भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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[ 8/25-28 समान कठोर है, इसलिये हरिनाम श्रवण-कीर्तन करनेपर भी वह द्रवीभूत नहीं होता। यद्यपि हरिनामसे चित्तद्रवताके बाह्य लक्षण अश्रु-पुलक हैं, तथापि ये अश्रु-पुलक सब समय चित्तद्रवताके लक्षण हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। श्रीरूप गोस्वामीने कहा है कि कुछ लोग ऐसे भावुक होते हैं कि उनकी आँखोंमें सहज ही अश्रु आ जाते हैं। वे सामान्य थोड़ासा सुख या दुःखका कारण उपस्थित होनेपर अधीर हो जाते हैं और उनके नेत्रोंसे अश्रु बहने लगते हैं। इस प्रकारके अश्रु बहना उनका हृदय-दौर्बल्यके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। कोई-कोई अन्य भावुक व्यक्ति प्रतिष्ठा पानेके लोभसे कृत्रिम अभ्यासके द्वारा अश्रु-पुलक दिखलाते हैं। इसलिये अश्रु-पुलक ही सदा भावावस्थाके लक्षण हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। अधिकतर देखा जाता है कि अति गम्भीर महानुभाव भक्तका चित्त कीर्तनादिके द्वारा द्रवीभूत होनेपर भी उनमें बाहरसे अश्रु-पुलकादि प्रकाशित नहीं होते। इसलिये बाहरसे अश्रु-पुलकादि होनेपर भी जो हृदय विगलित नहीं होता, वही पाषाणके समान कठोर है—यही अश्मसार-शब्दका अर्थ है। श्रीरूप गोस्वामीने भक्तिरसामृतसिन्धुमें कहा है कि जिनके हृदयमें भावका अङ्कुरमात्र भी उदित हुआ है, उन सभी पुरुषोंमें जो लक्षण देखे जाते हैं, वे इस प्रकार हैं— भक्तिभावके द्वारा हृदय द्रवित होनेपर बहिर्क्रियाके स्वरूप अश्रु-पुलकादि उदित होनेपर उसे सात्त्विक विकार कहते हैं। हृदय विकारका ऐसा साधारण लक्षण होनेपर भी कुछ असाधारण लक्षण भी हैं—क्षान्ति, अव्यर्थकालत्व, विरक्ति, मानशून्यता, आशाबन्ध, समुत्कण्ठा, नामगानमें सदा रुचि, भगवत्-गुणकीर्त्तनमें आसक्ति और वृन्दावनदि भगवत्-धामोंमें वास करनेमें प्रीति— भावभक्तिके ये नौ यथार्थ लक्षण हैं। निरपराधी भक्तजन नामसङ्कीर्त्तन करनेसे ही अपने हृदयमें नामका प्रभाव अनुभव करते हैं और नामके आस्वादनमें विभोर हो जाते हैं। उस अनुभवके कार्यस्वरूप हृदय द्रवित हो जाता है, जिससे उक्त लक्षण प्रकटित होते हैं। किन्तु जो अपराधी, परश्रीकातर (दूसरोंके सम्पन्न होनेपर ईर्ष्यालु) होते हैं, बहुत नाम करनेपर भी नामकी अप्रसन्नतासे उनका चित्त भक्तिभावसे द्रवित नहीं होता। बाहरसे अश्रु-पुलकादि देखे जानेपर भी हृदय लोहेके समान कठिन होनेके कारण, इस श्लोकमें उनकी निन्दा की गयी है। साधुसङ्गके प्रभावसे निरन्तर नाम ग्रहण करनेसे चित्त द्रवित होनेपर उनके हृदयका काठिन्य दूर हो सकता है॥25॥ स्वप्रकाश नामप्रभुका जिह्वापर उदित होकर श्रीकृष्णप्रेम-प्रदान :- एक ‘कृष्णनामे’ करे सर्वपाप नाश। प्रेमेर कारण भक्ति करेन प्रकाश॥26॥ अनुवाद—एक (अपराधरहित) श्रीकृष्णनाम सभी पापोंका नाश करके प्रेम उत्पन्न करानेवाली (साधन) भक्तिको प्रकाशित करता है॥26॥ अमृतप्रवाह भाष्य—प्रेमको उदय करानेवाली जो साधनभक्ति है, उसे प्रकाशित करता है॥26॥ शुद्धनामका फल श्रीकृष्णप्रेमके लक्षण :- प्रेमेर उदये हय प्रेमेर विकार। स्वेद-कम्प-पुलकादि गद्गदाश्रुधार॥27॥ अनायासे भवक्षय, कृष्णेर सेवन। एक कृष्णनामेर फले पाइ एत धन॥28॥ अनुवाद—(साधकमें) प्रेम उदय होनेसे शरीरमें स्वेद (पसीना), कम्प और पुलकादि, गला रुद्ध होना तथा नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होना—ये प्रेमके विकार उत्पन्न होते हैं। अनायास ही उसका भवबन्धन कट जाता है और उसे श्रीकृष्ण-सेवाकी प्राप्ति होती है। एक श्रीकृष्णनामसे उसे इतनी विशाल धनराशिकी प्राप्ति होती है॥27-28॥ अमृतानुकणिका—कृष्ण सम्बन्धी किसी भावके द्वारा जब चित्त साक्षात् रूपमें अथवा कुछ व्यवधानके साथ 14 | श्रीचैतन्यचरितामृत