भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

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पृष्ठ 578

[ 10/7-13 अनुभाष्य-श्रीकृष्णचैतन्यप्रेमाम्रतरोः (गौरप्रेम-देववृक्षस्य) कृष्णप्रेमफलप्रदान् शाखारूपान् प्रियान् भक्तगणान् अहं वन्दे। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥7॥ (1-क, ख, ग, घ) श्रीवास-श्रीरामादि चार भ्राता-शाखा :- श्रीवास पण्डित आर श्रीराम पण्डित। दुइ भाइ-दुइ शाखा, जगते विदित॥8॥ श्रीपति, श्रीनिधि-ताँर दुइ सहोदर। चारि भाइर दास-दासी, गृह-परिकर॥9॥ उनकी ऐकान्तिकी गौरभक्ति :- दुइ शाखार उपशाखाय ताँ-सबार गणन। याँर गृहे महाप्रभुर सदा सङ्कीर्त्तन॥10॥ सवंशे करेन याँरा चैतन्येर सेवा। गौरचन्द्र बिना नाहि जाने देवी-देवा॥11॥ अनुवाद-श्रीवास पण्डित और श्रीराम पण्डित-ये दोनों भाई दो शाखाओंके रूपमें जगत्में जाने जाते हैं। इन दोनोंके भाई श्रीपति और श्रीनिधि एवं इन चारों भाइयोंके दास-दासियाँ तथा समस्त गृह-परिवारकी गणना उन दो शाखाओंकी उपशाखाके रूपमें होती है। इनके घरमें श्रीचैतन्य महाप्रभु सदा सङ्कीर्तन करते थे। ये चारों भाई अपने वंश सहित श्रीचैतन्यदेवकी सेवा करते थे और श्रीगौरचन्द्रके अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवताको नहीं जानते थे॥8-11॥ अनुभाष्य-श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 90वें श्लोकमें श्रीवास पण्डितके विषयमें इस प्रकार वर्णन आता है- “श्रीवासपण्डितो धीमान् यः पुरा नारदो मुनिः। पर्वताख्यो मुनिवरो य आसीन्नारदप्रियः। स रामपण्डितः श्रीमान् तत्कनिष्ठसहोदरः॥"90॥ “जो पूर्वकालमें श्रीनारद मुनि थे, वे ही अब श्रीवास पण्डितरूपमें विख्यात हैं। श्रीनारद-प्रिय श्रीपर्वतमुनि ही श्रीवासके कनिष्ठ भ्राता श्रीमान् राम पण्डित हैं।" और 42वें श्लोकमें यह वर्णित है- “नाम्नाम्बिका व्रजे धात्री स्तन्यदात्री स्थिता पुरा। सैवेडयं 'मालिनी' नाम्नी श्रीवासगृहिणीमता॥"42॥ “पूर्वकालमें जो व्रजमें श्रीकृष्णको स्तनपान करानेवाली धात्री-माता 'अम्बिका' थीं, वे ही अब श्रीवास पण्डितकी पत्नी मालिनीदेवी हैं।” श्रीवासके भाईकी पुत्री ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी जननी नारायणीदेवी हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुके संन्यास ग्रहणके पश्चात् श्रीवास पण्डित नवद्वीपके वास-स्थानको छोड़कर कुमारहट्टमें वास करने लगे-चैःभाः अन्त्यखण्डके पाँचवें अध्यायमें इसका वर्णन है॥8-11॥ (2) श्रीचन्द्रशेखर-शाखा :- 'आचार्यरत्न'-नाम धरे बड़ एक शाखा। ताँर परिकर, ताँर शाखा-उपशाखा॥12॥ आचार्यरत्नेर नाम 'श्रीचन्द्रशेखर'। याँर घरे देवी-भावे नाचिला ईश्वर॥13॥ अनुवाद-'आचार्यरत्न' नामकी एक बड़ी शाखा है और उनके परिकर उनकी शाखा और उपशाखा हैं। आचार्यरत्नका नाम श्रीचन्द्रशेखर है और उनके घरमें महाप्रभुने देवीके (रुक्मिणीके) भावमें नृत्य किया था॥12-13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचन्द्रशेखर आचार्यरत्न किसी- किसी ग्रन्थके अनुसार महाप्रभुके मौसा हैं। अनुभाष्य-'श्रीचन्द्रशेखर' - श्रीमान् नवनिधिमेंसे प्रमुख, अथवा चन्द्र (?) हैं। इनके घरमें ही महाप्रभुका देवीभावमें नृत्य-अभिनय हुआ था (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अः)। श्रीचन्द्रशेखरका घर अब 'व्रजपत्तन'-नामसे सुप्रसिद्ध है। श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके विषयमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन्हें अवगत कराया था (चैःभाः मध्यखण्ड, 28वाँ अः) और संन्यासके समय श्रीनित्यानन्द एवं मुकुन्द दत्तके साथ कटोआमें उपस्थित 42 | श्रीचैतन्यचरितामृत