श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंदसवाँ अध्याय दसवें अध्यायका सार-इस दसवें अध्यायमें श्रीचैतन्य महाप्रभुकी निजशाखाका वर्णन हुआ है। (अमृतप्रवाह भाष्य) श्रीगौर-कल्पतरुकी मूलशाखाका वर्णन :- एइ मालीर-एइ वृक्षर अकथ्य कथन। एबे शुन मुख्य-शाखार नाम-विवरण॥ ३॥ अनुवाद-श्रीचैतन्यमालीके इस भक्ति-कल्पवृक्षका वर्णन अनिर्वचनीय है। अब उनकी मुख्य शाखाओंके नाम और विवरण सुनिये॥ ३॥ श्रीगौरभक्त-वन्दना :- श्रीचैतन्यपदाम्भोज-मधुपेभ्यो नमो नमः। कथञ्चिदाश्रयाद् येषां श्वापि तद्गन्धभाग्भवेत्॥ १॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥१॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंके भ्रमररूपी भक्तोंको मैं बारम्बार नमस्कार करता हूँ। उनका किसी प्रकारसे आश्रय लेनेसे (अभक्तरूपी) कुत्ता भी उनके चरणकमलोंकी गन्ध प्राप्त करनेका सौभाग्य प्राप्त करता है॥ १॥ अनुभाष्य-श्रीचैतन्यपदाम्भोजमधुपेभ्यः (श्रीचैतन्यस्य पदाम्भोजयोः मधुः भक्तिरसं पिबन्ति ये मधुपाः भृङ्गाः तेभ्यः गौरभक्तेभ्यः) नमो नमः; - येषां कथञ्चित् (केनचित् अपि प्रकारेण) आश्रयात् श्वा (कुकुरः - भोगापरः भगवद्भक्तौ श्रद्धाहीनः) अपि तद्-गन्धभाक् (तयोः गौरपदकमलयोः गन्धं भजति प्राप्नोति इति गौरभक्तिमान्) भवेत्। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है। श्रीगौरसुन्दरके चरणकमलोंकी गन्धको प्राप्त करते हैं अर्थात् उनके भक्त बन जाते हैं॥१॥ जय जय श्रीकृष्णचैतन्य-नित्यानन्द। जयाद्वैतचन्द्र जय गौरभक्तवृन्द॥२॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य महाप्रभु और श्रीनित्यानन्द प्रभुकी जय हो, जय हो। श्रीअद्वैतचन्द्रकी जय हो, सभी गौरभक्तोंकी जय हो॥ २॥ श्रीगौरभक्तोंमें बड़े-छोटेका भेद नहीं :- चैतन्य-गोसाञिर यत पारिषदचय। लघु-गुरु-भाव ताँर ना हय निश्चय॥ ४॥ यत यत महान्त कैला ताँ-सबार गणन। केह करिवारे नारे ज्येष्ठ-लघु-क्रम॥ ५॥ अतएव ताँ-सबारे करि' नमस्कार। नाम-मात्र करि, दोष ना लबे आमार॥ ६॥ अनुवाद-श्रीचैतन्य गोस्वामीके पार्षदोंमें कौन बड़ा है? कौन छोटा है?- यह निर्णय करना सम्भव नहीं है। जिन-जिन महापुरुषोंने उन सबकी गणना की है, उनमेंसे किसीने भी बड़े-छोटेके क्रमानुसार उनका परिचय नहीं दिया। इसलिये मैं उन सबको प्रणामकर केवलमात्र उनके नामोंका उल्लेख कर रहा हूँ, वे मेरे इस दोषको ग्रहण न करें॥ ४-६॥ वन्दे श्रीकृष्णचैतन्य-प्रेमामरतरोः प्रियान्। शाखारूपान् भक्तगणान् कृष्णप्रेमफलप्रदान्॥ ७॥ अनुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ ७॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीकृष्णचैतन्यरूप प्रेम-कल्पवृक्षके श्रीकृष्णप्रेमफलदाता शाखारूप उनके प्रिय भक्तोंकी मैं वन्दना करता हूँ॥ ७॥