भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 543

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अनुभाष्य—जगत्के लोग अपनी-अपनी भोगमयी सङ्कीर्ण बुद्धिके अनुसार दयाके एक आदर्शकी कल्पना करते हैं, परन्तु श्रीचैतन्यचन्द्रकी दया उनके विचारोंके अनुरूप नहीं है। तर्कशास्त्र पढ़कर लोगोंकी यह धारणा होती है कि तर्कके समान स्वरूप निर्धारण और सत्यके उद्घाटनमें समर्थवान और कोई वृत्ति नहीं है; इसलिये तर्कके हाथोंमें पड़कर जीवका तर्क ही उसके एकमात्र आश्रयदाता और पालकके स्थानपर अधिकार करता है। किन्तु जिस नींवके ऊपर तर्क प्रतिष्ठित है, उसकी सूक्ष्म आलोचना करनेपर बुद्धिमान् जीव ही यह समझ सकता है कि उसकी लौकिक ज्ञानेन्द्रियाँ भगवद्-विषयकी खोज करनेमें कितनी दुर्बल हैं, कहाँ तक अक्षम और अभावयुक्त हैं? तार्किक लोग अधिकतर 'असत्य' को ही तर्कसिद्ध 'सत्य' कहकर स्थिर करते हैं, इसलिये परिणाममें कुतर्कके फलसे उन्हें सियारादिकी योनियोंकी प्राप्ति होती है। तो भी जो लोग प्रधानरूपसे 'प्रत्यक्ष' और 'अनुमान' को नींव अथवा सहारा मानकर विषयके यथार्थ-निर्धारणके लिये प्रस्तुत हैं, उन लोगोंको भी कविराज गोस्वामी सम्बोधन करके कह रहे हैं कि जिनके पास दृष्टि है, विचार-शक्ति है, जिन्होंने सब प्रकारकी दयाके सम्पूर्ण चित्रको अनुभव किया है या देखनेका सामर्थ्य और सुयोग प्राप्त किया है, वे उन सब प्रकारकी दयाकी एक तालिका बना लें। तब उस तालिकामें लिखित सभी प्रकारकी दयाकी श्रीगौरहरिकी दयाके साथ तुलना करके देखेंगे, तो यह पायेंगे कि श्रीगौरहरि जैसी दया किसी भी सृष्ट-वस्तुमें अथवा सृष्टिकर्त्तामें अथवा अवतारोंमें और यहाँ तक अवतारी (श्रीकृष्ण) में भी नहीं है। उदार-विग्रह श्रीगौरहरिकी दया अवश्य ही सभीकी अपेक्षा अधिक विस्मय और चमत्कारिता हृदयमें लायेगी॥14-15॥


अपराध रहनेसे असंख्य बार श्रीकृष्णका श्रवण-कीर्तन वृथा :— बहु जन्म करे यदि श्रवण, कीर्त्तन। तबु त' ना पाय कृष्णपदे प्रेमधन ॥ 16 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥16॥ अमृतप्रवाह भाष्य—दस प्रकारके नामापराधोंसे युक्त व्यक्ति यद्यपि अनेक जन्मोंतक श्रवण-कीर्तन करे, तथापि उसे श्रीकृष्णके चरणोंमें प्रेमरूपी धनकी प्राप्ति नहीं होती है॥16॥ अनुभाष्य—श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंका आश्रय किये बिना यदि कोई व्यक्ति श्रवण-कीर्तनाख्या भक्तिका आश्रय करता है, तो भी अनेक जन्मोंमें उसे श्रीकृष्णप्रेम प्राप्तिकी सम्भावना नहीं है। श्रीचैतन्यचन्द्रकी शिक्षानुसार जो स्वयंको तिनकेसे भी अति-तुच्छ मानकर, वृक्षसे भी अधिक सहनशील, अपने सम्मानकी आशा न करके दूसरोंको यथायोग्य मान देते हुए किसी प्रकारका प्राकृत अभिमान नहीं रखते हैं, वे दस नामापराधोंसे मुक्त होकर सदा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेमें समर्थ होते हैं और प्रेम लाभ करते हैं। तात्पर्य यह है कि बद्धजीव श्रीकृष्णसेवासे विमुख हैं। जड़ेन्द्रियोंकी तृप्ति अथवा नश्वर स्वार्थकी सिद्धिके लिये श्रीकृष्णनामको जड़ेन्द्रियोंके द्वारा ग्रहण करने योग्य कोई विशेष वस्तु मानकर अथवा जड़ीय अक्षरके समान वाचक और वाच्यरूप श्रीकृष्णनाम और नामी श्रीकृष्णमें भेदबुद्धि रखते हुए स्वयंको श्रीनामप्रभुका नित्यदास ना जानकर असंख्य बार अपराधयुक्त नामादिका उच्चारण करनेपर भी वे शुद्ध-साधनभक्तिसे प्राप्त होनेवाले श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त नहीं कर पाते हैं। हःभःविः 11/527 में पद्मपुराणका श्लोक— “नामैकं यस्य वाचि स्मरणपथगतं श्रोतमूलं गतं वा, शुद्धं वाशुद्धवर्णं व्यवहितरहितं तारयत्यैव सत्यम्। तच्चेद्देहद्रविण-जनता-लोभ-पाषण्ड-मध्ये, निक्षिप्तं स्यान्न फलजनकं शीघ्रमेवात्र विप्र॥”

आठवाँ अध्याय | 7