श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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की जा रही है। दस नामापराधोंमें पहला अपराध साधु-निन्दा है। इससे बचनेका बड़ी सावधानीसे प्रयास करना चाहिये। कनिष्ठ वैष्णवसे लेकर उत्तम वैष्णव तक किसीकी भी निन्दा नहीं करनी चाहिये। दूसरा नामापराध शिवजीको विष्णुसे स्वतन्त्र भगवद्-ज्ञान करके उनका नाम करना है। वैष्णव लोग इससे तो थोड़ी सी सावधानीसे बच सकते हैं। तीसरा नाममापराध गुरुकी अवज्ञा है—यहाँ गुरुकी निन्दा नहीं कहा गया है, क्योंकि साधारण व्यक्ति भी गुरुकी निन्दा नहीं करता या उनपर प्रहार नहीं करता, किन्तु गुरुकी अवज्ञा कर सकता है। गुरु अवज्ञाका कारण गुरुमें मर्त्यबुद्धि रखकर ऐसा विचार करना है कि उनके समस्त आदेश पालनीय नहीं हैं, केवल कुछ ही आदेश पालनीय हैं। कुछ शिष्य ऐसा विचार रखते हैं कि गुरुजीने जब गृहस्थ जीवनको तो स्वीकार किया नहीं है, तब उन्हें इस विषयमें क्या ज्ञान हो सकता है? इसलिये गुरुके पारमार्थिक उपदेश तो माननेके योग्य हैं, परन्तु लौकिक सम्बन्धी उपदेश माननेके लिये हम बाध्य नहीं हैं। यह अर्द्ध-कुकुटि न्याय है और महापराध है। कुछ शिष्य यह संशय भी करते हैं कि क्या गुरुजीने सब शास्त्र पढ़े हैं अथवा नहीं? ये भी हमारे समान खाते-पीते-सोते हैं, तो किस विषयमें ये हमसे श्रेष्ठ हैं? केवल हमसे आयुमें बड़े हैं और बुढ़ापेमें तो बुद्धि मन्द हो जाती है। इसलिये गुरुके चरणोंकी अवज्ञाकी बहुत सम्भावना है। पुनः पुनः करनेपर यह अपराध वज्रसार हो जाता है और प्रायश्चित करनेसे भी दूर नहीं होता है। हरिनामकी महिमाको अति-स्तुति समझना पाँचवाँ नामापराध है। शास्त्रोंमें जो नामकी महिमा बतलायी गयी है, उसपर विश्वास नहीं होता। सभी अनर्थोंसे पूर्ण महापापी अजामिलने अपने पुत्रके उद्देश्यसे सङ्केतसे अनजानेमें हरिनाम किया और सभी पापोंसे मुक्त हो गया—यह शास्त्रोंमें नामकी महिमा बहुत कम लिखी गयी है। स्कन्दपुराणमें कहा गया है—
“मधुर-मधुरमेतन्मङ्गलं मङ्गलानां सकलनिगमवल्ली-सत्फलं चित्स्वरूपम्। सकृदपि परिगीतं श्रद्धया हेलया वा भृगुवर नरमात्रं तारयेत् कृष्णनाम॥” “हरिनाम सब प्रकारके मङ्गलोंमें श्रेष्ठ मङ्गल-स्वरूप है, मधुरसे भी सुमधुर है। वह निखिल श्रुति-लताओंका चिन्मय सुपक्वफल है। हे भार्गवश्रेष्ठ! श्रद्धासे हो अथवा अवहेलनासे, मनुष्य यदि स्पष्ट रूपसे एकबार भी निरपराध होकर “कृष्ण” नामका उच्चारण करे, तो वह नाम उसी समय मनुष्यको तार देता है।” इसलिये शास्त्रमें नामकी महिमा जो कुछ बतलायी गयी है, वह थोड़ी बतलायी गयी है, अधिक नहीं। जो ऐसा नहीं समझकर कहते हैं कि नामकी महिमा इतनी नहीं है, परन्तु यदि शुद्धनाम करें तो मुक्ति हो जायेगी अथवा नामाभाससे भी मुक्ति हो जायेगी, वे नामापराधी हैं। एक साँपके मन्त्रको जाननेवालेपर लोगोंको विश्वास हो जाता है, क्योंकि उसका प्रभाव शीघ्र ही दिखायी देता है। परन्तु नामजपका प्रभाव सहज ही दिखायी नहीं देता, इसलिये यह नामापराध होनेकी सम्भावना अधिक है। छठा नामापराध हरिनामको काल्पनिक समझना है। भगवान्का रूप ही नहीं है, वे निराकार हैं, तो उनके नाम कृष्ण आदि भी काल्पनिक हैं—ऐसा यदि कोई विचारकर नाम करता है, तो वह नामापराध करता है। प्राकृत शुभ कर्मोंके समान ही नामको मानना आठवाँ नामापराध है और अधिकांश लोग ऐसा ही मानते हैं। वे भूत-पिशाच-तावीज़ आदिमें विश्वास रखते हैं, परन्तु भगवान्के नाममें उनका विश्वास नहीं है। वे नहीं जानते हैं कि जहाँ भगवद्-नाम होता है, वहाँ कोसों दूर तक भूत-पिशाच नहीं आ सकते। इसलिये गुरु-पदाश्रय करके इस अपराधसे बचना चाहिये। अन्य नामापराधोंसे तो बच सकते हैं, परन्तु देहात्मबुद्धि रखते हुए नाम करना—इस दसवें नामापराधसे बचना सबसे कठिन है। बद्धजीवमें देहात्मबुद्धि होती है और वह स्वयंको शरीर मानता है। परन्तु श्रीकृष्णने
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गीता-भागवतमें कहा है कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं और उसे ही गुरु एवं अन्य शास्त्र भी कह रहे हैं, तो इसमें विश्वास रखना चाहिये। जब माँ जिसे हमारा पिता बतलाती है और हम उसके वचनोंपर विश्वासकर उसे अपना पिता मान लेते हैं, तब भगवान् और गुरुके वचनोंपर विश्वास क्यों नहीं होता? भगवान् और गुरुके वचनोंपर विश्वास करके इन दस प्रकारके नामापराधोंसे बचना चाहिये॥24॥ अपराधीके पाषाण-हृदयमें भाव शुद्ध नहीं, कृत्रिममात्र :- (श्रीमद्भागवत-2/3/24)— तदश्मसारं हृदयं वतेदं, यद्गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः। न विक्रियेताथ यदा विकारो, नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः॥25॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥25॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हरिनाम ग्रहण करनेपर भी जिनके हृदयमें विकार, नेत्रोंमें अश्रु और शरीरमें रोमाञ्च नहीं होता, उनका हृदय पाषाणके समान अर्थात् कठोर अपराधके द्वारा उनका हृदय कठोर होता है, इसलिये नामग्रहणसे भी वह द्रवीभूत नहीं होता॥25॥ अनुभाष्य-श्रीसूत गोस्वामीके मुखसे श्रीशुक- परीक्षित-संवाद श्रवण करते-करते ऋषियोंके द्वारा और अधिक श्रवण करनेकी अभिलाषा प्रकट करनेपर हरिकथा श्रवणसे विमुख लोगोंकी निन्दाके प्रसङ्गमें श्रीसूत गोस्वामीको सम्बोधित शौनक-वाक्य,— यत् हृदयं गृह्यमाणैः (कीर्त्त्यमानैरपि) हरिनामधेयैः न विक्रियेत, बत (अहो!) तत् इदं हृदयं अश्मसारं (नामापराधवशात् अश्मवत् पाषाणखण्डतुल्यः सारो यस्य तत्, कठिनमेव)। अथ यदा विकारो भवति, [तदा] नेत्रे जलं (अश्रु) गात्ररुहेषु हर्षः (रोमाञ्चः) भवति। (अतिगम्भीराणां महाभागवतानां हरिनामभिः चित्तद्रवेऽपि बहिरश्रुपुलकादीनाम् अदर्शनात् कृत्रिमाभ्यासानुकार पराणां पिच्छिलचित्तानां जड़ीय-प्रतिष्ठाभिलाषिणां सत्त्वाभासाद्भावेऽपि बहिः कपटाश्रुपुलकदयो दृश्यन्ते। अतएव बहुनामग्रहणेऽपि कनिष्ठाधिकारिणां विषयभोगप्रवणत्वात् कृत्रिमचित्तद्रवभावो नामापराध-लिङ्गमेवेति सन्दर्भः)। श्लोक भावानुवाद—(नामापराधके कारण) जिस हृदयमें हरिनाम लेनेपर भी विकार नहीं होता, वह पाषाणके समान कठोर ही है। हृदय जब पिघल जाता है, तब नेत्रोंसे अश्रुधारा बहती है और रोमावली आनन्दसे पुलकित होती है। (अति गम्भीर महाभागवतोंमें हरिनाम ग्रहण करनेसे चित्त द्रवित होनेपर भी बाहर अश्रु-पुलकादि नहीं दिखायी देते। कृत्रिम अभ्यास करके उनका अनुकरण करनेवाले कठोर हृदयवाले व्यक्तियोंमें सत्त्वाभास न होनेपर भी केवल जड़-प्रतिष्ठाके लिये बाहर कपट अश्रु-पुलकादि दिखलायी देते हैं। इसलिये बहुत नाम करनेपर भी कनिष्ठ अधिकारीके द्वारा विषय भोगोंमें लिप्त होनेके कारण चित्तके द्रवित होनेके कृत्रिम विकार प्रदर्शन करना नामापराध ही है)। श्रीमद्भागवतके इस श्लोकके गौड़ीय भाष्यमें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकी टीका, तथ्य और विवृति द्रष्टव्य है॥25॥ अमृतानुकणिका—शौनक ऋषि हरिकथा श्रवण-कीर्तन और हरिसेवाकी श्रेष्ठता प्रतिपादनके प्रसङ्गमें हरिभजनहीन व्यक्तियोंके बाह्य अङ्गसमूहकी निन्दा करके अब उनके अन्तःकरणकी भी निन्दा कर रहे हैं। अनर्थमुक्त पुरुषको नाम ग्रहणमात्रसे ही नाम माधुर्य अनुभव होता है, इसलिये नाम-माधुर्य अनुभवके साथ-साथ हृदयमें विकार और उसके भीतरी लक्षण क्षान्ति आदि तथा बाह्य लक्षण अश्रु-पुलकादि प्रकाशित होते हैं। अनेक बार हरिनाम ग्रहण करनेपर भी यदि किसीका हृदय द्रवीभूत नहीं होता, तब निश्चय ही वह व्यक्ति नामापराधी है। सर्वशक्तिमान् नाम देह-गृह-परिवार-लोभ आदिमें आसक्त पाषाण-सम चित्तमें शीघ्र फलजनक नहीं होते। इन सब प्रतिबन्धकोंके द्वारा हृदय विकार निरस्त हो जाते हैं। सामान्यमात्र प्रतिबन्धक रहनेपर उच्चारित नाम नामाभास होता है। किन्तु बृहत् प्रतिबन्धक रहनेपर उच्चारित नामाक्षर नामापराध मात्र है। नामापराधीका हृदय लोहेके
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[ 8/25-28 समान कठोर है, इसलिये हरिनाम श्रवण-कीर्तन करनेपर भी वह द्रवीभूत नहीं होता। यद्यपि हरिनामसे चित्तद्रवताके बाह्य लक्षण अश्रु-पुलक हैं, तथापि ये अश्रु-पुलक सब समय चित्तद्रवताके लक्षण हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्रीरूप गोस्वामीने कहा है कि कुछ लोग ऐसे भावुक होते हैं कि उनकी आँखोंमें सहज ही अश्रु आ जाते हैं। वे सामान्य थोड़ासा सुख या दुःखका कारण उपस्थित होनेपर अधीर हो जाते हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रु बहने लगते हैं। इस प्रकारके अश्रु बहना उनका हृदय-दौर्बल्यके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। कोई-कोई अन्य भावुक व्यक्ति प्रतिष्ठा पानेके लोभसे कृत्रिम अभ्यासके द्वारा अश्रु-पुलक दिखलाते हैं। इसलिये अश्रु-पुलक ही सदा भावावस्थाके लक्षण हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अधिकतर देखा जाता है कि अति गम्भीर महानुभाव भक्तका चित्त कीर्तनादिके द्वारा द्रवीभूत होनेपर भी उनमें बाहरसे अश्रु-पुलकादि प्रकाशित नहीं होते। इसलिये बाहरसे अश्रु-पुलकादि होनेपर भी जो हृदय विगलित नहीं होता, वही पाषाणके समान कठोर है—यही अश्मसार-शब्दका अर्थ है। श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धुमें कहा है कि जिनके हृदयमें भावका अङ्कुरमात्र भी उदित हुआ है, उन सभी पुरुषोंमें जो लक्षण देखे जाते हैं, वे इस प्रकार हैं— भक्तिभावके द्वारा हृदय द्रवित होनेपर बहिर्क्रियाके स्वरूप अश्रु-पुलकादि उदित होनेपर उसे सात्त्विक विकार कहते हैं। हृदय विकारका ऐसा साधारण लक्षण होनेपर भी कुछ असाधारण लक्षण भी हैं—क्षान्ति, अव्यर्थकालत्व, विरक्ति, मानशून्यता, आशाबन्ध, समुत्कण्ठा, नामगानमें सदा रुचि, भगवत्-गुणकीर्त्तनमें आसक्ति और वृन्दावनदि भगवत्-धामोंमें वास करनेमें प्रीति— भावभक्तिके ये नौ यथार्थ लक्षण हैं। निरपराधी भक्तजन नामसङ्कीर्त्तन करनेसे ही अपने हृदयमें नामका प्रभाव अनुभव करते हैं और नामके आस्वादनमें विभोर हो जाते हैं। उस अनुभवके कार्यस्वरूप हृदय द्रवित हो जाता है, जिससे उक्त लक्षण प्रकटित होते हैं। किन्तु जो अपराधी, परश्रीकातर (दूसरोंके सम्पन्न होनेपर ईर्ष्यालु) होते हैं, बहुत नाम करनेपर भी नामकी अप्रसन्नतासे उनका चित्त भक्तिभावसे द्रवित नहीं होता। बाहरसे अश्रु-पुलकादि देखे जानेपर भी हृदय लोहेके समान कठिन होनेके कारण, इस श्लोकमें उनकी निन्दा की गयी है। साधुसङ्गके प्रभावसे निरन्तर नाम ग्रहण करनेसे चित्त द्रवित होनेपर उनके हृदयका काठिन्य दूर हो सकता है॥25॥ स्वप्रकाश नामप्रभुका जिह्वापर उदित होकर श्रीकृष्णप्रेम-प्रदान :- एक ‘कृष्णनामे’ करे सर्वपाप नाश। प्रेमेर कारण भक्ति करेन प्रकाश॥26॥ अनुवाद—एक (अपराधरहित) श्रीकृष्णनाम सभी पापोंका नाश करके प्रेम उत्पन्न करानेवाली (साधन) भक्तिको प्रकाशित करता है॥26॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमको उदय करानेवाली जो साधनभक्ति है, उसे प्रकाशित करता है॥26॥ शुद्धनामका फल श्रीकृष्णप्रेमके लक्षण :- प्रेमेर उदये हय प्रेमेर विकार। स्वेद-कम्प-पुलकादि गद्गदाश्रुधार॥27॥ अनायासे भवक्षय, कृष्णेर सेवन। एक कृष्णनामेर फले पाइ एत धन॥28॥ अनुवाद—(साधकमें) प्रेम उदय होनेसे शरीरमें स्वेद (पसीना), कम्प और पुलकादि, गला रुद्ध होना तथा नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होना—ये प्रेमके विकार उत्पन्न होते हैं। अनायास ही उसका भवबन्धन कट जाता है और उसे श्रीकृष्ण-सेवाकी प्राप्ति होती है। एक श्रीकृष्णनामसे उसे इतनी विशाल धनराशिकी प्राप्ति होती है॥27-28॥ अमृतानुकणिका—कृष्ण सम्बन्धी किसी भावके द्वारा जब चित्त साक्षात् रूपमें अथवा कुछ व्यवधानके साथ 14 | श्रीचैतन्यचरितामृत
२. मध्य-लीला (पूर्वार्ध): जगन्नाथ पुरी आगमन, सार्वभौम उद्धार व दक्षिण यात्रा
8/27-31 ] विभावित होता है, तब उसी चित्तको 'सत्त्व' कहते हैं। इस सत्त्वसे जो भावसमूह पैदा होते हैं, उन्हें सात्त्विकभाव कहते हैं। स्तम्भ (जड़ता या निश्चलता), स्वेद (पसीना), रोमाञ्च (रोमावलीका खड़ा होना), स्वरभेद (स्वरकी विकृति, गद्गद् वाणी), वेपथु (कम्प), वैवर्ण (विषाद, भय और क्रोध आदिके द्वारा शरीरके ऊपर जो वर्ण विकार होता है, जैसे-मलिनता, कृशता आदि), अश्रु और प्रलय (मूर्च्छा)-ये आठ सात्त्विक विकार हैं। प्राण किसी अवस्थामें दूसरे चार भूतों (भूमि, जल, तेज और आकाश) के साथ पञ्चम भूतके रूपमें अवस्थित रहता है और कभी-कभी स्वप्रधान होकर अर्थात् वायु प्रधान होकर जीवके शरीरमें विचरण करता है। जिस समय वह भूमिस्थ होता है, तब स्तम्भ (जड़ता) लक्षित होता है, जलाश्रित होनेपर अश्रु, तेजस्थ होनेपर वैवर्ण एवं स्वेद या पसीना लक्षित होता है। जब वह आकाशाश्रित होता है, तब प्रलय या मूर्च्छा होती है तथा जब वह स्वप्रधान (वायुके आश्रित) होता है, तब मन्द, मध्य, तीव्र भेदसे रोमाञ्च, कम्प और स्वरभेद विकारसमूह प्रकाशित होते हैं। सूर्योदयके साथ ही अन्धकार जैसे स्वतः ही दूर हो जाता है, उसी प्रकार प्रेमाभक्तिके आविर्भावसे संसार बन्धनका स्वतः ही नाश हो जाता है॥27-28॥ नामापराधीका असंख्य बार श्रवण-कीर्तन निरर्थक :- हेन कृष्णनाम यदि लय बहुबार। तबु यदि प्रेम নহে, নহে अश्रुधार ॥ 29 ॥ तबे जानि, अपराध ताहाते प्रचुर। कृष्णनाम-बीज ताहे ना करे अङ्कुर ॥ 30 ॥ अनुवाद-ऐसे श्रीकृष्णनामको अनेक बार लेनेपर भी यदि किसी व्यक्तिको प्रेमकी प्राप्ति नहीं होती और उसके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित नहीं होती, तब यह समझ लेना चाहिये कि उसमें अपराध प्रचुर मात्रामें हैं, जिसके कारण उसके हृदयमें श्रीकृष्णनामरूपी बीज अङ्कुरित नहीं हो रहा है॥29-30॥ श्रीगौर-निताइ या उनके नाममें अपराधका विचार नहीं है :- चैतन्य-नित्यानन्दे नाहि एसब विचार। नाम लैते प्रेम देन, बहे अश्रुधार ॥ 31 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके नामोंमें अपराधका विचार नहीं है, इसलिये नाम लेने मात्रसे उस व्यक्तिको वे प्रेम प्रदान कर देते हैं और उसके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है॥31॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यदि कोई व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्य-नित्यानन्दका आश्रय ग्रहण करता है, तो क्षणकालमें ही उसके समस्त पूर्व अपराधोंका मार्जन हो जाता है और उसके मुखमें श्रीकृष्णनामका उदय होते-होते ही वे उसे प्रेम प्रदान कर देते हैं॥31॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्य-नित्यानन्दप्रभुके आश्रित भक्तोंके द्वारा 'तृणादपि' श्लोकके अनुसार निष्कपट होकर शुद्धनाम ग्रहण करनेपर उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रु बहते देखे जाते हैं। श्रीकृष्णनाम अपराधका विचार करते हैं, परन्तु श्रीगौर-नित्यानन्दके नाममें अपराधका विचार नहीं है। अपराधी व्यक्तिके द्वारा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेपर कभी भी उसे नामका फल (श्रीकृष्ण-प्रेम) प्राप्त नहीं होता। श्रीगौर-नित्यानन्दके नाम ग्रहण करनेवालेके अपराध रहनेपर भी नाम करते-करते अपराध-मोचनके अन्तमें उसे नामके फलकी प्राप्ति हो जाती है। इसका विचार और सिद्धान्त यह है- श्रीकृष्णविमुख साधक श्रीकृणोन्मुख होनेके लिये श्रीगौर-नित्यानन्दके पास जाते हैं। साधनसिद्ध, अनर्थमुक्त श्रीकृणोन्मुख व्यक्तिके द्वारा उच्चारित श्रीकृष्णनाम अपना (श्रीकृष्णप्रेमरूपी) फल प्रदान करता है, परन्तु साधककी अनर्थयुक्त अवस्थामें वह नाम वैसा फल प्रदान नहीं आठवाँ अध्याय | 15
[ 8/31-34 करता। श्रीगौर-नित्यानन्द अनर्थयुक्त जीवोंके भी सेव्य वस्तु हैं और उनकी सेवा भाग्यहीन जीवोंके द्वारा श्रीकृष्णसेवाकी अपेक्षा अधिक उपयोगी है। साधक जब नामप्रणालीकी शिक्षा ग्रहण किये बिना स्वयंमें सिद्धका अभिमान करके श्रीकृष्णनामकी सेवाके लिये उद्यत होता है, तब अनर्थ ही उसके निकट उपस्थित होते हैं। किन्तु जो श्रीनिताइ-गौरके भजनमें सिद्ध होनेका अभिमानरूप कपट न रखकर अनर्थयुक्त अवस्थामें भी जो उन दो जगद्-गुरुओं (श्रीनिताइ-गौर) के पास जाता है, वे उस व्यक्तिको अनर्थोंसे मुक्त करके उसको अपने स्वयंरूप (श्रीचैतन्य महाप्रभु) और स्वयंप्रकाश (श्रीनित्यानन्द प्रभु) के स्वरूपकी उपलब्धि करा देते हैं। इससे ही उस जीवके स्वरूप ज्ञानका उदय होता है। श्रीकृष्णनाम और श्रीगौरनाम—दोनों ही नामीसे अभिन्न हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णको श्रीगौरकी अपेक्षा लघु अथवा सङ्कीर्ण मानना अविद्याका कार्य समझना होगा। वस्तुतः जीवके प्रयोजनका विचार करनेपर श्रीगौर- नित्यानन्दके नाम-ग्रहण करनेकी उपयोगिता अधिक है। श्रीगौर-नित्यानन्द उदार हैं और उस उदारताके भीतर वे मधुर भी हैं। श्रीकृष्णकी उदारता केवल मुक्त, सिद्ध और उनके आश्रित भक्तोंपर ही दिखलायी देती है, किन्तु श्रीगौर-नित्यानन्दके औदार्य-स्रोतसे अनर्थयुक्त अपराधी जीव भोगमय अपराधोंके हाथोंसे मुक्त होकर श्रीगौर-कृष्णके चरणकमलोंको प्राप्त करते हैं॥ ३१॥ महावदान्य श्रीगौरके भजनके अतिरिक्त और कोई गति नहीं है :— स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु अत्यन्त उदार। ताँरे ना भजिले कभु ना हय निस्तार॥ ३२॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर और अत्यन्त उदार हैं। उनका भजन किये बिना जीवका उद्धार सम्भव नहीं है॥ ३२॥ अनुभाष्य—'श्रीचैतन्य-भजन' कहनेका तात्पर्य श्रीकृष्णको त्यागकर श्रीराधा-कृष्णसे अलग श्रीगौरभजन नहीं है। यह मायाकी दासतामें कल्पित भजन है और इसमें श्रीकृष्णप्रेम-माधुर्य अवस्थित नहीं है। श्रीचैतन्यके अति प्रिय निजजन श्रीस्वरूप-रूप-रघुनाथादि आचार्योंका उल्लङ्घन करके जो काल्पनिक चेष्टाओंके द्वारा यह सोचते हैं कि वे गौरभजन कर रहे हैं, उनका कभी उद्धार नहीं हो सकता। उनका यह मायाकल्पित दुष्प्रयास श्रीराधा-कृष्णसे अभिन्न श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंमें भीषण अपराध है, जिसके फलस्वरूप वे द्रुत गतिसे नरककी ओर बढ़ने लगते हैं। तब वे श्रीराधाकृष्ण-सेवापरायण भक्तोंमें दोषदर्शन करके श्रीरूपादि आचार्योंके चरणोंमें अपराध कर बैठते हैं। इस कारण श्रीगौरसुन्दरको मुखसे 'अवतारी' कहकर भी वे मनसे उन्हें नैमित्तिक-मनोधर्म प्रचारकोंके भाँति केवल साधुके रूपमें ही मानते हैं॥ ३२॥ व्यासावतार ठाकुर वृन्दावनदासके चैतन्यभागवतके श्रवणसे ही जीवका चरम मङ्गल :— ओरे मूढ़ लोक, शुन चैतन्यमङ्गल। चैतन्य-महिमा याते जानिबे सकल॥ ३३॥ अनुवाद—अरे मूर्ख लोगों ! श्रीचैतन्यमङ्गलका श्रवण करो, जिससे तुम श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमासे पूर्णरूपसे अवगत होवोगे॥ ३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—देनुड़ग्राम (जिला वर्धमान) के निवासी श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने 'चैतन्यभागवत' नामक ग्रन्थकी रचना की। इस ग्रन्थका पूर्व नाम 'चैतन्यमङ्गल' था। श्रीलोचनदास ठाकुरके निजरचित ग्रन्थ 'चैतन्यमङ्गल' गान आरम्भ करनेपर श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थका नाम परिवर्तित कर दिया—इस प्रकार प्रसिद्धि है॥ ३३॥ कृष्णलीला भागवते कहे वेदव्यास। चैतन्य-लीलार व्यास—वृन्दावन-दास॥ ३४॥ अनुवाद—जिस प्रकार श्रीवेदव्यासने श्रीमद्भागवतमें 16 | श्रीचैतन्यचरितामृत
8/34-41 ] श्रीकृष्णलीलाका वर्णन किया है, उसी प्रकार श्रीचैतन्यलीलाके व्यास श्रीवृन्दावनदास ठाकुर हैं॥ 34 ॥ अनुभाष्य-भाष्यकारके (श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके) द्वारा सम्पादित श्रीचैतन्य-भागवतकी भूमिकामें 'श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी' जीवनी द्रष्टव्य है॥ 34 ॥ वृन्दावन-दास कैल 'चैतन्यमङ्गल'। याँहार श्रवणे नाशे सर्व-अमङ्गल ॥ 35 ॥ चैतन्यभागवत-श्रीगौर-निताइ-महिमा और भक्तिसिद्धान्तकी खान :- चैतन्य-निताइर याते जानिये महिमा। याते जानि कृष्णभक्ति-सिद्धान्तेर सीमा ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने 'चैतन्यमङ्गल' की रचनाकी है, जिसे सुननेसे सभी अमङ्गलोंका नाश होता है। इससे श्रीचैतन्य-नित्यानन्दकी महिमाको समझोगे और जिसके द्वारा श्रीकृष्णभक्ति-सिद्धान्तकी चरम सीमाको भी जानोगे॥ 35-36 ॥ अनुभाष्य-श्रीमद्भागवत भक्ति-सिद्धान्तका मूल ग्रन्थ है, किन्तु ग्रन्थका कलेवर विशाल होनेके कारण अनेक लोग इसके सारांशको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होते हैं। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने उसके सारांशको अपने ग्रन्थ 'श्रीचैतन्यभागवत' में लिपिबद्ध किया है। श्रीकृष्णभक्तिके सिद्धान्तोंमें निपुण लोग ही श्रीगौर-नित्यानन्दकी महिमाको भली-भाँति प्रकारसे जाननेमें समर्थ हैं। समस्त भक्तिग्रन्थ एक स्वरमें यही गान करते हैं कि भक्तिसिद्धान्तके बिना भक्तिदेवीकी सेवा नहीं हो सकती ॥ 36 ॥ भागवते यत भक्तिसिद्धान्तेर सार। लिखियाछेन इँहा जानि' करिया उद्धार ॥ 37 ॥ चैतन्यभागवत-श्रवणसे दुर्जनोंका भी सज्जन बनना :- चैतन्यमङ्गल शुने यदि पाषण्डी, यवन। सेह महावैष्णव हय ततक्षण ॥ 38 ॥ उनकी अलौकिक रचना :- मनुष्ये रचिते नारे ऐछे ग्रन्थ धन्य। वृन्दावन-दास मुखे वक्ता श्रीचैतन्य ॥ 39 ॥ एक ग्रन्थके द्वारा ही जगत्का उद्धार :- वृन्दावनदास-पदे कोटि नमस्कार। ऐछे ग्रन्थ करि' तँहो तारिला संसार ॥ 40 ॥ अनुवाद-श्रीमद्भागवतमें जो भक्तिसिद्धान्तोंका सार है, उसे ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यमङ्गलमें उद्धृत किया है। यदि श्रीचैतन्यमङ्गलको कोई पाषण्डी (धर्मके विरुद्ध आचरण करनेवाला) अथवा यवन भी श्रवण करे, तो वह तत्क्षणात् महावैष्णव बन जाता है। ऐसे महिमायुक्त ग्रन्थकी रचना किसी मनुष्यके द्वारा सम्भव नहीं है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके मुखसे श्रीचैतन्य महाप्रभु ही इस ग्रन्थके वक्ता अर्थात् रचयिता हैं। श्रीवृन्दावनदासके चरणोंमें मैं कृष्णदास कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने ऐसे ग्रन्थकी रचना करके संसारके जीवोंका उद्धार किया है॥ 37-40 ॥ महाप्रभुकी कृपापात्री नारायणीके पुत्र-श्रीवृन्दावनदास :- नारायणी-चैतन्येर उच्छिष्ट-भाजन। ताँर गर्भे जन्मिला श्रीदास-वृन्दावन ॥ 41 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके उच्छिष्ट महाप्रसादको बाल्यकालमें ग्रहण करनेवाली श्रीमती नारायणी देवीके गर्भसे ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका जन्म हुआ ॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती नारायणी देवी श्रीवास पण्डितके भ्राताकी पुत्री थीं। उन्हें शिशुकालमें महाप्रभुके कीर्तनके अन्तमें उनका उच्छिष्ट-प्रसाद प्राप्त होता था ॥ 41 ॥ अनुभाष्य-श्रीगौर-गणोद्देशदीपिकामें श्रीकविकर्णपूरने श्रीमती नारायणी देवीके सम्बन्धमें इस प्रकार वर्णन किया है- “अम्बिकायाः स्वसा यासीन्नाम्नी श्रील-किलिम्बिका। कृष्णोच्छिष्टं प्रभुञ्जाना सेयं नारायणी मता ॥ 43 ॥” आठवाँ अध्याय | 17
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“पूर्वकालमें श्रीकृष्णको स्तनपान करानेवाली अम्बिका नामक धात्रीकी छोटी बहन किलिम्बिका थीं। वे श्रीकृष्णके उच्छिष्ट भोजनको ग्रहण करती थीं। अब वे ही श्रीगौरावतारमें 'नारायणी देवी' हुई हैं।”
श्रीवास पण्डितकी भतीजी नारायणी देवीके गर्भसे श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका जन्म हुआ। माता नारायणी देवी श्रीगौरसुन्दरका उच्छिष्ट खानेवाली और कृपापात्री थीं। उनके परिचयसे ही वृन्दावनदास ठाकुर जाने जाते हैं। वैष्णवोंके परिचयमें उनके पूर्व-पुरुषों (पूर्वजों) का परिचय जानना आवश्यक नहीं है, इसलिये उसका त्याग हुआ है अर्थात् वृन्दावनदास ठाकुरके पितृकुलका वर्णन कहीं नहीं मिलता॥41॥
श्रीगौरचरित्र-वर्णनके द्वारा उनका जगत्-उद्धार :- ताँर कि अद्भुत चैतन्यचरित-वर्णन। याहार श्रवणे शुद्ध कैल त्रिभुवन ॥ 42 ॥
'श्रीनिताइ-गौर-भजनसे ही मङ्गल'-जीवको उसके लिये अनुरोध :- अतएव भज, लोक, चैतन्य-नित्यानन्द। खण्डिबे संसार-दुःख, पाबे प्रेमानन्द ॥ 43 ॥
अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने कैसा यह अद्भुत चैतन्य महाप्रभुके चरित्रका वर्णन किया है, जिसे सुनने मात्रसे तीनों लोक पवित्र हो जाते हैं। अतः हे जगत्के जीवों! श्रीचैतन्य-नित्यानन्दका भजन करो। तुम्हारे संसारके दुःखोंका नाश हो जायेगा और तुम्हें प्रेमानन्दका प्राप्ति होगी॥ 42-43 ॥
वृन्दावनदास ठाकुरके द्वारा पहले सूत्ररूपमें और बादमें विस्तृतरूपसे श्रीगौरलीलाका वर्णन :- वृन्दावन-दास कैल 'चैतन्यमङ्गल'। ताहाते चैतन्य-लीला वर्णिल सकल ॥ 44 ॥ सूत्र करि' सब लीला करिल ग्रन्थन। पाछे विस्तारिया ताहार कैल विवरण ॥ 45 ॥ चैतन्यचन्द्रेर लीला अनन्त अपार। वर्णिते वर्णिते ग्रन्थ हइल विस्तार ॥ 46 ॥
किन्तु ग्रन्थ-विस्तार भयसे विस्तार करनेमें अनिच्छा :- विस्तार देखिया किछु सङ्कोच हैल मन। सूत्रधृत कोन लीला ना कैल वर्णन ॥ 47 ॥
श्रीनिताइकी लीला-वर्णनके आवेशसे श्रीगौरकी अन्त्यलीलाका वर्णन असम्पूर्ण :- नित्यानन्द-लीला-वर्णने हइल आवेश। चैतन्येर शेष-लीला रहिल अवशेष ॥ 49 ॥
अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने चैतन्यमङ्गल ग्रन्थकी रचना की और उसमें चैतन्य महाप्रभुकी सभी लीलाओंका वर्णन किया। पहले उन्होंने सूत्र रूपमें सभी लीलाओंका वर्णन किया और बादमें विस्तारपूर्वक उनकी व्याख्या की। श्रीचैतन्यचन्द्रकी लीलाएँ अनन्त और अपार हैं। वर्णन करते-करते ग्रन्थ बहुत विस्तृत हो गया। ग्रन्थके विस्तारको देखकर उनके मनमें कुछ सङ्कोच हुआ। इसलिये सूत्र रूपमें कही गयी कुछ लीलाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन छोड़ दिया। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी लीला वर्णन करनेमें वे इतने आविष्ट हो गये कि श्रीचैतन्य महाप्रभुकी शेषलीलाका वर्णन अवशेष रह गया॥ 44-48॥
श्रीगौरकी शेषलीलाओंको सुननेकी वृन्दावनवासियोंकी इच्छा :- सेइ सब लीलार शुनिते विवरण। वृन्दावनवासी भक्तेर उत्कण्ठित मन ॥ 49 ॥
अनुवाद-उन समस्त अवशेष लीलाओंको सुननेके लिये वृन्दावनवासी भक्तोंका मन उत्कण्ठित है॥49॥
कल्पवृक्षतले रत्नसिंहासनपर विराजमान श्रीगोविन्दकी सेवाका वर्णन :- वृन्दावने कल्पद्रुमे सुवर्ण-सदन। महा-योगपीठ ताँहा, रत्न-सिंहासन ॥ 50 ॥ ताते बसि' आछे सदा व्रजेन्द्रनन्दन। 'श्रीगोविन्द-देव' नाम साक्षात् मदन ॥ 51 ॥
18 | श्रीचैतन्यचरितामृत
8/50–57 ] अनुवाद-परमरमणीय श्रीवृन्दावनमें कल्पवृक्षके नीचे सुवर्ण-भवनमें महायोगपीठ है, जहाँ रत्नजड़ित सिंहासनपर श्रीव्रजेन्द्रनन्दन सदैव विराजमान हैं। उनका नाम श्रीगोविन्ददेव है और वे साक्षात् कामदेव हैं॥ 50–51॥ राजसेवा हय ताँहा विचित्र प्रकार। दिव्य सामग्री, दिव्य वस्त्र, अलङ्कार॥ 52॥ सहस्त्र सेवक सेवा करे अनुक्षण। सहस्त्र-वदने सेवा ना याय वर्णन॥ 53॥ अनुवाद-राजा-महाराजाओंके भाँति विचित्र प्रकारकी दिव्य सामग्री और दिव्य वस्त्र-अलङ्कारोंसे उनकी सेवा होती है। सैंकड़ों सेवक प्रतिक्षण उनकी सेवामें लगे रहते हैं। उस सेवाके वैभवका सैंकड़ों मुखोंके द्वारा भी वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ 52–53॥ उनके सेवाध्यक्ष श्रीहरिदास पण्डितके सद्गुणोंका वर्णन :- सेवार अध्यक्ष—श्रीपण्डित हरिदास। ताँर यशः-गुण सर्वजगते प्रकाश॥ 54॥ अनुवाद-श्रीगोविन्ददेवकी सेवाके अध्यक्ष श्रीहरिदास पण्डित हैं, जिनका यश और गुण सारे जगत्में प्रसिद्ध हैं॥ 54॥ अनुभाष्य-‘पण्डित हरिदास'—श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य श्रीअनन्ताचार्य ही इनके श्रीगुरुदेव हैं। परवर्ती पयार संख्या 59-65 और अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 54॥ सुशील, सहिष्णु, शान्त, वदान्य, गम्भीर। मधुर-वचन, मधुर-चेष्टा, महाधीर॥ 55॥ सबार सम्मान-कर्त्ता, करेन सबार हित। कौटिल्य-मात्सर्य-हिंसा शून्य ताँर चित्त॥ 56॥ कृष्णेर ये साधारण सद्गुण पञ्चाश। से-सब गुणेर ताँर शरीरे निवास॥ 57॥ अनुवाद-वे सुशील, सहनशील, शान्त, कृपालु, गम्भीर और मधुर-भाषी हैं। उनकी सभी चेष्टाएँ मधुर हैं और वे धैर्यके सागर हैं। वे सभीका सम्मान और हित करनेवाले हैं। उनके हृदयमें कुटिलता, ईर्ष्या, हिंसादि दोष लेशमात्र भी नहीं है। श्रीकृष्णमें जो पचास साधारण सद्गुण हैं, वे सब इनमें विद्यमान हैं॥ 55–57॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णमें साधारण जो पचास सद्गुण हैं, उनका उल्लेख “अयं नेता सुरम्याङ्ग" आदि (भःरःसिः, दक्षिण विभाग, 1 लहरीके) श्लोकोंमें वर्णित है॥ 57॥ अमृतानुकणिका-भक्तिरसामृतसिन्धु दक्षिण विभाग प्रथम लहरीमें श्रीकृष्णके साधारण जो पचास गुणोंका वर्णन किया गया है, वे इस प्रकार हैं- अयं नेता सुरम्याङ्गः सर्वसल्लक्षणान्वितः। रुचिरस्तेजसा युक्तो बलीयान् वयसान्वितः॥ विविधाद्भुतभाषावित् सत्यवाक्यः प्रियंवदः। वावदूकः सुपाण्डित्यो बुद्धिमान् प्रतिभान्वितः॥ विदग्धश्चतुरो दक्षः कृतज्ञः सुदृढ़व्रतः। देशकालसुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः शुचिर्वशी॥ स्थिरो दान्तः क्षमाशीलो गम्भीरो धृतिमान् समः। वदान्यो धार्मिकः शूरः करुणो मान्यमानकृत्॥ दक्षिणो विनयी ह्रीमान् शरणागतपालकः। सुखी भक्तसुहृत् प्रेमवश्यः सर्वशुभङ्करः॥ प्रतापी कीर्तिमान् रक्तलोकः साधुसमाश्रयः। नारीगणमनोहारी सर्वाराध्यः समृद्धिमान्॥ वरीयानीश्वरश्चेति गुणास्तस्यानुकीर्तिताः। समुद्रा इव पञ्चाशद् दुर्विगाहा हरेरमी॥ (1) सुरम्याङ्गः-अति रमणीय अङ्गसन्निवेश (2) सर्वसल्लक्षणान्वितः-सभी सद्-लक्षणोंसे युक्त (3) रुचिर-सभीके नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाला सौन्दर्य (4) तेजसायुक्तो-तेजसे युक्त तथा अतिशय प्रभावयुक्त (5) बलीयान्-अति बलशाली (6) वयसान्वितः-नानाविध विलासमय नवकिशोर अवस्था आठवाँ अध्याय | 19
[ 8/57 (7) विविधाद्भुतभाषावित्—विविध भाषाओंके (पशु-पक्षी आदि की भाषाओंके भी) विद्वान (8) सत्यवाक्यः—जिनका वाक्य कभी मिथ्या नहीं होता (9) प्रियंवदः—अपराधीके प्रति भी प्रिय वाक्य बोलनेवाले (10) वावदूकः—जिनके वाक्य कानोंको प्रिय लगनेवाले और रसभावादि युक्त हैं (11) सुपाण्डित्यो—विद्वान और नीतिज्ञ (12) बुद्धिमान्—मेधावी और सूक्ष्म बुद्धियुक्त (13) प्रतिभाऽन्वितः—नव-नव विषयोंके उद्भावनमें समर्थ (14) विदग्ध—चौंसठ विद्याओंमें निपुण (15) चतुरो—एक ही समयमें अनेक कार्य करनेवाले (16) दक्षः—दुष्कर कार्यको भी अति शीघ्र सम्पादन करनेवाले (17) कृतज्ञः—दूसरोंके द्वारा की गयी सेवाको माननेवाले (18) सुदृढव्रतः—जिनकी प्रतिज्ञा और नियम सदा सत्य होते हैं (19) देशकालसुपात्रज्ञः—काल-पात्रके अनुसार कार्यमें निपुण (20) शास्त्रचक्षुः—शास्त्रके अनुसार कार्य करनेवाले (21) शुचिः—पापनाशक और दोष रहित (22) वशी—जितेन्द्रिय (23) स्थिरो—फलोदयमें विलम्ब देखकर भी कार्यसे निवृत न होनेवाले (24) दान्तः—दुःसह होते हुए भी उपयुक्त क्लेश सहन करनेवाले (25) क्षमाशीलो—दूसरोंके अपराध क्षमा करनेवाले (26) गम्भीरो—जिनका अभिप्राय दूसरोंके लिये दुर्बोध है (27) धृतिमान्—क्षोभका तीव्र कारण होनेपर भी क्षोभशून्य (28) समः—राग-द्वेषशून्य (29) वदान्यो—दानवीर (30) धार्मिकः—स्वयं धर्मका आचरण करके दूसरोंको भी धर्मका आचरण करानेवाले (31) शूरः—युद्धके उत्साही और अस्त्र प्रयोगमें निपुण (32) करुणो—दूसरोंके दुःखको सहन न कर सकनेवाले (33) मान्यमानकृत्— गुरु, ब्राह्मण और वृद्धजनोंका सम्मान करनेवाले (34) दक्षिणो—सुस्वभाववश कोमल चित्तवाले (35) विनयी— उद्धताशून्य (36) हीमान्—दूसरोके द्वारा स्तुत्य होनेपर सङ्कोच करनेवाले (37) शरणागतपालकः—शरणमें आये हुए का पालन करनेवाले (38) सुखी—सुख भोग करनेवाले और दुःखकी गन्धमात्रसे रहित (39) भक्तसुहृत्—'सुसेव्य' और 'बन्धु' भेदसे दो प्रकारसे भक्तसुहृद हैं। 'सुसेव्य'—चुल्लू भर जल और तुलसी पत्र अर्पण करनेवालेको आत्मदान करनेवाले; 'बन्धु'—निज प्रतिज्ञाको भङ्ग करके भक्तकी प्रतिज्ञाकी रक्षा करनेवाले (40) प्रेमवश्यः—प्रेमके वशीभूत रहनेवाले (41) सर्वशुभङ्करः—सबके मङ्गलकारी (42) प्रतापी—अपने प्रतापसे शत्रुको ताप देनेमें प्रसिद्ध (43) कीर्तिमान्—निर्मल यशके द्वारा विख्यात (44) रक्तलोकः—समस्त लोकोंके अनुरागके पात्र (45) साधुसमाश्रयः—साधुके प्रति विशेष कृपाके कारण उनका पक्षपात करनेवाले (46) नारीगणमनोहारी—सौन्दर्य, माधुर्य, वैदग्धीके द्वारा सभी नारियोंके चित्तको हरण करनेवाले (47) सर्वाराध्यः—सभीके आराध्य (48) समृद्धिवान्—अत्यन्त सम्पन्नशाली (49) वरीयान्—ब्रह्मा, शिवादिसे भी श्रेष्ठ (50) ईश्वर—स्वतन्त्र, अन्यसे निरपेक्ष और जिनकी आज्ञा दुर्लङ्घ्य है। 20 | श्रीचैतन्यचरितामृत
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[शीर्षक / Header] 8/57-60 ]
[बायाँ स्तम्भ / Left Column]
ये पचास गुण श्रीकृष्णमें समुद्रवत् असीम रूपमें नित्य विराजमान रहते हैं॥ 57 ॥ (श्रीमद्भागवत 5/18/12)— यस्यास्ति भक्तिर्भगवत्यकिञ्चना सर्वैर्गुणैस्तत्र समासते सुराः। हरावभक्तस्य कुतो महद्गुणा मनोरथेनासति धावतो बहिः ॥ 58 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है ॥ 58 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीकृष्णमें जिनकी केवला भक्ति है, उन व्यक्तियोंमें समस्त गुणोंके सहित देवता वास करते हैं। हरिभक्तिविहीन व्यक्तियोंका मन सदा असत् बाह्य विषयोंमें दौड़ता रहता है, इसलिये उनमें महद्गुणोंका होना असम्भव है ॥ 58 ॥ अनुभाष्य—परमभक्त प्रह्लादके गुण वर्णन करते हुए श्रीशुकदेवने महाराज परीक्षितको कहा— यस्य (भक्तस्य) भगवति (श्रीविष्णौ) अकिञ्चना (निष्कामा) भक्तिः (आनुकूल्येन सेवनप्रवृत्तिः) अस्ति (विद्यते), तत्र (तस्मिन् भक्ते) सुराः (सर्वे देवाः) सर्वैः गुणैः (निखिल-सद्गुण-राशिभिः सह) समासते (सम्यग् आसते नित्यं वसन्ति)। असति (अनित्य विषयसुखे) मनोरथेन (मनोधर्मेण) बहिः धावतः (भोग-प्रवृत्तस्य) हरौ अभक्तस्य (अन्याभिलाष- कर्म-ज्ञान-योगपन्थिनः, अतः गृहाद्यासक्तस्य जनस्य हरिभक्त्यसम्भवात्) कुतः महद्गुणाः (महतां गुणाः ज्ञानवैराग्यादयः, श्रेष्ठ सद्गुणराशयः वा भवन्ति इति शेषः)। श्लोक भावानुवाद—जिनमें भगवान् श्रीविष्णुकी अकिञ्चना (निष्काम) भक्ति अर्थात् अनुकूल भावसे सेवाकी प्रवृत्ति है, उन भक्तोंमें सभी देवता निखिल सद्गुणोंके साथ सदा विराजते हैं। अनित्य विषयसुखोंमें मनोधर्मवाले व्यक्तियोंकी भोग करनेकी प्रवृत्ति होती है, वे श्रीकृष्णेतर कर्म-ज्ञान-योगमार्गमें चलते हैं, इसलिये गृहादिमें आसक्त व्यक्तियोंमें हरिभक्तिकी सम्भावना नहीं है। ऐसे अभक्त लोगोंमें ज्ञान-वैराग्यादि महत् गुण कहाँसे आयेंगे ? ॥ 58 ॥
[दायाँ स्तम्भ / Right Column]
पण्डित हरिदासका परिचय और गुरुपरम्परा :— पण्डित-गोसाञिर शिष्य—अनन्त आचार्य। कृष्णप्रेममय-तनु, उदार, सर्व-आर्य ॥ 59 ॥ ताँहार अनन्त गुण के करु प्रकाश। ताँर प्रिय शिष्य इँहो—पण्डित हरिदास ॥ 60 ॥ अनुवाद—श्रीअनन्ताचार्य श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य हैं। वे श्रीकृष्ण-प्रेमकी मूर्ति, उदार और सभी प्रकारसे श्रेष्ठ हैं। उनके अनन्त गुणोंका कौन वर्णन कर सकता है ? हरिदास पण्डित इन्हींके प्रिय शिष्य हैं॥ 59-60 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पण्डित गोसाञि'—श्रीगदाधर पण्डित ॥ 59 ॥ अनुभाष्य—श्रीअनन्ताचार्यकी शिष्य परम्परा इस प्रकार है— (1) श्रीगौर-गणोद्देशदीपिकाके 165वें श्लोकमें वर्णित है— “अनन्ताचार्य गोस्वामी या सुदेवी पुरा ब्रजे।” “ब्रजकी अष्टसखियोंमें श्रीसुदेवी सखी श्रीगौरावतारमें श्रीअनन्ताचार्य हैं।” श्रीपुरुषोत्तम (श्रीजगन्नाथपुरी) का प्रसिद्ध 'गङ्गामाता मठ' इन्हींके मठोंकी शाखा है। इनकी गुरुपरम्परामें इनका 'विनोद-मञ्जरी' के नामसे उल्लेख है। (2) हरिदास पण्डित इनके शिष्य हैं। उनका नाम 'श्रीरघुगोपाल' भी है और वे ब्रजलीलामें श्रीराममञ्जरी हैं। (3) इनकी शिष्या श्रीलक्ष्मीप्रिया (गङ्गामाताकी मामी) हैं। (4) श्रीगङ्गामाता पुटियाकी राजकन्या थीं और उन्होंने जयपुरके कृष्णमिश्रसे 'श्रीरसिकराय' नामक विग्रहको लाकर श्रीजगन्नाथपुरीमें श्रीसार्वभौमके घरमें उनकी सेवाको प्रकाशित किया था। (5) श्रीवनमाली, (6) श्रीभगवानदास (बङ्गालवासी), (7) श्रीमथुसूदनदास (उत्कलवासी), (8) श्रीनीलाम्बरदास, (9) श्रीनरोत्तमदास, (10) श्रीपीताम्बरदास, (11) श्रीमाधवदास ॥ 59-60 ॥
[पाद-टिप्पणी / Footer] आठवाँ अध्याय | 21
[ 8/61-70 उनका श्रीनिताइ-गौरमें अनुराग :- चैतन्य-नित्यानन्दे ताँर परम विश्वास। चैतन्य-चरिते ताँर परम उल्लास ॥ 61 ॥ वैष्णवोंमें गाढ़ प्रीति :- वैष्णवेर गुणग्राही, ना देखये दोष। कायमनोवाक्ये करे वैष्णव-सन्तोष ॥ 62 ॥ वैष्णवसभाभें उनका श्रीचैतन्यभागवत पाठ :- निरन्तर शुने तेंहो 'चैतन्यमङ्गल'। ताँहार प्रसादे शुनेन वैष्णवसकल ॥ 63 ॥ कथाय सभा उज्ज्वल करे, येन पूर्णचन्द्र। निज-गुणामृते बाड़ाय वैष्णव-आनन्द ॥ 64 ॥ अनुवाद—हरिदास पण्डितकी श्रीचैतन्य-नित्यानन्दमें परम श्रद्धा है और श्रीचैतन्य-चरित्रके श्रवण-कीर्तनसे उनको परम उल्लास होता है। वे वैष्णवोंके केवल गुणोंको ही देखते हैं और किसीमें भी दोष-दृष्टि नहीं रखते हैं। वे तन-मन-वचनसे सदा वैष्णवोंको सन्तुष्ट रखते हैं। वे निरन्तर श्रीचैतन्यमङ्गलका श्रवण करते हैं और उनकी कृपासे सभी वैष्णवोंको भी ऐसा सुयोग प्राप्त होता है। चैतन्यमङ्गलकी कथा करते हुए पूर्णचन्द्रकी भाँति वे सभाको प्रकाशित करते हैं और अपने गुणरूपी अमृतसे वैष्णवोंका आनन्द वर्धित करते हैं॥ 61-64 ॥ ग्रन्थकारको श्रीगौर-शेषलीला वर्णन करनेका आदेश :- तेंहो अति कृपा करि' आज्ञा दिल मोरे। गौराङ्गेर शेषलीला वर्णिवार तरे ॥ 65 ॥ अनुवाद—उन्होंने अत्यन्त कृपा करके मुझे श्रीगौराङ्ग महाप्रभुकी शेषलीलाका वर्णन करनेका आदेश प्रदान किया है॥ 65 ॥ इसी प्रकार आदेशकारी अन्य भक्तोंका परिचय :- काशीश्वर गोसाञिर शिष्य—गोविन्द गोसाञि। गोविन्देर प्रियसेवक ताँर सम नाञि ॥ 66 ॥ अनुवाद—श्रीकाशीश्वर पण्डितके शिष्य श्रीगोविन्द गोस्वामी हैं, जिनके समान श्रीगोविन्ददेवजीका प्रिय सेवक और कोई नहीं है॥ 66 ॥ अनुभाष्य—श्रीकाशीश्वर (पण्डित) गोस्वामी श्रीईश्वरपुरीके शिष्य और काज्जिलाल कानु वंशमें वात्स्यगोत्रीय वासुदेव भट्टाचार्यके पुत्र थे। चौधुरी इनकी उपाधि थी। इनके भाँजे वल्लभपुरके श्रीरुद्र पण्डित थे (संख्या 106 द्रष्टव्य है)। चातरा ग्राममें श्रीकाशीश्वरके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीराधा-गोविन्द और श्रीगौराङ्गके विग्रह हैं। ये बहुत बलवान थे। जब महाप्रभु प्रातःकाल श्रीजगन्नाथजीके दर्शनके लिये जाते थे, तो ये आगे-आगे चलकर भीड़को हटाकर उनका मार्ग सुगम बनाते थे (चैःचः आदिलीला 10/138-142; मध्यलीला 12/207; 13/89 संख्या द्रष्टव्य हैं)। पुरीमें ये कीर्तनके अन्तमें भक्तोंको प्रसाद वितरण करते थे। महाप्रभुके साथ इनके मिलनके प्रसङ्गके लिये चैःचः मध्यलीला 10/134, 185 संख्या द्रष्टव्य हैं। श्रीगौरगणोद्देश दीपिका (श्लोक 137) के अनुसार ये ब्रजमें श्रीकृष्णके सेवक 'भृङ्गार' और (श्लोक 166) के अनुसार ब्रजकी 'शशिरेखा' सखी ही गौरावतारके काशीश्वर हैं (?)॥ 66 ॥ यादवाचार्य गोसाञि श्रीरूपेर सङ्गी। चैतन्यचरिते तेंहो अति बड़ रङ्गी ॥ 67 ॥ पण्डित-गोसाञिर शिष्य—भूगर्भ गोसाञि। गौरकथा बिना ताँर मुखे अन्य नाइ ॥ 68 ॥ ताँर शिष्य—गोविन्द-पूजक चैतन्यदास। मुकुन्दानन्द चक्रवर्ती, प्रेमी कृष्णदास ॥ 69 ॥ आचार्य गोसाञिर शिष्य—चक्रवर्ती शिवानन्द। निरवधि ताँर चित्ते श्रीचैतन्यान्द ॥ 70 ॥ अनुवाद—श्रीरूप गोस्वामीके सङ्गी श्रीयादवाचार्य गोस्वामी भी श्रीचैतन्य-चरित्रके अति रसिक हैं। श्रीगदाधर पण्डितके शिष्य श्रीभूगर्भ गोस्वामी भी हैं, जिनके मुखमें 22 | श्रीचैतन्यचरितामृत
8/69-79 ] श्रीगौर-कथाके अतिरिक्त और कुछ नहीं आता है। उनके शिष्य श्रीगोविन्ददेवजीके पुजारी श्रीचैतन्यदास, श्रीमुकुन्दानन्द चक्रवर्ती और प्रेमी कृष्णदास हैं। श्रीअनन्ताचार्यके शिष्य श्रीशिवानन्द चक्रवर्ती हैं, जिनके चित्तमें सदा श्रीगौराङ्ग-नित्यानन्द वास करते हैं॥67-70॥ अनुभाष्य-भूगर्भ गोस्वामी (चैःचः आदिलीला 12/81) के शिष्य श्रीचैतन्यदास, मुकुन्ददास और कृष्णदास हैं। 'शिवानन्द'-चैःचः आदिलीला 12/87 संख्या द्रष्टव्य है॥69-70॥ इति अनुभाष्ये अष्टम परिच्छेदः। आठवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। आर यत वृन्दावने बैसे भक्तगण। शेष-लीला शुनिते सबार हैल मन॥71॥ मोरे आज्ञा करिला सबे करुणा करिया। ताँ-सबार बोले लिखि निर्लज्ज हइया॥72॥ अनुवाद-और भी वृन्दावनमें जितने भक्त हैं, सभीका मन श्रीचैतन्यकी शेष-लीलाको सुननेके लिये उत्सुक है। सभीने कृपा करके मुझे आज्ञा प्रदान की और उन सबके कहनेपर मैं निर्लज्ज होकर लिख रहा हूँ॥71-72॥ वैष्णवादेशसे सम्भ्रम सहित श्रीमदनगोपालसे आज्ञा प्रार्थना :- वैष्णवेर आज्ञा पाञा चिन्तित-अन्तरे। मदनगोपाले गेलाङ आज्ञा मागिवारे॥73॥ अनुवाद-उन समस्त वैष्णवोंकी आज्ञा प्राप्तकर मैं चिन्तित हो गया और श्रीमदनगोपालसे अनुमति माँगने गया॥73॥ गोस्वामिदासके द्वारा प्रार्थना करते ही सभी वैष्णवोंके सामने श्रीमदनगोपालकी आज्ञा-मालाका गिरना :- दरशन करि कैलुँ चरण वन्दन। गोसाञिदास पूजारी करे चरण-सेवन॥74॥ प्रभुर चरणे यदि आज्ञा मागिल। प्रभुकण्ठ हैते माला खसिया पड़िल॥75॥ सर्व वैष्णवगण हरिध्वनि दिल। गोसाञिदास आनि' माला मोर गले दिल॥76॥ अनुवाद-श्रीमदनगोपालका दर्शन करके मैंने उनके चरणोंकी वन्दना की। उस समय श्रीगोसांईदास पुजारी श्रीविग्रहकी चरणसेवा कर रहे थे। श्रीमदनगोपालके चरणोंमें मैंने जब आज्ञा माँगी, तब प्रभुके गलेसे एक पुष्पमाला खुलकर नीचे गिर गयी। यह देखकर सभीने हरिध्वनि की और पुजारी गोसांईदासने वह माला मेरे गलेमें डाल दी॥74-76॥ आज्ञा-माला लाभसे ही इस ग्रन्थ-लेखनमें प्रवृत्ति :- आज्ञामाला पाञा आमार हइल आनन्द। ताहाइ करिनु एइ ग्रन्थेर आरम्भ॥77॥ अनुवाद-आज्ञामाला पाकर मुझे बहुत आनन्द हुआ, इसलिये मैंने यह ग्रन्थ आरम्भ किया॥77॥ ग्रन्थरचनामें श्रीमदनमोहनकी ही सम्पूर्ण क्रिया या प्रेरणा :- एइ ग्रन्थ लेखाय मोरे 'मदनमोहन'। आमार लिखन येन शुकेर पठन॥78॥ सेइ लिखि, मदनगोपाल मोरे ये लिखाय। काष्ठेर पुत्तली येन कुहके नाचाय॥79॥ अनुवाद-श्रीमदनमोहन ही मुझसे यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं। मेरा लिखना शुक (तोते) के पाठ करनेके समान है (शुकको जो पढ़ाया जाता है, वह वही बोलता है)। जैसे काठकी पुतलीको मदारी नचाता है, वैसे ही श्रीमदनगोपाल जो मुझसे लिखवा रहे हैं, मैं वही लिख रहा हूँ॥78-79॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमदनगोपालकी प्रेरणासे मैंने आठवाँ अध्याय | 23
[ 8/78-85
श्रीचैतन्यचरितामृत लिखा है, इसलिये इसमें शुक पक्षीके पाठकी भाँति मेरी कोई महिमा नहीं है॥ 78 ॥
इति अमृतप्रवाह भाष्ये अष्टम परिच्छेदः। आठवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ।
कुलाधिदेवता मोर—मदनमोहन। याँर सेवक—रघुनाथ, रूप, सनातन ॥ 80 ॥
अनुवाद—श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीरघुनाथ जिनके सेवक हैं, वही श्रीमदनमोहन मेरे कुलाधिदेवता हैं॥ 80 ॥
ग्रन्थकारकी श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके प्रति वैष्णवोचित गुरुबुद्धि और प्रणति :— वृन्दावन-दासेर पादपद्म करि' ध्यान। ताँर आज्ञा लञा लिखि याहाते कल्याण ॥ 81 ॥ चैतन्यलीलाते 'व्यास'—वृन्दावन-दास। ताँर कृपा बिना अन्ये ना हय प्रकाश ॥ 82 ॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके चरणकमलोंका ध्यान करते हुए उनसे आज्ञा लेकर मैं यह ग्रन्थ लिख रहा हूँ, जिससे सभीका कल्याण होगा। श्रीचैतन्यलीलाके 'व्यास' श्रीवृन्दावनदास ठाकुर हैं, इसलिये उनकी कृपाके बिना किसीके भी हृदयमें श्रीचैतन्यलीलाकी स्फूर्ति नहीं हो सकती॥ 81-82 ॥
ग्रन्थकारकी दैन्योक्ति :— मूर्ख, नीच, क्षुद्र मुञि विषय-लालस। वैष्णवाज्ञा-बले करि एतेक साहस ॥ 83 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-चरणेर एइ बल। याँर स्मृते सिद्ध हय वाञ्छितसकल ॥ 84 ॥
अनुवाद—मैं मूर्ख, नीच, अति क्षुद्र और विषयोंका लोभी हूँ। केवल वैष्णवोंकी आज्ञाके बलपर मैं (यह ग्रन्थ लिखनेका) साहस कर रहा हूँ। श्रीरूप-रघुनाथके चरणोंमें इतना बल है कि केवल उनके स्मरणमात्रसे समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ 83-84 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 85 ॥
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 85 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे ग्रन्थकरणे वैष्णवाज्ञारूपकथनं नामाष्टम-परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डके 'ग्रन्थ रचनार्थ वैष्णवोंकी आज्ञा' नामक आठवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।
नवाँ अध्याय
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नवाँ अध्याय नवें अध्यायका सार—इस अध्यायमें भक्तिको एक वृक्षके रूपमें वर्णन करके एक रहस्यको प्रकट किया गया है कि मूलवृक्ष विश्वम्भर-श्रीगौराङ्ग महाप्रभु ही भक्तिवृक्षके माली और उसके फलके दाता एवं भोक्ताके रूपमें भी हैं। श्रीनवद्वीपधाममें यह फलवृक्ष रोपित हुआ और उसके पश्चात् पुरुषोत्तम, वृन्दावनआदि अन्य स्थानोंमें ऐसे प्रेमफलके उद्यानोंकी वृद्धि हुई। श्रीमाधवेन्द्रपुरी इस वृक्षके प्रथम अङ्कुर हैं और उनके शिष्य श्रीईश्वरपुरीने इस अङ्कुरको पुष्ट किया। महाप्रभु श्रीचैतन्यदेव माली होकर अपनी अचिन्त्य-शक्तिके बलसे इस वृक्षके स्कन्ध भी हैं। श्रीपरमानन्दपुरी आदि नौ संन्यासी इस वृक्षके मूल हैं। मूल-स्कन्धके ऊपर श्रीअद्वैताचार्य एवं श्रीनित्यानन्दरूप और भी दो स्कन्ध हुए। इन दो स्कन्धोंसे अनेक प्रकारकी शाखाएँ-उपशाखाएँ निकलीं, जिन्होंने सम्पूर्ण जगत्को आवृत्त कर लिया। इस वृक्षके प्रेमफलको सर्वत्र सभीको ही दान किया है। इस प्रकार भक्तिवृक्षको रोपण करके उसके फलास्वादनके द्वारा जगत्को आनन्दमें डुबो दिया। यह वर्णन एक रूपक है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौर-कृपासे असम्भव भी सम्भव :— तं श्रीमत्कृष्णचैतन्यदेवं वन्दे जगद्गुरुम्। यस्यानुकम्पया श्वापि महाब्धिं सन्तरेत् सुखम् ॥ 1 ॥ अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—जिनकी कृपा प्राप्त करके एक कुकुर (कुत्ता) भी महासागरको पार करनेमें समर्थ हो जाता है, उन जगद्गुरु श्रीकृष्णचैतन्यदेवकी मैं वन्दना करता हूँ॥ 1 ॥ अनुभाष्य—यस्य (चैतन्यदेवस्य) अनुकम्पया (प्रसादेन) श्वा (कुकुरः) अपि महाब्धिं (महासमुद्रं) सुखं सन्तरेत् (सन्तरणेन तत्पारं गच्छेत्), तं जगद्गुरुं (सर्वजगतां गुरुं पूज्यं) श्रीकृष्णचैतन्यदेवम् [अहं] वन्दे। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 1 ॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्र। जय जयाद्वैत जय जय नित्यानन्द ॥ 2 ॥ अनुवाद—श्रीकृष्णचैतन्य गौरचन्द्रकी जय हो, जय हो। श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीअद्वैताचार्यकी जय हो, जय हो॥ 2 ॥ जय जय श्रीवासादि गौरभक्तगण। सर्वाभीष्ट-पूर्ति हेतु याँहार स्मरण ॥ 3 ॥ अनुवाद—श्रीवासादि गौरभक्तोंकी जय हो, जय हो, जिनके स्मरणसे समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ 3 ॥ श्रीरूप, सनातन, भट्ट-रघुनाथ। श्रीजीव, गोपालभट्ट, दास-रघुनाथ ॥ 4 ॥ एसब-प्रसादे लिखि चैतन्य-लीलागुण। जानि वा ना जानि, करि आपन-शोधन ॥ 5 ॥ अनुवाद—श्रीरूप, श्रीसनातन, श्रीरघुनाथभट्ट, श्रीजीव, श्रीगोपालभट्ट और श्रीरघुनाथदास गोस्वामी—इन सबकी कृपासे मैं श्रीचैतन्य महाप्रभुकी लीलाओं और गुणोंको लिख रहा हूँ। मैं इन्हें जानता हूँ अथवा नहीं जानता हूँ, तो भी अपने चित्तकी शुद्धिके लिये मैं इन्हें लिख रहा हूँ॥ 4-5 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आपन शोधन'—अपने शुद्धिकरणके लिये ॥ 5 ॥ महाप्रभु स्वयं 'माली' :— मालाकारः स्वयं कृष्ण-प्रेमामृतरुः स्वयम्। दाता भोक्ता तत्फलानां यस्तं चैतन्यमाश्रये ॥ 6 ॥
[ 9/6-10 अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥ अमृतप्रवाह भाष्य—श्रीचैतन्य स्वयं ही प्रेमरूप-कल्पवृक्ष और स्वयं ही उसके माली हैं। जो उस वृक्षके फलोंके दाता और भोक्ता हैं, उन श्रीकृष्णचैतन्यका मैं आश्रय ग्रहण करता हूँ॥6॥ अनुभाष्य— यः (चैतन्यदेवः) स्वयं मालाकारः (उद्यानरक्षकः) स्वयं कृष्णप्रेमाम्रतरुः (कृष्णस्य प्रेमैव अमरतरुः अविनाशी वृक्षः) तत्फलानां (कल्पवृक्षस्य प्रेमफलानां) दाता, भोक्ता च, [स्वयं एव] तं चैतन्यम् [अहम्] आश्रये (प्रपद्ये)। श्लोक भावानुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥6॥ माली होनेका कारण—अभिधेय-अधिदेवता होनेकी सार्थकता :— प्रभु कहे, आमि 'विश्वम्भर' नाम धरि। नाम सार्थक हय, यदि प्रेमे विश्व भरि॥7॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभुने विचार किया कि मेरा नाम 'विश्वम्भर' (विश्वका पालन करनेवाला) है। यदि मैं कृष्णप्रेमसे सम्पूर्ण विश्वको भर दूँ, तभी मेरा यह नाम सार्थक होगा॥7॥ नवद्वीपमें भक्तिफलके उद्यानकी रचना :— एत चिन्ति' लैला प्रभु मालाकार-धर्म। नवद्वीपे आरम्भिला फलोद्यान-कर्म॥8॥ श्रीचैतन्य मालाकार पृथिवीते आनि'। भक्ति-कल्पतरु रोपिला सिञ्चि' इच्छा-पानि॥9॥ अनुवाद—ऐसा विचार करके महाप्रभुने माली बनकर नवद्वीपमें फलका उद्यान लगाना आरम्भ किया। श्रीचैतन्य मालीने भक्ति-कल्पवृक्षको पृथ्वीपर लाकर रोपण किया और इच्छारूपी जलके द्वारा उसका सिञ्चन किया॥8-9॥ उसके प्रथम अङ्कुर—श्रीमाधवेन्द्रपुरी :— जय श्रीमाधवपुरी कृष्णप्रेमपूर। भक्तिकल्पतरुर तेंहो प्रथम अङ्कुर॥10॥ अनुवाद—श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी जय हो, जिनका हृदय कृष्णप्रेमसे परिपूर्ण है। वे भक्ति-कल्पवृक्षके प्रथम अङ्कुर हैं॥10॥ अमृतप्रवाह भाष्य— 'श्रीमाधवपुरी'—इनका नाम श्रीमाधवेन्द्रपुरी है। ये श्रीमध्वाचार्य सम्प्रदायमें एक प्रसिद्ध संन्यासी थे। श्रीचैतन्यदेव इनके अनुशिष्य (शिष्यके शिष्य) थे। इनसे पहले श्रीमध्व-सम्प्रदायमें प्रेमभक्तिका कोई लक्षण नहीं था। इनके द्वारा रचित “अयि दयार्द्रनाथ' श्लोकमें श्रीमन्महाप्रभुके द्वारा शिक्षित तत्त्व बीजरूपमें था॥10॥ अमृतानुकणिका—श्रीमाधवेन्द्र पुरी श्रीमध्व गौड़ीय सम्प्रदायके द्वारा सेवित भक्ति कल्पतरुके प्रथम अङ्कुर हैं। इनसे पूर्व श्रीमध्व सम्प्रदायमें शृङ्गार रसात्मिका भक्तिका कोई भी लक्षण नहीं देखा जाता। श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी महिमा श्रीचैतन्यभागवत और श्रीभक्तिरत्नाकर ग्रन्थमें वर्णित हुई है। श्रीभक्तिरत्नाकर पाँचवीं तरङ्ग— “माधवेन्द्रपुरी प्रेमभक्तिरसमय। याँर नामस्मरणे सकल सिद्धि हय॥2272॥” “श्रीमाधवेन्द्रपुरी प्रेमभक्तिके रसस्वरूप हैं, जिनके नाम स्मरण मात्रसे ही सब सिद्धियाँ प्राप्त हो जाती हैं।” चैःभाः आदिखण्ड नौवाँ अध्याय— “माधवेन्द्र-कथा अति अद्भुत-कथन। मेघ देखिलेइ मात्र हय अचेतन॥175॥ अहर्निश कृष्णप्रेम मद्यपेर प्राय। हासे, कान्दे, है है करे हाय हाय॥176॥” “श्रीमाधवेन्द्रपुरीकी ऐसी अद्भुत कथा है कि मेघ देखने मात्रसे ही नवजलधर मेघ कान्तिवाले श्रीकृष्णकी उद्दीपनावनेपर वे उसी समय अचेतन हो जाते। वे रात-दिन श्रीकृष्णप्रेममें मदिरापान करनेवालेके भाँति कभी हँसते, कभी रोते और कभी उल्लसित होकर 'है है' करते तथा कभी दुःखी होकर 'हाय हाय' करते॥” चैःभाः आदिखण्डके नौवें अध्यायमें श्रीमाधवेन्द्र पुरीके साथ श्रीनित्यानन्द प्रभुके मिलनका प्रसङ्ग वर्णित है। 28 | श्रीचैतन्यचरितामृत
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“एइमत नित्यानन्दप्रभुर भ्रमण। दैवे माधवेन्द्र-सह हैल दरशन॥ 154 ॥ माधवेन्द्रपुरी प्रेममय कलेवर। प्रेममय यत सब सङ्गे अनुचर॥ 155 ॥ कृष्णरस बिनु आर नाहिक आहार। माधवेन्द्रपुरी-देहे कृष्णेर विहार॥ 156 ॥ याँर शिष्य प्रभु आचार्यवर-गोसाञि। कि कहिब आर ताँर प्रेमेर बड़ाइ॥ 157 ॥ माधवपुरीरे देखिलेन नित्यानन्द। तत्क्षणे प्रेम मूर्च्छा हइला निष्पन्द॥ 158 ॥ नित्यानन्दे देखि' मात्र श्रीमाधवपुरी। पड़िला मूर्च्छित हइ' आपना' पासरि'॥ 159 ॥ भक्तिरसे माधवेन्द्र आदि-सूत्रधार। गौरचन्द्र इहा कहियाछेन बारे-बार॥”160 ॥
“इस प्रकार भ्रमण करते-करते श्रीनित्यानन्द प्रभुको दैवयोगसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीके दर्शन हुए। श्रीमाधवेन्द्र पुरीका शरीर प्रेममय था और उनके सङ्गी-अनुचर जितने भी थे, सभी प्रेममें मत्त थे। कृष्णरस ही उनका आहार था। उनके दिव्य कलेवरको देखकर ऐसा अनुभव होता था कि वह श्रीकृष्णकी विहार-स्थली है। और उनकी अधिक बड़ाई क्या करें कि स्वयं श्रीअद्वैताचार्य उनके शिष्य थे। जैसे ही श्रीनित्यानन्द प्रभुने श्रीमाधवेन्द्रपुरीको देखा, उसी क्षण वे प्रेममें मूर्च्छित हो गये। श्रीनित्यानन्द प्रभुको देखकर श्रीमाधवेन्द्रपुरी भी स्वयंको भूलकर उसी क्षण मूर्च्छित होकर भूमिपर गिर पड़े। श्रीमाधवेन्द्रपुरी भक्तिरसके आदि सूत्रधार हैं, ऐसा श्रीगौरचन्द्रने बार-बार कहा है।”
“नित्यानन्द बोले, - 'यत तीर्थ करिलाङ। सम्यक् ताहार फल आजि पाइलाङ॥ 166 ॥ नयने देखिनु माधवेन्द्रेर चरण। ए प्रेम देखिया धन्य हइल जीवन॥”167 ॥
“मूर्च्छा भङ्ग होनेपर श्रीनित्यानन्द प्रभु कहने लगे-“मैंने जितने तीर्थोंमें भ्रमण किया है, आज उन सबका सम्पूर्ण फल पाया है। मैंने अपने नेत्रोंसे श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरणोंके दर्शन किये हैं और इनके प्रेमको देखकर मेरा जीवन धन्य हो गया है।”
“माधवेन्द्रपुरी नित्यानन्दे करि' कोले। उत्तर ना स्फुरे, - कण्ठरुद्ध प्रेमजले॥ 168 ॥ हेन प्रीत हइलेन माधवेन्द्रपुरी। वक्ष हैते नित्यानन्दे बाहिर ना करि॥ 169 ॥ जानिलुँ कृष्णेर कृपा आछे मोर प्रति। नित्यानन्द-हेन बन्धु पाइनु संहति॥ 183 ॥ नित्यानन्दे याहार तिलेक द्वेष रहे। भक्त हइलेओँ से कृष्णेर प्रिय नहे॥ 186 ॥”
“श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीनित्यानन्द प्रभुको छातीसे लगाकर उनसे कुछ कहना चाहते थे, किन्तु प्रेमके कारण उनका गला रुँद्ध गया। उनके हृदयमें इतना प्रेम उमड़ आया कि वे श्रीनित्यानन्द प्रभुको छातीसे अलग नहीं कर सके और कहने लगे कि आज मैं समझ गया हूँ कि श्रीकृष्णकी मेरे प्रति अपार कृपा है, इसलिये तो उन्होंने श्रीनित्यानन्द जैसे परम बन्धुसे मुझे मिला दिया है। श्रीनित्यानन्द प्रभुके प्रति यदि किसीके हृदयमें तिलमात्र भी द्वेष रहेगा, वह भक्त होनेपर भी श्रीकृष्णका प्यारा नहीं हो सकता।”
भक्तिरत्नाकर पाँचवीं तरङ्गमें उन दोनोंके पुनः मिलन और उनके परस्पर सम्बन्धका वर्णन है— “कथोदिन परे माधवेन्द्रर सहिते। देखा हैल प्रतीची-तीर्थेर समीपेते॥ 2330 ॥ ये प्रेम प्रकाश हइल दोँहार मिलने। ताहा के वर्णिब? - ये देखिल सेइ जाने॥ 2331 ॥ नित्यानन्दे बन्धुज्ञान करे माधवेन्द्र। माधवेन्द्रे गुरुबुद्धि करे नित्यानन्द॥ 2332 ॥”
“पुनः कितने दिनोंके बाद प्रतीची-तीर्थके समीप श्रीमाधवेन्द्रपुरी और श्रीनित्यानन्द प्रभु परस्पर मिले, उन दोनोंके मिलनेपर जिस प्रेमका प्रकाश हुआ उसे कौन वर्णन कर सकेगा? इसे तो वही जान सकता है जिसने उस दृश्यको देखा है। श्रीमाधवेन्द्रपुरी श्रीनित्यानन्द प्रभुको अपना परम बन्धु समझते थे और श्रीनित्यानन्द प्रभु श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रति गुरु बुद्धि रखते थे।”
श्रीमाधवेन्द्रपुरीके लिये श्रीगोपीनाथके द्वारा क्षीर चुरानेका प्रसङ्ग चैःचः मध्यलीला चौथे अध्यायमें तथा
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[ 9/10-15 अपने शिष्य रामचन्द्रपुरीपर गुरु-अवज्ञाके कारण क्रोध प्रकाश एवं त्याग तथा अन्य शिष्य श्रीईश्वरपुरीकी सेवा देखकर कृपाशीर्वादके प्रसङ्ग चैःचः अन्त्यलीलाके आठवें अध्यायमें द्रष्टव्य हैं॥10॥ ईश्वरपुरीमें उसकी वृद्धि प्राप्ति :- श्रीईश्वरपुरी-रूपे अङ्कुर पुष्ट हैल। आपने चैतन्यमाली स्कन्ध उपजिला॥ 11 ॥ अनुवाद-श्रीईश्वरीपुरीरूपमें यह अङ्कुर पुष्ट हुआ और स्वयं चैतन्यमाली इस वृक्षके तनेके रूपमें प्रकट हुए॥11॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीईश्वरीपुरी श्रीचैतन्य महाप्रभुके दीक्षामन्त्र गुरु थे। इनका जन्म कुमारहट्टमें अर्थात् हालिसहर गाँवमें एक ब्राह्मण कुलमें हुआ था और ये श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य थे॥11॥ अनुभाष्य-श्रीईश्वरपुरी कुमारहट्टमें ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न हुए थे और ये श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रियतम शिष्य थे। चैःचः अन्त्यलीलाके 8/26-29 संख्यामें- “ईश्वरपुरी करे श्रीपदसेवन। स्वहस्ते करेन मल-मूत्रादि मार्जन॥ निरन्तर कृष्णनाम कराय स्मरण। कृष्णनाम, कृष्णलीला सुनाय अनुक्षण॥ तुष्ट हञा पुरी ताँरे कैल आलिङ्गन। वर दिल कृष्णे तोमार हउक् प्रेमधन॥ सेइ हैते ईश्वरपुरी प्रेमेर सागर।” “श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरणोंकी सेवा करते थे। (श्रीमाधवेन्द्रपुरी जब वृद्धावस्थाके कारण चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गये थे, तब) वे अपने हाथोंसे उनके मल-मूत्रका मार्जन करते थे। वे निरन्तर श्रीकृष्णनाम तथा श्रीकृष्णलीलाका कीर्तन करते और श्रीमाधवेन्द्रपुरीको सुनाते थे। उनकी सेवासे सन्तुष्ट होकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उनका आलिङ्गन किया और उन्हें वर दिया कि श्रीकृष्ण उनके प्रेमधन हों। उस आशीर्वादके फलस्वरूप श्रीईश्वरपुरी 'प्रेमके सागर' हो गये।” श्रीईश्वरपुरी महाप्रभुको गयामें दशाक्षर-मन्त्र दीक्षा देनेसे पूर्व एक बार नवद्वीप आये थे और श्रीगोपीनाथाचार्यके घर कुछ मास रहे। उस समय उनका महाप्रभुसे कई बार वार्तालाप हुआ और उन्होंने महाप्रभुको स्वरचित 'कृष्णलीलामृत' ग्रन्थका श्रवण कराया। (चैःभाः आदिखण्ड सातवाँ अध्याय द्रष्टव्य है)। महाप्रभु जब श्रीईश्वरपुरीके जन्मस्थान कुमारहट्टके दर्शन करने आये, तो जीवोंको गुरुभक्तिकी शिक्षा देनेके लिये उन्होंने इस लीलाका प्रदर्शन किया था- “सेइ स्थानेर मृत्तिका आपने प्रभु तुलि'। लइलेन बहिर्वासे बान्धि' एक झुलि॥” -(चैःभाः आदिखण्ड, 12वाँ अः) “उन्होंने उस स्थानसे मिट्टी लेकर उसे अपने बहिर्वास वस्त्रमें बाँध लिया। उस समयसे जो श्रीईश्वरपुरीके स्थानके दर्शनके लिये आते हैं, वे सभी वहाँसे कुछ मिट्टी अपने साथ ले जाते हैं॥”11॥ अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे माली होकर भी स्वयं स्कन्ध और सब शाखाओंके आश्रय :- निजाचिन्त्यशक्त्ये माली हञा स्कन्ध हय। सकल शाखार सेइ स्कन्ध मूलाश्रय ॥ 12 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु अपनी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे माली होते हुए भी उस वृक्षका तना भी बने। यह तना सभी शाखाओंका मूल आश्रय है॥12॥ नौ संन्यासी-नौ जड़ें :- परमानन्द पुरी, आर केशव भारती। ब्रह्मानन्द पुरी, आर ब्रह्मानन्द भारती ॥ 13 ॥ विष्णु पुरी, केशव पुरी, पुरी कृष्णानन्द। श्रीनृसिंह तीर्थ, आर पुरी सुखानन्द ॥ 14 ॥ एइ नव मूल निकसिल वृक्षमूले। एइ नव मूले वृक्ष करिल निश्चले ॥ 15 ॥ अनुवाद-परमानन्द पुरी, केशव भारती, ब्रह्मानन्द 30 | श्रीचैतन्यचरितामृत
9/13-15 ] पुरी, ब्रह्मानन्द भारती, विष्णु पुरी, केशव पुरी, कृष्णानन्द पुरी, श्रीनृसिंहतीर्थ और सुखानन्द पुरी—ये नौ जड़ें वृक्षके मूलसे निकलीं, जिन्होंने वृक्षको स्थिर किया॥13-15॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'पुरी' नामके ये सभी संन्यासी श्रीईश्वरपुरीके सम्बन्धसे और 'भारती' नामके ये संन्यासी श्रीचैतन्य महाप्रभुके संन्यास गुरु श्रीकेशव भारतीके सम्बन्धसे आत्मीयवर्ग हैं॥14॥ अनुभाष्य—श्रीपरमानन्दपुरी त्रिहुत नामक देशमें ब्राह्मण कुलमें आविर्भूत हुए और वे श्रीमाधवेन्द्र पुरीके शिष्य तथा श्रीचैतन्य महाप्रभुके परम प्रियपात्र थे। (चैःभाः अन्त्यखण्ड 10/46-49, 42) में— “संन्यासीर मध्ये ईश्वरेर प्रियपात्र। आर नाहि, एक पुरी गोसाञि से मात्र॥46॥ दामोदरस्वरूप, परमानन्द-पुरी। संन्यासीपार्षदे एइ दुइ अधिकारी॥47॥ निरवधि निकटे थाकेन दुईजन। प्रभुर संन्यासे करे दण्डेर ग्रहण॥48॥ पुरी ध्यानपर, दामोदरेर कीर्त्तन। न्यासी-रूपे न्यासी-देहे बाहु दुइ जन॥49॥ यत प्रीति ईश्वरेर पुरी-गोसाञिरे। दामोदर-स्वरूपेओ तत प्रीति करे॥42॥” “दामोदर-स्वरूप संन्यासियोंमें से महाप्रभुके प्रियपात्र थे। एक परमानन्दपुरीके अतिरिक्त उनके समान और कोई न था। संन्यासी पार्षदोंमें दामोदर-स्वरूप और परमानन्दपुरी—ये दोनों अधिकारी थे। दोनों निरन्तर महाप्रभुके पास ही रहते थे। महाप्रभुके संन्यासके पश्चात् इन्होंने दण्ड ग्रहण किया। परमानन्दपुरी विरक्त ध्यानपरायण भजनमें अनुरक्त रहते थे और दामोदर स्वरूप कीर्तनानन्दी थे। भगवान् श्रीगौरसुन्दरके संन्यासी शरीरमें ये दोनों भुजा सदृश थे। श्रीपरमानन्दपुरीके प्रति भगवान् श्रीगौरसुन्दरका जिस प्रकारका मर्यादाभाव था, दामोदर स्वरूपके प्रति भी वह भाव किसी भी प्रकारसे न्यून नहीं था।” श्रीपरमानन्दपुरीका दर्शनकर महाप्रभु कहने लगे— (चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा अध्याय संख्या 171-172, 175)— “आजि धन्य लोचन, सफल आजि जन्म। सफल आमार आजि हैल सर्वधर्म॥”171॥ प्रभु बोले,—“आजि मोर सफल संन्यास। आजि माधवेन्द्र मोरे हइल प्रकाश॥”172॥ कत क्षणे अन्योऽन्ये करेन प्रणाम। परमानन्दपुरी—चैतन्येर प्रेम-धाम॥” “हरि हरि! नेत्रोंसे परमानन्दपुरीके दर्शनकर आज मेरे नेत्र धन्य हो गये, आज जन्म सफल हो गया, धन्य हो गया। आज मेरे सभी धर्म सफल हो गये।” महाप्रभुने आगे कहा—“आज मेरा संन्यास सफल हुआ है। आज श्रीमाधवेन्द्रपुरीका प्रकाश मेरे सामने प्रकट हुआ है।” कुछ क्षणों पश्चात् दोनोंने एक दूसरेको प्रणाम किया। श्रीपरमानन्दपुरी चैतन्य-प्रेमके धाम हैं। श्रीपरमानन्दपुरी पुरुषोत्तम क्षेत्रमें श्रीमन्दिरके पश्चिम दिशाकी ओर एक मठका और एक कुँआ निर्माणकर रहते थे। कुँएका जल पवित्र न देख महाप्रभुने कहा— (चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा अध्याय)— “महाप्रभु जगन्नाथ मोरे देह एह वर। गङ्गा प्रवेशुक एई कूपेर भितर॥”242॥ प्रभु बोले,—“शुनह सब भक्तगण। ए कूपेर जले ये करिबे स्नान पान॥251॥ सत्य सत्य हबे तार गङ्गास्नान-फल। कृष्णे भक्ति हबे तार परम निर्मल॥”252॥ प्रभु बोले,—“आमि ये आछिये पृथिवीते। निश्चयइ जानिह पुरी-गोसाञिर प्रीते॥”255॥ श्रीचैतन्य महाप्रभु भुजाएँ उठाकर कहने लगे,—“जगन्नाथ महाप्रभु, मुझे यह वर दीजिये कि गङ्गा इस कुँएके भीतर प्रविष्ट हो जाय।” तब श्रीचैतन्य महाप्रभु कहने लगे,—“सभी भक्तों सुनो! इस कुँएके जलमें जो स्नान करेगा और जो इसका जल पान करेगा, उसे सत्य ही गङ्गा-स्नानका फल मिलेगा और परम निर्मल कृष्णभक्तिकी प्राप्ति होगी।” आगे श्रीचैतन्य महाप्रभुने कहा,—“केवल नवाँ अध्याय | 31