भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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8/69-79 ] श्रीगौर-कथाके अतिरिक्त और कुछ नहीं आता है। उनके शिष्य श्रीगोविन्ददेवजीके पुजारी श्रीचैतन्यदास, श्रीमुकुन्दानन्द चक्रवर्ती और प्रेमी कृष्णदास हैं। श्रीअनन्ताचार्यके शिष्य श्रीशिवानन्द चक्रवर्ती हैं, जिनके चित्तमें सदा श्रीगौराङ्ग-नित्यानन्द वास करते हैं॥67-70॥ अनुभाष्य-भूगर्भ गोस्वामी (चैःचः आदिलीला 12/81) के शिष्य श्रीचैतन्यदास, मुकुन्ददास और कृष्णदास हैं। 'शिवानन्द'-चैःचः आदिलीला 12/87 संख्या द्रष्टव्य है॥69-70॥ इति अनुभाष्ये अष्टम परिच्छेदः। आठवें अध्यायका अनुभाष्य पूर्ण हुआ। आर यत वृन्दावने बैसे भक्तगण। शेष-लीला शुनिते सबार हैल मन॥71॥ मोरे आज्ञा करिला सबे करुणा करिया। ताँ-सबार बोले लिखि निर्लज्ज हइया॥72॥ अनुवाद-और भी वृन्दावनमें जितने भक्त हैं, सभीका मन श्रीचैतन्यकी शेष-लीलाको सुननेके लिये उत्सुक है। सभीने कृपा करके मुझे आज्ञा प्रदान की और उन सबके कहनेपर मैं निर्लज्ज होकर लिख रहा हूँ॥71-72॥ वैष्णवादेशसे सम्भ्रम सहित श्रीमदनगोपालसे आज्ञा प्रार्थना :- वैष्णवेर आज्ञा पाञा चिन्तित-अन्तरे। मदनगोपाले गेलाङ आज्ञा मागिवारे॥73॥ अनुवाद-उन समस्त वैष्णवोंकी आज्ञा प्राप्तकर मैं चिन्तित हो गया और श्रीमदनगोपालसे अनुमति माँगने गया॥73॥ गोस्वामिदासके द्वारा प्रार्थना करते ही सभी वैष्णवोंके सामने श्रीमदनगोपालकी आज्ञा-मालाका गिरना :- दरशन करि कैलुँ चरण वन्दन। गोसाञिदास पूजारी करे चरण-सेवन॥74॥ प्रभुर चरणे यदि आज्ञा मागिल। प्रभुकण्ठ हैते माला खसिया पड़िल॥75॥ सर्व वैष्णवगण हरिध्वनि दिल। गोसाञिदास आनि' माला मोर गले दिल॥76॥ अनुवाद-श्रीमदनगोपालका दर्शन करके मैंने उनके चरणोंकी वन्दना की। उस समय श्रीगोसांईदास पुजारी श्रीविग्रहकी चरणसेवा कर रहे थे। श्रीमदनगोपालके चरणोंमें मैंने जब आज्ञा माँगी, तब प्रभुके गलेसे एक पुष्पमाला खुलकर नीचे गिर गयी। यह देखकर सभीने हरिध्वनि की और पुजारी गोसांईदासने वह माला मेरे गलेमें डाल दी॥74-76॥ आज्ञा-माला लाभसे ही इस ग्रन्थ-लेखनमें प्रवृत्ति :- आज्ञामाला पाञा आमार हइल आनन्द। ताहाइ करिनु एइ ग्रन्थेर आरम्भ॥77॥ अनुवाद-आज्ञामाला पाकर मुझे बहुत आनन्द हुआ, इसलिये मैंने यह ग्रन्थ आरम्भ किया॥77॥ ग्रन्थरचनामें श्रीमदनमोहनकी ही सम्पूर्ण क्रिया या प्रेरणा :- एइ ग्रन्थ लेखाय मोरे 'मदनमोहन'। आमार लिखन येन शुकेर पठन॥78॥ सेइ लिखि, मदनगोपाल मोरे ये लिखाय। काष्ठेर पुत्तली येन कुहके नाचाय॥79॥ अनुवाद-श्रीमदनमोहन ही मुझसे यह ग्रन्थ लिखवा रहे हैं। मेरा लिखना शुक (तोते) के पाठ करनेके समान है (शुकको जो पढ़ाया जाता है, वह वही बोलता है)। जैसे काठकी पुतलीको मदारी नचाता है, वैसे ही श्रीमदनगोपाल जो मुझसे लिखवा रहे हैं, मैं वही लिख रहा हूँ॥78-79॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीमदनगोपालकी प्रेरणासे मैंने आठवाँ अध्याय | 23