श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 547, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें8/24 ] (8) अन्यशुभक्रियाभिर्नाम्नां साम्यमननम् (धर्म, व्रत, त्याग, होमादि प्राकृत शुभ कर्मोंको अप्राकृत भगवन्नामके समान समझना) (9) अश्रद्धाने विमुखे च नामोपदेशः (अश्रद्धालु और नाम-श्रवण करनेसे विमुख मनुष्यको नामका उपदेश देना) (10) श्रुतेऽपि नाम्नां माहात्म्ये तत्राप्रीतिर्हि (नामकी अद्भुत महिमा सुनकर भी शरीरमें 'मैं' और सांसारिक भोग्य वस्तुओंमें 'मेरा' की बुद्धि रखकर श्रीनामोच्चारणमें प्रीति नहीं दिखाना)। (विस्तृत व्याख्या अनुभाष्यमें द्रष्टव्य है)। इन दस अपराधोंके रहनेपर श्रीकृष्ण कृपा नहीं करते। अपराधी व्यक्तिके श्रीकृष्णनामसे वास्तविक सात्त्विक विकारादि नहीं होते ॥24॥ अनुभाष्य—दस नामापराध-सम्बन्धमें मूल श्लोक— (1) “सतां निन्दा नाम्नः परमपराधं वितनुते। यतः ख्यातिं यातं कथमुसहते तद्विगर्हाम्॥ (2) शिवस्य श्रीविष्णोर्य इह गुणनामादि-सकलं। धिया भिन्नं पश्येत् स खलु हरिनामाहितकरः॥ (3) गुरोरवज्ञा (4) श्रुतिशास्त्रनिन्दनं (5) तथार्थवादो (6) हरिनाम्नि कल्पनम्। (7) नाम्नो बलाद् यस्य हि पापबुद्धिर्न विद्यते तस्य यमैर्हि शुद्धिः॥ (8) धर्म-व्रत-त्याग-हुतादि-सर्वशुभक्रिया-साम्यमपि प्रमादः। (9) अश्रद्दधाने विमुखेऽप्य शृण्वति यश्चोपदेशः शिवनामापराधः॥ (10) श्रुतेऽपि नाममाहात्म्ये यः प्रीतिरहितो नरः। अहंममादि परमो नाम्नि सोऽप्यपराधकृत्॥” दस प्रकारके नामापराधोंकी व्याख्या— (1) साधुवर्गकी निन्दा नामके प्रति परम अपराध विस्तार करती है। जिन सब नाम-परायण साधुओंके द्वारा जगत्में श्रीकृष्णनाम प्रसिद्धि लाभ करता है (अर्थात् प्रचारित होता है), श्रीनामप्रभु उन सब साधुओंकी निन्दा कैसे सहन कर सकते हैं? इसलिये साधु-निन्दा नामापराध है। (2) इस संसारमें जो व्यक्ति प्राकृत वस्तुओंकी भाँति मङ्गलमय श्रीविष्णुके नाम, रूप, गुण और लीलादिको नामी श्रीविष्णुसे पृथक् मानते हैं; अथवा शिवादि देवताओंको उनके प्रतिद्वन्द्वीके रूपमें श्रीविष्णुसे स्वतन्त्र या अभिन्न देखते हैं, उनका वह नामके छलसे नामापराध निश्चय ही अहितकर है। (3) नाम-तत्त्वविद् गुरुको मरणशील और पञ्चभौतिक शरीरयुक्त साधारण मनुष्य मानकर उनकी अवज्ञा अथवा उनसे ईर्ष्या करना। (4) वेद और सात्वत-पुराणादिकी निन्दा करना। (5) हरिनामकी महिमाको अति-स्तुति समझना। (6) भगवान्के नामोंको काल्पनिक समझना नामापराध है। (7) जिनकी नामके बलपर पापाचरणमें बुद्धि होती है, उनकी अनेक यम, नियम, ध्यान, धारणादि कृत्रिम योग-प्रक्रियाओंके द्वारा भी शुद्धि नहीं होती—यह निश्चित है। (8) धर्म, व्रत, त्याग, होमादि प्राकृत शुभ कर्मोंके साथ अप्राकृत नाम-ग्रहणको समान या तुल्य समझना भी प्रमाद या असावधानी है—यह भी नामापराध है। (9) श्रद्धाहीन और नाम-श्रवणसे विमुख व्यक्तिको नामका उपदेश देना भी मङ्गलमय श्रीनामके प्रति नामापराध है। (10) नामकी अद्भुत महिमाको सुनकर भी जो [रक्त, मांस और चमड़ेके] शरीरमें 'मैं' और [सांसारिक भोग्य पदार्थोंमें] 'मेरा' की बुद्धि रखते हैं तथा नाम-ग्रहण-श्रवणमें प्रीति अथवा आदर नहीं दिखलाते हैं, वे भी नामापराधी हैं॥24॥ अमृताणुकणिका—यदि कोई हरिनाम करता है और उसने दीक्षा भी ग्रहण की है, परन्तु इन दस प्रकारके भयङ्कर अपराधोंसे बचनेकी चेष्टा नहीं करता है, तो अग्निमें भस्म डालनेके समान उसका भजन नष्ट हो जायेगा। यहाँ कुछ नामापराधोंके कारणोंकी आलोचना आठवाँ अध्याय | 11