भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 546

[ 8/20-24 मदिराकी मटकीसे प्रहार किया। यह समाचार पाते ही महाप्रभु तुरन्त वहाँ आये और अपने ऐश्वर्यका प्रकाश करते हुए अपने चक्रका आह्वान करने लगे, किन्तु श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुसे उन्हें क्षमा करनेकी प्रार्थना करने लगे। इस प्रकार श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा प्रहार सहनकर क्रोधके अभाव और क्षमाशीलता एवं करुणाके गुणोंको देखकर जगाइ-मधाइका हृदय विगलित हो गया तथा तीव्र अनुतापकी ज्वालासे उनका हृदय दग्ध हो गया। महाप्रभुके ऐश्वर्यको देखकर वे कातर होकर कृपाकी याचना करने लगे। महाप्रभुने कृपा परवश होकर उनके हृदयके सभी कल्मषको धोकर उन्हें प्रेमदान करके कृतार्थ किया॥20॥ स्वतन्त्र ईश्वर प्रेम-निगूढ़-भाण्डार। बिलाइल यारे तारे, ना कैल विचार॥21॥ श्रीगौर-निताइकी सेवासे ही श्रीकृष्णप्रेमोदय :- अद्यापिह देख चैतन्य-नाम येइ लय। कृष्णप्रेमे पुलकाश्रु-विह्वल से हय॥22॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर और निगूढ़-प्रेमके भण्डार हैं। इसलिये कोई विचार किये बिना उन्होंने (पात्र-अपात्र सभीको) इस प्रेम-भक्तिका वितरण किया। (श्रीगौरसुन्दरकी कृपा ऐसी विशेष है कि) अभी भी जो श्रीचैतन्य महाप्रभुका नाम लेते हैं, वे श्रीकृष्णप्रेममें विह्वल हो जाते हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रु बहने लगते हैं तथा शरीरमें पुलक हो जाता है॥21-22॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचैतन्य-अवतारका एक विशेष आश्चर्य विषय यह है कि जो कोई उनके समीप जायेगा, पात्र-अपात्रका विचार किये बिना वे निगूढ़-प्रेमका भण्डार उसे दे देंगे, क्योंकि वे स्वतन्त्र ईश्वर हैं। और भी देखें, श्रीचैतन्यचन्द्र जगद्गुरुके रूपमें अवतीर्ण हुए हैं। कोई अपराधी हो अथवा निरपराधी, 'हे गौराङ्ग! हे कृष्णचैतन्य!' कहकर जो उनके शरणागत होकर उनको पुकारता है, तो श्रीकृष्णप्रेमके पुलक-अश्रु आदि सात्त्विक विकारोंके उदित होनेसे वह विह्वल हो जाता है॥21-22॥ नित्यानन्द बलिते हय कृष्णप्रेमोदय। आउलाय सकल अङ्ग, अश्रु-गङ्गा बय॥23॥ अनुवाद-श्रीनित्यानन्द प्रभुका नाम लेने मात्रसे व्यक्तिमें श्रीकृष्णप्रेमका उदय होता है और उसके अङ्गोंमें रोमाञ्च तथा नेत्रोंसे गङ्गाकी भाँति अश्रुओंकी धारा प्रवाहित होने लगती है॥23॥ अपराध रहनेपर मुक्तकुलके उपास्य श्रीकृष्णनामक उदयका अभाव :- 'कृष्णनाम' करे अपराधेर विचार। कृष्ण बलिले अपराधीर ना हय विकार॥24॥ अनुवाद-'श्रीकृष्णनाम' प्रभु अपराधोंका विचार करते हैं और अपराधी व्यक्तिको नामका वास्तविक फल 'प्रेम' प्राप्त नहीं होता। इसलिये श्रीकृष्ण नामका उच्चारण करनेसे अपराधी व्यक्तिमें कोई विकार उत्पन्न नहीं होते॥24॥ अमृतप्रवाह भाष्य-पद्मपुराणमें दस नामापराध- (1) सतां निन्दा (नाम प्रचार करनेवाले नामपरायण सन्तोंकी निन्दा) (2) श्रीविष्णुसकाशात् शिवनामादेः स्वातन्त्र्यमननम् (शिवादि देवताओंको विष्णुके समान अथवा उनसे स्वतन्त्र ईश्वर मानना) (3) गुर्वज्ञा (गुरुकी अवज्ञा) (4) श्रुति-तदनुयायिशास्त्रनिन्दा (श्रुतियों और उनके अनुगत शास्त्रोंकी निन्दा करना) (5) हरिनाम-महिम्नि अर्थवादमात्रमेतदिति मननम् (हरिनामकी महिमा केवल अर्थवाद है, ऐसा मानना) (6) तत्र प्रकारान्तरेणार्थकल्पनम् (अथवा भगवन्नामोंको काल्पनिक समझना) (7) नामबलेन पापप्रवृत्तिः (नामके बलपर पाप करनेकी प्रवृत्ति) 10 | श्रीचैतन्यचरितामृत