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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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गीता-भागवतमें कहा है कि हम शरीर नहीं आत्मा हैं और उसे ही गुरु एवं अन्य शास्त्र भी कह रहे हैं, तो इसमें विश्वास रखना चाहिये। जब माँ जिसे हमारा पिता बतलाती है और हम उसके वचनोंपर विश्वासकर उसे अपना पिता मान लेते हैं, तब भगवान् और गुरुके वचनोंपर विश्वास क्यों नहीं होता? भगवान् और गुरुके वचनोंपर विश्वास करके इन दस प्रकारके नामापराधोंसे बचना चाहिये॥24॥ अपराधीके पाषाण-हृदयमें भाव शुद्ध नहीं, कृत्रिममात्र :- (श्रीमद्भागवत-2/3/24)— तदश्मसारं हृदयं वतेदं, यद्गृह्यमाणैर्हरिनामधेयैः। न विक्रियेताथ यदा विकारो, नेत्रे जलं गात्ररुहेषु हर्षः॥25॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥25॥ अमृतप्रवाह भाष्य-हरिनाम ग्रहण करनेपर भी जिनके हृदयमें विकार, नेत्रोंमें अश्रु और शरीरमें रोमाञ्च नहीं होता, उनका हृदय पाषाणके समान अर्थात् कठोर अपराधके द्वारा उनका हृदय कठोर होता है, इसलिये नामग्रहणसे भी वह द्रवीभूत नहीं होता॥25॥ अनुभाष्य-श्रीसूत गोस्वामीके मुखसे श्रीशुक- परीक्षित-संवाद श्रवण करते-करते ऋषियोंके द्वारा और अधिक श्रवण करनेकी अभिलाषा प्रकट करनेपर हरिकथा श्रवणसे विमुख लोगोंकी निन्दाके प्रसङ्गमें श्रीसूत गोस्वामीको सम्बोधित शौनक-वाक्य,— यत् हृदयं गृह्यमाणैः (कीर्त्त्यमानैरपि) हरिनामधेयैः न विक्रियेत, बत (अहो!) तत् इदं हृदयं अश्मसारं (नामापराधवशात् अश्मवत् पाषाणखण्डतुल्यः सारो यस्य तत्, कठिनमेव)। अथ यदा विकारो भवति, [तदा] नेत्रे जलं (अश्रु) गात्ररुहेषु हर्षः (रोमाञ्चः) भवति। (अतिगम्भीराणां महाभागवतानां हरिनामभिः चित्तद्रवेऽपि बहिरश्रुपुलकादीनाम् अदर्शनात् कृत्रिमाभ्यासानुकार पराणां पिच्छिलचित्तानां जड़ीय-प्रतिष्ठाभिलाषिणां सत्त्वाभासाद्भावेऽपि बहिः कपटाश्रुपुलकदयो दृश्यन्ते। अतएव बहुनामग्रहणेऽपि कनिष्ठाधिकारिणां विषयभोगप्रवणत्वात् कृत्रिमचित्तद्रवभावो नामापराध-लिङ्गमेवेति सन्दर्भः)। श्लोक भावानुवाद—(नामापराधके कारण) जिस हृदयमें हरिनाम लेनेपर भी विकार नहीं होता, वह पाषाणके समान कठोर ही है। हृदय जब पिघल जाता है, तब नेत्रोंसे अश्रुधारा बहती है और रोमावली आनन्दसे पुलकित होती है। (अति गम्भीर महाभागवतोंमें हरिनाम ग्रहण करनेसे चित्त द्रवित होनेपर भी बाहर अश्रु-पुलकादि नहीं दिखायी देते। कृत्रिम अभ्यास करके उनका अनुकरण करनेवाले कठोर हृदयवाले व्यक्तियोंमें सत्त्वाभास न होनेपर भी केवल जड़-प्रतिष्ठाके लिये बाहर कपट अश्रु-पुलकादि दिखलायी देते हैं। इसलिये बहुत नाम करनेपर भी कनिष्ठ अधिकारीके द्वारा विषय भोगोंमें लिप्त होनेके कारण चित्तके द्रवित होनेके कृत्रिम विकार प्रदर्शन करना नामापराध ही है)। श्रीमद्भागवतके इस श्लोकके गौड़ीय भाष्यमें श्रील विश्वनाथ चक्रवर्तीकी टीका, तथ्य और विवृति द्रष्टव्य है॥25॥ अमृतानुकणिका—शौनक ऋषि हरिकथा श्रवण-कीर्तन और हरिसेवाकी श्रेष्ठता प्रतिपादनके प्रसङ्गमें हरिभजनहीन व्यक्तियोंके बाह्य अङ्गसमूहकी निन्दा करके अब उनके अन्तःकरणकी भी निन्दा कर रहे हैं। अनर्थमुक्त पुरुषको नाम ग्रहणमात्रसे ही नाम माधुर्य अनुभव होता है, इसलिये नाम-माधुर्य अनुभवके साथ-साथ हृदयमें विकार और उसके भीतरी लक्षण क्षान्ति आदि तथा बाह्य लक्षण अश्रु-पुलकादि प्रकाशित होते हैं। अनेक बार हरिनाम ग्रहण करनेपर भी यदि किसीका हृदय द्रवीभूत नहीं होता, तब निश्चय ही वह व्यक्ति नामापराधी है। सर्वशक्तिमान् नाम देह-गृह-परिवार-लोभ आदिमें आसक्त पाषाण-सम चित्तमें शीघ्र फलजनक नहीं होते। इन सब प्रतिबन्धकोंके द्वारा हृदय विकार निरस्त हो जाते हैं। सामान्यमात्र प्रतिबन्धक रहनेपर उच्चारित नाम नामाभास होता है। किन्तु बृहत् प्रतिबन्धक रहनेपर उच्चारित नामाक्षर नामापराध मात्र है। नामापराधीका हृदय लोहेके

आठवाँ अध्याय | 13

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