श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 540, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/6-12 पञ्चतत्त्वके माहात्म्यको ना मानकर पृथक् बुद्धिसे श्रीगौर या श्रीकृष्णपूजा घोर अपराध :- ए-सब ना माने येइ पण्डितसकल। ता-सबार विद्यापाठ भेक-कोलाहल ॥ 6 ॥ अनुवाद-जो सब (स्वयंको) पण्डित (माननेवाले) पञ्चतत्त्वको नहीं मानते, उनका विद्यापाठादि मेंढकोंके कोलाहलकी भाँति निरर्थक है॥ 6 ॥ अमृतानुकणिका-मेंढकका कोलाहल उसका कुछ भी कल्याण नहीं करता, अपितु उसके लिये विपत्तिका ही आह्वान करता है। उसके कोलाहलको सुनकर सर्प उसकी स्थिति जानकर वहाँ आकर उसको ग्रास कर लेता है। इसी प्रकार जो पञ्च-तत्त्वको ईश्वर रूपमें स्वीकार नहीं करते अथवा उनकी अलौकिक शक्तिपर विश्वास नहीं करते, उनका लौकिक दृष्टिसे पण्डित होनेपर भी कोई कल्याण नहीं होता। उनका विद्याभ्यास और ग्रन्थोंका अध्ययन निरर्थक हो जाता है, क्योंकि इस पाण्डित्य अभिमानके कारण वे भगवद्-चरणोंमें अपराध कर बैठते हैं और क्रमशः वे श्रीभगवान्से बहुत दूर हो जाते हैं॥ 6 ॥ एइ सब ना माने येबा, करे कृष्णभक्ति। कृष्ण-कृपा नाहि तारे, नाहि तार गति ॥ 7 ॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 7 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-इन पञ्चतत्त्वको न मानकर जो श्रीकृष्णभक्ति करते हैं, उनपर श्रीकृष्णकी कृपा नहीं होती ॥ 7 ॥ अनुभाष्य-'तारे' अर्थात् उनके प्रति॥ 7 ॥ पूर्वे येन जरासन्ध-आदि राजागण। वेदधर्म करि' करे विष्णुर पूजन ॥ 8 ॥ कृष्णभक्ति बिना गौरभक्ति, गौरभक्ति बिना कृष्णभक्ति-अभक्ति :- कृष्ण नाहि माने, ताते दैत्य करि' मानि। चैतन्य ना मानिले तैछे दैत्य तारे जानि ॥ 9 ॥ अनुवाद-जैसे द्वापरमें जरासन्धादि राजा वेदविहित धर्मके अनुसार विष्णुकी पूजा करते थे, परन्तु वे श्रीकृष्णको नहीं मानते थे, इसलिये इन्हें दैत्य माना गया है। इस प्रकार जो श्रीचैतन्य महाप्रभुकी भगवत्ताको स्वीकार नहीं करते, उन्हें भी दैत्यके रूपमें जानो॥ 8-9 ॥ अनुभाष्य-विष्णु-परतत्त्व स्वयंरूप श्रीकृष्णको स्वीकार न करके उनके प्रति विद्वेष अथवा उदासीनवशतः जरासन्धादिकी वेदमन्त्रोंके द्वारा की गयी विष्णुपूजा भी आसुरिक धर्ममें ही समाप्त होती है, उसी प्रकार अपने स्वरूपगत धर्म श्रीचैतन्यदास्यको भुलाकर जीवकी विष्णुपूजाकी जो चेष्टा है, वह भी उत्पातमय आसुरिक-धर्म या अवैष्णवता मात्र है॥ 9 ॥ महाप्रभुकी संन्यासलीलाका हेतु :- 'मोरे ना मानिले सब लोक हबे नाश।' इथि लागि' कृपार्द्र प्रभु करिल संन्यास ॥ 10 ॥ संन्यासी-बुद्धये मोरे करिबे नमस्कार। तथापि खण्डिबे दुःख, पाइबे निस्तार ॥ 11 ॥ अनुवाद-'जो मुझे (स्वयं भगवान्को) नहीं मानते, उन सभी लोगोंका नाश होगा'-यह विचारकर कृपासे द्रवीभूत होकर श्रीचैतन्य महाप्रभुने संन्यास ग्रहण किया। संन्यासी जानकर वे मुझे नमस्कार करेंगे, इससे उनके दुःखोंका नाश होगा और उनका उद्धार हो जायेगा॥ 10-11 ॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यचन्द्र श्रीराधाकृष्णतत्त्वसे अभिन्न वस्तु हैं। किन्तु कुछ अज्ञानी लोग अपनी जड़ और भोगमय चित्त-वृत्तिके कारण श्रीगौरसुन्दरकी अप्राकृत लीलाको साधारण समझकर अपराध कर बैठते हैं। ऐसे निर्बोध लोगोंके अपराधोंकी चिन्ता करके श्रीगौरहरिने कृपावश संन्यास ग्रहणकर उनके प्रति दयाका प्रकाश किया॥ 11 ॥ महावदान्य श्रीगौरमें अभक्ति-आसुरिक-वृत्ति :- हेन कृपामय चैतन्य ना भजे येइ जन। सर्वोत्तम हइलेओ तारे असुरे गणन ॥ 12 ॥ 4 | श्रीचैतन्यचरितामृत