श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ 9/10-15 अपने शिष्य रामचन्द्रपुरीपर गुरु-अवज्ञाके कारण क्रोध प्रकाश एवं त्याग तथा अन्य शिष्य श्रीईश्वरपुरीकी सेवा देखकर कृपाशीर्वादके प्रसङ्ग चैःचः अन्त्यलीलाके आठवें अध्यायमें द्रष्टव्य हैं॥10॥ ईश्वरपुरीमें उसकी वृद्धि प्राप्ति :- श्रीईश्वरपुरी-रूपे अङ्कुर पुष्ट हैल। आपने चैतन्यमाली स्कन्ध उपजिला॥ 11 ॥ अनुवाद-श्रीईश्वरीपुरीरूपमें यह अङ्कुर पुष्ट हुआ और स्वयं चैतन्यमाली इस वृक्षके तनेके रूपमें प्रकट हुए॥11॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीईश्वरीपुरी श्रीचैतन्य महाप्रभुके दीक्षामन्त्र गुरु थे। इनका जन्म कुमारहट्टमें अर्थात् हालिसहर गाँवमें एक ब्राह्मण कुलमें हुआ था और ये श्रीमाधवेन्द्रपुरीके शिष्य थे॥11॥ अनुभाष्य-श्रीईश्वरपुरी कुमारहट्टमें ब्राह्मणकुलमें उत्पन्न हुए थे और ये श्रीमाधवेन्द्रपुरीके प्रियतम शिष्य थे। चैःचः अन्त्यलीलाके 8/26-29 संख्यामें- “ईश्वरपुरी करे श्रीपदसेवन। स्वहस्ते करेन मल-मूत्रादि मार्जन॥ निरन्तर कृष्णनाम कराय स्मरण। कृष्णनाम, कृष्णलीला सुनाय अनुक्षण॥ तुष्ट हञा पुरी ताँरे कैल आलिङ्गन। वर दिल कृष्णे तोमार हउक् प्रेमधन॥ सेइ हैते ईश्वरपुरी प्रेमेर सागर।” “श्रीईश्वरपुरी श्रीमाधवेन्द्रपुरीके चरणोंकी सेवा करते थे। (श्रीमाधवेन्द्रपुरी जब वृद्धावस्थाके कारण चलने-फिरनेमें असमर्थ हो गये थे, तब) वे अपने हाथोंसे उनके मल-मूत्रका मार्जन करते थे। वे निरन्तर श्रीकृष्णनाम तथा श्रीकृष्णलीलाका कीर्तन करते और श्रीमाधवेन्द्रपुरीको सुनाते थे। उनकी सेवासे सन्तुष्ट होकर श्रीमाधवेन्द्रपुरीने उनका आलिङ्गन किया और उन्हें वर दिया कि श्रीकृष्ण उनके प्रेमधन हों। उस आशीर्वादके फलस्वरूप श्रीईश्वरपुरी 'प्रेमके सागर' हो गये।” श्रीईश्वरपुरी महाप्रभुको गयामें दशाक्षर-मन्त्र दीक्षा देनेसे पूर्व एक बार नवद्वीप आये थे और श्रीगोपीनाथाचार्यके घर कुछ मास रहे। उस समय उनका महाप्रभुसे कई बार वार्तालाप हुआ और उन्होंने महाप्रभुको स्वरचित 'कृष्णलीलामृत' ग्रन्थका श्रवण कराया। (चैःभाः आदिखण्ड सातवाँ अध्याय द्रष्टव्य है)। महाप्रभु जब श्रीईश्वरपुरीके जन्मस्थान कुमारहट्टके दर्शन करने आये, तो जीवोंको गुरुभक्तिकी शिक्षा देनेके लिये उन्होंने इस लीलाका प्रदर्शन किया था- “सेइ स्थानेर मृत्तिका आपने प्रभु तुलि'। लइलेन बहिर्वासे बान्धि' एक झुलि॥” -(चैःभाः आदिखण्ड, 12वाँ अः) “उन्होंने उस स्थानसे मिट्टी लेकर उसे अपने बहिर्वास वस्त्रमें बाँध लिया। उस समयसे जो श्रीईश्वरपुरीके स्थानके दर्शनके लिये आते हैं, वे सभी वहाँसे कुछ मिट्टी अपने साथ ले जाते हैं॥”11॥ अचिन्त्यशक्तिके प्रभावसे माली होकर भी स्वयं स्कन्ध और सब शाखाओंके आश्रय :- निजाचिन्त्यशक्त्ये माली हञा स्कन्ध हय। सकल शाखार सेइ स्कन्ध मूलाश्रय ॥ 12 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु अपनी अचिन्त्य शक्तिके प्रभावसे माली होते हुए भी उस वृक्षका तना भी बने। यह तना सभी शाखाओंका मूल आश्रय है॥12॥ नौ संन्यासी-नौ जड़ें :- परमानन्द पुरी, आर केशव भारती। ब्रह्मानन्द पुरी, आर ब्रह्मानन्द भारती ॥ 13 ॥ विष्णु पुरी, केशव पुरी, पुरी कृष्णानन्द। श्रीनृसिंह तीर्थ, आर पुरी सुखानन्द ॥ 14 ॥ एइ नव मूल निकसिल वृक्षमूले। एइ नव मूले वृक्ष करिल निश्चले ॥ 15 ॥ अनुवाद-परमानन्द पुरी, केशव भारती, ब्रह्मानन्द 30 | श्रीचैतन्यचरितामृत