भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 385

६/१४-१५ ] (मर्मानुवाद)—श्रुतिमें ‘कपिल’ नामक एक सिद्ध ऋषिका उल्लेख देखा जाता है। उन्होंने वेदोंमें कहे गये कर्मकाण्डोंको यथावत् स्वीकार किया है। इन्हीं कपिल ऋषिने ही ज्ञानकाण्डके विस्तारके लिये सांख्यस्मृतिकी रचना की थी। सांख्यस्मृतिके मतानुसार,—‘अथ त्रिविधदुःखात्यन्त-निवृत्तिरत्यन्त-पुरुषार्थः’ आदि सूत्रोंमें आध्यात्मिकादि तीन प्रकारके दुःखोंकी अत्यन्त निवृत्तिको ही ‘अत्यन्त-पुरुषार्थ अथवा मोक्ष’ कहा है। इसमें अचेतन प्रधानको ही स्वतन्तरूपसे जगत्का कारण कहकर निरूपण किया गया है। केवल ब्रह्मको ही यदि जगत्का एकमात्र कारण कहा जाय, तो सांख्यस्मृति निर्विषय (विषयरहित) हो जायेगी, क्योंकि आदिसे अन्ततक सांख्यस्मृतिका एकमात्र प्रतिपाद्य विषय तत्त्व-संख्यामात्र ही है। इसलिये परमसिद्ध कपिल-ऋषिके मतोंका विरोध न करते हुए ही वेदान्त-समूहका व्याख्यान करना उचित है। इससे मनु आदिके द्वारा प्रचारित स्मृतियोंकी भी निर्विषयता नहीं होगी, क्योंकि धर्मके प्रतिपादनके द्वारा कर्मकाण्डकी वृद्धि होनेपर इन सभी स्मृतियोंकी सविषयता ही होगी। इसका खण्डन करनेके लिये (“स्मृत्यनवकाश-दोषप्रसङ्ग” आदि) प्रथमसूत्रकी अवतारणा कर रहे हैं— (प्रथम सूत्र)—अवकाशका अभाव ही अनवकाश है। ‘अनवकाश’ शब्दका अर्थ निर्विषयता है। समन्वयके अनुरोधसे वेदान्तकी व्याख्या होनेपर सांख्यस्मृतिपर निर्विषयताका दोष आता है। इसलिये यदि कहें, श्रुतिके विपरीत अर्थके द्वारा वेदान्तकी व्याख्या करना क्या उचित है? उत्तर—वह असम्भव है, क्योंकि इस प्रकार व्याख्या करनेपर, ब्रह्मको ही एकमात्र कारण माननेवाले वेदान्तानुगत मनु आदि स्मृतियोंपर निर्विषयतारूप महान् दोष आ जाता है। इन सभी स्मृतियोंमें सर्वेश्वरको ही जगत्की उत्पत्ति आदिका कारण कहकर प्रतिपादन किया गया है। परन्तु कपिलमुनिने जिस प्रकार तत्त्वोंका वर्णन किया है, उस प्रकारसे इन सब स्मृतियोंमें नहीं कहा गया है। श्रीम call—श्रीम call? श्रीम call? नहीं, श्रीमनुने कहा है—“सृष्टिसे पहले सभी तमोमय, अज्ञात, अलक्षित, अतर्क्य, अविज्ञेय और सुप्तकी भाँति अवस्थित थे। उसके बाद स्वयंभू भगवान्ने स्वयं अव्यक्त होकर भी इस संसारको व्यक्त करनेके लिये महाभूतादि शक्तिसे समन्वित होकर प्रादुर्भूत होकर पूर्वोक्त तमोरशिको दूर किया। वे अतीन्द्रिय, अग्राह्य, सूक्ष्म, अव्यक्त, सनातन, सर्वभूतमय और अचिन्त्यस्वरूप हैं। उन्होंने स्वयं प्रादुर्भूत होकर मन-ही-मन अपने शरीरसे विभिन्न प्रकारकी प्रजाकी सृष्टिकी अभिलाषा की और सर्वप्रथम जलकी सृष्टि की। तत्पश्चात् परमेश्वरने इस जलमें वीर्यको स्थापित किया। इस वीर्यसे सहस्र सूर्योंकी भाँति प्रभायुक्त सुवर्णमय अण्डा उत्पन्न हुआ। इस अण्डेमें ही सर्वलोक-पितामह स्वयं ब्रह्मा उत्पन्न हुए।” पराशर ऋषिने भी कहा है—“परिदृश्यमान जगत् भगवान् विष्णुसे ही उत्पन्न हुआ है और उनके आश्रयमें ही अवस्थित है। वे ही इसके पालनकर्त्ता और संहारकर्त्ता हैं, यह जगत् उनकी ही शक्तिविशेष है। मकड़ी जिस प्रकार अपने मुखसे जाल निकालकर उसके सहारे विहार करके बादमें स्वयं ही उसको मुखमें ग्रास करती है, उसी प्रकार भगवान् विष्णु भी अपनी शक्तिसे जगत्-प्रपञ्चकी सृष्टि करके बादमें पुनः उसे अपनी शक्तिमें ही विलीन कर देते हैं।” अन्य-अन्य ऋषिगण भी इस प्रकार कहते हैं। छठा अध्याय | ३४३