भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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(द्वितीय सूत्र)—“प्रवृत्ति देखकर भी प्रधानको जगत्का कारण मानना सङ्गत नहीं है। चेतनके द्वारा अधिष्ठित जड़में ही प्रवृत्ति दिखायी देती है। जिसका अधिष्ठान होनेपर ही जड़की प्रवृत्ति होती है, उसकी ही यह प्रवृत्ति है—यह निश्चित है। रथ और सारथी इसके उत्तम दृष्टान्त हैं। इसी प्रकार ‘वृक्षके द्वारा फलकी उत्पत्ति होती है’ आदि उदाहरणोंमें प्रधानका कारणता-सम्बन्धीय दृष्टान्त उक्त हुआ है। इस स्थानपर भी चेतनका आश्रय स्वीकृत हुआ है, क्योंकि अन्तर्यामी ब्राह्मणमें उसका उल्लेख हुआ है। इस भाष्यमें इसका बादमें विस्तारसे वर्णन होगा। सूत्रोक्त च-शब्द अवधारणमें है। ‘मैं करता हूँ’ इस दृष्टान्तमें भी चेतनकी ही प्रवृत्ति दिखायी देती है, इसलिये जड़का कर्त्तृत्व सङ्गत नहीं है। यदि कहें—प्रकृति और पुरुषकी परस्पर सन्निधिमात्रसे परस्परके धर्मके विनिमयके कारण ही जगत्की रचना हुई है? उत्तर—यह भी नहीं कह सकते। अच्छा, जो सन्निधि परस्परके धर्मके विनिमयका कारण है, वह सन्निधि क्या प्रकृति और पुरुष, दोनोंका ही सद्भाव है अथवा प्रकृति-पुरुषगत कोई विकार? उत्तर—वह दोनोंका सद्भाव तो नहीं ही है, क्योंकि ऐसा स्वीकार करनेसे सभी मुक्त-पुरुषोंके साथ भी प्रकृतिके धर्मका विनिमय मानना होगा। यह सन्निधि—प्रकृतिगत विकार भी नहीं है, क्योंकि विनिमयको ‘कार्यरूप’में स्वीकार करनेपर इस प्रकृतिगत विकारकी विनिमयके ‘कारणरूप’में होनेकी सम्भावना नहीं है (कार्य और कारण एक नहीं हो सकते)। इसी प्रकार, यह पुरुषगत विकार भी नहीं है, क्योंकि पुरुषगत विकार भी अस्वीकार्य है। इसलिये ‘प्रधान’ जगत्का कारण नहीं हो सकता॥ २॥ यदि कहें—दूध जिस प्रकार अपने आप दहीमें परिणत हो जाता है और एक ही मेघसे निकला जल जिस प्रकार एकरस होनेपर भी ताल और आमादि फलोंमें मीठे और खट्टे विभिन्न रसोंमें परिणत हो जाता है, उसी प्रकार एक ही प्रधान, पुरुषके कर्म-वैचित्र्यके अनुसार देह-जगदादिरूपमें परिणत होता है। इसके उत्तरमें कह रहे हैं— (तृतीय सूत्र)—दूध और जलादि अचेतन वस्तुओंकी भी चेतनके द्वारा अधिष्ठित होनेपर ही कार्यमें प्रवृत्ति होती है, अपनेसे ही प्रवृत्तन नहीं हो सकता; क्योंकि रथादि दृष्टान्तसे ऐसा ही अनुमान होता है। अन्तर्यामी ब्राह्मणसे इन दोनों (दूध और जल) जड़ वस्तुओंका चेतन-अधिष्ठतभाव सिद्ध होता है॥ ३॥ (चतुर्थ सूत्र)—प्रधानके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी अनुपस्थिति परित्यक्त होनेसे (अर्थात् अन्य कोई कारण भी उपस्थित हो सकता है) केवलमात्र प्रधानका ही कर्त्तृत्व असङ्गत हुआ है। ‘अपि’-शब्दका अर्थ च-कार अर्थात् समुच्चय है। सृष्टिके पूर्व प्रधानके अतिरिक्त अन्य किसी कारणकी अनुपस्थितिका त्याग हुआ है, ऐसा कहनेसे केवल प्रधानका ही अपने परिणामका कर्त्ता होना निरस्त हुआ है। प्रधानके अतिरिक्त उसका प्रवर्त्तक अथवा निवर्त्तक, अन्य कोई भी कारण ही आदि-सृष्टिसे पूर्व नहीं था,—इस प्रकारका मत उपेक्षित हुआ है; क्योंकि उस समय चेतनकी सन्निधिके कारणको ‘अन्य कारण’ के रूपमें स्वीकार किया गया है। इसलिये केवल जड़कर्त्तृत्ववादका खण्डन हुआ है। विशेषतः इस प्रकार पूर्वपक्षसे प्रलयमें

छठा अध्याय | ३३९