श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)
Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary
श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा
पृष्ठ 582, कुल 2549 में से
संदर्भ में पढ़ें[ 10/17–20
“व्यूहस्तुर्योऽनिरुद्धो यः स वक्रेश्वरपण्डितः। कृष्णावेशज नृत्येन प्रभोः सुखमजीजनत्॥ 71 ॥ सहस्रगायकन्मह्यं देहि त्वं करुणामय। इति चैतन्यपादे य उवाच मधुरं वचः॥ 72 ॥ स्वप्रकाशविभेदेन शशिरेखा तमाविशत्॥” 73(क)॥ “चतुर्व्यूहमें जो श्रीअनिरुद्ध हैं, वे ही श्रीवक्रेश्वर पण्डित हैं। श्रीकृष्णवेश-जनित नृत्यके द्वारा इन्होंने महाप्रभुका सुख विधान किया। इन्होंने मधुर वाणीसे महाप्रभुको कहा—‘हे करुणामय! आप मुझे हजार गायक प्रदान करें।' अपने प्रकाश भेदसे (श्रीराधिकाकी प्रिय सखी) श्रीशशिरेखाने इनमें प्रवेश किया है।” श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामी प्रभुने लिखा है— “राधाकृष्णरसप्रकाशनपरं गानावलीभूषितं, वृन्दारण्यसुखप्रचारजनितं स्तम्भादिभावान्वितम्। श्रीगौराङ्गमहाप्रभो रसमिलन्नृत्यावताराङ्कुरं श्रीवक्रेश्वरपण्डितं द्विजवरं चैतन्यभक्तं भजे॥ नित्यं तिष्ठति तत्रैव तुङ्गविद्या समुत्सुका। विप्रलब्धात्वामापन्ना श्रीकृष्णो रतियुक् सदा॥ अस्या वयः प्रमाणं स्यात् असौ गौररसे पुनः। वक्रेश्वर इति ख्यातमापन्ना हि कलौ युगे॥” श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामीके वर्णनानुसार—“श्रीराधाकृष्ण रसको प्रकाश करनेवाली गानावली जिनका भूषण है, वृन्दावन-रसतत्त्व प्रचारके समय स्तम्भादि भावोंसे जो शोभित हैं, श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके रसात्मक-नृत्य प्रकाशमें जो अङ्कुर-स्वरूप हैं, उन श्रीचैतन्यभक्त द्विजवर श्रीवक्रेश्वर पण्डितका मैं भजन करता हूँ। उनमें ही सदा-उत्सुका श्रीमती तुङ्गविद्या नित्य विराजित हैं। सदा श्रीकृष्णमें रतियुक्ता और विप्रलम्भ-भावान्विता श्रीतुङ्गविद्या पुनः कलियुगमें गौररसमें 'वक्रेश्वर' नामसे विख्यात हैं।” इन्होंने श्रीवास-आङ्गनमें और श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें महाप्रभुके कीर्तनमें नृत्य किया था। महाप्रभुने देवानन्दसे वक्रेश्वरकी जो महिमा कही थी, उसके लिये चैःभाः अन्त्यखण्ड, तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है। श्रीवक्रेश्वर पण्डितके सम्बन्धमें उत्कल-कवि श्रीगोविन्दके रचित श्रीगौरकृष्णोदयमें— “प्रभोः प्रथमशिष्य इत्यर्थं विमृश्य वक्रेश्वरं निवेश्य च तदाश्रमे निजनिजं निवासं ययो।” इनके शिष्य श्रीगोपालगुरु हैं और उनके शिष्य श्रीध्यानचन्द्र हैं। उत्कल-प्रदेशमें श्रीवक्रेश्वरके शिष्य-सम्प्रदायमें अधिकांश भक्त ही अपना परिचय गौड़ीय-वैष्णवके रूपमें देते हैं॥ 17॥ अमृतानुकणिका—देवानन्द पण्डित स्मार्त्त धर्ममें प्रविष्ट होनेपर भी महाज्ञानी और संयमी थे, परन्तु महाप्रभुके प्रति उनकी श्रद्धा जाग्रत नहीं हुई थी। वे श्रीमद्भागवतम्को छोड़कर अन्य किसी ग्रन्थका पाठ नहीं करते थे। इसी कारण एक बार वक्रेश्वर पण्डित उनके आश्रममें ठहर गये और देवानन्द पण्डितने उनकी सेवा की। वक्रेश्वर पण्डितके सङ्गके प्रभावसे देवानन्द पण्डितमें महाप्रभुके प्रति श्रद्धाका उदय हुआ था और वे वक्रेश्वर पण्डितके साथ महाप्रभुके दर्शनके लिये गये। महाप्रभु चन्द्र आसनपर विराजमान थे। देवानन्द पण्डित उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके सङ्कोचके साथ एक तरफ खड़े हो गये। महाप्रभु भी उन्हें देखकर सन्तुष्ट हुए और एकान्तमें उन्हें साथ लेकर बैठे। उनके जो कुछ भी पूर्व अपराध थे, उन सभी अपराधोंको क्षमा करके महाप्रभुने उनपर कृपा की। महाप्रभुने कहा,—“तुमने जो वक्रेश्वर पण्डितकी सेवा की है, इसी कारण तुम्हें मेरे दर्शन हुए हैं। वक्रेश्वर पण्डित प्रभुकी पूर्णशक्ति हैं। जो उनकी सेवा करते हैं, उन्हें कृष्णकी प्राप्ति होती है। वक्रेश्वरका हृदय कृष्णका अपना घर है। वक्रेश्वर जब नृत्य करते हैं, तब कृष्णका नृत्य होता है। जिस किसी भी स्थानपर वक्रेश्वरका सङ्ग क्यों न हो, वह स्थान श्रीवैकुण्ठमय सर्वतीर्थस्वरूप हो जाता है॥” 19॥
प्रभु बलेन—तुमि मोर पक्ष एक शाखा। आकाशे उड़िया याङ, पाङ आर पाखा॥ 20॥
अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,— “वक्रेश्वर! तुम मेरे एक पंख हो, एक और तुम्हारे जैसा पंख मुझे मिलता, तो मैं आकाशमें उड़ जाता॥” 20॥
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