श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 555, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें8/50–57 ] अनुवाद-परमरमणीय श्रीवृन्दावनमें कल्पवृक्षके नीचे सुवर्ण-भवनमें महायोगपीठ है, जहाँ रत्नजड़ित सिंहासनपर श्रीव्रजेन्द्रनन्दन सदैव विराजमान हैं। उनका नाम श्रीगोविन्ददेव है और वे साक्षात् कामदेव हैं॥ 50–51॥ राजसेवा हय ताँहा विचित्र प्रकार। दिव्य सामग्री, दिव्य वस्त्र, अलङ्कार॥ 52॥ सहस्त्र सेवक सेवा करे अनुक्षण। सहस्त्र-वदने सेवा ना याय वर्णन॥ 53॥ अनुवाद-राजा-महाराजाओंके भाँति विचित्र प्रकारकी दिव्य सामग्री और दिव्य वस्त्र-अलङ्कारोंसे उनकी सेवा होती है। सैंकड़ों सेवक प्रतिक्षण उनकी सेवामें लगे रहते हैं। उस सेवाके वैभवका सैंकड़ों मुखोंके द्वारा भी वर्णन करना सम्भव नहीं है॥ 52–53॥ उनके सेवाध्यक्ष श्रीहरिदास पण्डितके सद्गुणोंका वर्णन :- सेवार अध्यक्ष—श्रीपण्डित हरिदास। ताँर यशः-गुण सर्वजगते प्रकाश॥ 54॥ अनुवाद-श्रीगोविन्ददेवकी सेवाके अध्यक्ष श्रीहरिदास पण्डित हैं, जिनका यश और गुण सारे जगत्में प्रसिद्ध हैं॥ 54॥ अनुभाष्य-‘पण्डित हरिदास'—श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके शिष्य श्रीअनन्ताचार्य ही इनके श्रीगुरुदेव हैं। परवर्ती पयार संख्या 59-65 और अनुभाष्य द्रष्टव्य है॥ 54॥ सुशील, सहिष्णु, शान्त, वदान्य, गम्भीर। मधुर-वचन, मधुर-चेष्टा, महाधीर॥ 55॥ सबार सम्मान-कर्त्ता, करेन सबार हित। कौटिल्य-मात्सर्य-हिंसा शून्य ताँर चित्त॥ 56॥ कृष्णेर ये साधारण सद्गुण पञ्चाश। से-सब गुणेर ताँर शरीरे निवास॥ 57॥ अनुवाद-वे सुशील, सहनशील, शान्त, कृपालु, गम्भीर और मधुर-भाषी हैं। उनकी सभी चेष्टाएँ मधुर हैं और वे धैर्यके सागर हैं। वे सभीका सम्मान और हित करनेवाले हैं। उनके हृदयमें कुटिलता, ईर्ष्या, हिंसादि दोष लेशमात्र भी नहीं है। श्रीकृष्णमें जो पचास साधारण सद्गुण हैं, वे सब इनमें विद्यमान हैं॥ 55–57॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णमें साधारण जो पचास सद्गुण हैं, उनका उल्लेख “अयं नेता सुरम्याङ्ग" आदि (भःरःसिः, दक्षिण विभाग, 1 लहरीके) श्लोकोंमें वर्णित है॥ 57॥ अमृतानुकणिका-भक्तिरसामृतसिन्धु दक्षिण विभाग प्रथम लहरीमें श्रीकृष्णके साधारण जो पचास गुणोंका वर्णन किया गया है, वे इस प्रकार हैं- अयं नेता सुरम्याङ्गः सर्वसल्लक्षणान्वितः। रुचिरस्तेजसा युक्तो बलीयान् वयसान्वितः॥ विविधाद्भुतभाषावित् सत्यवाक्यः प्रियंवदः। वावदूकः सुपाण्डित्यो बुद्धिमान् प्रतिभान्वितः॥ विदग्धश्चतुरो दक्षः कृतज्ञः सुदृढ़व्रतः। देशकालसुपात्रज्ञः शास्त्रचक्षुः शुचिर्वशी॥ स्थिरो दान्तः क्षमाशीलो गम्भीरो धृतिमान् समः। वदान्यो धार्मिकः शूरः करुणो मान्यमानकृत्॥ दक्षिणो विनयी ह्रीमान् शरणागतपालकः। सुखी भक्तसुहृत् प्रेमवश्यः सर्वशुभङ्करः॥ प्रतापी कीर्तिमान् रक्तलोकः साधुसमाश्रयः। नारीगणमनोहारी सर्वाराध्यः समृद्धिमान्॥ वरीयानीश्वरश्चेति गुणास्तस्यानुकीर्तिताः। समुद्रा इव पञ्चाशद् दुर्विगाहा हरेरमी॥ (1) सुरम्याङ्गः-अति रमणीय अङ्गसन्निवेश (2) सर्वसल्लक्षणान्वितः-सभी सद्-लक्षणोंसे युक्त (3) रुचिर-सभीके नेत्रोंको आनन्द प्रदान करनेवाला सौन्दर्य (4) तेजसायुक्तो-तेजसे युक्त तथा अतिशय प्रभावयुक्त (5) बलीयान्-अति बलशाली (6) वयसान्वितः-नानाविध विलासमय नवकिशोर अवस्था आठवाँ अध्याय | 19