥ कृष्णदास-अभिमानसे भक्तिका प्रचार :- सेइ अभिमान-सुखे आपना पासरे। 'कृष्णदास हओ'-जीवे उपदेश करे॥४२॥ अनुवाद-इस दास-अभिमानके आनन्दमें डूबकर श्रीअद्वैताचार्य स्वयंको भूल जाते हैं और जीवोंको श्रीकृष्णके दास बननेका उपदेश करते हैं॥४२॥ अनुभाष्य-भक्तभावको अङ्गीकारकर महाविष्णु अपने स्वरूप-अभिमानका परित्यागकर भगवत्-दास्यको ही अपना आनुष्ठानिक कार्य मानकर आनन्दका अनुभव करते हैं। इस सेवानन्दके द्वारा महाविष्णुका अपना स्वरूपज्ञान शिथिल हो जाता है अर्थात् उन्हें स्वयं भोक्ता होनेके ज्ञानकी विस्मृतिसी हो जाती है। वे स्वयं आचरण करके जीवोंको अनुक्षण श्रीकृष्णसेवा करनेकी प्रवृत्ति प्रदान करते हैं। संख्या २७-२८ द्रष्टव्य है॥४२॥ कृष्णदास्यमें वैकुण्ठ-आनन्द :- कृष्णदास-अभिमाने ये आनन्दसिन्धु। कोटी ब्रह्मसुख नहे तार एकबिन्दु॥४३॥ श्रीअद्वैतप्रभु एवं श्रीनित्यानन्द प्रभुका गौरदास्यमें ही सुख :- मुञि ये चैतन्यदास, आर नित्यानन्द। दास-भाव-सम नहे अन्यत्र आनन्द॥४४॥ अनुवाद-(श्रीअद्वैताचार्य कहते हैं)-श्रीकृष्णदास-अभिमानसे जिस आनन्दके समुद्रकी प्राप्ति होती है, करोड़ों ब्रह्मसुखकी तुलना उसके एक बिन्दुसे भी नहीं की जा सकती है। मैं और नित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके दास हैं। इस दास-भावके समान आनन्द और कहीं भी नहीं है॥४३-४४॥ अमृतप्रवाह भाष्य-'ब्रह्मसुख'-'मैं ब्रह्म हूँ', इस अभेद-बुद्धिमें जो सुख है॥४३॥ अनुभाष्य-आदिलीला ७/८५, ९७-९८ संख्या द्रष्टव्य हैं। भःरःसिः पूर्व-लहरीमें- “ब्रह्मानन्दो भवेदेष चेत् पराद्धर्गुणीकृत। नैति भक्तिसुखाम्भोघेः परमाणुतुलामपि॥” अर्थात् “यदि ब्रह्मानन्दको परार्द्ध (ब्रह्माजीकी आयुके आधेकालमें जितने दिन हैं, उतने) गुणा कर दिया जाय, तो वह आनन्द भगवत्सेवानन्द समुद्रके एक परमाणुके बराबर भी नहीं है।” ३५० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/४३-४४ ] भावार्थदीपिकामें— “त्वत्कथामृत-पाथोधौ विहरन्तो महामुदः। कुर्वन्ति कृतिनः केचिच्चतुर्वर्गं तृणोपमम् ॥” अर्थात् “आपके कथामृतके समुद्रमें विचरण करनेवाले परमानन्दमें मग्न हुए भक्त धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष, इन चार पुरुषार्थोंको तृणके समान समझते हैं।” “तत्रापि च विशेषेण गतिमण्वीमन्विच्छतः। भक्तिहृतमनःप्राणान् प्रेम्णा तान् कुरुते जनान्॥ श्रीकृष्णचरणाम्भोजसेवा-निर्वृतचेतसाम्। एषां मोक्षाय भक्तानां न कदाचित् स्पृहा भवेत्॥” अर्थात् “जीवोंमेंसे विशेष रूपसे जो सूक्ष्म गति अर्थात् मुक्ति नहीं चाहते, ऐसे भक्तोंके मन और प्राणको भक्ति प्रेमके द्वारा हरण कर लेती है। भगवान् श्रीकृष्णके चरणकमलोंके सेवासुखमें निमग्न-चित्त भक्तोंको कभी भी मुक्तिकी इच्छा नहीं होती।” पद्मपुराणमें कार्तिक-माहात्म्यमें— “वरं देव मोक्षं न मोक्षावधिं वा, न चान्यं वृणेऽहं वरेशादपीह। इदं ते वपुर्नाथ गोपालबालं, सदा मे मनस्याविरास्तां किमन्यैः॥” अर्थात् “हे देव! आप सब प्रकारके वर देनेमें समर्थ हैं। तो भी मैं आपसे चतुर्थ पुरुषार्थरूप मोक्ष अथवा मोक्षकी चरम सीमा वैकुण्ठादि लोक भी नहीं चाहता हूँ। ना ही मैं श्रवण-कीर्तनादि नवधाभक्तिके द्वारा प्राप्त किये जानेवाला कोई दूसरा वरदान ही आपसे माँगता हूँ। हे नाथ! आपका यह बाल-गोपालरूप मेरे हृदयमें सदा विराजमान रहे। मुझे और दूसरे वरदानसे कोई प्रयोजन नहीं है।” तथा “कुबेरात्मजौ बद्धमूर्त्तैव यद्वत्, तया मोचितौ भक्तिभाजौ कृतौ च। तथा प्रेमभक्तिं स्वकां मे प्रयच्छ, न मोक्षे ग्रहो मेऽस्ति दामोदरेह॥” अर्थात् “हे दामोदर ! जिस प्रकार आपने अपने दामोदर रूपसे माता यशोदाके द्वारा ओखलमें बँधे रहकर भी नलकूबेर और मणिग्रीव नामक कुबेरके पुत्रोंका नारदके शापसे प्राप्त वृक्ष योनिसे उद्धारकर उन्हें परम प्रयोजनरूप अपनी भक्ति प्रदान की थी, उसी प्रकार मुझे भी आप अपनी प्रेमभक्ति प्रदान कीजिये, यही मेरा एकमात्र आग्रह है। किसी भी प्रकार अन्य प्रकारके मोक्षके लिये मेरा तनिक भी आग्रह नहीं है।” हयशीर्षमें श्रीनारायणव्यूह स्तवमें— “न धर्मं काममर्थं वा मोक्षं वा वरदेश्वर। प्रार्थये तब पादाब्जे दास्यमेवाभिकामये॥ पुनः पुनर्वरान् दित्सुर्विष्णुर्मुक्तिं न याचितः। भक्तिरेव वृता येन प्रह्लादं तं नमाम्यहम्॥ यदृच्छया लब्धमपि विष्णोर्दाशरथेस्तु यः। नैच्छन्मोक्षं बिना दास्यं तस्मै हनुमते नमः॥” अर्थात् “हे वरदेनेवालोंमें श्रेष्ठ! आप धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष प्रदान कर सकते हैं, परन्तु मैं इन्हें नहीं चाहता हूँ। मैं तो केवल आपके चरणकमलोंका दास बनकर सेवा करना चाहता छठा अध्याय | ३५१
[ ६/४३-४४ हूँ। भगवान् नृसिंहदेवके बार-बार देनेपर भी प्रह्लादने किसी भी वर को स्वीकार नहीं किया और केवल उनकी भक्तिकी ही कामना की, मैं उन प्रह्लादके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ। इसी प्रकार श्रीहनुमानके चरणोंमें प्रणाम करता हूँ, जो श्रीरामचन्द्रके दास्यके बिना मोक्षकी भी कामना नहीं करते हैं।” श्रीहनुमद्वाक्यमें— “भवबन्धच्छिन्दे तस्मै स्पृहयामि न मुक्तये। भवान् प्रभुरहं दास इति यत्र विलुप्यते॥” अर्थात् “मैं ऐसी मुक्ति नहीं चाहता हूँ और ना ही ब्रह्ममें लीन होना चाहता हूँ, जहाँ प्रभु-दासभाव विलुप्त हो जाय।” श्रीनारदपञ्चरात्रमें जितन्त-स्तोत्रमें— “धर्मार्थ-काम-मोक्षेषु नेच्छा मम कदाचन। त्वत्पादपङ्कजस्याधो जीवितं दीयतां मम॥ मोक्ष-सालोक्य-सारूप्यान् प्रार्थये न धराधर। इच्छामि हि महाभाग कारुण्यं तव सुव्रत॥” अर्थात् “धर्म-अर्थ-काम-मोक्षकी मेरी कभी भी इच्छा नहीं है। मैं तो केवल आपके चरणकमलोंका दासत्व ही चाहता हूँ। हे जगत्पते! मैं सालोक्य-सारूप्यादि मुक्तिकी भी प्रार्थना नहीं करता, मैं तो केवल आपकी कृपाकी अभिलाषा करता हूँ।” राजाकुलशेखर-कृत “मुकुन्दमाला” स्तोत्रमें— “नाहं वन्दे पदकमलयोर्द्वन्द्वमद्वन्द्व-हेतोः, कुम्भीपाकं गुरुमपि हरे नारकं नापनेतुम्। रम्या-रामा-मृदुतनुलता-नन्दने नाभिरन्तुं, भावे भावे हृदयभवने भावयेयं भवन्तम्॥” अर्थात् “हे भगवन्! मैं ना तो संसारके द्वन्द्वों अर्थात् जन्म-मरण, लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःखसे और ना ही कुम्भीपाक नरकके भीषण कष्टोंसे निदान पानेके लिये आपके चरणकमलोंकी वन्दना कर रहा हूँ। ना ही मैं स्वर्गमें नन्दनवनमें वास करनेवाली कोमलाङ्गी रमणियोंके साथ विहार करना चाहता हूँ, मैं तो केवल आपके चरणकमलोंमें यह प्रार्थना करता हूँ कि जन्म-जन्मान्तर मैं अपने हृदयमें आपका स्मरण करता रहूँ।” श्रीमद्भागवतमें—३/२५/३६, ३/४/१५, ३/२५/३४, ४/१/२२, ४/९/१०, ४/२०/२४, ५/१४/४३, ६/११/२५, ६/१७/२८, ६/१८/७४, ७/६/२५, ७/८/४२, ८/३/२०, ९/४/४९, ९/२१/१२, १०/१६/३७, १०/८७/२१, ११/१४/१४, ११/२०/३४, १२/३/६ आदि अनेक श्लोक द्रष्टव्य हैं॥४४॥ अमृतानुकणिका—जीव स्वरूपतः श्रीकृष्णका चित्कण अंश और श्रीकृष्णदास है। इसलिये श्रीकृष्णदास होनेका अभिमान जीवके पक्षमें स्वरूपगत और स्वाभाविक है। जैसे दाहिका शक्तिसे अग्निको पृथक् नहीं किया जा सकता, वैसे ही श्रीकृष्णदास अभिमानसे जीवको विच्छिन्न नहीं किया जा सकता। अग्निमें चन्द्रकान्तमणि अथवा महौषधविशेष डालनेसे जिस प्रकार अग्निकी ३५२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/४३-४७ ] दाहिका शक्ति स्तम्भित हो जाती है, उसी प्रकार देह-आवेशादिजनित अन्य अभिमानके फलसे मायाबद्ध जीवका श्रीकृष्णदास-अभिमान स्तम्भित अथवा ढक जाता है। अन्य अभिमान दूर होनेपर श्रीकृष्णदास अभिमान जाग्रत होता है और क्रमशः उज्ज्वलताको धारण करता है। तब यह श्रीकृष्णदास अभिमान ही विभु-चैतन्य श्रीकृष्णके साथ अणुचैतन्य जीवका संयोग स्थापन करता है, जीवके चित्तमें श्रीकृष्णसेवावासना जाग्रत होती है तथा आनन्दघनविग्रह अखिलरसामृतमूर्ति श्रीकृष्णके प्रेमसेवामृत समुद्रमें निमज्जित होकर जीव अनन्त रसवैचित्रीकी आस्वादन चमत्कारिता अनुभव करता है। यही श्रीकृष्णदास अभिमानका स्वाभाविक फल है। निर्विशेष ब्रह्मानुसन्धानमूलक साधनके फलसे जिस ब्रह्मानन्दका आस्वादन प्राप्त होता है, उसमें स्वरूपशक्तिका विलास नहीं होनेके कारण आनन्दकी तरङ्ग और वैचित्री नहीं है, आस्वादनकी चमत्कारिता नहीं है। जीवका श्रीकृष्णदास अभिमान तब भी जीव-स्वरूपविरोधी भावविशेषसे ढका होनेके कारण श्रीकृष्णसेवा-वासना उनके चित्तमें जाग्रत नहीं हो पाती। रसतरङ्ग-वैचित्रीके आस्वादनसे जो अपूर्व और अनिर्वचनीय आस्वादन-चमत्कारिता उत्पन्न होती है, उसकी तुलनामें ब्रह्मानन्दका आस्वादन अति तुच्छ है। श्रीभगवान्से ध्रुव महाराजने कहा (हरिभक्तिसुधोदय १४/३६)— “त्वंसाक्षात्काराह्लाद-विशुद्धाब्धि-स्थितस्य मे। सुखानि गोष्पदायन्ते ब्राह्माण्यपि जगद्गुरो॥” अर्थात् “हे जगद्गुरु! आपके साक्षात्कारके फलसे जिस अप्राकृत विशुद्ध आनन्द-समुद्रमें मैं निमज्जित हुआ हूँ, उसकी तुलनामें निर्विशेष ब्रह्मानुभवजनित आनन्द भी मुझे गोखुरके समान अति अल्प प्रतीत हो रहा है।”॥४३-४४॥ दृष्टान्तके द्वारा कृष्णदास्यकी सर्वश्रेष्ठताका प्रदर्शन :- (१) लक्ष्मीकी कृष्णदास्यके लिये प्रार्थना :- परमप्रेयसी लक्ष्मी हृदये वसति। तेंहो दास्य-सुख मागे करिया मिनति॥४५॥ (२) विष्णुपार्षदगण और ब्रह्मा, शिव, चतुःसन, नारद तथा शुकादिका भी कृष्णदास्य :- दास्य-भावे आनन्दित पार्षदगण। विधि, भव, नारदादि शुक सनातन॥४६॥ (३) गौरदास्यमें पागल निताइ :- नित्यानन्द अवधूत सबाते आगल। चैतन्येर दास्य-प्रेमे हइला पागल॥४७॥ अनुवाद—नारायणकी परमप्रेयसी लक्ष्मी उनके वक्षस्थलपर वास करती हैं, तो भी वे उनसे दीनतापूर्वक दास्य-सुखकी ही विनती करती हैं। वैकुण्ठमें भगवान् विष्णुके पार्षद, ब्रह्मा, शिव, नारद, शुक और सनातनादि चतुःसन भी दास्य-भावमें आनन्दका अनुभव करते हैं। अवधूत श्रीनित्यानन्द प्रभु तो महाप्रभुके दासोंमें अग्रणी हैं और दास्य-प्रेममें वे उन्मत्त रहते हैं॥४५-४७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—‘आगल’—अग्रगण्य॥४७॥ छठा अध्याय | ३५३
[ ६/४८-५२ (४) श्रीवासादि महाजनगण, सभी गौरदास :- श्रीवास, हरिदास, रामदास, गदाधर। मुरारि, मुकुन्द, चन्द्रशेखर, वक्रेश्वर ॥४८॥ एसब पण्डितलोक परम-महत्त्व। चैतन्येर दास्ये सबाय करये उन्मत्त ॥ ४९॥ अनुवाद-श्रीवास पण्डित, श्रीहरिदास ठाकुर, श्रीरामदास, श्रीगदाधर पण्डित, श्रीमुरारि गुप्त, श्रीमुकुन्द दत्त, श्रीचन्द्रशेखर आचार्य और श्रीवक्रेश्वर पण्डितादि, इन सब परम विद्वान और महान् व्यक्तियोंको भी महाप्रभुका दास्य-भाव उन्मत्त करता है॥४८-४९॥ अपनेको गौरदास कहकर सभीको गौरदास बननेका ही उपदेश :- एइ मत गाय, नाचे, करे अट्टहास। लोके उपदेशे,–'हओ चैतन्येर दास' ॥ ५०॥ चैतन्यगोसाञि मोरे करे गुरु-ज्ञान। तथापिह मोर हय दास-अभिमान ॥ ५१ ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यदास-भावमें उन्मत्त होकर श्रीअद्वैताचार्य कभी गाते, कभी नाचते, कभी अट्टहास करते। वे लोगोंको श्रीचैतन्यका दास होनेका उपदेश करते। वे कहते-श्रीचैतन्य महाप्रभु मुझे गुरु-तुल्य मानते हैं, परन्तु मैं तो उनका दास हूँ॥५०-५१॥ श्रीकृष्णप्रेमका प्रभाव :- कृष्णप्रेमेर एइ एक अपूर्व प्रभाव। गुरु-सम-लघुके कराय दास्यभाव ॥ ५२ ॥ अनुवाद-श्रीकृष्णप्रेमका एक अपूर्व प्रभाव यह है कि वह बड़े-समान-छोटे, सभीमें दास्य-भाव उत्पन्न करा देता है॥५२॥ अमृतप्रवाह भाष्य - 'गुरु' - वात्सल्यरसमाश्रित गुरुवर्ग; 'सम' - समान (सख्यरसमाश्रित); 'लघु' - क्षुद्र। श्रीकृष्णप्रेम इन तीनोंको ही दास्यभाव प्रदान करता है। इसलिये श्रीकृष्णचैतन्यके गुरुवर्ग, समानगण और लघुगण-सभी उनके दास हैं॥५२॥ अनुभाष्य-जगत्में गुरुवर्ग अज्ञातरूपसे जो दास्यभावमें सेवा करते हैं, उसे अधिकांशतः ऐश्वर्य-प्रधान बुद्धिसे अथवा मर्यादा-मार्गमें नहीं समझा जा सकता। इसलिये नारायणसेवामें श्रीकृष्णप्रेमकी भाँति चमत्कारिता नहीं है। श्रीकृष्णके गुरुवर्ग दास्यके उत्कर्षमें अवस्थित होनेके लिये ही गुरुपदको ग्रहणकर सेवा करते हैं। समान और लघु-सम्बन्धयुक्त होकर दास्यभाव ऐश्वर्यप्रधान बुद्धिसे समझा जा सकता है, किन्तु गुरु-अभिमानमें दासभावकी प्रबलता एकमात्र श्रीकृष्णसेवामें ही अवस्थित है। सम्पूर्णरूपसे सेवा-प्रवृत्तियुक्त होकर प्रचुर परिमाणमें सेवाभिलाष एकमात्र सर्वसेव्य श्रीकृष्णके प्रति ही सम्भव है। नारायणके सम और लघु बहुतसे सेवक हैं, किन्तु श्रीकृष्णके गुरुवर्ग अपूर्व प्रभाव विस्तारकर आत्यन्तिक सेवा ही करते रहते हैं। श्रीकृष्णके गुरुजन, श्रीकृष्णके सम और श्रीकृष्णके स्नेहपात्र, ये तीनों प्रकारके व्यक्ति ही उनके प्रेमसे युक्त होकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं- यही प्रेमका अद्भुत विक्रम है॥५२॥ ३५४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/५३-६० ] सिद्धानुभूति-प्रमाण :- इहार प्रमाण शुन-शास्त्रेर व्याख्यान। महदनुभव, याते सुदृढ़ प्रमाण॥५३॥ अनुवाद-शास्त्रके उपाख्यानसे इसका प्रमाण श्रवण करो, क्योंकि महान् व्यक्तियोंका अनुभव सुदृढ़ प्रमाण होता है॥५३॥ (५) नन्द-महाराजका वात्सल्य-रसमें भी श्रीकृष्णदास्य :- अन्येर का कथा, व्रजे नन्द-महाशय। ताँर सम 'गुरु' कृष्णेर आर केह नय॥५४॥ शुद्धवात्सल्ये ईश्वर-ज्ञान नाहि तार। ताँहाकेइ प्रेमे कराय दास्य-अनुकार॥५५॥ तेंहो रति-मति मागे कृष्णेर चरणे। ताँहार श्रीमुखवाणी ताहते प्रमाणे॥५६॥ “शुन उद्धव, सत्य, कृष्ण-आमार तनय। तेंहो ईश्वर-हेन यदि तोमार मने लय॥५७॥ तथापि ताँहाते रहु मोर मनोवृत्ति। तोमार ईश्वर-कृष्णे हउक मोर मति॥"५८॥ अनुवाद-औरोंके विषयमें क्या कहूँ, व्रजमें नन्द महाराजके समान श्रीकृष्णके गुरु (वन्दनीय) और कोई नहीं हैं। उनमें शुद्धवात्सल्य-भावके कारण श्रीकृष्णके प्रति भगवत्-बुद्धि नहीं है, परन्तु श्रीकृष्णप्रेम उन्हें भी दासके समान बना देता है। वे भी श्रीकृष्णके चरणोंमें रति-मति माँगते हैं, उनके मुखसे निकले वचन ही इसका प्रमाण हैं। वे उद्धवजीसे कहते हैं—'हे उद्धव सुनो! यह सत्य है कि कृष्ण मेरा पुत्र है। यदि तुम्हें लगता है कि वह भगवान् है, तो भी उसके प्रति मेरी पुत्र भावना ही रहेगी। तुम्हारे 'ईश्वर-कृष्ण' में मेरी वात्सल्य मति हो॥"५४-५८॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हे उद्धव! यद्यपि तुम कृष्णको ईश्वर मानते हो, तथापि उस कृष्णमें मेरी मनोवृत्ति स्थित रहे॥५८॥ श्रीमद्भागवत (१०/४७/६६-६७)- मनसो वृत्तयो नः स्युः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः। वाचोऽभिधायिनीर्नाम्नां कायस्तत्प्रह्वणादिषु॥५९॥ कर्मभिर्भ्राम्यमाणानां यत्र क्वापीश्वरेच्छया। मङ्गलाचरितैर्दानै रतिर्नः कृष्ण ईश्वरे॥६०॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५९-६०॥ अमृतप्रवाह भाष्य-नन्द महाराज बोले-“हे उद्धव! हमारी समस्त मनोवृत्ति कृष्णके चरणकमलोंका आश्रय करके रहे, हमारी वाणी सदा उनका नाम-कीर्तन करती रहे और हमारा शरीर उनके अभिवादनमें ही प्रयुक्त हो। कर्मफलके अनुसार ईश्वरकी इच्छासे हमारी कोई भी छठा अध्याय | ३५५
[ ६/५९-६० अवस्था क्यों ना हो, दानादि शुभ कर्मोंके द्वारा परम पुरुष कृष्णमें हमारी रति सदा वर्द्धित होती रहे॥५९-६०॥ अनुभाष्य—व्रजवासियोंके साथ भेंट करनेके पश्चात् उन्हें आमन्त्रितकर मथुरा लौटते समय उद्धवजीको नन्दादि गोप श्रीकृष्णके प्रति अनुरागसे कह रहे हैं— नः (अस्माकं) मनसः वृत्तयः कृष्णपादाम्बुजाश्रयाः (कृष्णपादपद्माश्रिताः) स्युः। [अस्माकं] वाचः तु नाम्नां (तन्नाम्नाम्) अभिधायिनीः (कीर्त्तनपरा भवन्तु), कायः (देहः) तत्प्रह्वणादिषु (तस्य कृष्णस्य नमस्कारादिषु) अस्तु। कर्मभिः (पापपुण्यादिभिः फलान्वितैः) ईश्वरेच्छया यत्र क्वापि भ्राम्यमाणानां (चतुरशीतियोनिषु जायमानानां) नः (अस्माकं) मङ्गलाचरितैः दानैः (तज्जनितैः शुभकर्मभिः) ईश्वरे (भगवति) कृष्णे रतिः (अनुरागः) अस्तु। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥५९-६०॥ अमृताणुकणिका—उद्धवजी व्रजमें श्रीकृष्णका सन्देश लेकर आये थे, तब उन्होंने नन्दबाबा और यशोदा मैयाको सान्त्वना देनेका प्रयास करते हुए कहा था—“श्रीकृष्ण नारायण हैं, अखिल जगत्के गुरु हैं। सभी उनके पुत्र हैं और आप उनको अपना पुत्र मानकर रो रहे हैं। इस जगत्में, समस्त विश्व ब्रह्माण्डमें आप और माता यशोदा परम सौभाग्यवान् हैं। आपके इस भाग्यको जगत्का कोई भी प्राणी स्पर्श नहीं कर सकता, क्योंकि आप लोगोंमें कृष्णके लिये इतना अनुराग है।” उद्धृत श्लोकोंकी टीकामें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्ती लिखते हैं— “अब उद्धवजीके मथुरा लौटते समय नन्द महाराज उनके ऐश्वर्य-प्रधान मतकी आलोचना करते हुए कह रहे हैं—‘हे आयुष्मन् ! उद्धव ! कृष्णके रूप और गुण समुद्रतुल्य हैं, परन्तु उसके पिता-माता—हम दोनोंमें ही उसके प्रति कठोरता ही थी और अभी भी है। कृष्ण जब व्रजमें था, तब हमने जो स्नेह-ममतादि दिखलायी थी, अब उसपर विचार करता हूँ, तो लगता है कि वह सब कृत्रिम ही थी; अन्यथा उसके विरहमें हम किस प्रकारसे जीवित रह सकते हैं? पिता तो जगत्में एकमात्र महाराज दशरथ थे, जिन्होंने अपने पुत्रके वियोगमें ‘हा-राम! हा-राम!’ कहते ही अपने प्राण छोड़ दिये। हम तो पुत्रके वियोगमें मर भी नहीं रहे हैं। हममें तो कृष्णके लिये प्रेमकी गन्ध भी नहीं है। हम तो उसके पिता-माता होने योग्य नहीं हैं, इसलिये तो कृष्णने हमें छोड़कर देवकी-वसुदेवको माता-पिताके रूपमें अङ्गीकार किया है। परमेश्वर होनेके कारण कृष्णकी यह अचिन्त्य विचित्र लीला है। जो भी हो, कृष्णने हमें अयोग्य पिता-माता जानकर हमारा त्याग किया है। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे समान दुर्भाग्यशाली जगत्में और कोई नहीं है। हमें धिक्कार है।’ इस प्रकार कहते-कहते कृष्णविरहजनित विवशतासे और अपने प्रति श्रीकृष्णकी उदासीन भावनासे नन्दबाबाके मनमें महानुराग-जात महादैन्य उदित हुआ, उसीसे वे बड़े दुःखके साथ आगे कहने लगे—‘यह जन्म तो इसी प्रकार चला गया। यदि भविष्यमें किसी भी जन्ममें कृष्णमें हमारी रति-मति हो, तब हम उसके पिता-माता होने योग्य हो सकेंगे; यही हमारी प्रार्थना है।’ सख्य, वात्सल्य और मधुर भावका स्वभाव ऐसा है कि विरह विवशतासे और अपने प्रति विषयालम्बनकी (श्रीकृष्णकी) उदासीनतासे भक्तके चित्तमें महादैन्य उपस्थित होता है; उसके द्वारा अपने भावका परिवर्तन होकर दास्य भावका उदय होता है। तभी नन्दबाबा उक्तरूपमें ३५६ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
चिन्ता करते यह 'मनसो वृत्तयो० ०' कह पा रहे हैं, ऐश्वर्यज्ञानसे यह सब नहीं कह रहे हैं।" 'ईश्वरेच्छया'-ईश्वरकी इच्छासे। यहाँ ईश्वर-श्रीकृष्णकी इच्छा नहीं कहकर 'ईश्वर-इच्छासे' यह पृथक् ईश्वर-पदकी जो उक्ति है, वह नन्द महाराजके निजभावके ही अनुरूप है, अर्थात् कर्मफलदाता ईश्वरकी इच्छासे। उद्धवके कहनेके अनुसार नन्द महाराज यदि श्रीकृष्णको वास्तवमें ईश्वर स्वीकार करते, तो वे 'ईश्वर-इच्छासे' नहीं कहकर 'उसकी इच्छासे' अथवा 'कृष्णकी इच्छासे' कहते। 'कर्माभि:'-प्रारब्ध कर्मफलके अनुसार। नन्द महाराज आदि नित्यसिद्ध भगवत्-परिकर शुद्धसत्त्व-विग्रह हैं, उनका कोई भी कर्मादि नहीं है, वे केवल लीलामात्र करते हैं। 'न कर्मबन्धनं जन्म वैष्णवानाञ्च विद्यते।' आदि पद्मपुराण-प्रमाणके अनुसार वैष्णवोंका कर्मफलसे जन्मादि नहीं होता, तब भगवत्-परिकर नन्द महाराजादिका कर्मफल कैसे होगा? वे श्रीकृष्णकी नरलीलाकी पुष्टिके लिये उनके परिकर हैं और लीलाशक्तिकी इच्छासे उनमें साधारण नर अभिमानके कारण वे अपनेको संसारी मनुष्य कहते हैं, इसलिये वे अपने कर्मफलकी बात कह रहे हैं॥५९-६०॥
६) व्रजसखाओंका सख्यरसमें भी श्रीकृष्णदास्य :- श्रीदामादि व्रजे यत सखार निचय। ऐश्वर्यज्ञान-हीन, केवल सख्यमय॥६१॥ कृष्णसङ्गे युद्ध करे, स्कन्धे आरोहण। ताँरा दास्यभावे करे चरण-सेवन॥६२॥
अनुवाद—श्रीदामादि व्रजमें जितने सखा हैं, वे सब ऐश्वर्यज्ञान-रहित हैं, वे केवल श्रीकृष्णको अपना सखामात्र मानते हैं। वे खेल-खेलमें श्रीकृष्णके साथ युद्ध भी करते हैं, कभी उनके कन्धेपर चढ़ जाते हैं और वे दास्यभावमें उनके चरणोंकी सेवा भी करते हैं॥६१-६२॥
अमृतप्रवाह भाष्य—सख्यभाव दो प्रकारके हैं—'ऐश्वर्यज्ञानयुक्त' और 'केवल' अथवा 'अमिश्र' सख्यभाव। श्रीदामादि व्रजसखाओंका 'केवल' सख्यभाव है—वे लोग श्रीकृष्णके ऐश्वर्यको नहीं जानते हैं॥६१॥
श्रीमद्भागवत (१०/१५/१७)— पादसम्वाहनं चक्रु अपरे हतपाप्मानो व्यजनैः समवीजयन्॥६३॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्ण शयन कर रहे थे, तो कोई सखा उनके पाद-सम्वाहन करने लगे और कोई विशुद्ध सखाभावसे कोमल पत्तोंसे बने पंखेसे उनको हवा करने लगे॥६३॥
अनुभाष्य—तालवनमें धेनुकासुरके वधसे पहले रामकृष्णको साथ लेकर गोप-बालक परस्पर इस प्रकार क्रीड़ा कर रहे थे— हतपाप्मानः (विगतकल्मषाः) केचित् गोपबालकाः महात्मनः (भगवतः) तस्य (कृष्णस्य) पादसम्वाहनं चक्रु अपरे [गोपाः] व्यजनैः समवीजयन् (सम्यक् अवीजयन्)।
श्लोक-भावानुवाद—(जब कभी श्रीकृष्ण थककर शयन करने लगते) तब कुछ निष्पाप
[ ६/६३-६५ ग्वाल-बाल भगवान् श्रीकृष्णके पाद सम्वाहन करने लगते और कुछ अन्य बाल-सखा बड़े-बड़े पत्तोंसे उनपर पंखा झलने लगते॥६३॥ अमृताणुकणिका—‘हतपाप्मानः'—जिनके पाप दूर हो गये हैं। इससे यह समझा जाता है—'इन सभी श्रीकृष्णके सखाओंके पहले पाप थे और वे पाप श्रीकृष्णसेवाकी बाधास्वरूप थे, किसी कारणसे उनके पाप दूर होनेसे अब उन्हें श्रीकृष्णकी इस प्रकार सेवा प्राप्त हुई है।' किन्तु श्रीकृष्णके सखा साधारण जीव नहीं हैं, इसलिये कभी भी उनको पाप स्पर्श नहीं कर सकता, वे नित्यसिद्ध भगवत्-परिकर—शुद्धसत्त्वमय विग्रह हैं। इसलिये ‘हतपाप्मानः' शब्दका उल्लिखित साधारण अर्थ उनके सम्बन्धमें प्रयोग नहीं हो सकता। उक्त शब्दका अन्य तात्पर्य है—आत्मा नित्य वस्तु और चित्-वस्तु है; पाप कभी भी उसको स्पर्श नहीं कर सकता, तथापि श्रुतिमें कहा गया है 'अयमात्मा अपहतपाप्ना-यह आत्मा पापशून्य है।' इस श्रुति वाक्यमें 'अपहतपाप्ना'-शब्दसे जैसे 'नित्य आत्माकी नित्य पापशून्यता' सूचित होती है, उसी प्रकार श्रीमद्भागवतके इस उद्धृत श्लोकके 'हतपाप्मानः'-शब्दसे भी श्रीकृष्णसखाओंका 'नित्य पापशून्यत्व' सूचित होता है। श्लोकका इस प्रकार अर्थ करनेसे और कोई भी आपत्तिका कारण नहीं रहता॥६३॥ (७) व्रजगोपियोंका मधुर रसमें भी श्रीकृष्णदास्य :- कृष्णेर प्रेयसी व्रजे यत गोपीगण। याँर पदधूलि करे उद्धव प्रार्थन॥६४॥ याँ-सबार ऊपरे कृष्णेर प्रिय नाहि आन। ताँहारा आपनाके करे दासी-अभिमान॥६५॥ अनुवाद-जिनके चरणोंकी धूलिके लिये उद्धवजी प्रार्थना करते हैं, जिनसे अधिक श्रीकृष्णको कोई प्रिय नहीं है, वे श्रीकृष्णकी प्रेयसी गोपियाँ भी स्वयंमें श्रीकृष्णकी दासी होनेका अभिमान करती हैं॥६४-६५॥ अमृताणुकणिका-श्रीकृष्णके वचन—जैसे श्रीमद्भागवत (३/४/३१)— “नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्नादितः प्रभुः।” अर्थात् “उद्धव मुझसे किञ्चित्मात्र भी कम नहीं हैं, क्योंकि वे गोस्वामी हैं अर्थात् वे विषयोंके द्वारा क्षुब्ध नहीं होते।” तथा श्रीमद्भागवत (११/१४/१५)- “न तथा मे प्रियतम आत्मयोनिर्न शङ्करः। न च सङ्कर्षणो न श्रीर्नैवात्मा च यथा भवान्॥” अर्थात् “हे उद्धव ! तुम मुझे जितने प्रिय हो-मेरे पुत्र ब्रह्मा, शङ्कर, सगे भाई बलराम, स्वयं अर्द्धाङ्गिनी लक्ष्मी और यहाँ तक मेरी अपनी आत्मा भी मुझे उतनी प्रिय नहीं है।" इन सभी श्रीकृष्णके वाक्योंसे समझा जाता है, महिमा अंशसे उद्धवजी श्रीकृष्णके तुल्य हैं और प्रियताके अंशसे भी उद्धवजीके समान कोई नहीं है, वे सर्वभक्त-शिरोमणि हैं। किन्तु परम-प्रेमवती गोपियोंके प्रेमकी महिमा ऐसी अद्भुत है कि ऐसे उद्धवजी भी अपने आपको ३५८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
गोपियोंकी अपेक्षा अति हीन मानकर 'आसामहो चरणरेणुजुषामहं स्यां' आदि वाक्योंके द्वारा उनके चरणोंकी धूलिकी प्रार्थना करते हैं। ऐसी प्रेमवती गोपियाँ भी स्वयंको श्रीकृष्णकी दासी मानती हैं॥६४-६५॥ श्रीमद्भागवत (१०/३१/६)— व्रजजनार्त्तिहन् वीर योषितां निजजनस्मयध्वंसनस्मित। भज सखे भवत्किङ्करीः स्म नो जलरुहाननं चारु दर्शय॥६६॥ अनुवाद—हे व्रजवासियोंके दुःखोंका नाश करनेवाले! हे वीर! हे अपनी मन्द-मन्द मुस्कानमात्रसे ही अपने निजजनोंमें सौभाग्यसे उत्पन्न गर्व और उसके कारण हुए वाम्य लक्षणयुक्त मानको विनष्ट कर देनेवाले! हे सखे! हम तुम्हारी दासियाँ हैं, इसलिये निश्चय ही अपनी दासियोंका भजन करो। हम अबला गोपियोंको एक बार अपने मनोहर मुखकमलका दर्शन कराकर सुखी करो॥६६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हे व्रजके दुःखोंके नाशक! हे स्त्रियोंके परम-नायक! हे अपनी मन्द-मुस्कानसे निजजनोंके गर्वको दूर करनेवाले! हे सखे! हम तुम्हारी दासियाँ हैं—अपने मुखकमलका हमें दर्शन कराओ॥६६॥ अनुभाष्य—रासक्रीड़ाके समय श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेपर उनका अन्वेषण करते हुए गोपियोंका यह गीत— हे व्रजजनार्त्तिहन् (कृष्णानुरागिजनविरहक्लेशविनाशन) वीर (उदारविग्रह), निजजनस्मयध्वंसनस्मित (निजजनानां रसविग्रहानां स्मयः गर्वं तं ध्वंसयति इति तथाभूतं स्मितं हास्यं यस्य तथाभूत) सखे, स्म (निश्चितं) भवत्किङ्करीः नः (अस्मान्) भज (अनुवर्त्तस्व); चारु (मनोहरं) जलरूहाननं (मुखपद्मं) च योषितां (गोपिनामस्माकं) दर्शय। श्लोक-भावानुवाद—अनुवाद द्रष्टव्य है॥६६॥ श्रीमद्भागवत (१०/४७/२१)— अपि बत मधुपुर्यामार्यपुत्रोऽधुनास्ते स्मरति स पितृगेहान् सौम्य बन्धूंश्च गोपान्। क्वचिदपि स कथां नः किङ्करीणां गृणीते भुजमगुरुसुगन्धं मूर्ध््न्यधास्यत् कदा नु॥६७॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥६७॥ अमृतप्रवाह भाष्य—अभी खेदका विषय यह है कि हमारे आर्यपुत्र मथुरा-नगरीमें वास कर रहे हैं। हे उद्धव! क्या वे अपने पिता नन्दबाबाके घरको और गोप-बन्धुओंको स्मरण करते हैं? क्या कभी वे हम दासियोंकी चर्चा करते हैं? आहा! क्या वे कभी अपने अगुरु जैसे सुगन्धित हस्तकमल हमारे मस्तकपर रखेंगे?॥६७॥ अनुभाष्य—व्रजमें उद्धवके आनेपर भ्रमरको लक्ष्यकर श्रीमती राधिकाकी चित्रजल्पोक्ति— हे सौम्य! अपि बत आर्यपुत्रः (नन्दनन्दनः) अधुना किं मधुपुर्यां (मथुरायाम्) आस्ते (सुखं निवसति)? सः पितृगेहान् (पितृभ्यां नन्दयशोदाभ्यां गेहैश्च सहितान्) बन्धून् (पर्जन्न्यवरीयस्युपनन्दाभिनन्द-सन्नन्द-नन्दन- रोहिणी-सानन्दानन्दिनी-कण्डव-दण्डवादीन्) गोपान् (सुबलार्जुन-गन्धर्व-वसन्त-श्रीदामसुदामोज्ज्वल-कोकिल-
[ ६/६७-७० सनन्दन-विदग्धादीन्) च किं स्मरति? क्वचित् (कदाचित्) अपि किङ्करीणां (ललिता-विशाखा चित्रा-चम्पकलता- तुङ्गविद्येन्दुलेखा-रङ्गदेवी-सुदेवी-कलावती-शुभाङ्गदा-हिरण्याङ्गी-रत्नलेखा-शिखावती-कन्दर्पमञ्जरी-पुण्डरीका- फुल्लकलिकानङ्गमञ्जरी-सीताखण्डी-चारुचण्डी-सदण्डिका-कुण्ठिता-कलकण्ठी-वामची-मेचका-हरिद्राभा- हरिच्चेला-वितण्डिका-लीलावती-साधिका-चन्द्रिका-माधवी-विजया-नन्दा-गौरी-सुधामुखी-वृन्दा-कौमुदी-रत्नभवा- रत्नप्रभादि-दासीनां) नः (अस्माकं श्रीमतीवृषभानुकुमारीणां गान्धर्विकानां) कथां सः गृणीते (किं स्वमुखेनोच्चारयति?) कदा नु अगुरुसुगन्धं (अगुरुः सकाशादपि सुष्ठुगन्धं यस्य तादृशं) भुजं (स्वभुजं) मूर्ध्नि अधास्यत् (निधास्यति)? श्लोक-भावानुवाद-हे सौम्य ! आजकल आर्यपुत्र (श्रीनन्दनन्दन) क्या मथुरापुरीमें सुखपूर्वक निवास कर रहे हैं? क्या वे अपने पिता-माताके साथ अपने गृहको और अपने बन्धुओं-पर्जन्यबाबा, उपनन्द, अभिनन्द, सत्रन्द, नन्दन, रोहिणी, सानन्द, आनन्दिनी, कण्डव, दण्डवादि तथा अपने गोपसखाओं-सुबल, अर्जुन, गन्धर्व, वसन्त, श्रीदाम, सुदाम, उज्ज्वल, कोकिल, सनन्दन, विदग्धादिको स्मरण करते हैं? कभी भी वे अपनी दासियों-ललिता, विशाखा, चित्रा, चम्पकलता, तुङ्गविद्या, इन्दुलेखा, रङ्गदेवी, सुदेवी, कलावती, शुभाङ्गदा, हिरण्याङ्गी, रत्नलेखा, शिखावती, कन्दर्पमञ्जरी, फुल्लकल्लिका, अनङ्गमञ्जरी, पुण्डरीका, सीताखण्डी, चारुचण्डी, सदण्डिका, कुण्ठिता, कलकण्ठी, वामची, मेचका, हरिद्राभा, हरिच्चेला, वितण्डिका, लीलावती, साधिका, चन्द्रिका, माधवी, विजया, नन्दा, गौरी, सुधामुखी, वृन्दा, कौमुदी, रत्नभवा, रत्नप्रभादि और मेरी चर्चा कभी अपने मुखकमलसे करते हैं? क्या वे कभी अपने अगुरु जैसे सुगन्धित हस्तकमल हमारे मस्तकपर रखेंगे? ॥६७॥ (८) यहाँ तक कि, साक्षात् श्रीराधाका भी श्रीकृष्णदास्य :- ताँ-सबार कथा रहु, - श्रीमती राधिका। सबा हैते सकलांशे परम-अधिका ॥ ६८ ॥ तेँहो याँर दासी हैञा सेवेन चरण। याँर प्रेमगुणे कृष्ण बद्ध अनुक्षण ॥ ६९ ॥ अनुवाद-अन्य सबकी बातें रहने दो, श्रीमती राधिका, जो सभी गोपियोंमें सब प्रकारसे सर्वश्रेष्ठ हैं, जिनके प्रेम और गुणोंसे श्रीकृष्ण सदा-सर्वदा बँधे हुए हैं, वे भी प्रेमके अद्भुत स्वभाववशतः श्रीकृष्णकी दासी होकर उनके चरणोंकी सेवा करती हैं ॥ ६८-६९ ॥ श्रीमद्भागवत (१०/३०/४०)- हा नाथ रमण प्रेष्ठ क्वासि क्वासि महाभुज। दास्यास्ते कृपणाया मे सखे दर्शय सन्निधिम् ॥ ७० ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ ७० ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हा नाथ! हा रमण! हा प्रियतम! हा महाबाहो! मैं आपकी अतिदीना दासी हूँ, मुझे अपने समीप ले लो ॥ ७० ॥ अनुभाष्य-रासक्रीड़ाके समय अन्य गोपियोंका परित्यागकर श्रीकृष्ण केवल श्रीमती राधिकाके साथ अन्तर्धान हो गये। दूसरी गोपियाँको श्रीकृष्ण-विरहमें विलाप करते हुए देखकर अभिमान प्रदर्शित करते हुए श्रीमती राधिकाने आदेश दिया कि मैं अब और नहीं चल सकती हूँ, ३६० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/७०-७३ ] इसलिये मुझे कन्धेपर उठाकर ले चलो। तब श्रीकृष्णके अन्तर्धान हो जानेके कारण श्रीमती राधिकाकी विलापोक्ति— हा नाथ, रमण, प्रेष्ठ (सर्वोत्तम), क्वासि [त्वं] क्वासि ? हे सखे, कृपणायाः (तब विरहकातरायाः दीनायाः) ते (तव) दास्याः मे (मम) सन्निधिं (निजसन्निधानं) दर्शय (अवलोकय)। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७०॥ (९) महिषियोंका भी श्रीकृष्णदास्य :- द्वारकाते रुक्मिण्यादि यतेक महिषी। ताँहाराओ आपनाके माने कृष्णदासी ॥७१॥ अनुवाद—द्वारकामें रुक्मिणी आदि जितनी महिषियाँ हैं, वे भी स्वयंको श्रीकृष्णकी दासी मानती हैं॥७१॥ श्रीमद्भागवत (१०/८३/११)— तपश्चरन्तीमाज्ञाय स्वपादस्पर्शनाशया। सख्योपेत्योग्रहीत् पाणिं साहं तद्गृह्मार्जनी ॥७२॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं तो श्रीकृष्णके चरणस्पर्शकी लालसासे तपस्या कर रही थी, कृपापूर्वक श्रीकृष्णने अपने सखा (अर्जुन) के साथ आकर मेरा पाणिग्रहण किया। तबसे मैं उनके गृहका मार्जन करनेवाली दासी बन गयी हूँ॥७२॥ अनुभाष्य—स्यमन्तपञ्चकमें यादव और कौरव-स्त्रियाँ एकत्रित होकर परस्पर श्रीकृष्णकथा करने लगीं, तब श्रीकृष्णकी महिषी कालिन्दीने द्रौपदीसे कहा— स्वपादस्पर्शनाशया (स्वस्य श्रीकृष्णस्य पादस्पर्शनस्य आशा, तया) तपश्चरन्तीं मा (माम्) आज्ञाय (ज्ञात्वा) सः कृष्णः सख्या (अर्जुनेन) सह उपेत्य (समीपमागत्य) पाणिम् अग्रहीत्; सा अहं तत् (तस्य) गृहमार्जनी दासी। श्लोक-भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७२॥ श्रीमद्भागवत (१०/८३/३९)— आत्मारामस्य तस्येमा वयं वै गृहदासिकाः। सर्वसङ्गनिवृत्त्याद्धा तपसा च बभूविम ॥७३॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥७३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—हमलोगोंने सबका सङ्ग त्यागकर कैसी-कैसी तपस्याके द्वारा इन आत्माराम पुरुष (श्रीकृष्ण) के गृहमें दासीके पदको प्राप्त किया है॥७३॥ अनुभाष्य—उसी समय उसी प्रसङ्गमें लक्ष्मणाने द्रौपदीसे कहा— इमाः वयं (महिष्यः) सर्वसङ्गनिवृत्या (सर्वेषु सुखवित्तपुत्रादिषु वा समोक्षचतुर्वर्गादिषु वा सङ्ग तस्य निवृत्या उपेक्षया) तपसा (दासीवृत्त्या) आत्मारामस्य तस्य (कृष्णस्य) अद्धा (साक्षात्) गृहदासिकाः बभूविम (आस्महि)। श्लोक-भावानुवाद—हम (महिषियाँ) सभी प्रकारके सुखों, धन-सम्पत्ति, पुत्रादि और यहाँतक चार प्रकारकी मुक्तियोंकी उपेक्षाकर दासीवृत्तिका अवलम्बनकर इन आत्माराम (श्रीकृष्ण) की साक्षात् गृहदासिका हुई हैं॥७३॥ छठा अध्याय | ३६१
[ ६/७४-७५ १०) स्वयंप्रकाश श्रीबलरामका भी श्रीकृष्णदास्य :- आनेर कि कथा, बलदेव महाशय। याँर भाव—शुद्धसख्य-वात्सल्यादिमय ॥७४॥ तेंहो आपनाके करेन दास-भावना। कृष्णदास-भाव बिनु आछे कोन जना॥७५॥ अनुवाद—औरोंकी बात ही क्या, श्रीबलदेव प्रभु जिनका श्रीकृष्णके प्रति शुद्ध सख्य-वात्सल्यमय भाव है, वे भी अपनेको उनके दासके रूपमें मानते हैं। श्रीकृष्णदास भावके बिना कौन व्यक्ति हो सकता है?॥७४-७५॥ अनुभाष्य—श्रीबलदेव प्रभुने श्रीकृष्णसे पहले जन्मग्रहण किया था और बड़े भाई होनेके नाते वे पूजनीय हैं। परन्तु वे स्वयंको अपने अनुज श्रीकृष्णका सेवक मानते हैं। महावैकुण्ठमें इन स्वयंप्रकाश-श्रीबलदेव प्रभुके ही चतुर्व्यूहात्मक प्रकोष्ठ हैं—यही सर्वशक्तिमान् परमेश्वरका परम ऐश्वर्य है। मर्यादामार्गमें इस प्रकार सर्वोच्च पदवी भी श्रीकृष्णकी सेवकवृत्तिमें अवस्थित है। इसलिये गोलोक-वैकुण्ठ और असंख्य ब्रह्माण्डोंमें कोई भी वास्तवमें श्रीकृष्णका भोग करनेमें अथवा उन्हें अपना दास बनानेमें समर्थ नहीं है। श्रीकृष्णके अतिरिक्त अन्य सभीमें श्रीकृष्णके प्रति जितने परिमाणमें सेवाप्रवृत्ति है, उसी परिमाणमें ही वे दूसरोंसे श्रेष्ठ हैं। श्रीकृष्णदास्य परित्यागकर जो प्राणी जितने परिमाणमें उनसे विमुख हुए हैं, उतने परिमाणमें उन्होंने (माया-बन्धनरूप) अमङ्गलका आह्वान किया है। जड़जगत्में श्रीकृष्णको भोग करनेकी प्रवृत्ति अथवा श्रीकृष्णको अपने समान मानकर उनकी भाँति भोग करनेकी प्रवृत्ति अभक्तोंका मूलमन्त्र होनेपर भी स्वरूपतः सभी श्रीकृष्णाश्रित लोग ही सदा भगवत्सेवामें नियुक्त हैं। श्रीकृष्णसेवा-विमुखता ही जीवोंको (जीवित अवस्थामें ही) मृतके समान ही बना देती है। जब श्रीकृष्णज्ञानका उदय होता है, उसी समय न्यूनाधिक श्रीकृष्णदास्यवृत्ति जीवमात्रमें लक्षित होती है॥७५॥ अमृतानुकणिका—५४ से ७० संख्यामें व्रज परिकरोंका तथा ७१ से ७३ संख्यामें द्वारकाके परिकरोंका दास्यभाव दिखाया। अब व्रज और द्वारका, दोनोंके परिकर श्रीबलदेव प्रभुके दास्यभावकी कथा कह रहे हैं। श्रीरुक्मिणी आदि महिषियाँ श्रीकृष्णकी पत्नियाँ हैं और पतिकी सेवा करना पत्नीका एकान्त कर्त्तव्य है, इसलिये उनके हृदयमें श्रीकृष्णकी दासी होनेका अभिमान अस्वाभाविक नहीं है। किन्तु श्रीबलदेवमें श्रीकृष्णके ज्येष्ठ भ्राता होनेका अभिमान है और उनकी श्रीकृष्णके प्रति प्रीति ऐश्वर्यज्ञानसे मिश्रित भी नहीं है। वे शुद्ध-वात्सल्य और शुद्ध-सख्य भावसे ही श्रीकृष्णको प्रीति करते हैं। श्रीबलदेव भी जब स्वयंको श्रीकृष्णका दास मानते हैं, तब श्रीकृष्णके प्रति जिनका भाव ऐश्वर्यज्ञानमय है, वे स्वयंको श्रीकृष्णका दास मानेंगे, इसमें क्या आश्चर्य है? ब्रह्म-विमोहन लीलामें श्रीबलदेव प्रभुके दास्यभावका प्रमाण भागवतके (१०/१३/३७) श्लोकमें दृष्ट होता है—'प्रायो मायास्तु मे भर्तुः'—मेरे प्रभु श्रीकृष्णकी ही यह माया है। इस वाक्यमें 'भर्तुः' शब्दके द्वारा सूचित होता है कि वे श्रीकृष्णको अपना प्रभु कहकर स्वयंको उनका दास ही मान रहे हैं॥७४-७५॥ ३६२ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत
६/७६-७९ ] ११) शेषरूपी अनन्तका दस देहोंसे श्रीकृष्णदास्य :- सहस्रवदने यँहो शेष-सङ्कर्षण। दश देह धरि' करे कृष्णेर सेवन ॥७६॥ अनुवाद—हजारों मुखोंवाले शेष, जिन्हें सङ्कर्षण भी कहते हैं, वे दस रूप धारणकर श्रीकृष्णकी सेवा करते हैं॥७६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—छत्र, पादुका, शय्या, तकिया, वस्त्र, आभूषण, आराम, आवास, यज्ञसूत्र और सिंहासन—ये दस प्रकारके शरीर हैं॥७६॥ १२) शिवका श्रीकृष्णदास्य :- अनन्त ब्रह्माण्डे रुद्र-सदाशिवेर अंश। गुणावतार तैंहो, सर्वदेव-अवतंस ॥७७॥ तैंहो करेन कृष्णेर दास्य-प्रत्याश। निरन्तर कहे शिव, 'मुञि कृष्णदास' ॥७८॥ कृष्णप्रेमे उन्मत्त, विह्वल दिगम्बर। कृष्ण-गुण-लीला गाय, नाचे निरन्तर ॥७९॥ अनुवाद—अनन्त ब्रह्माण्डोंमें विराजमान जो रुद्र हैं, वे सभी सदाशिवके अंश हैं। वे गुणावतार और सभी देवोंके शिरोमणि हैं। वे भी श्रीकृष्णदास्यकी अभिलाषा रखते हैं और सदा कहते हैं—'मैं श्रीकृष्णका दास हूँ।' वे श्रीकृष्णप्रेममें उन्मत्त और विह्वल होकर दिगम्बर वेशमें श्रीकृष्णके गुण और लीलाओंका निरन्तर गान करते हुए नाचते रहते हैं॥७७-७९॥ अनुभाष्य—(रुद्र और सदाशिव)—लघुभागवतामृतमें गुणावतार वर्णनप्रसङ्गमें (१८-२४) श्लोक। रुद्र— “एकादशव्यूहस्तथाष्टतनुरप्यसौ। प्रायः पञ्चाननस्त्र्यक्षो दशबाहुरुदीर्यते॥ क्वचिज्जीवविशेषत्वं हरस्योक्तं विधेरिव। तत्तु शेषवदेवास्तां तदंशत्वेन कीर्त्तनात्॥ हरः पुरुषधामत्वान्निर्गुणप्राय एव सः। विकारवानिह तमियोगात् सर्वैः प्रतीयते॥” यथा श्रीदशमे (१०/८८/३)— “शिवः शक्तियुतः शश्वत् त्रिलिङ्गो गुणसंवृत॥” यथा ब्रह्मसंहितायां (५/४५)— “क्षीरं यथा दधि विकारविशेषयोगात्, सञ्जायते न तु ततः पृथगस्ति हेतोः। यः शम्भुतामपि तथा समुपैति कार्याद्, गोविन्दमादि पुरुषं तमहं भजामि॥” “विधेर्ललाटाज्जन्मास्य कदाचित् कमलापतेः। कालाग्निरुद्रः कल्पान्ते भवेत् सङ्कर्षणादपि॥ सदाशिवाख्या तन्मूर्त्तिस्तमोगन्धविवर्जिता। सर्वकारणभूतासावङ्गभूता स्वयं प्रभोः। वायव्यादिषु सैवेयं शिवलोके प्रदर्शिता॥” तथा च ब्रह्मसंहितायाम् आदिशिव-कथने—(५/८)— छठा अध्याय | ३६३
[ ६/७७-७९ “नियतिः सा रमादेवी तत्प्रिया तद्वशं तदा। तल्लिङ्गं भगवान् शम्भुर्ज्योतीरूपः सनातनः। या योनिः सा पराशक्तिः” इत्यादि। श्रीरुद्रके एकादश व्यूह—अजैकपात्, अहिर्ब्रध्न, विरूपाक्ष, रैवत, हर, बहुरूप, देवश्रेष्ठ त्र्यम्बक, सावित्र, जयन्त, पिनाकी और अपराजित; और इन विस्तारोंके अतिरिक्त उनके आठ रूप (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र और सोमयाजी) हैं। इसमेंसे प्राय सभी रुद्र ही पाँच मुख, तीन नेत्र और दस भुजाओंवाले हैं। कहीं-कहीं रुद्रको भी ब्रह्माकी भाँति ‘जीवविशेष’ कहा गया है। भगवत्-अंश कहनेपर ‘शेष’ की भाँति इनकी भी मीमांसा करनी होगी अर्थात् स्वांश शिव ईश्वर-श्रेणीमें आते हैं और संहारक रुद्र विभिन्नांश जीव हैं। भगवदावतार ‘हर’ पुरुषात्मस्वरूप कहे जाते हैं और वे वस्तुतः निर्गुण होकर भी तमोगुणके योगसे तत्त्वको ना जाननेवाले साधारण लोगोंको आपाततः विकारीकी भाँति प्रतीत होते हैं। जैसे दशम स्कन्धमें कहा गया है—“रुद्र निरन्तर गुणसाम्यावस्थरूप प्रकृतिसे युक्त हैं, गुणोंमें क्षोभ होनेके बाद वे तीन गुणोंसे युक्त और दूरसे तीन गुणोंसे संवृत होते हैं।” जैसे ब्रह्मसंहितामें—“जिस प्रकार दूध विकारविशेषके योगसे दहीके रूपमें परिणत होता है, किन्तु वह दही अपने कारण दूधसे कभी भी पृथक् वस्तु नहीं है, वैसे ही जो संहारकार्यके लिये रुद्ररूपमें अवतीर्ण होते हैं, मैं उन आदिपुरुष गोविन्दका भजन करता हूँ।” किसी कल्पमें ब्रह्माके ललाटसे अथवा किसी कल्पमें विष्णुके ललाटसे रुद्रकी उत्पत्ति होती है। कल्पके अन्तमें सङ्कर्षणसे भी कालाग्नि रुद्रका जन्म होता है। वायुपुराणादिमें वैकुण्ठस्थित शिवलोकको सर्वकारणस्वरूप कहा गया है और वहाँ तमोगुण-सम्बन्धरहित जो ‘सदाशिव’-नामक शिवमूर्ति प्रदर्शित हुई है, वे स्वयं भगवान् श्रीकृष्णके विलास हैं। जैसे ब्रह्मसंहितामें आदिशिव-कथनमें वर्णन हुआ है—“चित्-शक्तिरूपा रमादेवी ही नियतिरूपा हैं और वे जिन भगवान्की प्रिया और वशीभूता हैं, उन स्वयंरूपके एक अङ्गविशेष सनातन चैतन्यविग्रह भगवान् शम्भु हैं। उनकी सङ्गिनी महामाया अर्थात् योनि रमादेवीका विस्तार हैं और वे महदादि-तत्त्वका उत्पत्ति स्थान हैं तथा अपरा अर्थात् त्रिगुणमयी शक्ति हैं।” आदि श्रीबलदेव विद्याभूषण :- वाक्यविशेषलाभात् रुद्रस्यापि द्वैविध्यं प्रतिपादयितुमाह—श्रीति। ‘सत्त्वं रजः’ इत्यादि (भाः १/२/२३) वाक्ये य ईश्वरकोटिरुक्तः, तं तावदाह—रुद्र एकादशव्यूह इति। अत्र भारतवाक्यम्—“अजैकपादहिर्ब्रध्नो विरूपाक्षोऽथ रैवतः। हरश्च बहुरूपश्च त्र्यम्बकश्च सुरेश्वरः। सावित्रश्च जयन्तश्च पिनाकी चापराजितः॥” इत्येतत्। तथाष्टतनुरिति—“पृथिवीं सलिलं तेजो वायुराकाशमेव च। सूर्यचन्द्रमसौ सोमयाजी चेत्यष्टमूर्त्तयः॥” इति यादवः। प्रायः इति—जलावरणस्थ-रुद्रस्यैकमुखत्ववीक्षणात्। अथ जीवकोटित्वं तस्याह—क्वचिदिति। “यं कामये तमुग्रं कृणोमि तं ब्रह्माणं तमृषिं तं सुमेधाम्” इत्यादिकमृक्श्रुतौ; “अथ पुरुषो ह वै नारायणोऽकामयत—प्रजाः सृजेय” इत्यारभ्य, “नारायणाद् ब्रह्मा जायते, नारायणाद् रुद्रो जायते, नारायणात् प्रजापतिर्जायते, नारायणादिन्द्रो जायते, नारायणोऽष्टौ वसवो (जायन्ते), नारायणादेकादश-रुद्रा (जायन्ते) नारायणाद्द्वादशादित्याः” (नाः उः १) इत्यादिकं नारायणोपनिषदि। “एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा न ईशानः” इत्युपक्रम्य, “तस्य ध्यानान्तस्थस्य ललाटात् त्र्यक्षः शूलपाणिः पुरुषोऽजायत विभ्रच्छ्रि ३६४ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत