श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें8/34-41 ] श्रीकृष्णलीलाका वर्णन किया है, उसी प्रकार श्रीचैतन्यलीलाके व्यास श्रीवृन्दावनदास ठाकुर हैं॥ 34 ॥ अनुभाष्य-भाष्यकारके (श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती ठाकुरके) द्वारा सम्पादित श्रीचैतन्य-भागवतकी भूमिकामें 'श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी' जीवनी द्रष्टव्य है॥ 34 ॥ वृन्दावन-दास कैल 'चैतन्यमङ्गल'। याँहार श्रवणे नाशे सर्व-अमङ्गल ॥ 35 ॥ चैतन्यभागवत-श्रीगौर-निताइ-महिमा और भक्तिसिद्धान्तकी खान :- चैतन्य-निताइर याते जानिये महिमा। याते जानि कृष्णभक्ति-सिद्धान्तेर सीमा ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने 'चैतन्यमङ्गल' की रचनाकी है, जिसे सुननेसे सभी अमङ्गलोंका नाश होता है। इससे श्रीचैतन्य-नित्यानन्दकी महिमाको समझोगे और जिसके द्वारा श्रीकृष्णभक्ति-सिद्धान्तकी चरम सीमाको भी जानोगे॥ 35-36 ॥ अनुभाष्य-श्रीमद्भागवत भक्ति-सिद्धान्तका मूल ग्रन्थ है, किन्तु ग्रन्थका कलेवर विशाल होनेके कारण अनेक लोग इसके सारांशको ग्रहण करनेमें समर्थ नहीं होते हैं। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने उसके सारांशको अपने ग्रन्थ 'श्रीचैतन्यभागवत' में लिपिबद्ध किया है। श्रीकृष्णभक्तिके सिद्धान्तोंमें निपुण लोग ही श्रीगौर-नित्यानन्दकी महिमाको भली-भाँति प्रकारसे जाननेमें समर्थ हैं। समस्त भक्तिग्रन्थ एक स्वरमें यही गान करते हैं कि भक्तिसिद्धान्तके बिना भक्तिदेवीकी सेवा नहीं हो सकती ॥ 36 ॥ भागवते यत भक्तिसिद्धान्तेर सार। लिखियाछेन इँहा जानि' करिया उद्धार ॥ 37 ॥ चैतन्यभागवत-श्रवणसे दुर्जनोंका भी सज्जन बनना :- चैतन्यमङ्गल शुने यदि पाषण्डी, यवन। सेह महावैष्णव हय ततक्षण ॥ 38 ॥ उनकी अलौकिक रचना :- मनुष्ये रचिते नारे ऐछे ग्रन्थ धन्य। वृन्दावन-दास मुखे वक्ता श्रीचैतन्य ॥ 39 ॥ एक ग्रन्थके द्वारा ही जगत्का उद्धार :- वृन्दावनदास-पदे कोटि नमस्कार। ऐछे ग्रन्थ करि' तँहो तारिला संसार ॥ 40 ॥ अनुवाद-श्रीमद्भागवतमें जो भक्तिसिद्धान्तोंका सार है, उसे ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यमङ्गलमें उद्धृत किया है। यदि श्रीचैतन्यमङ्गलको कोई पाषण्डी (धर्मके विरुद्ध आचरण करनेवाला) अथवा यवन भी श्रवण करे, तो वह तत्क्षणात् महावैष्णव बन जाता है। ऐसे महिमायुक्त ग्रन्थकी रचना किसी मनुष्यके द्वारा सम्भव नहीं है। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके मुखसे श्रीचैतन्य महाप्रभु ही इस ग्रन्थके वक्ता अर्थात् रचयिता हैं। श्रीवृन्दावनदासके चरणोंमें मैं कृष्णदास कोटि-कोटि नमस्कार करता हूँ, जिन्होंने ऐसे ग्रन्थकी रचना करके संसारके जीवोंका उद्धार किया है॥ 37-40 ॥ महाप्रभुकी कृपापात्री नारायणीके पुत्र-श्रीवृन्दावनदास :- नारायणी-चैतन्येर उच्छिष्ट-भाजन। ताँर गर्भे जन्मिला श्रीदास-वृन्दावन ॥ 41 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभुके उच्छिष्ट महाप्रसादको बाल्यकालमें ग्रहण करनेवाली श्रीमती नारायणी देवीके गर्भसे ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरका जन्म हुआ ॥ 41 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमती नारायणी देवी श्रीवास पण्डितके भ्राताकी पुत्री थीं। उन्हें शिशुकालमें महाप्रभुके कीर्तनके अन्तमें उनका उच्छिष्ट-प्रसाद प्राप्त होता था ॥ 41 ॥ अनुभाष्य-श्रीगौर-गणोद्देशदीपिकामें श्रीकविकर्णपूरने श्रीमती नारायणी देवीके सम्बन्धमें इस प्रकार वर्णन किया है- “अम्बिकायाः स्वसा यासीन्नाम्नी श्रील-किलिम्बिका। कृष्णोच्छिष्टं प्रभुञ्जाना सेयं नारायणी मता ॥ 43 ॥” आठवाँ अध्याय | 17