श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
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महाप्रभु इनको 'बाप' कहकर बुलाते थे और इन्हें 'प्रेमनिधि' नाम दिया था। ये श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके गुरु और श्रीदामोदर स्वरूपके सुहृद थे। अबोध लोगोंको सतर्क करके मङ्गल शिक्षा देनेके उद्देश्यसे श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने श्रीविद्यानिधिको पहले विषयी समझकर भूल करनेका अभिनयकर फिर अन्तमें उन्हींसे दीक्षा-अभिनय लीला की। श्रीजगन्नाथदेवके द्वारा उन्हें थप्पड़ मारनेका वृत्तान्त—चैःभाः अन्त्यखण्ड, 10वें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥14॥
अमृतानुकणिका—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 10अः संख्या 90-151) ओड़न अथवा उड़न-षष्ठी नामक यात्रामें श्रीजगन्नाथदेव नये माँड़युक्त वस्त्र धारण करते हैं। माँड़युक्त वस्त्र धारण किये हुए श्रीजगन्नाथदेवको देखकर विद्यानिधिके मनमें सन्देह हुआ। विद्यानिधिने दामोदर स्वरूपसे पूछा,—"ईश्वरको माँड़युक्त वस्त्र क्यों प्रदान किये जाते हैं? इस देशमें तो श्रुति-स्मृतिका प्रचुर परिमाणमें प्रचार है, फिर क्यों बिना धोए माँड़युक्त वस्त्र पहनाये जाते हैं? माँड़युक्त वस्त्रोंको स्पर्श करनेसे हाथ धोकर शुद्ध होना पड़ता है।" दामोदर स्वरूपने कहा,—"यद्यपि श्रीजगन्नाथदेवके सेवक नियम जानते हैं, तो भी इस यात्रा-उत्सवपर सब समय ऐसा ही होता है। यह श्रीजगन्नाथदेवकी ही इच्छा है, इसलिये राजा भी इसके लिये निषेध नहीं करते।" विद्यानिधिने कहा,—"ठीक है, श्रीजगन्नाथदेव ईश्वर हैं, उनके लिये सब कुछ सम्भव है, परन्तु उनके सेवक ईश्वर जैसा आचरण क्यों कर रहे हैं? इन पूजा-पण्डा आदिने अपवित्र वस्त्र क्यों धारण किये हैं? राजाने भी माँड़युक्त वस्त्र सिरपर क्यों धारण किया है?" दामोदर स्वरूपने कहा,—"सुनो भाई! लगता है, ओड़न-यात्रामें दोष नहीं है। श्रीजगन्नाथदेव परमब्रह्म हैं। यहाँ वे विधि-निषेधका विचार नहीं करते हैं।" विद्यानिधिने कहा,—"भाई, एक बात सुनो! श्रीजगन्नाथदेव विग्रह परम ब्रह्मस्वरूप हैं। वे यदि विधि-निषेधोंका उल्लङ्घन करें, तो इसमें कोई दोष नहीं है। परन्तु ये सब लोग भी नीलाचलमें रहकर लोक व्यवहार छोड़ चुके हैं, क्या सभी ब्रह्मरूप-अवतार हो गये हैं?" इतना कहकर दोनों सम्पूर्ण मार्गमें हँसते-हँसते श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके प्रभावको न जानकर उनके आचरणपर दोषारोपण कर रहे थे। भिक्षाके उपरान्त दोनों गौराङ्ग महाप्रभुके पास चले आये। महाप्रभुके पास आकर वे सो गये। केवल श्रीकृष्ण ही जानते हैं कि किसमें कितना अनुराग है। श्रीकृष्ण अपने दासोंको भ्रममें डाल देते हैं, और बादमें दयावान होकर भ्रम दूर भी करते हैं। गौराङ्ग महाप्रभु सब कुछ जानते थे। श्रीजगन्नाथके रूपमें महाप्रभु स्वप्नमें उनके पास गये। विद्यानिधि महाशयने स्वप्नमें देखा कि श्रीजगन्नाथ-बलरामका शुभागमन हुआ है, परन्तु दोनों क्रोधित होकर उन्हें पकड़कर उनके दोनों गालोंपर थप्पड़ मार रहे हैं। थप्पड़ इतने ज़ोरसे मारे कि उनके गाल फूल गये और उनपर उँगलियोंके निशान बन गये। विद्यानिधि कहने लगे,—"हे कृष्ण! रक्षा करो, अपराध क्षमा करो, हे स्वामी! किस अपराधके कारण आप मुझे मार रहे हैं?" श्रीजगन्नाथने कहा,—"तेरे अपराधोंका अन्त नहीं है। मेरी और मेरे सेवकोंकी जाति नहीं है। मुझे परब्रह्मके रूपमें स्थापित करके भी तुमने माँड़युक्त वस्त्रके प्रति दोष-दृष्टि रखकर मेरे सेवकोंकी निन्दा की है।" स्वप्नमें विद्यानिधि मनसे महाभयभीत होकर श्रीचरणोंपर सिर पटकते हुए क्रन्दन करने लगे। विद्यानिधि कहने लगे,—"हे प्रभु! मुझ पापीके सभी अपराध क्षमा कीजिये। हे प्रभु, जिस मुखसे मैंने आपके सेवकोंकी हँसी उड़ाई है, आपने मेरे उस मुखको भलीभाँति दण्ड प्रदान किया है। आज मेरे सौभाग्यका दिन है। मेरे मुख और ललाटको आपके श्रीहस्तका स्पर्श मिला है।" श्रीजगन्नाथने कहा,—"सेवक समझकर तुमपर अनुग्रह करनेके लिये मैंने तुम्हें दण्ड प्रदान किया है।" स्वप्न देखनेके उपरान्त विद्यानिधि जाग उठे। फिर सूजे हुए गालोंपर थप्पड़ोंके निशान देखकर वे हँसने लगे। यह देखकर विद्यानिधिने कहा,—"बहुत अच्छा
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