श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें10/13-14 ] होकर संन्यासके उपयुक्त कार्योंका सम्पादनकर इन्होंने नवद्वीप लौटकर सबको महाप्रभुके संन्यास-ग्रहणकी सूचना दी थी। इनके घरपर महाप्रभुके कीर्त्तनका विषय-चैःभाः मध्यखण्ड, ४वें अः, चाँद-काजीके दलनके समय ये नगरसङ्कीर्त्तनमें सम्मिलित थे और श्रीधरपर महाप्रभुकी कृपा करनेके समय भी ये वहाँ उपस्थित थे (चैःभाः मध्यखण्ड, २३वाँ अः)। ये भक्तोंके साथ श्रीचैतन्यदेवके दर्शनके लिये गौड़देशसे श्रीजगन्नाथपुरी आया करते थे॥13॥ (3) श्रीपुण्डरीक-शाखा :- पुण्डरीक विद्यानिधि-बड़शाखा जानि। याँर नाम लञा प्रभु कान्दिला आपनि॥14॥ अनुवाद-भक्ति-कल्पवृक्षकी एक और बड़ी शाखा श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि हैं, जिनका नाम लेकर महाप्रभु स्वयं क्रन्दन करते थे॥14॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि चट्टग्रामके निवासी थे॥14॥ अनुभाष्य-श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 54-57वें श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है- “वृषभानुस्तया ख्यातः पुरा यो व्रजमण्डले। अधुना पुण्डरीकाक्षो विद्यानिधि-महाशयः॥ 54॥ स्वकीयभावमास्वाद्य राधा-विरहकातरः। चैतन्यः पुण्डरीकाक्षमये तातावदत् स्वयम्॥ 55॥ 'प्रेमनिधि' तया ख्यातिं गौरो यस्मै ददौ सुधीः। माधवेन्द्रस्य शिष्यत्वात् गौरवञ्च सदाकरोत्॥ 56॥ तत्प्रकाशविशेषोऽपि मिश्रः श्रीमाधवो मतः। रत्नावती तु तत्पत्नी कीर्त्तिदा कीर्त्तिता बुधैः॥”57॥ “पूर्वकालमें जो व्रजमण्डलमें श्रीवृषभानुरूपमें विख्यात थे, वे ही अब पुण्डरीकाक्ष विद्यानिधि हैं। स्वकीयभावका अवलम्बन करते राधाभावमें विरहकातर श्रीचैतन्य महाप्रभु श्रीपुण्डरीकाक्षको स्वयं पिता कहकर सम्बोधन करते थे। श्रीगौरसुन्दरने उन्हें 'प्रेमनिधि' उपाधि दी थी और श्रीमाधवेन्द्रपुरीपादका शिष्य जानकर उनका सदा सम्मान करते थे। इनकी पत्नी 'रत्नावती' थीं, किन्तु पण्डितलोग उन्हें 'कीर्त्तिदा' कहते थे।” इनके पिताका नाम वाणेश्वर (अन्य मतके अनुसार 'शुक्लाम्बर' ब्रह्मचारी) और माताका नाम गङ्गादेवी था। अन्य मतके अनुसार, वाणेश्वर शिवराम गङ्गोपाध्यायके वंशमें जन्में थे। इनके पिता जिला ढाका जिलाके बाधिया ग्रामके वारेन्द्र-श्रेणीके ब्राह्मण थे, इसलिये वहाँके राढ़ीय ब्राह्मण समाजने उन्हें स्वीकार नहीं किया; इस कारणसे उनके शाक्त अधस्तनगण 'बहिष्कृत' होकर समाजके 'बहिष्कृत' लोगोंके ही पुरोहितका कार्य करते आ रहे हैं। इनमेंसे सरोजानन्द गोस्वामी नामक एक व्यक्ति वृन्दावनमें आकर रह रहे हैं। इनके वंशकी यह विशेषता यह है कि सभी भाइयोंमें केवल एकको ही पुत्रकी प्राप्ति होती थी और अन्य भाइयोंके घरोंमें कन्याका जन्म होता था या कोई सन्तान नहीं होती थी। इस कारणसे इनके वंशका विस्तार न हो सका। चट्टग्रामके उत्तर-पूर्वमें 'मेखलाग्राम'में इनका पूर्व निवास था। [टीका लिखनेके समय-] विद्यानिधिका भजन मन्दिर अत्यन्त जीर्ण और अस्वच्छ है, इसका संस्कार नहीं करनेपर शीघ्र ही लुप्त होनेकी सम्भावना है। मन्दिरकी दीवारपर ईंटके पटलपर दो श्लोक खुदे हैं; अक्षर विकृत होनेके कारण पढ़े नहीं जा सकते और उनके अर्थ भी समझे नहीं जा सकते। इस मन्दिरसे दक्षिण-पूर्व दिशामें 400-500 हाथ दूरीपर एक और मन्दिर देखा जाता है, उसकी दीवारपर ईंटके पटलपर लिखे अक्षर भी नहीं पढ़े जाते हैं। इसके ही सामने 15-20 हाथकी दूरीपर बाई ओर एक और मन्दिर होनेकी बात वहाँ गिरी हुई अनेक ईंटोंके टुकड़ोंको देखकर जानी जाती है। वहाँके लोगोंसे सुननेमें आता है कि यही मुकुन्द दत्तका भजन मन्दिर था। पुण्डरीक विद्यानिधिके वंशमें श्रीहरकुमार स्मृतितीर्थ और श्रीकृष्णकिङ्कर विद्यालङ्कार अभी भी वर्तमान हैं। (वैष्णव-मञ्जूषा-प्रथम संख्या द्रष्टव्य है)। दसवाँ अध्याय | 43