श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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की जा रही है। दस नामापराधोंमें पहला अपराध साधु-निन्दा है। इससे बचनेका बड़ी सावधानीसे प्रयास करना चाहिये। कनिष्ठ वैष्णवसे लेकर उत्तम वैष्णव तक किसीकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। दूसरा नामापराध शिवजीको विष्णुसे स्वतन्त्र भगवद्-ज्ञान करके उनका नाम करना है। वैष्णव लोग इससे तो थोड़ी सी सावधानीसे बच सकते हैं। तीसरा नाममापराध गुरुकी अवज्ञा है—यहाँ गुरुकी निन्दा नहीं कहा गया है, क्योंकि साधारण व्यक्ति भी गुरुकी निन्दा नहीं करता या उनपर प्रहार नहीं करता, किन्तु गुरुकी अवज्ञा कर सकता है। गुरु अवज्ञाका कारण गुरुमें मर्त्यबुद्धि रखकर ऐसा विचार करना है कि उनके समस्त आदेश पालनीय नहीं हैं, केवल कुछ ही आदेश पालनीय हैं। कुछ शिष्य ऐसा विचार रखते हैं कि गुरुजीने जब गृहस्थ जीवनको तो स्वीकार किया नहीं है, तब उन्हें इस विषयमें क्या ज्ञान हो सकता है? इसलिये गुरुके पारमार्थिक उपदेश तो माननेके योग्य हैं, परन्तु लौकिक सम्बन्धी उपदेश माननेके लिये हम बाध्य नहीं हैं। यह अर्द्ध-कुकुटि न्याय है और महापराध है। कुछ शिष्य यह संशय भी करते हैं कि क्या गुरुजीने सब शास्त्र पढ़े हैं अथवा नहीं? ये भी हमारे समान खाते-पीते-सोते हैं, तो किस विषयमें ये हमसे श्रेष्ठ हैं? केवल हमसे आयुमें बड़े हैं और बुढ़ापेमें तो बुद्धि मन्द हो जाती है। इसलिये गुरुके चरणोंकी अवज्ञाकी बहुत सम्भावना है। पुनः पुनः करनेपर यह अपराध वज्रसार हो जाता है और प्रायश्चित करनेसे भी दूर नहीं होता है। हरिनामकी महिमाको अति-स्तुति समझना पाँचवाँ नामापराध है। शास्त्रोंमें जो नामकी महिमा बतलायी गयी है, उसपर विश्वास नहीं होता। सभी अनर्थोंसे पूर्ण महापापी अजामिलने अपने पुत्रके उद्देश्यसे सङ्केतसे अनजानेमें हरिनाम किया और सभी पापोंसे मुक्त हो गया—यह शास्त्रोंमें नामकी महिमा बहुत कम लिखी गयी है। स्कन्दपुराणमें कहा गया है—
“मधुर-मधुरमेतन्मङ्गलं मङ्गलानां सकलनिगमवल्ली-सत्फलं चित्स्वरूपम्। सकृदपि परिगीतं श्रद्धया हेलया वा भृगुवर नरमात्रं तारयेत् कृष्णनाम॥” “हरिनाम सब प्रकारके मङ्गलोंमें श्रेष्ठ मङ्गल-स्वरूप है, मधुरसे भी सुमधुर है। वह निखिल श्रुति-लताओंका चिन्मय सुपक्वफल है। हे भार्गवश्रेष्ठ! श्रद्धासे हो अथवा अवहेलनासे, मनुष्य यदि स्पष्ट रूपसे एकबार भी निरपराध होकर “कृष्ण” नामका उच्चारण करे, तो वह नाम उसी समय मनुष्यको तार देता है।” इसलिये शास्त्रमें नामकी महिमा जो कुछ बतलायी गयी है, वह थोड़ी बतलायी गयी है, अधिक नहीं। जो ऐसा नहीं समझकर कहते हैं कि नामकी महिमा इतनी नहीं है, परन्तु यदि शुद्धनाम करें तो मुक्ति हो जायेगी अथवा नामाभाससे भी मुक्ति हो जायेगी, वे नामापराधी हैं। एक साँपके मन्त्रको जाननेवालेपर लोगोंको विश्वास हो जाता है, क्योंकि उसका प्रभाव शीघ्र ही दिखायी देता है। परन्तु नामजपका प्रभाव सहज ही दिखायी नहीं देता, इसलिये यह नामापराध होनेकी सम्भावना अधिक है। छठा नामापराध हरिनामको काल्पनिक समझना है। भगवान्का रूप ही नहीं है, वे निराकार हैं, तो उनके नाम कृष्ण आदि भी काल्पनिक हैं—ऐसा यदि कोई विचारकर नाम करता है, तो वह नामापराध करता है। प्राकृत शुभ कर्मोंके समान ही नामको मानना आठवाँ नामापराध है और अधिकांश लोग ऐसा ही मानते हैं। वे भूत-पिशाच-तावीज़ आदिमें विश्वास रखते हैं, परन्तु भगवान्के नाममें उनका विश्वास नहीं है। वे नहीं जानते हैं कि जहाँ भगवद्-नाम होता है, वहाँ कोसों दूर तक भूत-पिशाच नहीं आ सकते। इसलिये गुरु-पदाश्रय करके इस अपराधसे बचना चाहिये। अन्य नामापराधोंसे तो बच सकते हैं, परन्तु देहात्मबुद्धि रखते हुए नाम करना—इस दसवें नामापराधसे बचना सबसे कठिन है। बद्धजीवमें देहात्मबुद्धि होती है और वह स्वयंको शरीर मानता है। परन्तु श्रीकृष्णने
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