श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें8/27-31 ] विभावित होता है, तब उसी चित्तको 'सत्त्व' कहते हैं। इस सत्त्वसे जो भावसमूह पैदा होते हैं, उन्हें सात्त्विकभाव कहते हैं। स्तम्भ (जड़ता या निश्चलता), स्वेद (पसीना), रोमाञ्च (रोमावलीका खड़ा होना), स्वरभेद (स्वरकी विकृति, गद्गद् वाणी), वेपथु (कम्प), वैवर्ण (विषाद, भय और क्रोध आदिके द्वारा शरीरके ऊपर जो वर्ण विकार होता है, जैसे-मलिनता, कृशता आदि), अश्रु और प्रलय (मूर्च्छा)-ये आठ सात्त्विक विकार हैं। प्राण किसी अवस्थामें दूसरे चार भूतों (भूमि, जल, तेज और आकाश) के साथ पञ्चम भूतके रूपमें अवस्थित रहता है और कभी-कभी स्वप्रधान होकर अर्थात् वायु प्रधान होकर जीवके शरीरमें विचरण करता है। जिस समय वह भूमिस्थ होता है, तब स्तम्भ (जड़ता) लक्षित होता है, जलाश्रित होनेपर अश्रु, तेजस्थ होनेपर वैवर्ण एवं स्वेद या पसीना लक्षित होता है। जब वह आकाशाश्रित होता है, तब प्रलय या मूर्च्छा होती है तथा जब वह स्वप्रधान (वायुके आश्रित) होता है, तब मन्द, मध्य, तीव्र भेदसे रोमाञ्च, कम्प और स्वरभेद विकारसमूह प्रकाशित होते हैं। सूर्योदयके साथ ही अन्धकार जैसे स्वतः ही दूर हो जाता है, उसी प्रकार प्रेमाभक्तिके आविर्भावसे संसार बन्धनका स्वतः ही नाश हो जाता है॥27-28॥ नामापराधीका असंख्य बार श्रवण-कीर्तन निरर्थक :- हेन कृष्णनाम यदि लय बहुबार। तबु यदि प्रेम নহে, নহে अश्रुधार ॥ 29 ॥ तबे जानि, अपराध ताहाते प्रचुर। कृष्णनाम-बीज ताहे ना करे अङ्कुर ॥ 30 ॥ अनुवाद-ऐसे श्रीकृष्णनामको अनेक बार लेनेपर भी यदि किसी व्यक्तिको प्रेमकी प्राप्ति नहीं होती और उसके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित नहीं होती, तब यह समझ लेना चाहिये कि उसमें अपराध प्रचुर मात्रामें हैं, जिसके कारण उसके हृदयमें श्रीकृष्णनामरूपी बीज अङ्कुरित नहीं हो रहा है॥29-30॥ श्रीगौर-निताइ या उनके नाममें अपराधका विचार नहीं है :- चैतन्य-नित्यानन्दे नाहि एसब विचार। नाम लैते प्रेम देन, बहे अश्रुधार ॥ 31 ॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुके नामोंमें अपराधका विचार नहीं है, इसलिये नाम लेने मात्रसे उस व्यक्तिको वे प्रेम प्रदान कर देते हैं और उसके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है॥31॥ अमृतप्रवाह भाष्य-यदि कोई व्यक्ति श्रद्धापूर्वक श्रीचैतन्य-नित्यानन्दका आश्रय ग्रहण करता है, तो क्षणकालमें ही उसके समस्त पूर्व अपराधोंका मार्जन हो जाता है और उसके मुखमें श्रीकृष्णनामका उदय होते-होते ही वे उसे प्रेम प्रदान कर देते हैं॥31॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्य-नित्यानन्दप्रभुके आश्रित भक्तोंके द्वारा 'तृणादपि' श्लोकके अनुसार निष्कपट होकर शुद्धनाम ग्रहण करनेपर उनके नेत्रोंसे प्रेमाश्रु बहते देखे जाते हैं। श्रीकृष्णनाम अपराधका विचार करते हैं, परन्तु श्रीगौर-नित्यानन्दके नाममें अपराधका विचार नहीं है। अपराधी व्यक्तिके द्वारा श्रीकृष्णनाम ग्रहण करनेपर कभी भी उसे नामका फल (श्रीकृष्ण-प्रेम) प्राप्त नहीं होता। श्रीगौर-नित्यानन्दके नाम ग्रहण करनेवालेके अपराध रहनेपर भी नाम करते-करते अपराध-मोचनके अन्तमें उसे नामके फलकी प्राप्ति हो जाती है। इसका विचार और सिद्धान्त यह है- श्रीकृष्णविमुख साधक श्रीकृणोन्मुख होनेके लिये श्रीगौर-नित्यानन्दके पास जाते हैं। साधनसिद्ध, अनर्थमुक्त श्रीकृणोन्मुख व्यक्तिके द्वारा उच्चारित श्रीकृष्णनाम अपना (श्रीकृष्णप्रेमरूपी) फल प्रदान करता है, परन्तु साधककी अनर्थयुक्त अवस्थामें वह नाम वैसा फल प्रदान नहीं आठवाँ अध्याय | 15