श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 544, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/16-18 “हे विप्रवर ! एक हरिनाम भी जिसकी जिह्वापर उदित हो जाते हैं अथवा कर्णेन्द्रियमें प्रवेश करते हैं या स्मरण-पथपर जागरूक हो जाते हैं, उसका वे नाम (प्रभु) अवश्य ही उद्धार करेंगे। यहाँ नामोच्चारणमें वर्णोंकी शुद्धता, अशुद्धता अथवा विधिके अनुसार शुद्ध नामोच्चारण या अशुद्ध उच्चारण आदिका महत्त्व नहीं है, अर्थात् श्रीनाम इनका कुछ भी विचार नहीं करते, परन्तु विचारणीय यह है कि यदि वे सर्वशक्तिसम्पन्न नाम शरीर, गृह, अर्थ-सम्पत्ति, पुत्र-परिवार और लोभ (काञ्चन, कामिनी और प्रतिष्ठादि) आदि पाषाणके ऊपर पतित हों अर्थात् उनके उद्देश्यसे लिये जाँय, तो (श्रीकृष्ण-प्रेमरूपी) फल शीघ्र ही उत्पन्न नहीं होता। श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धु पूर्व विभाग-द्वितीय लहरीमें लिखा है— “अतः श्रीकृष्णनामादि न भवेद्ग्राह्यमिन्द्रियैः। सेवोन्मुखे हि जिह्वादौ स्वयमेव स्फुरत्यदः॥” “श्रीकृष्णनामादिको प्राकृत इन्द्रियों (जिह्वा-कान आदि) के द्वारा ग्रहण नहीं किया जा सकता। जब इन्द्रियाँ श्रीकृष्णकी सेवाके लिये उन्मुख होती हैं, तो नाम स्वतः ही जिह्वापर स्फुरित हो जाता है॥”16॥ श्रीकृष्णमें प्रेमभक्ति-सुदुर्लभा :- (भःरःसिः 1/1/36 में उद्धृत तन्त्रवचन) ज्ञानतः सुलभा मुक्तिर्भुक्तिर्यज्ञादिपुण्यतः। सेयं साधनसाहस्रैर्हरिभक्तिः सुदुर्ल्लभा ॥17॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥17॥ अमृतप्रवाह भाष्य—ज्ञानके प्रयासके द्वारा सहजमें मुक्ति होती है और यज्ञादि पुण्यकर्मोंके द्वारा स्वर्गके भोगादि सुलभ होते हैं, किन्तु सहस्र-सहस्र साधन करनेपर भी सहजमें हरिभक्ति प्राप्त नहीं होती। [इसका तात्पर्य यह है कि साधनके साथ और भी कुछ प्रक्रिया (शुद्धभक्तोंका दास्य और भक्त-भगवान्के साथ सम्बन्ध-ज्ञान) है, उसका अवलम्बन करनेसे हरिभक्ति प्राप्त होती है]॥17॥ अनुभाष्य—ज्ञानतः (स्वरूपज्ञानेन) [कर्मबन्धात्] मुक्तिः, यज्ञादिपुण्यतः (यज्ञेश्वर-सेवाजनित-सौभाग्येन) भुक्तिः सुलभा च। साधनसाहस्रैः (अन्याभिलाषितायुक्तैः कर्मज्ञानाद्यावृतैः प्रचुर-साधनैः) सा इयं हरिभक्तिः सुदुर्लभा। श्लोक भावानुवाद—स्वरूपज्ञानकी उपलब्धि होनेसे कर्मबन्धनसे मुक्ति, यज्ञेश्वरकी सेवा करनेके सौभाग्यसे भुक्ति (संसारके भोग) सुलभ हैं। परन्तु श्रीकृष्णसे इतर अभिलाषाओंसे युक्त, कर्म-ज्ञानसे आवृत प्रचुर साधन करनेपर भी यह हरिभक्ति सुदुर्लभ है॥17॥ जीवके भाव और रतिके पूर्व तक ही श्रीकृष्णका मुक्तिदान, रति देखनेपर प्रेमभक्तिदान :- कृष्ण यदि छुटे भक्ते भुक्ति मुक्ति दिया। कभु भक्ति ना देन राखेन लुकाइया॥18॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥18॥ अमृतप्रवाह भाष्य—भक्तगण यदि भुक्ति-मुक्तिकी आशा करते हैं, तो श्रीकृष्ण शुद्धभक्तितत्त्वको उनसे छिपाकर (अर्थात् उन्हें न देकर) उन्हें भुक्ति-मुक्ति देकर अपना छुटकारा पा लेते हैं॥18॥ अमृतानुकणिका—भक्त यदि श्रीकृष्णके द्वारा भुक्ति या मुक्ति पाकर सन्तुष्ट हो जाते हैं, अर्थात् वे यह मानते हैं कि उनकी मनोभीष्ट वस्तुकी उन्हें उपलब्धि हो गयी है, तो श्रीकृष्ण उन्हें अपनी प्रेमाभक्ति प्रदान नहीं करते। इसका कारण यह है कि जब तक हृदयमें भुक्ति-मुक्तिकी स्पृहा रहती है, तब तक वह हृदय भक्तिके आविर्भावकी योग्यता लाभ नहीं करता। श्रील रूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धु (पूर्वः 2/14) में कहा है— “भुक्तिमुक्तिस्पृहा यावत् पिशाची हृदि वर्तते। तावद्भक्तिसुखस्यात्र कथमभ्युदयो भवेत्॥” अर्थात् “भुक्ति (लौकिक भोग-सुख) और मुक्ति (ब्रह्मानन्द) को प्राप्त करनेकी स्पृहा पिशाची है, जब 8 | श्रीचैतन्यचरितामृत