भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

पृष्ठ 581, कुल 2549 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 581

10/14-19 ] हुआ, बहुत अच्छा हुआ। अपराधानुसार मुझे सजा मिली है। अच्छा ही किया प्रभुने, मुझे तो कम सजा मिली है।" विद्यानिधिकी इस महिमाको देखिये। सेवकके प्रति प्रभु-दयाकी यही सीमा है। अपने पुत्र प्रद्युम्नको भी शिक्षा हेतु प्रभु इस प्रकार (स्वप्नमें) थप्पड़ नहीं मारते। जानकी, रुक्मिणी, सत्यभामा आदि कितने ही ईश्वर-ईश्वरी हैं, उनको भी स्वप्नमें भी दण्ड नहीं देते। अपराधीको प्रभु साक्षात् ही मारते हैं। स्वप्नमें प्रदान की गई कृपा अथवा दण्ड बाहरसे कभी दिखायी नहीं देते। स्वप्नमें भले ही कोई दण्डित होता है अथवा किसीको अर्थकी प्राप्ति होती है, परन्तु पुरुषके जग जानेपर उन सबका कुछ भी अस्तित्व नहीं रहता है। प्रभु स्वप्नमें जिन्हें दण्ड अथवा कृपा प्रदान करते हैं, जागनेपर जब वे उसके साक्षात् दर्शन करते हैं, तब उन्हें इस बातकी प्रतीति होती है कि उनसे बढ़कर भाग्यवान् संसारमें दूसरा नहीं है। प्रभु अभक्तजनोंको स्वप्नमें भी कुछ नहीं कहते। स्वप्नमें प्रभुने साक्षात् भावसे स्वयं विद्यानिधिको थप्पड़ मारे थे। इस प्रकारकी कृपा केवल विद्यानिधिको ही मिली॥14॥ (4) श्रीगदाधर-शाखा :- बड़ शाखा—गदाधर पण्डित-गोसाञि। तेंहो लक्ष्मीरूपा, ताँर सम केह नाइ॥15॥ ताँर शिष्य-उपशिष्य,—ताँर उपशाखा। एइमत सब शाखा-उपशाखार लेखा॥16॥ अनुवाद—एक और बड़ी शाखा श्रीगदाधर पण्डित हैं। वे लक्ष्मीस्वरूपा (श्रीराधिका) हैं, जिनके समान और कोई नहीं है। इनके शिष्य और उपशिष्य इनकी उपशाखाएँ हैं। इस प्रकार समस्त शाखाओं और उपशाखाओंका उल्लेख किया गया है॥15-16॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 147-150 श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है— “श्रीराधाप्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी। सा श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डिताख्यकः॥147॥ निर्णीतः श्रीस्वरूपैर्यो व्रजलक्ष्मीतया यथा॥148॥ पुरा वृन्दावने लक्ष्मीः श्यामसुन्दर-वल्लभा। साद्य गौरप्रेम-लक्ष्मीः श्रीगदाधरपण्डितः॥149 ॥ राधामनुगता यत्तल्ललिताप्यनुराधिका। अतः प्राविशदेषा तं गौरचन्द्रोदये यथा॥”150॥ “पहले जो वृन्दावनेश्वरी प्रेमरूपा श्रीमती राधिका थीं, वे ही अब श्रीगौरप्रिय श्रीगदाधर पण्डित हैं। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने श्रीगदाधर पण्डितको व्रजलक्ष्मीके रूपमें निर्धारित किया है। पूर्वकालमें श्रीश्यामसुन्दर-वल्लभा वृन्दावन-लक्ष्मी ही इस लीलामें गौरप्रेम-लक्ष्मी श्रीगदाधर पण्डित हैं। ‘श्रीचैतन्यचन्द्रोदय’ ग्रन्थके अनुसार श्रीराधाकी अनुगता होनेके कारण ‘अनुराधा’-रूपसे विख्यात श्रीललितादेवीने श्रीगदाधर पण्डितमें प्रवेश किया है॥”15-16॥ (5) श्रीवक्रेश्वर-महिमा और शाखा :- वक्रेश्वर पण्डित—प्रभुर बड़ प्रिय भृत्य। एक-भावे चब्बिश प्रहर याँर नृत्य॥17॥ आपने महाप्रभु गाय याँर नृत्यकाले। प्रभुर चरण धरि' वक्रेश्वर बले॥18॥ “दशसहस्र गन्धर्व मोरे देह' चन्द्रमुख। तारा गाय, मुञि नाचि—तबे मोर सुख॥”19॥ अनुवाद—श्रीवक्रेश्वर पण्डित श्रीचैतन्य महाप्रभुके अत्यन्त प्रिय सेवक हैं, जिन्होंने एक ही भावमें चौबीस प्रहर (तीन दिन) तक नृत्य किया था। जब महाप्रभुने स्वयं इनके नृत्यपर गान किया, तब इन्होंने महाप्रभुके चरण पकड़कर निवेदन किया,—‘हे चन्द्रमुख! मुझे दस-हजार गन्धर्व (गायक) दे दीजिये, जिससे वे सब गान करते रहें और मैं नृत्य करता रहूँ। तब ही मुझे सुख प्राप्त होगा॥”17-19॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 71-73वें श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है— दसवाँ अध्याय | 45