भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 542, कुल 2549 में से

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पृष्ठ 542

[ 8/12-15 एकमूर्ति है; इन सब विभिन्न रूपोंमें तत्त्वके विचारसे कोई भी भेद नहीं है, क्योंकि सभी एक ही परतत्त्व वस्तुके एक ही विग्रहकी विभिन्न अभिव्यक्ति हैं। जो किसी भी भगवद्-स्वरूपके प्रति अवज्ञा प्रदर्शन नहीं करते अथवा उनमें पृथक् भगवद्-भेद बुद्धि नहीं करते, अपने उपास्य-स्वरूपके अतिरिक्त अन्य भगवद्-स्वरूपोंका भजन नहीं करनेपर भी वे निज भजन अनुरूप अभीष्ट वस्तुको ही प्राप्त करते हैं। जैसे हनुमानजी श्रीरामचन्द्रके सेवक हैं और वे श्रीकृष्णका भजन नहीं करते हैं, तथापि श्रीरामचन्द्र और श्रीकृष्णको अभिन्न भगवद्-तत्त्व स्वीकार करनेपर वे श्रीरामचन्द्रकी सेवासे वञ्चित नहीं होते। किन्तु जरासन्धादि राजा श्रीकृष्ण-स्वरूपकी भगवत्ताको ही स्वीकार नहीं करते, विष्णु-भजन करनेपर भी उन्हें श्रीविष्णुकी कृपा प्राप्त नहीं होती है, इसलिये उनकी गणना असुरोंमें होती है। महाप्रभुने कहा है (चैःचः मध्यलीला 9/155)- “ईश्वर-तत्त्वे भेद मानिले हय अपराध॥” एक ही ईश्वर-तत्त्वमें भेद माननेसे अपराध होता है। श्रीचैतन्यदेव भी भगवद्-स्वरूप हैं, उनकी अवज्ञा करना भगवद्-स्वरूपकी अवज्ञा ही है। इसलिये श्रीचैतन्यदेवकी अतुलनीय करुणाके अभिभूत होकर श्रीकविराज गोस्वामी जो वचन कह रहे हैं, उनका तात्पर्य यह है-“श्रीचैतन्यदेवकी अवज्ञा करके अन्य भगवद्-स्वरूपका भजन करनेपर भी लोग असुरोंमें गणित होते हैं॥” 12॥ श्रीगौर-नित्यानन्दके भजन-निमित्त सभीको कविराज गोस्वामीका आदेश सहित अनुरोध :- अतएव पुनः कहों उर्ध्वबाहु हञा। चैतन्य-नित्यानन्द भज कुतर्क छाड़िया॥ 13॥ अनुवाद-इसलिये मैं (कृष्णदास) भुजाओंको ऊपर उठाकर पुनः कहता हूँ कि सब कुतर्कोंको त्यागकर श्रीचैतन्य-नित्यानन्दका भजन करो॥ 13॥ अमृतानुकणिका-भगवान्‌के जितने गुण जीवके चित्तको आकृष्ट करते हैं, उनके मध्य करुणा ही जीवोंके पक्षमें सर्वश्रेष्ठ है। भगवान् रस-स्वरूप और रसिकशेखर होनेपर भी यदि वे करुणा करके उसकी उपलब्धि करनेकी योग्यता जीवको नहीं दें, तो जीवको क्या लाभ? करुणाकी अभिव्यक्ति जिस भगवद्-स्वरूपमें जितनी अधिक होती है, वह भगवद्-स्वरूप ही जीवके चित्तको उतना ही अधिक आकृष्ट करता है। यह करुणा श्रीगौर-नित्यानन्दमें सर्वापेक्षा अधिक रूपमें अभिव्यक्त होती है, इसलिये ग्रन्थकार कविराज गोस्वामी सभीको पुकारकर कह रहे हैं कि कुतर्कको छोड़कर तुम सब श्रीगौर-नित्यानन्दका भजन करो। परन्तु श्रीकृष्णका भजन त्यागकर श्रीगौर-नित्यानन्दका भजन करना इस पयारका अभिप्राय नहीं है। श्रीचैतन्य-नित्यानन्द प्रभु पुनः पुनः श्रीकृष्ण भजनका आदेश दे रहे हैं, इसलिये उनकी अवज्ञा करनेपर उनकी कृपा लाभ नहीं होगी। इस पयारका अभिप्राय यह है-श्रीगौर-नित्यानन्दके आदेशानुसार श्रीकृष्ण-भजनके साथ-साथ श्रीगौर- नित्यानन्दका भी भजन करना चाहिये॥ 13॥ प्रत्यक्ष और अनुमानवादी तार्किकोंको भी उपदेश :- यदि वा तार्किक कहे, - 'तर्क से प्रमाण। तर्कशास्त्रे सिद्ध येइ, सेइ सेव्यमान॥' 14॥ श्रीगौरकी दया समस्त दयाकी अपेक्षा अधिकतर चमत्कारी :- श्रीकृष्णचैतन्य-दया करह विचार। विचार करिले चित्ते पाबे चमत्कार॥ 15॥ अनुवाद-यदि कोई तार्किक कहे कि तर्क ही प्रमाण है (अर्थात् श्रीचैतन्य-श्रीनित्यानन्दके भजनकी क्या आवश्यकता है?) और तर्कशास्त्रसे जो सिद्ध हुए हैं, वे ही सेव्य हैं अर्थात् भजन करने योग्य हैं, (तो) श्रीकृष्णचैतन्यकी दयाका विचार करो। अच्छी प्रकारसे विचार करनेपर तुम्हारे चित्तमें चमत्कार होगा॥ 14-15॥ 6 | श्रीचैतन्यचरितामृत

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