भारतकोश
श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

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पृष्ठ 583

10/21-25 ] (6) श्रीजगदानन्दका माहात्म्य :- पण्डित जगदानन्द प्रभुर प्राणरूप। लोके ख्याते यँहो सत्भाभार स्वरूप॥21॥ प्रीत्ये करिते चाहे प्रभुरे लालन-पालन। वैराग्य-लोक-भये प्रभु ना माने कखन॥22॥ दुइजने खट्मटि लागाय कोन्दल। ताँर प्रीत्येर कथा आगे कहिब सकल॥23॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके प्राण स्वरूप थे। लोगोंमें वे सत्यभामाके रूपमें विख्यात हैं। वे प्रेमसे महाप्रभुका लालन-पालन करना चाहते थे, किन्तु उससे वैराग्य (संन्यास धर्म) नष्ट होगा और लोगोंमें निन्दा होगी—इस भयसे अर्थात् मर्यादा रक्षाके लिये महाप्रभु उनकी बात नहीं मानते थे। इसलिये इन दोनोंमें परस्पर प्रेम कलह हो जाती थी। इनकी प्रीतिका वर्णन आगे विस्तारपूर्वक किया जायेगा॥21-23॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चैःचः अन्त्यलीलाके चौथे, सातवें, बारहवें और तेरहवें अध्याय द्रष्टव्य हैं॥23॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 51वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “केनावान्तरभेदेन भेदं कुर्वन्ति सात्वताः। सत्यभामाप्रकाशोऽपि जगदानन्दपण्डितः॥”51॥ “भगवद्भक्त जन किसी अवान्तर भेदसे अर्थात् (सत्यभामा विष्णुप्रिया हैं—इस) विचारसे भेद करते हुए कहते हैं कि श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीसत्यभामाके प्रकाश हैं।” ये श्रीवास-आङ्गनमें और श्रीचन्द्रशेखर भवनमें महाप्रभुके कीर्त्तनके सङ्गी थे। महाप्रभुके संन्यासके पश्चात् उड़ीसा जाते समय श्रीजगदानन्द पण्डितने उनका दण्ड वहन किया और भिक्षा की॥21॥ (7) श्रीराघव पण्डित-शाखा :- राघव-पण्डित-प्रभुर आद्य अनुचर। ताँर शाखा मुख्य एक,—मकरध्वज कर॥24॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डित श्रीचैतन्यदेवके नित्य सेवक हैं। इनकी एक मुख्य शाखा श्रीमकरध्वज-कर हैं॥24॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 166वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “धनिष्ठा भक्ष्यसामग्रीं कृष्णायादात् व्रजेऽमिताम्। सैव सम्प्रति गौराङ्गप्रियो राघवपण्डितः॥”166॥ “व्रजकी धनिष्ठा नामक जो सखी श्रीकृष्णके लिये अपरिमित स्वादिष्ट खाद्य सामग्री प्रस्तुत करती थीं, वे अब गौराङ्गप्रिय श्रीराघव पण्डित हैं।” पाणिहाटी ग्राममें राघवभवन है। [टीका लिखनेके समय] राघव पण्डितकी समाधिके ऊपर लताकुञ्ज-आवृत एक ऊँची वेदी स्थापित है। जिस स्थानपर समाधि है, उसकी उत्तर दिशामें एक खण्डहर-प्राय जीर्ण-शीर्ण घरमें बिना किसी विशेष यत्नसे सेवित श्रीमदनमोहनका विग्रह विराजमान है। पाणिहाटीके वर्तमान जमीन्दार श्रीशिवचन्द्र राय चौधुरीके तत्त्वावधानमें इस सेवाकी व्यवस्था चल रही है। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 141वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “नटश्चन्द्रमुखः प्राग् यः स करो मकरध्वजः॥”141॥ “पूर्वकालके नट अर्थात् नाटकमें अभिनय करनेवाले चन्द्रमुख अब मकरध्वज-कर हुए हैं।” ये पाणिहाटी ग्राममें रहते थे॥24॥ उनकी बहन दमयन्ती गुणोंकी राशि :- ताँहार भगिनी दमयन्ती प्रभुर प्रिय दासी। प्रभुर भोगसामग्री ये करे बारमासी॥25॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितकी बहन श्रीदमयन्ती देवी महाप्रभुकी प्रिय दासी हैं, जो बारह मासोंके लिये एक बारमें ही प्रभुके लिये समस्त भोगसामग्री प्रस्तुत करती थीं॥25॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 167वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— दसवाँ अध्याय | 47