भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 382

[ ६/१४-१५ भी कार्योत्पत्तिका प्रसङ्ग होता है; क्योंकि प्रधानके अतिरिक्त अन्य कारणका अभाव और प्रधानकी सन्निधि रहनेके कारण सृष्टिकालकी भाँति प्रलयकालमें भी कार्य-उत्पत्तिका प्रसङ्ग है। अदृष्टके ज्ञानके अभावके कारण प्रलयकालमें कार्यका अभाव भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि उस समय उस अदृष्टका ज्ञान भी आकर उपस्थित हो सकता है॥४॥ यदि कहें कि तृण-पल्लवादि जिस प्रकार गायादि (पशु) के द्वारा खाये जानेपर अपने-आप दूधके रूपमें परिवर्तित हो जाते हैं, उसी प्रकार प्रधान भी महत्तत्त्वादि रूपमें परिणत होता है, तो उसके उत्तरमें कह रहे हैं— (पञ्चम सूत्र)—इस उदाहरणके अतिरिक्त अन्यत्र ऐसा दूधके रूपमें परिवर्तन नहीं भी देखा जाता है, इसलिये प्रधानका भी तृणादिके समान स्वभावतः (स्वतः) परिणाम कहना सङ्गत नहीं है। यहाँ च-शब्दका प्रयोग निश्चयके रूपमें है, इस प्रकार पूर्वपक्ष असङ्गत है; क्योंकि अन्यत्र यह नहीं देखा जाता; जैसे बैलादिके द्वारा खाये जानेपर तृणादिका दूध-रूपमें परिणाम नहीं देखा जाता, वैसे यह परिवर्तन स्वाभाविक नहीं है। और भी यदि स्वभावतः ही तृणादि दूधमें परिवर्तित होते हैं, तो आङ्गनमें पड़े तृणादिका दूधमें परिवर्तन नहीं देखा जाता है। जब ऐसा दिखलायी नहीं देता, तब केवल स्वभावको ही परिणामका कारण नहीं कह सकते। ‘तृणादि विशेष प्राणियोंके सम्बन्धसे दूधमें परिवर्तित हो जायँ', ऐसा सर्वेश्वरका सङ्कल्प ही उसका कारण है॥५॥ जड़ होनेके कारण प्रधानका सम्पूर्णरूपसे स्वतः प्रवर्त्तन नहीं है, —यह सिद्ध हुआ है। यदि तुम्हारे सन्तोषके लिये उसे स्वीकार कर भी लें, तो भी उससे तुम्हारा कोई अभीष्ट सिद्ध नहीं होगा। इसलिये आगे कह रहे हैं— (षष्ठम सूत्र)—प्रधानकी स्वाभाविकी प्रवृत्ति स्वीकार करनेमें भी कोई सार्थकता नहीं है। चार सूत्रोंमें 'ना'-अर्थ ही पूर्व सूत्रोंके अनुरूप होगा। 'पुरुष मुझे भोगकर मेरे दोषोंको अनुभवकर मुझसे उदासीनता रूप मोक्ष लाभ करेंगे'—इस प्रकार भोग-मोक्षार्थक कहकर प्रधानकी प्रवृत्ति प्रतीत होती है। ऊँट जिस प्रकार केवल दूसरोंके लिये ही कुङ्कुमका भार ढोता है, स्वयं उसका भोग नहीं करता है, प्रधानकी भी प्रवृत्ति उस प्रकार केवल दूसरोंके लिये ही है। और पुरुष भी अकर्त्ता होकर भी भोक्ता प्रतीत होता है। अन्नका कर्त्ता अर्थात् उसको उत्पन्न करनेवाला ना होकर भी अन्न-भोक्ता जिस प्रकार अन्नका भोग करता है, पुरुषका भी उसी प्रकार फलका उपभोग होता है। पूर्वपक्षकी इस प्रधान-प्रवृत्तिको स्वीकार करना युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि इसे स्वीकार करनेपर भी कोई फल दिखायी नहीं देता। पुरुषका प्रकृतिका दर्शनरूप 'भोग' और प्रकृतिके प्रति उदासीनतारूप 'मोक्ष' ही प्रवृत्तिका फल है। प्रधानके द्वारा भोग सम्भव नहीं है, क्योंकि चिन्मात्र, निर्विकार और अकर्त्ता होकर भी पुरुषका प्रकृति-दर्शनरूप सङ्गसे विकारयोगके कारण वह पुरुषका ही भोग है, प्रधानका नहीं। प्रधानका अपवर्ग (मोक्ष) भी सम्भव नहीं है, क्योंकि प्रवृत्तिकी उत्पत्तिसे पूर्व भी अपवर्ग सिद्ध रहनेपर उसकी व्यर्थता प्रकाशित हो रही है। सन्निधिमात्रको ही भोगका कारण कहनेपर, सन्निधिकी नित्यताके कारण मुक्त लोगोंके द्वारा भी भोग लक्षित होते हैं॥६॥ ३४० | श्रीश्रीचैतन्यचरितामृत