श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 539, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ेंआठवाँ अध्याय आठवें अध्यायका सार—इस अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाका वर्णन हुआ है। नामापराध रहनेपर जन्मों-जन्मोंतक श्रीकृष्णनाम करनेपर भी व्यक्तिको प्रेमधनकी प्राप्ति नहीं होती। इससे यह समझना चाहिये कि यदि नामापराधी व्यक्ति सात्त्विक विकारादिका प्रदर्शन करता है, तो वह केवल छलमात्र है। जो व्यक्ति निष्कपट भावसे श्रीचैतन्य- श्रीनित्यानन्दका नाम लेते हुए आनन्दका अनुभव करता है, दोनों प्रभु उसके हृदयको अपराधशून्य कर देते हैं। तब श्रीकृष्णनाम जप करनेसे उसके हृदयमें प्रेमका उदय होता है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुर-कृत श्रीचैतन्यभागवतमें सूत्ररूपमें दी गयी महाप्रभुकी शेषलीलाका विस्तारसे वर्णन होना बाकी था, अतः श्रीवृन्दावनवासी वैष्णवोंकी आज्ञासे और श्रीमदनमोहनजीकी आज्ञामाला प्राप्तकर श्रील कविराज गोस्वामीने इस ग्रन्थकी रचना की। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौरकी इच्छासे नितान्त अयोग्य व्यक्तिको भी योग्यता-लाभ :- वन्दे चैतन्यदेवं तं भगवन्तं यदिच्छया। प्रसभं नर्त्तते चित्रं लेखरङ्गे जड़ोऽप्ययम् ॥1॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥1॥ अमृतप्रवाह भाष्य—मैं भगवान् श्रीचैतन्यदेवकी वन्दना करता हूँ, जिनकी इच्छासे चित्रपुत्तलिका (चित्रपटपर बने चित्र) की भाँति होनेपर भी मुझ मूर्ख व्यक्तिने हठात् (सहसा) यह ग्रन्थ-लेखनरूपी नृत्य-कार्य आरम्भ किया है॥1॥ अनुभाष्य—यदिच्छया (यत् यस्य चैतन्यदेवस्य इच्छया) अयम् (अहं कृष्णदासः) जड़ोऽपि (जड़सदृशोऽपि) लेखरङ्गे (ग्रन्थरचन-क्रीड़ाकार्य) प्रसभं (हठात्) चित्रम् (आश्चर्यं यथा स्यात् तथा) नर्त्तते, तं [कृपामयं] भगवन्तं चैतन्यदेवम् [अहं] वन्दे (प्रणमामि)। श्लोक भावानुवाद—जिन श्रीचैतन्यदेवकी इच्छासे मुझ कृष्णदासने जड़-सदृश होनेपर भी हठात् ग्रन्थ-लेखन- क्रीड़ारूपी नृत्य आरम्भ किया है, उन कृपामय भगवान् श्रीचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥1॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र। जय जय परमानन्द नित्यानन्द॥2॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। परमानन्द स्वरूप श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो॥2॥ जय जयाद्वैताचार्य जय कृपामय॥ जय जय गदाधर पण्डित महाशय॥3॥ अनुवाद—कृपामय श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो। श्रीगदाधर पण्डित महाशयकी जय हो, जय हो॥3॥ जय जय श्रीवासादि यत भक्तगण। प्रणत हइया वन्दों सबार चरण॥4॥ अनुवाद—श्रीवासादि सभी भक्तोंकी जय हो, जय हो। मैं शरणागत होकर इन सबके चरणोंकी वन्दना करता हूँ॥4॥ मूक कवित्व करे याँ-सबार स्मरणे। पङ्गु गिरि लङ्घे, अन्ध देखे तारागणे॥5॥ अनुवाद—इनके (पञ्चतत्त्वके) स्मरणमात्रसे गूँगा व्यक्ति कविता करने लगता है, पङ्गु (चलनेमें असमर्थ) व्यक्ति भी पर्वतको लांघ सकता है और अन्धा व्यक्ति आकाशके तारोंको देखनेमें समर्थ हो जाता है॥5॥