श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ६/१४-१५ विकारको प्राप्त होती है और यह स्वयं अचेतन होकर भी अनेक चेतन जीवोंके भोगका और मोक्षका कारण है एवं प्रकृति इन्द्रियातीत होनेपर भी इसके कार्यसे इसके विषयमें अनुमान किया जा सकता है। प्रकृति स्वयं एक होनेपर भी तीन गुणोंमें असमानता होनेपर परिणामशक्तिके द्वारा महत्तत्त्वादि विचित्र रचनामय जगत्की सृष्टि करती है। इस प्रकार प्रकृति ही जगत्का निमित्त और उपादान रूपिणी है। पुरुष निष्क्रिय, निर्गुण है और प्रभु है। वह चित्-स्वरूप है, प्रत्येक देहमें वह भिन्न रूपसे अवस्थित है और प्रधानके सञ्चालनसे उसके विषयमें अनुमान लगाया जा सकता है तथा विकार और क्रियाके अभावमें वह कर्त्ता और भोक्ताके भावसे रहित है। प्रकृति और पुरुषका तत्त्व इस प्रकार है कि दोनोंके सान्निध्यमात्रसे परस्परके धर्मका विनिमय (आदान-प्रदान) होता है—प्रकृतिमें चैतन्यका और पुरुषमें कर्त्ता-भोक्ताके भावका आरोपण हो जाता है। इस प्रकार विवेकके अभावसे ही पुरुषके द्वारा भोग और विवेकसे ही उसका मोक्ष होता है। प्रकृतिके प्रति पुरुषके उदासीनतामय धर्मादि विषयसमूह सोपपत्तिक सूत्रोंके द्वारा निबद्ध किये गये हैं। इस प्रक्रियामें सांख्यकार, —'प्रत्यक्ष', 'अनुमान' और 'आगम', इन तीन प्रमाणोंको मानते हैं और इनके द्वारा जो सिद्ध होता है, वही प्रमाण है। (उपमानादि उन्हींके अन्तर्गत हैं, ये अतिरिक्त प्रमाण नहीं हैं।) 'प्रत्यक्षसिद्ध' और 'आगमसिद्ध' अर्थोंके विषयमें अधिक नहीं कहना है। परन्तु 'परिणामात्', 'समन्वयात्', 'शक्तितः' आदि सूत्रोंके द्वारा जो प्रधानको जगत्का कारण 'अनुमान' किया गया है, उसका खण्डन करना ही हमारा प्रयोजन है। क्योंकि उक्त मतके खण्डनसे सांख्यके सम्पूर्ण मतका ही खण्डन हो जायेगा। इस विषयमें यह संशय है कि 'प्रधान' जगत्का निमित्त और उपादान है अथवा नहीं। पूर्वपक्षने प्रधानका निमित्तत्व और उपादानत्व, दोनों ही स्वीकार किये हैं। पूर्वपक्षका कहना है कि उन्होंने जगत्के उपादानरूपसे ही सत्त्वादिरूप प्रधानका अनुमान किया है। उपादान-कार्यके सजातीय ही होता है, जैसे घड़ेके कार्यमें (निर्माणमें) उपादानरूपसे मिट्टी आदिको ही समजातीय देखा गया है। जड़ वृक्षसे फलकी उत्पत्ति और उसी प्रकार जलको चलते देखकर जड़ अथवा अचेतन प्रधानका भी जगत्कर्त्तृत्व स्थिर होता है। 'प्रधान ही जगत्का उपादान और निमित्त कारण है'—पूर्वपक्षके इस सिद्धान्तके खण्डनके लिये पहले सूत्रकी अवतारणा कर रहे हैं— (प्रथम सूत्र)—"प्रधान अचेतन है, इसलिये जड़-प्रधान जगत्का उपादान और निमित्त कारण नहीं है, क्योंकि इस जगत्की विचित्र रचना देखकर चेतनके आश्रयके बिना जड़-प्रधानके द्वारा परिदृश्यमान जगत्की रचना सिद्ध नहीं होती अथवा ऐसा अनुमान करना भी सङ्गत नहीं है। इस जगत्में चेतनके आश्रयके बिना ईंटों आदिके द्वारा कभी भी भवनका निर्माण सिद्ध नहीं होता है। सूत्रमें उक्त 'च'-शब्दके द्वारा अन्वयकी असङ्गति उचित है। बाह्य घटादि पदार्थसमूहका कभी भी सुखादि स्वरूपसे अन्वय नहीं हो सकता अर्थात् वे सुखादिका अनुभव नहीं कर सकते, क्योंकि सुखादि सभी विषय आन्तरिक धर्म हैं, इसलिये बाह्यवस्तुसे उसका अन्वय सम्भव नहीं है। विशेषतः घटादि पदार्थ उक्त सुखादिके कारण नहीं हैं और सुखादि रूपमें भी उनकी प्रतीति नहीं है॥"१॥ ३३८ | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत