भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 552

[ 8/31-34 करता। श्रीगौर-नित्यानन्द अनर्थयुक्त जीवोंके भी सेव्य वस्तु हैं और उनकी सेवा भाग्यहीन जीवोंके द्वारा श्रीकृष्णसेवाकी अपेक्षा अधिक उपयोगी है। साधक जब नामप्रणालीकी शिक्षा ग्रहण किये बिना स्वयंमें सिद्धका अभिमान करके श्रीकृष्णनामकी सेवाके लिये उद्यत होता है, तब अनर्थ ही उसके निकट उपस्थित होते हैं। किन्तु जो श्रीनिताइ-गौरके भजनमें सिद्ध होनेका अभिमानरूप कपट न रखकर अनर्थयुक्त अवस्थामें भी जो उन दो जगद्-गुरुओं (श्रीनिताइ-गौर) के पास जाता है, वे उस व्यक्तिको अनर्थोंसे मुक्त करके उसको अपने स्वयंरूप (श्रीचैतन्य महाप्रभु) और स्वयंप्रकाश (श्रीनित्यानन्द प्रभु) के स्वरूपकी उपलब्धि करा देते हैं। इससे ही उस जीवके स्वरूप ज्ञानका उदय होता है। श्रीकृष्णनाम और श्रीगौरनाम—दोनों ही नामीसे अभिन्न हैं। इस प्रकार श्रीकृष्णको श्रीगौरकी अपेक्षा लघु अथवा सङ्कीर्ण मानना अविद्याका कार्य समझना होगा। वस्तुतः जीवके प्रयोजनका विचार करनेपर श्रीगौर- नित्यानन्दके नाम-ग्रहण करनेकी उपयोगिता अधिक है। श्रीगौर-नित्यानन्द उदार हैं और उस उदारताके भीतर वे मधुर भी हैं। श्रीकृष्णकी उदारता केवल मुक्त, सिद्ध और उनके आश्रित भक्तोंपर ही दिखलायी देती है, किन्तु श्रीगौर-नित्यानन्दके औदार्य-स्रोतसे अनर्थयुक्त अपराधी जीव भोगमय अपराधोंके हाथोंसे मुक्त होकर श्रीगौर-कृष्णके चरणकमलोंको प्राप्त करते हैं॥ ३१॥ महावदान्य श्रीगौरके भजनके अतिरिक्त और कोई गति नहीं है :— स्वतन्त्र ईश्वर प्रभु अत्यन्त उदार। ताँरे ना भजिले कभु ना हय निस्तार॥ ३२॥ अनुवाद—श्रीचैतन्य महाप्रभु स्वतन्त्र ईश्वर और अत्यन्त उदार हैं। उनका भजन किये बिना जीवका उद्धार सम्भव नहीं है॥ ३२॥ अनुभाष्य—'श्रीचैतन्य-भजन' कहनेका तात्पर्य श्रीकृष्णको त्यागकर श्रीराधा-कृष्णसे अलग श्रीगौरभजन नहीं है। यह मायाकी दासतामें कल्पित भजन है और इसमें श्रीकृष्णप्रेम-माधुर्य अवस्थित नहीं है। श्रीचैतन्यके अति प्रिय निजजन श्रीस्वरूप-रूप-रघुनाथादि आचार्योंका उल्लङ्घन करके जो काल्पनिक चेष्टाओंके द्वारा यह सोचते हैं कि वे गौरभजन कर रहे हैं, उनका कभी उद्धार नहीं हो सकता। उनका यह मायाकल्पित दुष्प्रयास श्रीराधा-कृष्णसे अभिन्न श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणोंमें भीषण अपराध है, जिसके फलस्वरूप वे द्रुत गतिसे नरककी ओर बढ़ने लगते हैं। तब वे श्रीराधाकृष्ण-सेवापरायण भक्तोंमें दोषदर्शन करके श्रीरूपादि आचार्योंके चरणोंमें अपराध कर बैठते हैं। इस कारण श्रीगौरसुन्दरको मुखसे 'अवतारी' कहकर भी वे मनसे उन्हें नैमित्तिक-मनोधर्म प्रचारकोंके भाँति केवल साधुके रूपमें ही मानते हैं॥ ३२॥ व्यासावतार ठाकुर वृन्दावनदासके चैतन्यभागवतके श्रवणसे ही जीवका चरम मङ्गल :— ओरे मूढ़ लोक, शुन चैतन्यमङ्गल। चैतन्य-महिमा याते जानिबे सकल॥ ३३॥ अनुवाद—अरे मूर्ख लोगों ! श्रीचैतन्यमङ्गलका श्रवण करो, जिससे तुम श्रीचैतन्य महाप्रभुकी महिमासे पूर्णरूपसे अवगत होवोगे॥ ३३॥ अमृतप्रवाह भाष्य—देनुड़ग्राम (जिला वर्धमान) के निवासी श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने 'चैतन्यभागवत' नामक ग्रन्थकी रचना की। इस ग्रन्थका पूर्व नाम 'चैतन्यमङ्गल' था। श्रीलोचनदास ठाकुरके निजरचित ग्रन्थ 'चैतन्यमङ्गल' गान आरम्भ करनेपर श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने अपने ग्रन्थका नाम परिवर्तित कर दिया—इस प्रकार प्रसिद्धि है॥ ३३॥ कृष्णलीला भागवते कहे वेदव्यास। चैतन्य-लीलार व्यास—वृन्दावन-दास॥ ३४॥ अनुवाद—जिस प्रकार श्रीवेदव्यासने श्रीमद्भागवतमें 16 | श्रीचैतन्यचरितामृत