श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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श्रीचैतन्यचरितामृत लिखा है, इसलिये इसमें शुक पक्षीके पाठकी भाँति मेरी कोई महिमा नहीं है॥ 78 ॥
इति अमृतप्रवाह भाष्ये अष्टम परिच्छेदः। आठवें अध्यायका अमृतप्रवाह भाष्य पूर्ण हुआ।
कुलाधिदेवता मोर—मदनमोहन। याँर सेवक—रघुनाथ, रूप, सनातन ॥ 80 ॥
अनुवाद—श्रीरूप, श्रीसनातन और श्रीरघुनाथ जिनके सेवक हैं, वही श्रीमदनमोहन मेरे कुलाधिदेवता हैं॥ 80 ॥
ग्रन्थकारकी श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके प्रति वैष्णवोचित गुरुबुद्धि और प्रणति :— वृन्दावन-दासेर पादपद्म करि' ध्यान। ताँर आज्ञा लञा लिखि याहाते कल्याण ॥ 81 ॥ चैतन्यलीलाते 'व्यास'—वृन्दावन-दास। ताँर कृपा बिना अन्ये ना हय प्रकाश ॥ 82 ॥
अनुवाद—श्रीवृन्दावनदास ठाकुरके चरणकमलोंका ध्यान करते हुए उनसे आज्ञा लेकर मैं यह ग्रन्थ लिख रहा हूँ, जिससे सभीका कल्याण होगा। श्रीचैतन्यलीलाके 'व्यास' श्रीवृन्दावनदास ठाकुर हैं, इसलिये उनकी कृपाके बिना किसीके भी हृदयमें श्रीचैतन्यलीलाकी स्फूर्ति नहीं हो सकती॥ 81-82 ॥
ग्रन्थकारकी दैन्योक्ति :— मूर्ख, नीच, क्षुद्र मुञि विषय-लालस। वैष्णवाज्ञा-बले करि एतेक साहस ॥ 83 ॥ श्रीरूप-रघुनाथ-चरणेर एइ बल। याँर स्मृते सिद्ध हय वाञ्छितसकल ॥ 84 ॥
अनुवाद—मैं मूर्ख, नीच, अति क्षुद्र और विषयोंका लोभी हूँ। केवल वैष्णवोंकी आज्ञाके बलपर मैं (यह ग्रन्थ लिखनेका) साहस कर रहा हूँ। श्रीरूप-रघुनाथके चरणोंमें इतना बल है कि केवल उनके स्मरणमात्रसे समस्त कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं॥ 83-84 ॥
श्रीरूप-रघुनाथ-पदे यार आश। चैतन्यचरितामृत कहे कृष्णदास ॥ 85 ॥
अनुवाद—श्रीरूप-रघुनाथ गोस्वामीके चरणकमलोंकी कृपाभिलाषा करते हुए कृष्णदास इस श्रीचैतन्यचरितामृतका वर्णन कर रहा है॥ 85 ॥
इति श्रीचैतन्यचरितामृते आदिखण्डे ग्रन्थकरणे वैष्णवाज्ञारूपकथनं नामाष्टम-परिच्छेदः। श्रीचैतन्यचरितामृतके आदिखण्डके 'ग्रन्थ रचनार्थ वैष्णवोंकी आज्ञा' नामक आठवें अध्यायका अनुवाद समाप्त।