श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 554, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 8/41-51
“पूर्वकालमें श्रीकृष्णको स्तनपान करानेवाली अम्बिका नामक धात्रीकी छोटी बहन किलिम्बिका थीं। वे श्रीकृष्णके उच्छिष्ट भोजनको ग्रहण करती थीं। अब वे ही श्रीगौरावतारमें 'नारायणी देवी' हुई हैं।”
श्रीवास पण्डितकी भतीजी नारायणी देवीके गर्भसे श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका जन्म हुआ। माता नारायणी देवी श्रीगौरसुन्दरका उच्छिष्ट खानेवाली और कृपापात्री थीं। उनके परिचयसे ही वृन्दावनदास ठाकुर जाने जाते हैं। वैष्णवोंके परिचयमें उनके पूर्व-पुरुषों (पूर्वजों) का परिचय जानना आवश्यक नहीं है, इसलिये उसका त्याग हुआ है अर्थात् वृन्दावनदास ठाकुरके पितृकुलका वर्णन कहीं नहीं मिलता॥41॥
श्रीगौरचरित्र-वर्णनके द्वारा उनका जगत्-उद्धार :- ताँर कि अद्भुत चैतन्यचरित-वर्णन। याहार श्रवणे शुद्ध कैल त्रिभुवन ॥ 42 ॥
'श्रीनिताइ-गौर-भजनसे ही मङ्गल'-जीवको उसके लिये अनुरोध :- अतएव भज, लोक, चैतन्य-नित्यानन्द। खण्डिबे संसार-दुःख, पाबे प्रेमानन्द ॥ 43 ॥
अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने कैसा यह अद्भुत चैतन्य महाप्रभुके चरित्रका वर्णन किया है, जिसे सुनने मात्रसे तीनों लोक पवित्र हो जाते हैं। अतः हे जगत्के जीवों! श्रीचैतन्य-नित्यानन्दका भजन करो। तुम्हारे संसारके दुःखोंका नाश हो जायेगा और तुम्हें प्रेमानन्दका प्राप्ति होगी॥ 42-43 ॥
वृन्दावनदास ठाकुरके द्वारा पहले सूत्ररूपमें और बादमें विस्तृतरूपसे श्रीगौरलीलाका वर्णन :- वृन्दावन-दास कैल 'चैतन्यमङ्गल'। ताहाते चैतन्य-लीला वर्णिल सकल ॥ 44 ॥ सूत्र करि' सब लीला करिल ग्रन्थन। पाछे विस्तारिया ताहार कैल विवरण ॥ 45 ॥ चैतन्यचन्द्रेर लीला अनन्त अपार। वर्णिते वर्णिते ग्रन्थ हइल विस्तार ॥ 46 ॥
किन्तु ग्रन्थ-विस्तार भयसे विस्तार करनेमें अनिच्छा :- विस्तार देखिया किछु सङ्कोच हैल मन। सूत्रधृत कोन लीला ना कैल वर्णन ॥ 47 ॥
श्रीनिताइकी लीला-वर्णनके आवेशसे श्रीगौरकी अन्त्यलीलाका वर्णन असम्पूर्ण :- नित्यानन्द-लीला-वर्णने हइल आवेश। चैतन्येर शेष-लीला रहिल अवशेष ॥ 49 ॥
अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने चैतन्यमङ्गल ग्रन्थकी रचना की और उसमें चैतन्य महाप्रभुकी सभी लीलाओंका वर्णन किया। पहले उन्होंने सूत्र रूपमें सभी लीलाओंका वर्णन किया और बादमें विस्तारपूर्वक उनकी व्याख्या की। श्रीचैतन्यचन्द्रकी लीलाएँ अनन्त और अपार हैं। वर्णन करते-करते ग्रन्थ बहुत विस्तृत हो गया। ग्रन्थके विस्तारको देखकर उनके मनमें कुछ सङ्कोच हुआ। इसलिये सूत्र रूपमें कही गयी कुछ लीलाओंका विस्तारपूर्वक वर्णन छोड़ दिया। श्रीनित्यानन्द प्रभुकी लीला वर्णन करनेमें वे इतने आविष्ट हो गये कि श्रीचैतन्य महाप्रभुकी शेषलीलाका वर्णन अवशेष रह गया॥ 44-48॥
श्रीगौरकी शेषलीलाओंको सुननेकी वृन्दावनवासियोंकी इच्छा :- सेइ सब लीलार शुनिते विवरण। वृन्दावनवासी भक्तेर उत्कण्ठित मन ॥ 49 ॥
अनुवाद-उन समस्त अवशेष लीलाओंको सुननेके लिये वृन्दावनवासी भक्तोंका मन उत्कण्ठित है॥49॥
कल्पवृक्षतले रत्नसिंहासनपर विराजमान श्रीगोविन्दकी सेवाका वर्णन :- वृन्दावने कल्पद्रुमे सुवर्ण-सदन। महा-योगपीठ ताँहा, रत्न-सिंहासन ॥ 50 ॥ ताते बसि' आछे सदा व्रजेन्द्रनन्दन। 'श्रीगोविन्द-देव' नाम साक्षात् मदन ॥ 51 ॥
18 | श्रीचैतन्यचरितामृत