भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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8/18-20 ] तक वह साधकके हृदयमें विद्यमान रहती है, तब तक उसमें विशुद्ध भक्तिका सुख भला कैसे उदित हो सकता है? अर्थात् भक्ति उस हृदयमें कभी भी उदित नहीं हो सकती।” जिनके हृदयमें भुक्ति-मुक्तिकी वासना नहीं है, वे भुक्ति-मुक्ति पाकर भी तृप्त नहीं होते, यहाँ तक कि श्रीकृष्ण स्वयं उन्हें भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने चाहें, तो वे उसे ग्रहण नहीं करते। ऐसे ही व्यक्ति प्रेमाभक्तिको प्राप्त करते हैं॥18॥ श्रीकृष्णके साथ रस-सम्बन्ध नहीं होने पर मुक्तिमात्र-लाभ :- (श्रीमद्भागवत 5/6/18) - राजन् पतिर्गुरुरलं भवतां यदूनां दैवं प्रियः कुलपतिः क्व च किङ्करो वः। अस्त्वेवमङ्ग भजतां भगवान् मुकुन्दो मुक्तिं ददाति कर्हिचित् स्म न भक्तियोगम्॥19॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥19॥ अमृतप्रवाह भाष्य-शुकदेव गोस्वामीने कहा-“हे राजन्! भगवान् श्रीकृष्णचन्द्र तुम्हारे (पाण्डवोंके) और यादवोंके सम्बन्धसे कभी पति, गुरु, देवता, प्रियबन्धु, कुलपति और कभी वे सेवक भी बन जाते हैं। [यहाँपर यह ज्ञातव्य है], मुकुन्द भजनशील लोगोंको सहजमें 'मुक्ति' तो प्रदान करते है, परन्तु भजनमें भक्तका किस प्रकारका निष्ठा-चातुर्य है, उसे देखकर ही वे उसे 'भक्तियोग' देते हैं॥19॥ अनुभाष्य-ऋषभदेवके चरित्र वर्णन प्रसङ्गमें शुकदेव गोस्वामी परिक्षित महाराजसे कह रहे हैं- हे राजन्! भगवान् मुकुन्दः (श्रीकृष्णः) भवतां (पाण्डवानां) यदूनां च पतिः (अधीश्वरः पालकः), गुरुः (उपदेष्टा), दैवं (उपास्यविग्रहः), प्रियः (आत्मा), कुलपतिः; क्व च (कदाचित् दौत्यादिषु) वः (युष्माकं पाण्डवानां) किङ्करः (आज्ञावहः) च। हे अङ्ग! एवम् अस्तु, [तथापि स भगवान्] भजतां (जनानां सकामभक्तेभ्य इति यावत्) मुक्तिं ददाति, कर्हिचित् (कदापि) [तेभ्यः] भक्तियोगं न ददाति स्म। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥19॥ किन्तु उदारविग्रह श्रीगौरसुन्दरकी महापापी तकको प्रेमभक्ति प्रदान-लीला :- हेन प्रेम श्रीचैतन्य दिला यथा तथा। जगाइ मधाइ पर्यन्त—अन्येर का कथा॥20॥ अनुवाद-किन्तु श्रीचैतन्य महाप्रभुने ऐसे सुदुर्लभ प्रेमको जहाँ-तहाँ प्रदान किया। औरोंकी तो बात ही क्या है, उन्होंने जगाइ-मधाइ तकको यह सुदुर्लभ प्रेम प्रदान किया॥20॥ अनुभाष्य-जगाइ और मधाइके जैसे अन्य पापी और दुष्चरित्र व्यक्ति भी श्रीगौरसुन्दरकी कृपा पाकर पापों और दुष्कृतियोंको पूर्णरूपसे त्यागकर कब श्रीकृष्णप्रेमको प्राप्त करेंगे?॥20॥ अमृताणुकणिका-बड़े-बड़े योगियों तथा ब्रह्मादि देवताओंके लिये परम दुर्लभ कृष्णप्रेमको महाप्रभुने जहाँ-तहाँ धनी-दरिद्र, पापी-पुण्यात्मा, बालक-वृद्ध, स्त्री-पुरुष, ब्राह्मण-चण्डाल, यवनादि सभीको बिना भेद-भावके प्रदान किया। नामापराध और वैष्णवापराध कृष्णप्रेम प्राप्तिमें बड़े बाधक हैं। जो सुदुराचारी होनेपर भी यदि निरपराधी हैं, उनके सभी पाप नामाभाससे ही दूर हो जाते हैं और उनका हृदय प्रेम लाभ करने योग्य हो जाता है। इस पयारमें निरपराध व्यक्तिको प्रेमदानकी बात कही गयी है। जगाइ-मधाइ, ये दोनों भाई नवद्वीपमें ब्राह्मण कुलमें उत्पन्न हुए थे, परन्तु दुःसङ्गके कारण सभी प्रकारके बुरे कर्मोंमें लिप्त थे। ऐसा कोई दुष्कर्म नहीं था जो इन्होंने नहीं किया अथवा कर नहीं सकते थे। वे सदा मदिरापान करके मत्त रहते थे। ये अति दुराचारी थे, परन्तु अपराधी नहीं थे। महाप्रभुके आदेशसे श्रीनित्यानन्द प्रभु और हरिदास ठाकुर घर-घर नाम प्रचारके लिये जाते थे और एक दिन इन दोनों भाइयोंके पास आये और उनसे कृष्णनाम करनेके लिये कहा। मदिरापानसे मत्त दोनों भाइयोंने उनपर क्रोध प्रकाश करते हुए मधाइने श्रीनित्यानन्द प्रभुके माथेपर आठवाँ अध्याय | 9