भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 541, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 541

8/12 ] अनुवाद-ऐसे कृपालु श्रीचैतन्य महाप्रभुका जो लोग भजन नहीं करते, वे (जगत्में) सर्वश्रेष्ठ होनेपर भी असुरतुल्य हैं॥12॥ अनुभाष्य-“हे जीवों! केवल श्रीकृष्णका भजन करो”-श्रीचैतन्यचन्द्रकी इस प्रकारकी दयाकी जो लोग उपलब्धि नहीं कर सकते, वे निश्चय ही असुर अर्थात् विष्णुभक्तिरहित अवैष्णव हैं, चाहे जगत्के विषयी लोगोंके मध्य वे श्रेष्ठ माने जाते हों। श्रीकृष्णभजनको त्यागकर श्रीचैतन्यभजनमें भी श्रीचैतन्यचन्द्रकी दया नहीं है, क्योंकि ऐसा भजन कलिके प्रभावसे मनकी कल्पनामात्र है। उसी प्रकार निरीश्वर स्मार्त्त अथवा पञ्चोपासक समाजका अनुगमनकर क्षुद्र नश्वर स्वार्थसिद्धिके लिये विष्णुपूजाका प्रयास करनेवालोंकी श्रीकृष्ण-चैतन्यात्मक (चैःचः आदिलीला 1/1 में वर्णित) छह तत्त्वोंमें किसी एक तत्त्वको त्यागकर अन्य एक तत्त्वके प्रति जो श्रद्धा अथवा पूजा है, अथवा श्रीचैतन्य महाप्रभुको श्रीकृष्णसे भिन्न सामान्य मर्त्य जीवोंमें श्रेष्ठ समझकर गौरनाम, गौरमन्त्र और गौरशक्तिके प्रति जो अश्रद्धा है, वह भी आसुरिक धर्म अर्थात् कलिके प्रभावसे मनकी कल्पनामात्र है॥12॥ अमृताणुकणिका-इस अध्यायके 6-12 पयार संख्यामें वर्णित है कि जो श्रीकृष्ण-चैतन्यात्मक छह तत्त्वोंको नहीं मानते, वे असुर ही हैं-ऐसा शाब्दिक अर्थ ग्रहण करनेपर शैव-शाक्त-धर्म-सम्प्रदायके लोग, योग-ज्ञानमार्ग अवलम्बी साधक, यहाँ तक कि महाप्रभुके अनुगत वैष्णवोंके अतिरिक्त अन्य वैष्णव सम्प्रदायके लोग भी असुर ही कहलायेंगे, परन्तु यह श्रील कविराज गोस्वामीका उद्देश्य नहीं है। भक्तिरसामृतसिन्धुमें श्रील रूप गोस्वामीने कहा है-“ज्ञानतः सुलभा मुक्तिः” अर्थात् ज्ञानमार्गमें भजनसे मुक्ति सुलभ है। चैःचः (मध्य 20/157) में कहा गया है- “ज्ञान, योग, भक्ति,-तिन साधनेर वशे। ब्रह्म, आत्मा, भगवान्-त्रिविध प्रकाशे॥” इस पयारमें भी ज्ञानमार्ग, योगमार्ग और सभी प्रकारके भक्तिमार्गोंकी सार्थकता स्वीकार हुई है। इसलिये गौड़ीय वैष्णवोंका मत यही है कि अन्य प्रमाणिक सम्प्रदायके भक्त परव्योम स्थित अपने-अपने इष्ट भगवद्-स्वरूपका भजन करके वैकुण्ठमें सालोक्यादि चार प्रकारकी मुक्ति प्राप्त करते हैं। परम उदार वैष्णवशास्त्र सभी साधक सम्प्रदायोंके प्रति यथायोग्य मर्यादाका प्रदर्शन करते हैं, कहीं भी सङ्कीर्णताको आश्रय नहीं देते। श्रुतियोंमें कहा गया है कि परतत्त्व वस्तु एक होकर भी अनेक रूपोंमें प्रकाशित होती है (एकोऽपि सन् यो बहुधावभाति) और वह रसस्वरूप है (रसो वै सः)। उसमें अनन्त वैचित्री है और वह रसामृतसिन्धु है। नारायण, राम, नृसिंहादि विभिन्न भगवद्-स्वरूप उसकी रस वैचित्रीके विभिन्न रूपमात्र हैं। विभिन्न रसवैचित्री जिस प्रकार अखिलरसामृत-सिन्धु परतत्त्व वस्तुमें ही अवस्थित है, उसी प्रकार ये सब रसवैचित्रीके विभिन्न रूप या विग्रह भी उस परतत्त्व वस्तु अखिलरसामृत-घन विग्रहके ही अन्तर्भुक्त हैं, उससे स्वतन्त्र विग्रह नहीं हैं। जैसे, नारायण जिस रसवैचित्रीके मूर्त्तरूप हैं, उसी रस वैचित्रीके उपासक भक्तोंके निकट परतत्त्व वस्तु अपने विग्रहमें नारायण रूपको प्रकट करती है। इसी बातको महाप्रभुने (चैःचः मध्यलीला 9/156) में कहा है- “एक ईश्वर-भक्तेर ध्यान-अनुरूप। एकइ विग्रहे करे नानाकार रूप॥” अर्थात् एक ही ईश्वर भक्तोंके ध्यानके अनुरूप एक ही विग्रहमें नाना प्रकारके रूप प्रकट करते हैं। लीलामें श्रीकृष्णने अपने वासुदेव-विग्रहमें ही अर्जुनको विश्वरूप दिखलाया और श्रीचैतन्य महाप्रभुने अपने विग्रहमें लक्ष्मी, दुर्गा, महेश, वराह, नृसिंह, बलदेवादि विभिन्न भगवद्-स्वरूपके रूपोंको नदीयावासी भक्तोंको दिखलाया। (‘बहुमूर्त्येकमूर्तिकम्’ भाः 10/40/7)-इस प्रकार परतत्त्व वस्तु एक मूर्तिमें बहुमूर्ति और बहुमूर्तिमें आठवाँ अध्याय | 5