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श्री चैतन्य चरितामृत (कृष्णदास कविराज गोस्वामी - सम्पूर्ण आदि, मध्य एवं अन्त्य लीला)

Sri Chaitanya Charitamrita of Krishnadas Kaviraj with Hindi Commentary

श्रील कृष्णदास कविराज गोस्वामी द्वारा

DevanagariHindipublished2,549 पृष्ठ

[ 10/7-13 अनुभाष्य-श्रीकृष्णचैतन्यप्रेमाम्रतरोः (गौरप्रेम-देववृक्षस्य) कृष्णप्रेमफलप्रदान् शाखारूपान् प्रियान् भक्तगणान् अहं वन्दे। श्लोक भावानुवाद-अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥7॥ (1-क, ख, ग, घ) श्रीवास-श्रीरामादि चार भ्राता-शाखा :- श्रीवास पण्डित आर श्रीराम पण्डित। दुइ भाइ-दुइ शाखा, जगते विदित॥8॥ श्रीपति, श्रीनिधि-ताँर दुइ सहोदर। चारि भाइर दास-दासी, गृह-परिकर॥9॥ उनकी ऐकान्तिकी गौरभक्ति :- दुइ शाखार उपशाखाय ताँ-सबार गणन। याँर गृहे महाप्रभुर सदा सङ्कीर्त्तन॥10॥ सवंशे करेन याँरा चैतन्येर सेवा। गौरचन्द्र बिना नाहि जाने देवी-देवा॥11॥ अनुवाद-श्रीवास पण्डित और श्रीराम पण्डित-ये दोनों भाई दो शाखाओंके रूपमें जगत्में जाने जाते हैं। इन दोनोंके भाई श्रीपति और श्रीनिधि एवं इन चारों भाइयोंके दास-दासियाँ तथा समस्त गृह-परिवारकी गणना उन दो शाखाओंकी उपशाखाके रूपमें होती है। इनके घरमें श्रीचैतन्य महाप्रभु सदा सङ्कीर्तन करते थे। ये चारों भाई अपने वंश सहित श्रीचैतन्यदेवकी सेवा करते थे और श्रीगौरचन्द्रके अतिरिक्त किसी अन्य देवी-देवताको नहीं जानते थे॥8-11॥ अनुभाष्य-श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 90वें श्लोकमें श्रीवास पण्डितके विषयमें इस प्रकार वर्णन आता है- “श्रीवासपण्डितो धीमान् यः पुरा नारदो मुनिः। पर्वताख्यो मुनिवरो य आसीन्नारदप्रियः। स रामपण्डितः श्रीमान् तत्कनिष्ठसहोदरः॥"90॥ “जो पूर्वकालमें श्रीनारद मुनि थे, वे ही अब श्रीवास पण्डितरूपमें विख्यात हैं। श्रीनारद-प्रिय श्रीपर्वतमुनि ही श्रीवासके कनिष्ठ भ्राता श्रीमान् राम पण्डित हैं।" और 42वें श्लोकमें यह वर्णित है- “नाम्नाम्बिका व्रजे धात्री स्तन्यदात्री स्थिता पुरा। सैवेडयं 'मालिनी' नाम्नी श्रीवासगृहिणीमता॥"42॥ “पूर्वकालमें जो व्रजमें श्रीकृष्णको स्तनपान करानेवाली धात्री-माता 'अम्बिका' थीं, वे ही अब श्रीवास पण्डितकी पत्नी मालिनीदेवी हैं।” श्रीवासके भाईकी पुत्री ही श्रीवृन्दावनदास ठाकुरकी जननी नारायणीदेवी हैं। श्रीचैतन्य महाप्रभुके संन्यास ग्रहणके पश्चात् श्रीवास पण्डित नवद्वीपके वास-स्थानको छोड़कर कुमारहट्टमें वास करने लगे-चैःभाः अन्त्यखण्डके पाँचवें अध्यायमें इसका वर्णन है॥8-11॥ (2) श्रीचन्द्रशेखर-शाखा :- 'आचार्यरत्न'-नाम धरे बड़ एक शाखा। ताँर परिकर, ताँर शाखा-उपशाखा॥12॥ आचार्यरत्नेर नाम 'श्रीचन्द्रशेखर'। याँर घरे देवी-भावे नाचिला ईश्वर॥13॥ अनुवाद-'आचार्यरत्न' नामकी एक बड़ी शाखा है और उनके परिकर उनकी शाखा और उपशाखा हैं। आचार्यरत्नका नाम श्रीचन्द्रशेखर है और उनके घरमें महाप्रभुने देवीके (रुक्मिणीके) भावमें नृत्य किया था॥12-13॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीचन्द्रशेखर आचार्यरत्न किसी- किसी ग्रन्थके अनुसार महाप्रभुके मौसा हैं। अनुभाष्य-'श्रीचन्द्रशेखर' - श्रीमान् नवनिधिमेंसे प्रमुख, अथवा चन्द्र (?) हैं। इनके घरमें ही महाप्रभुका देवीभावमें नृत्य-अभिनय हुआ था (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अः)। श्रीचन्द्रशेखरका घर अब 'व्रजपत्तन'-नामसे सुप्रसिद्ध है। श्रीमन्महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेके विषयमें श्रीनित्यानन्द प्रभुने उन्हें अवगत कराया था (चैःभाः मध्यखण्ड, 28वाँ अः) और संन्यासके समय श्रीनित्यानन्द एवं मुकुन्द दत्तके साथ कटोआमें उपस्थित 42 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/13-14 ] होकर संन्यासके उपयुक्त कार्योंका सम्पादनकर इन्होंने नवद्वीप लौटकर सबको महाप्रभुके संन्यास-ग्रहणकी सूचना दी थी। इनके घरपर महाप्रभुके कीर्त्तनका विषय-चैःभाः मध्यखण्ड, ४वें अः, चाँद-काजीके दलनके समय ये नगरसङ्कीर्त्तनमें सम्मिलित थे और श्रीधरपर महाप्रभुकी कृपा करनेके समय भी ये वहाँ उपस्थित थे (चैःभाः मध्यखण्ड, २३वाँ अः)। ये भक्तोंके साथ श्रीचैतन्यदेवके दर्शनके लिये गौड़देशसे श्रीजगन्नाथपुरी आया करते थे॥13॥ (3) श्रीपुण्डरीक-शाखा :- पुण्डरीक विद्यानिधि-बड़शाखा जानि। याँर नाम लञा प्रभु कान्दिला आपनि॥14॥ अनुवाद-भक्ति-कल्पवृक्षकी एक और बड़ी शाखा श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि हैं, जिनका नाम लेकर महाप्रभु स्वयं क्रन्दन करते थे॥14॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीपुण्डरीक विद्यानिधि चट्टग्रामके निवासी थे॥14॥ अनुभाष्य-श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 54-57वें श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है- “वृषभानुस्तया ख्यातः पुरा यो व्रजमण्डले। अधुना पुण्डरीकाक्षो विद्यानिधि-महाशयः॥ 54॥ स्वकीयभावमास्वाद्य राधा-विरहकातरः। चैतन्यः पुण्डरीकाक्षमये तातावदत् स्वयम्॥ 55॥ 'प्रेमनिधि' तया ख्यातिं गौरो यस्मै ददौ सुधीः। माधवेन्द्रस्य शिष्यत्वात् गौरवञ्च सदाकरोत्॥ 56॥ तत्प्रकाशविशेषोऽपि मिश्रः श्रीमाधवो मतः। रत्नावती तु तत्पत्नी कीर्त्तिदा कीर्त्तिता बुधैः॥”57॥ “पूर्वकालमें जो व्रजमण्डलमें श्रीवृषभानुरूपमें विख्यात थे, वे ही अब पुण्डरीकाक्ष विद्यानिधि हैं। स्वकीयभावका अवलम्बन करते राधाभावमें विरहकातर श्रीचैतन्य महाप्रभु श्रीपुण्डरीकाक्षको स्वयं पिता कहकर सम्बोधन करते थे। श्रीगौरसुन्दरने उन्हें 'प्रेमनिधि' उपाधि दी थी और श्रीमाधवेन्द्रपुरीपादका शिष्य जानकर उनका सदा सम्मान करते थे। इनकी पत्नी 'रत्नावती' थीं, किन्तु पण्डितलोग उन्हें 'कीर्त्तिदा' कहते थे।” इनके पिताका नाम वाणेश्वर (अन्य मतके अनुसार 'शुक्लाम्बर' ब्रह्मचारी) और माताका नाम गङ्गादेवी था। अन्य मतके अनुसार, वाणेश्वर शिवराम गङ्गोपाध्यायके वंशमें जन्में थे। इनके पिता जिला ढाका जिलाके बाधिया ग्रामके वारेन्द्र-श्रेणीके ब्राह्मण थे, इसलिये वहाँके राढ़ीय ब्राह्मण समाजने उन्हें स्वीकार नहीं किया; इस कारणसे उनके शाक्त अधस्तनगण 'बहिष्कृत' होकर समाजके 'बहिष्कृत' लोगोंके ही पुरोहितका कार्य करते आ रहे हैं। इनमेंसे सरोजानन्द गोस्वामी नामक एक व्यक्ति वृन्दावनमें आकर रह रहे हैं। इनके वंशकी यह विशेषता यह है कि सभी भाइयोंमें केवल एकको ही पुत्रकी प्राप्ति होती थी और अन्य भाइयोंके घरोंमें कन्याका जन्म होता था या कोई सन्तान नहीं होती थी। इस कारणसे इनके वंशका विस्तार न हो सका। चट्टग्रामके उत्तर-पूर्वमें 'मेखलाग्राम'में इनका पूर्व निवास था। [टीका लिखनेके समय-] विद्यानिधिका भजन मन्दिर अत्यन्त जीर्ण और अस्वच्छ है, इसका संस्कार नहीं करनेपर शीघ्र ही लुप्त होनेकी सम्भावना है। मन्दिरकी दीवारपर ईंटके पटलपर दो श्लोक खुदे हैं; अक्षर विकृत होनेके कारण पढ़े नहीं जा सकते और उनके अर्थ भी समझे नहीं जा सकते। इस मन्दिरसे दक्षिण-पूर्व दिशामें 400-500 हाथ दूरीपर एक और मन्दिर देखा जाता है, उसकी दीवारपर ईंटके पटलपर लिखे अक्षर भी नहीं पढ़े जाते हैं। इसके ही सामने 15-20 हाथकी दूरीपर बाई ओर एक और मन्दिर होनेकी बात वहाँ गिरी हुई अनेक ईंटोंके टुकड़ोंको देखकर जानी जाती है। वहाँके लोगोंसे सुननेमें आता है कि यही मुकुन्द दत्तका भजन मन्दिर था। पुण्डरीक विद्यानिधिके वंशमें श्रीहरकुमार स्मृतितीर्थ और श्रीकृष्णकिङ्कर विद्यालङ्कार अभी भी वर्तमान हैं। (वैष्णव-मञ्जूषा-प्रथम संख्या द्रष्टव्य है)। दसवाँ अध्याय | 43

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महाप्रभु इनको 'बाप' कहकर बुलाते थे और इन्हें 'प्रेमनिधि' नाम दिया था। ये श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीके गुरु और श्रीदामोदर स्वरूपके सुहृद थे। अबोध लोगोंको सतर्क करके मङ्गल शिक्षा देनेके उद्देश्यसे श्रीगदाधर पण्डित गोस्वामीने श्रीविद्यानिधिको पहले विषयी समझकर भूल करनेका अभिनयकर फिर अन्तमें उन्हींसे दीक्षा-अभिनय लीला की। श्रीजगन्नाथदेवके द्वारा उन्हें थप्पड़ मारनेका वृत्तान्त—चैःभाः अन्त्यखण्ड, 10वें अध्यायमें द्रष्टव्य है॥14॥

अमृतानुकणिका—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 10अः संख्या 90-151) ओड़न अथवा उड़न-षष्ठी नामक यात्रामें श्रीजगन्नाथदेव नये माँड़युक्त वस्त्र धारण करते हैं। माँड़युक्त वस्त्र धारण किये हुए श्रीजगन्नाथदेवको देखकर विद्यानिधिके मनमें सन्देह हुआ। विद्यानिधिने दामोदर स्वरूपसे पूछा,—"ईश्वरको माँड़युक्त वस्त्र क्यों प्रदान किये जाते हैं? इस देशमें तो श्रुति-स्मृतिका प्रचुर परिमाणमें प्रचार है, फिर क्यों बिना धोए माँड़युक्त वस्त्र पहनाये जाते हैं? माँड़युक्त वस्त्रोंको स्पर्श करनेसे हाथ धोकर शुद्ध होना पड़ता है।" दामोदर स्वरूपने कहा,—"यद्यपि श्रीजगन्नाथदेवके सेवक नियम जानते हैं, तो भी इस यात्रा-उत्सवपर सब समय ऐसा ही होता है। यह श्रीजगन्नाथदेवकी ही इच्छा है, इसलिये राजा भी इसके लिये निषेध नहीं करते।" विद्यानिधिने कहा,—"ठीक है, श्रीजगन्नाथदेव ईश्वर हैं, उनके लिये सब कुछ सम्भव है, परन्तु उनके सेवक ईश्वर जैसा आचरण क्यों कर रहे हैं? इन पूजा-पण्डा आदिने अपवित्र वस्त्र क्यों धारण किये हैं? राजाने भी माँड़युक्त वस्त्र सिरपर क्यों धारण किया है?" दामोदर स्वरूपने कहा,—"सुनो भाई! लगता है, ओड़न-यात्रामें दोष नहीं है। श्रीजगन्नाथदेव परमब्रह्म हैं। यहाँ वे विधि-निषेधका विचार नहीं करते हैं।" विद्यानिधिने कहा,—"भाई, एक बात सुनो! श्रीजगन्नाथदेव विग्रह परम ब्रह्मस्वरूप हैं। वे यदि विधि-निषेधोंका उल्लङ्घन करें, तो इसमें कोई दोष नहीं है। परन्तु ये सब लोग भी नीलाचलमें रहकर लोक व्यवहार छोड़ चुके हैं, क्या सभी ब्रह्मरूप-अवतार हो गये हैं?" इतना कहकर दोनों सम्पूर्ण मार्गमें हँसते-हँसते श्रीजगन्नाथदेवके सेवकोंके प्रभावको न जानकर उनके आचरणपर दोषारोपण कर रहे थे। भिक्षाके उपरान्त दोनों गौराङ्ग महाप्रभुके पास चले आये। महाप्रभुके पास आकर वे सो गये। केवल श्रीकृष्ण ही जानते हैं कि किसमें कितना अनुराग है। श्रीकृष्ण अपने दासोंको भ्रममें डाल देते हैं, और बादमें दयावान होकर भ्रम दूर भी करते हैं। गौराङ्ग महाप्रभु सब कुछ जानते थे। श्रीजगन्नाथके रूपमें महाप्रभु स्वप्नमें उनके पास गये। विद्यानिधि महाशयने स्वप्नमें देखा कि श्रीजगन्नाथ-बलरामका शुभागमन हुआ है, परन्तु दोनों क्रोधित होकर उन्हें पकड़कर उनके दोनों गालोंपर थप्पड़ मार रहे हैं। थप्पड़ इतने ज़ोरसे मारे कि उनके गाल फूल गये और उनपर उँगलियोंके निशान बन गये। विद्यानिधि कहने लगे,—"हे कृष्ण! रक्षा करो, अपराध क्षमा करो, हे स्वामी! किस अपराधके कारण आप मुझे मार रहे हैं?" श्रीजगन्नाथने कहा,—"तेरे अपराधोंका अन्त नहीं है। मेरी और मेरे सेवकोंकी जाति नहीं है। मुझे परब्रह्मके रूपमें स्थापित करके भी तुमने माँड़युक्त वस्त्रके प्रति दोष-दृष्टि रखकर मेरे सेवकोंकी निन्दा की है।" स्वप्नमें विद्यानिधि मनसे महाभयभीत होकर श्रीचरणोंपर सिर पटकते हुए क्रन्दन करने लगे। विद्यानिधि कहने लगे,—"हे प्रभु! मुझ पापीके सभी अपराध क्षमा कीजिये। हे प्रभु, जिस मुखसे मैंने आपके सेवकोंकी हँसी उड़ाई है, आपने मेरे उस मुखको भलीभाँति दण्ड प्रदान किया है। आज मेरे सौभाग्यका दिन है। मेरे मुख और ललाटको आपके श्रीहस्तका स्पर्श मिला है।" श्रीजगन्नाथने कहा,—"सेवक समझकर तुमपर अनुग्रह करनेके लिये मैंने तुम्हें दण्ड प्रदान किया है।" स्वप्न देखनेके उपरान्त विद्यानिधि जाग उठे। फिर सूजे हुए गालोंपर थप्पड़ोंके निशान देखकर वे हँसने लगे। यह देखकर विद्यानिधिने कहा,—"बहुत अच्छा

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10/14-19 ] हुआ, बहुत अच्छा हुआ। अपराधानुसार मुझे सजा मिली है। अच्छा ही किया प्रभुने, मुझे तो कम सजा मिली है।" विद्यानिधिकी इस महिमाको देखिये। सेवकके प्रति प्रभु-दयाकी यही सीमा है। अपने पुत्र प्रद्युम्नको भी शिक्षा हेतु प्रभु इस प्रकार (स्वप्नमें) थप्पड़ नहीं मारते। जानकी, रुक्मिणी, सत्यभामा आदि कितने ही ईश्वर-ईश्वरी हैं, उनको भी स्वप्नमें भी दण्ड नहीं देते। अपराधीको प्रभु साक्षात् ही मारते हैं। स्वप्नमें प्रदान की गई कृपा अथवा दण्ड बाहरसे कभी दिखायी नहीं देते। स्वप्नमें भले ही कोई दण्डित होता है अथवा किसीको अर्थकी प्राप्ति होती है, परन्तु पुरुषके जग जानेपर उन सबका कुछ भी अस्तित्व नहीं रहता है। प्रभु स्वप्नमें जिन्हें दण्ड अथवा कृपा प्रदान करते हैं, जागनेपर जब वे उसके साक्षात् दर्शन करते हैं, तब उन्हें इस बातकी प्रतीति होती है कि उनसे बढ़कर भाग्यवान् संसारमें दूसरा नहीं है। प्रभु अभक्तजनोंको स्वप्नमें भी कुछ नहीं कहते। स्वप्नमें प्रभुने साक्षात् भावसे स्वयं विद्यानिधिको थप्पड़ मारे थे। इस प्रकारकी कृपा केवल विद्यानिधिको ही मिली॥14॥ (4) श्रीगदाधर-शाखा :- बड़ शाखा—गदाधर पण्डित-गोसाञि। तेंहो लक्ष्मीरूपा, ताँर सम केह नाइ॥15॥ ताँर शिष्य-उपशिष्य,—ताँर उपशाखा। एइमत सब शाखा-उपशाखार लेखा॥16॥ अनुवाद—एक और बड़ी शाखा श्रीगदाधर पण्डित हैं। वे लक्ष्मीस्वरूपा (श्रीराधिका) हैं, जिनके समान और कोई नहीं है। इनके शिष्य और उपशिष्य इनकी उपशाखाएँ हैं। इस प्रकार समस्त शाखाओं और उपशाखाओंका उल्लेख किया गया है॥15-16॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 147-150 श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है— “श्रीराधाप्रेमरूपा या पुरा वृन्दावनेश्वरी। सा श्रीगदाधरो गौरवल्लभः पण्डिताख्यकः॥147॥ निर्णीतः श्रीस्वरूपैर्यो व्रजलक्ष्मीतया यथा॥148॥ पुरा वृन्दावने लक्ष्मीः श्यामसुन्दर-वल्लभा। साद्य गौरप्रेम-लक्ष्मीः श्रीगदाधरपण्डितः॥149 ॥ राधामनुगता यत्तल्ललिताप्यनुराधिका। अतः प्राविशदेषा तं गौरचन्द्रोदये यथा॥”150॥ “पहले जो वृन्दावनेश्वरी प्रेमरूपा श्रीमती राधिका थीं, वे ही अब श्रीगौरप्रिय श्रीगदाधर पण्डित हैं। श्रीस्वरूप दामोदर गोस्वामीने श्रीगदाधर पण्डितको व्रजलक्ष्मीके रूपमें निर्धारित किया है। पूर्वकालमें श्रीश्यामसुन्दर-वल्लभा वृन्दावन-लक्ष्मी ही इस लीलामें गौरप्रेम-लक्ष्मी श्रीगदाधर पण्डित हैं। ‘श्रीचैतन्यचन्द्रोदय’ ग्रन्थके अनुसार श्रीराधाकी अनुगता होनेके कारण ‘अनुराधा’-रूपसे विख्यात श्रीललितादेवीने श्रीगदाधर पण्डितमें प्रवेश किया है॥”15-16॥ (5) श्रीवक्रेश्वर-महिमा और शाखा :- वक्रेश्वर पण्डित—प्रभुर बड़ प्रिय भृत्य। एक-भावे चब्बिश प्रहर याँर नृत्य॥17॥ आपने महाप्रभु गाय याँर नृत्यकाले। प्रभुर चरण धरि' वक्रेश्वर बले॥18॥ “दशसहस्र गन्धर्व मोरे देह' चन्द्रमुख। तारा गाय, मुञि नाचि—तबे मोर सुख॥”19॥ अनुवाद—श्रीवक्रेश्वर पण्डित श्रीचैतन्य महाप्रभुके अत्यन्त प्रिय सेवक हैं, जिन्होंने एक ही भावमें चौबीस प्रहर (तीन दिन) तक नृत्य किया था। जब महाप्रभुने स्वयं इनके नृत्यपर गान किया, तब इन्होंने महाप्रभुके चरण पकड़कर निवेदन किया,—‘हे चन्द्रमुख! मुझे दस-हजार गन्धर्व (गायक) दे दीजिये, जिससे वे सब गान करते रहें और मैं नृत्य करता रहूँ। तब ही मुझे सुख प्राप्त होगा॥”17-19॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 71-73वें श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है— दसवाँ अध्याय | 45

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“व्यूहस्तुर्योऽनिरुद्धो यः स वक्रेश्वरपण्डितः। कृष्णावेशज नृत्येन प्रभोः सुखमजीजनत्॥ 71 ॥ सहस्रगायकन्मह्यं देहि त्वं करुणामय। इति चैतन्यपादे य उवाच मधुरं वचः॥ 72 ॥ स्वप्रकाशविभेदेन शशिरेखा तमाविशत्॥” 73(क)॥ “चतुर्व्यूहमें जो श्रीअनिरुद्ध हैं, वे ही श्रीवक्रेश्वर पण्डित हैं। श्रीकृष्णवेश-जनित नृत्यके द्वारा इन्होंने महाप्रभुका सुख विधान किया। इन्होंने मधुर वाणीसे महाप्रभुको कहा—‘हे करुणामय! आप मुझे हजार गायक प्रदान करें।' अपने प्रकाश भेदसे (श्रीराधिकाकी प्रिय सखी) श्रीशशिरेखाने इनमें प्रवेश किया है।” श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामी प्रभुने लिखा है— “राधाकृष्णरसप्रकाशनपरं गानावलीभूषितं, वृन्दारण्यसुखप्रचारजनितं स्तम्भादिभावान्वितम्। श्रीगौराङ्गमहाप्रभो रसमिलन्नृत्यावताराङ्कुरं श्रीवक्रेश्वरपण्डितं द्विजवरं चैतन्यभक्तं भजे॥ नित्यं तिष्ठति तत्रैव तुङ्गविद्या समुत्सुका। विप्रलब्धात्वामापन्ना श्रीकृष्णो रतियुक् सदा॥ अस्या वयः प्रमाणं स्यात् असौ गौररसे पुनः। वक्रेश्वर इति ख्यातमापन्ना हि कलौ युगे॥” श्रीध्यानचन्द्र गोस्वामीके वर्णनानुसार—“श्रीराधाकृष्ण रसको प्रकाश करनेवाली गानावली जिनका भूषण है, वृन्दावन-रसतत्त्व प्रचारके समय स्तम्भादि भावोंसे जो शोभित हैं, श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके रसात्मक-नृत्य प्रकाशमें जो अङ्कुर-स्वरूप हैं, उन श्रीचैतन्यभक्त द्विजवर श्रीवक्रेश्वर पण्डितका मैं भजन करता हूँ। उनमें ही सदा-उत्सुका श्रीमती तुङ्गविद्या नित्य विराजित हैं। सदा श्रीकृष्णमें रतियुक्ता और विप्रलम्भ-भावान्विता श्रीतुङ्गविद्या पुनः कलियुगमें गौररसमें 'वक्रेश्वर' नामसे विख्यात हैं।” इन्होंने श्रीवास-आङ्गनमें और श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें महाप्रभुके कीर्तनमें नृत्य किया था। महाप्रभुने देवानन्दसे वक्रेश्वरकी जो महिमा कही थी, उसके लिये चैःभाः अन्त्यखण्ड, तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है। श्रीवक्रेश्वर पण्डितके सम्बन्धमें उत्कल-कवि श्रीगोविन्दके रचित श्रीगौरकृष्णोदयमें— “प्रभोः प्रथमशिष्य इत्यर्थं विमृश्य वक्रेश्वरं निवेश्य च तदाश्रमे निजनिजं निवासं ययो।” इनके शिष्य श्रीगोपालगुरु हैं और उनके शिष्य श्रीध्यानचन्द्र हैं। उत्कल-प्रदेशमें श्रीवक्रेश्वरके शिष्य-सम्प्रदायमें अधिकांश भक्त ही अपना परिचय गौड़ीय-वैष्णवके रूपमें देते हैं॥ 17॥ अमृतानुकणिका—देवानन्द पण्डित स्मार्त्त धर्ममें प्रविष्ट होनेपर भी महाज्ञानी और संयमी थे, परन्तु महाप्रभुके प्रति उनकी श्रद्धा जाग्रत नहीं हुई थी। वे श्रीमद्भागवतम्‌को छोड़कर अन्य किसी ग्रन्थका पाठ नहीं करते थे। इसी कारण एक बार वक्रेश्वर पण्डित उनके आश्रममें ठहर गये और देवानन्द पण्डितने उनकी सेवा की। वक्रेश्वर पण्डितके सङ्गके प्रभावसे देवानन्द पण्डितमें महाप्रभुके प्रति श्रद्धाका उदय हुआ था और वे वक्रेश्वर पण्डितके साथ महाप्रभुके दर्शनके लिये गये। महाप्रभु चन्द्र आसनपर विराजमान थे। देवानन्द पण्डित उन्हें दण्डवत् प्रणाम करके सङ्कोचके साथ एक तरफ खड़े हो गये। महाप्रभु भी उन्हें देखकर सन्तुष्ट हुए और एकान्तमें उन्हें साथ लेकर बैठे। उनके जो कुछ भी पूर्व अपराध थे, उन सभी अपराधोंको क्षमा करके महाप्रभुने उनपर कृपा की। महाप्रभुने कहा,—“तुमने जो वक्रेश्वर पण्डितकी सेवा की है, इसी कारण तुम्हें मेरे दर्शन हुए हैं। वक्रेश्वर पण्डित प्रभुकी पूर्णशक्ति हैं। जो उनकी सेवा करते हैं, उन्हें कृष्णकी प्राप्ति होती है। वक्रेश्वरका हृदय कृष्णका अपना घर है। वक्रेश्वर जब नृत्य करते हैं, तब कृष्णका नृत्य होता है। जिस किसी भी स्थानपर वक्रेश्वरका सङ्ग क्यों न हो, वह स्थान श्रीवैकुण्ठमय सर्वतीर्थस्वरूप हो जाता है॥” 19॥

प्रभु बलेन—तुमि मोर पक्ष एक शाखा। आकाशे उड़िया याङ, पाङ आर पाखा॥ 20॥

अनुवाद—अमृतप्रवाह भाष्य द्रष्टव्य है॥ 20॥ अमृतप्रवाह भाष्य—यह सुनकर महाप्रभुने कहा,— “वक्रेश्वर! तुम मेरे एक पंख हो, एक और तुम्हारे जैसा पंख मुझे मिलता, तो मैं आकाशमें उड़ जाता॥” 20॥

46 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/21-25 ] (6) श्रीजगदानन्दका माहात्म्य :- पण्डित जगदानन्द प्रभुर प्राणरूप। लोके ख्याते यँहो सत्भाभार स्वरूप॥21॥ प्रीत्ये करिते चाहे प्रभुरे लालन-पालन। वैराग्य-लोक-भये प्रभु ना माने कखन॥22॥ दुइजने खट्मटि लागाय कोन्दल। ताँर प्रीत्येर कथा आगे कहिब सकल॥23॥ अनुवाद—श्रीजगदानन्द पण्डित महाप्रभुके प्राण स्वरूप थे। लोगोंमें वे सत्यभामाके रूपमें विख्यात हैं। वे प्रेमसे महाप्रभुका लालन-पालन करना चाहते थे, किन्तु उससे वैराग्य (संन्यास धर्म) नष्ट होगा और लोगोंमें निन्दा होगी—इस भयसे अर्थात् मर्यादा रक्षाके लिये महाप्रभु उनकी बात नहीं मानते थे। इसलिये इन दोनोंमें परस्पर प्रेम कलह हो जाती थी। इनकी प्रीतिका वर्णन आगे विस्तारपूर्वक किया जायेगा॥21-23॥ अमृतप्रवाह भाष्य—चैःचः अन्त्यलीलाके चौथे, सातवें, बारहवें और तेरहवें अध्याय द्रष्टव्य हैं॥23॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 51वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “केनावान्तरभेदेन भेदं कुर्वन्ति सात्वताः। सत्यभामाप्रकाशोऽपि जगदानन्दपण्डितः॥”51॥ “भगवद्भक्त जन किसी अवान्तर भेदसे अर्थात् (सत्यभामा विष्णुप्रिया हैं—इस) विचारसे भेद करते हुए कहते हैं कि श्रीजगदानन्द पण्डित श्रीसत्यभामाके प्रकाश हैं।” ये श्रीवास-आङ्गनमें और श्रीचन्द्रशेखर भवनमें महाप्रभुके कीर्त्तनके सङ्गी थे। महाप्रभुके संन्यासके पश्चात् उड़ीसा जाते समय श्रीजगदानन्द पण्डितने उनका दण्ड वहन किया और भिक्षा की॥21॥ (7) श्रीराघव पण्डित-शाखा :- राघव-पण्डित-प्रभुर आद्य अनुचर। ताँर शाखा मुख्य एक,—मकरध्वज कर॥24॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डित श्रीचैतन्यदेवके नित्य सेवक हैं। इनकी एक मुख्य शाखा श्रीमकरध्वज-कर हैं॥24॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 166वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “धनिष्ठा भक्ष्यसामग्रीं कृष्णायादात् व्रजेऽमिताम्। सैव सम्प्रति गौराङ्गप्रियो राघवपण्डितः॥”166॥ “व्रजकी धनिष्ठा नामक जो सखी श्रीकृष्णके लिये अपरिमित स्वादिष्ट खाद्य सामग्री प्रस्तुत करती थीं, वे अब गौराङ्गप्रिय श्रीराघव पण्डित हैं।” पाणिहाटी ग्राममें राघवभवन है। [टीका लिखनेके समय] राघव पण्डितकी समाधिके ऊपर लताकुञ्ज-आवृत एक ऊँची वेदी स्थापित है। जिस स्थानपर समाधि है, उसकी उत्तर दिशामें एक खण्डहर-प्राय जीर्ण-शीर्ण घरमें बिना किसी विशेष यत्नसे सेवित श्रीमदनमोहनका विग्रह विराजमान है। पाणिहाटीके वर्तमान जमीन्दार श्रीशिवचन्द्र राय चौधुरीके तत्त्वावधानमें इस सेवाकी व्यवस्था चल रही है। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 141वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “नटश्चन्द्रमुखः प्राग् यः स करो मकरध्वजः॥”141॥ “पूर्वकालके नट अर्थात् नाटकमें अभिनय करनेवाले चन्द्रमुख अब मकरध्वज-कर हुए हैं।” ये पाणिहाटी ग्राममें रहते थे॥24॥ उनकी बहन दमयन्ती गुणोंकी राशि :- ताँहार भगिनी दमयन्ती प्रभुर प्रिय दासी। प्रभुर भोगसामग्री ये करे बारमासी॥25॥ अनुवाद—श्रीराघव पण्डितकी बहन श्रीदमयन्ती देवी महाप्रभुकी प्रिय दासी हैं, जो बारह मासोंके लिये एक बारमें ही प्रभुके लिये समस्त भोगसामग्री प्रस्तुत करती थीं॥25॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 167वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— दसवाँ अध्याय | 47

[ 10/25-32 “गुणमाला व्रजे यासीद्दमयन्ती तु तत्स्वसा॥”167॥ “व्रजकी गुणमाला सखी अब श्रीराघव पण्डितकी बहन दमयन्ती हैं॥” 25॥ से-सब सामग्री यत झालिते भरिया। राघव लइया यांन गुप्त करिया॥ 26 ॥ बारमास ताहा प्रभु करेन अङ्गीकार। 'राघवेर झालि' बलि' प्रसिद्धि याहार ॥ 27 ॥ से-सब सामग्री आगे करिब विस्तार। याहार श्रवणे भक्तेर बहे अश्रुधार ॥ 28 ॥ अनुवाद—वह सब सामग्रीको यत्नसे एक टोकरीमें भरकर रख देती, जिसे राघव पण्डित छिपाकर महाप्रभुके लिये श्रीपुरुषोत्तम धाम ले जाते। महाप्रभु बारह मास तक उस सामग्रीका आस्वादन करते, इसलिये यह 'राघवकी डलिया'के नामसे प्रसिद्ध है। उस सब सामग्रीका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर भक्तोंके नेत्रोंसे अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है॥26-28॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे'—चैःचः अन्त्यलीलाके दसवें अध्यायमें यह द्रष्टव्य है॥ 28 ॥ अनुभाष्य—चैःचः अन्त्यलीलाके दसवें अध्यायमें 'झाली' का वर्णन द्रष्टव्य है॥ 27 ॥ (8) श्रीगङ्गादास :- प्रभुर अत्यन्त प्रिय—पण्डित गङ्गादास। याँहार स्मरणे हय सर्वबन्ध-नाश॥ 29 ॥ अनुवाद—श्रीगङ्गादास पण्डित श्रीचैतन्यदेवके अत्यन्त प्रिय हैं, जिनके केवल स्मरणमात्रसे समस्त बन्धनोंका नाश हो जाता है॥ 29 ॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 53 और 111 श्लोकोंमें इस प्रकार वर्णन आता है— “पुरासीत् रघुनाथस्य यो वशिष्ठमुनिर्गुरुः। स प्रकाशविशेषेण गङ्गादास-सुदर्शनौ ॥ 53 ॥ गङ्गादासः प्रभुप्रियः। आसीत्त्रिभुवने प्राग् यो दुर्वासा गोपिका-प्रियः॥”111॥ “पूर्वकालमें जो श्रीरघुनाथके गुरु श्रीवशिष्ठ मुनि थे, वे ही अब प्रकाश भेदसे श्रीगङ्गादास और श्रीसुदर्शन हैं। पूर्वकालमें जो निधुवनमें गोपिकाप्रिय श्रीदुर्वासा थे, वे ही महाप्रभुके प्रिय श्रीगङ्गादास हैं॥ 29 ॥ (9) श्रीपुरन्दर आचार्य :- चैतन्य-पार्षद—श्रीआचार्य पुरन्दर। पिता करि' याँरे बोले गौराङ्गसुन्दर ॥ 30 ॥ अनुवाद—श्रीपुरन्दर आचार्य श्रीचैतन्य महाप्रभुके पार्षद थे, जिन्हें श्रीगौराङ्गसुन्दर 'पिता' कहकर सम्बोधित करते थे॥ 30 ॥ अनुभाष्य—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, पाँचवें अध्यायमें)— “प्रभु आइलेन मात्र पण्डितेर घर। वार्त्ता पाइ' आइला आचार्य पुरन्दर ॥ 15 ॥ ताहाने देखिया प्रभु पिता करि' बोले। प्रेमावेशे मत्त ताने करिलेन कोले॥ 16 ॥ परम-सुकृति से आचार्य पुरन्दर। प्रभु देखि' कान्दे अति हइ असम्बर॥”17॥ “कुमारहट्टमें स्थित श्रीवास पण्डितके घर श्रीचैतन्य महाप्रभुके आनेका समाचार पाते ही श्रीपुरन्दर आचार्य वहाँ आ पहुँचे। उन्हें देखकर महाप्रभुने उन्हें 'पिता' कहकर सम्बोधित किया और प्रेमके आवेशमें मत्त होकर उन्हें अपनी गोदमें ले लिया। परम सुकृतिवान् श्रीपुरन्दर आचार्य महाप्रभुको देखकर अधीर होकर बहुत क्रन्दन करने लगे॥” 30 ॥ (10) श्रीदामोदर पण्डित-शाखा :- दामोदर पण्डित-शाखा प्रेमेते प्रचण्ड। प्रभुर उपरे यँहो कैल वाक्यदण्ड ॥ 31 ॥ दण्ड-कथा कहिब आगे विस्तार करिया। दण्डे तुष्ट प्रभु ताँरे पाठाइला नदीया ॥ 32 ॥ 48 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/31-33 ] अनुवाद—एक अन्य शाखा श्रीदामोदर पण्डित हैं, जिनकी महाप्रभुमें प्रचण्ड प्रीति है। इन्होंने वाक्यके द्वारा महाप्रभुको भी शासन किया था, जिसका आगे विस्तारसे वर्णन करूँगा। इनके इस वाक्य-दण्डसे प्रसन्न होकर महाप्रभुने इन्हें नवद्वीपमें भेजा था॥31-32॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आगे' अर्थात् चैःचः अन्त्यलीलाका तीसरा अध्याय द्रष्टव्य है॥32॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 159वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “शैव्या यासीत् व्रजे चण्डी सा दामोदरपण्डितः। कुतश्चित् कार्यतो देवी प्राविशत्तं सरस्वती॥”159॥ “व्रजमें जो प्रखरा शैव्या थीं, वे ही श्रीदामोदर पण्डित हैं। किसी कार्यवशतः श्रीसरस्वतीदेवी भी इनमें प्रविष्ट हुई हैं।” महाप्रभुकी आज्ञासे श्रीदामोदर शचीमाताके दर्शनके लिये गौड़देश आते और रथयात्रासे पहले भक्तोंके साथ पुरुषोत्तम धाम जाते थे। महाप्रभुके द्वारा शचीदेवीकी श्रीकृष्णभक्तिके विषयमें जिज्ञासा सुनकर श्रीदामोदरने जो कहा—वह चैःभाः अन्त्यखण्ड, नौवें अध्यायमें वर्णित है। चैःचः अन्त्यलीला, तीसरे अध्यायमें महाप्रभुके प्रति दामोदर पण्डितके वाक्य-दण्डका वृत्तान्त द्रष्टव्य है॥31-32॥ अमृतानुकणिका—दामोदर पण्डित आइ (शचीमाता) को देखनेके लिये नवद्वीप गये थे, वे आइको देखकर शीघ्र चले आये। दामोदरको देखकर महाप्रभुने उन्हें एकान्तमें बुलाया और आइका वृत्तान्त पूछने लगे। महाप्रभुने कहा,–“तुम तो उनके (आइके) पास थे। सत्य कहना, क्या आइकी विष्णुमें भक्ति है?” यह सुनकर परम तपस्वी निरपेक्ष दामोदर क्रोधित होकर कहने लगे,–“क्या कहा गोसाईं, आइकी विष्णुमें भक्ति है? आप किस प्रयोजनसे यह पूछ रहे हैं? आइकी कृपासे ही आपमें विष्णुभक्ति है। आपका जो कुछ भी है, वह सब उन्हींकी शक्ति है। आपमें जितनी विष्णुभक्ति उदित हुई है, निश्चय ही जान लीजिये, यह सब आइकी कृपासे ही है। अश्रु, कम्प, स्वेद, मूर्च्छा, पुलक, हुँकार आदि विष्णुभक्तिके जितने भी विकार समूह हैं, आइके श्रीअङ्गोंमें उन सबका एक क्षणके लिये भी विराम नहीं है। आइके श्रीमुखमें निरन्तर कृष्णनाम स्फुरित होता रहता है। आप आइकी भक्तिकी कथा पूछ रहे हैं! आइको देखनेसे ही पता चलता है कि 'विष्णुभक्ति' किसे कहते हैं। मैं आपसे कह रहा हूँ कि आइ मूर्तिमती भक्तिस्वरूपा हैं। आप यह जानकर भी माया विस्तारपूर्वक मुझसे पूछ रहे हैं। प्राकृत-शब्दके रूपमें भी जो ‘आइ' कहेगा, आइ-शब्दके प्रभावसे उसे कोई दुःख नहीं रहेगा।” पुत्र-सङ्गसे वञ्चित होकर आइकी भक्ति कैसी है, इसलिये महाप्रभुने यह प्रश्न किया था और दामोदरके मुखसे आइकी महिमा सुनकर महाप्रभुको असीम आनन्द हुआ॥32॥ (11) श्रीशङ्कर पण्डित-माहात्म्य और शाखा :- ताँहार अनुज शाखा—शङ्कर पण्डित। 'प्रभु-पादोपाधान' याँर नाम विदित॥33॥ अनुवाद—श्रीदामोदर पण्डितके छोटे भाई श्रीशङ्कर पण्डित एक अन्य शाखा हैं। ये महाप्रभुके 'चरणोंके तकिया'के नामसे प्रसिद्ध थे॥33॥ अनुभाष्य—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 157वें श्लोकमें इस प्रकार वर्णन आता है— “यस्या वक्षसि सुष्वाप कृष्णो वृन्दावने पुरा। सा श्रीभद्राद्य गौराङ्गप्रियः शङ्करपण्डितः॥”157॥ “वृन्दावनमें श्रीकृष्ण जिनके वक्षःस्थलपर शयन करते थे, वे श्रीभद्रा सखी ही अब श्रीशङ्कर पण्डित हैं।” (चैःचः अन्त्यलीला 19/67-74 संख्या द्रष्टव्य है)। महाप्रभु श्रीदामोदर पण्डितके प्रति गौरव बुद्धिके साथ प्रीति रखते थे और उनके छोटे भाई श्रीशङ्कर पण्डितसे उनका केवल शुद्ध प्रेम था (चैःचः मध्यलीला 11/146-148 संख्या द्रष्टव्य है)॥33॥ दसवाँ अध्याय | 49

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[ 10/34-37 (12) श्रीसदाशिव पण्डित :- सदाशिव-पण्डित याँर प्रभु strip: सदाशिव-पण्डित याँर प्रभुदे आश। प्रथमेइ नित्यानन्देर याँर घरे वास ॥ 34 ॥ अनुवाद-श्रीसदाशिव पण्डित सदा श्रीमन्महाप्रभुके चरणोंकी सेवाकी अभिलाषा करते थे। नवद्वीपमें आकर श्रीनित्यानन्द प्रभु सबसे पहले इनके घरमें रहे थे॥34॥ अनुभाष्य-(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 8/19-श्रीरथयात्राके समय)- “सदाशिव पण्डित चलिला शुद्धमति। याँर घरे पूर्वे नित्यानन्देर वसति॥” “पहले श्रीनित्यानन्द प्रभु जिनके घरमें रहे थे, वे शुद्धमति श्रीसदाशिव पण्डित रथयात्राके लिये नीलाचलकी ओर अग्रसर हुए।” ये नवद्वीपमें महाप्रभुके कीर्त्तनके सङ्गी थे। गयासे लौटनेके पश्चात् महाप्रभुने इन्हें और अन्य भक्तोंको शुक्लाम्बरके घरमें अपने श्रीकृष्ण-भजनके विषयमें बतलाया था। श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें लक्ष्मीके वेषमें नृत्य करनेके समय महाप्रभुने इनको वेषभूषादि तैयार करनेके लिये कहा था (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अध्याय द्रष्टव्य है)॥ 34॥ (13) श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी :- श्रीनृसिंह-उपासक-प्रद्युम्न ब्रह्मचारी। प्रभु ताँर नाम कैला 'नृसिंहानन्द' करि' ॥ 35 ॥ अनुवाद-श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी श्रीनृसिंह भगवान्‌के उपासक थे, इसलिये महाप्रभुने इनका नाम 'श्रीनृसिंहानन्द' रखा था॥ 35 ॥ अनुभाष्य-(चैःचः अन्त्यलीला 2/53)- “प्रद्युम्न ब्रह्मचारी ताँर निजनाम। 'नृसिंहानन्द' नाम ताँर कैल गौरधाम॥” “प्रद्युम्न ब्रह्मचारी उनका अपना नाम था, [नृसिंह भगवान्‌के प्रति उनकी निष्ठा देखकर] महाप्रभुने उनको 'नृसिंहानन्द' नाम दिया।” पाणिहाटीमें श्रीराघव पण्डितके घरसे लौटकर कुमारहट्टमें श्रीशिवानन्दसेनके घरमें महाप्रभुने श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीके हृदयमें आविर्भूत होकर श्रीजगन्नाथ, श्रीनृसिंह और अपना-तीनोंका भोग ग्रहण किया था (चैःचः अन्त्यलीला 2/48-78 संख्या द्रष्टव्य है)। कुलियासे महाप्रभुका वृन्दावन जानेका समाचार सुनकर ये ध्यानमग्न चित्तमें कुलियासे वृन्दावन तकके मार्गको रत्नादिके द्वारा सजाने लगे, किन्तु बीचमें ही ध्यान भङ्ग होनेके कारण वे भक्तोंसे बोले-“महाप्रभु इस बार कानाई-नाटशाला तक ही जायेंगे, वृन्दावन नहीं जायेंगे।”-(चैःचः मध्यलीला संख्या 1/55-62)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 74वाँ श्लोक)- “आवेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्नसञ्ज्ञके ॥”74(क)॥ “श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारीमें श्रीगौरहरिका आवेश जानना चाहिये।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 3/186 संख्यामें)- “याँहार शरीरे नृसिंहेर परकाश।” “जिनके शरीरमें श्रीनृसिंहदेवका प्रकाश था।” और (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वें अध्यायमें)- “साक्षात् नृसिंह याँर सने कथा कय।” “साक्षात् श्रीनृसिंहदेव इनके साथ बात करते थे॥”35॥ (14) श्रीनारायण पण्डित :- नारायण-पण्डित एक बड़इ उदार। चैतन्यचरण बिनु नाहि जाने आर ॥ 36 ॥ अनुवाद-श्रीनारायण पण्डित बड़े ही उदार थे। वे श्रीचैतन्य-चरणोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते थे॥ 36 ॥ अनुभाष्य-(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9/93 संख्यामें)- श्रीवास पण्डितके भ्राता श्रीराम पण्डितके साथ श्रीनारायण पण्डित महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचल गये थे॥36॥ (15) श्रीमान् पण्डित-शाखा :- श्रीमान्‌पण्डित शाखा-प्रभुर निज भृत्य। देउटि धरेन, यबे प्रभु करेन नृत्य ॥ 37 ॥ 50 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/37-40 ] अनुवाद—एक और शाखा श्रीमान् पण्डित श्रीचैतन्य महाप्रभुके निज दास हैं। महाप्रभुके नृत्यके समय ये हाथमें जलती हुई मशाल धारण करते थे॥ ३७॥ अनुभाष्य—नवद्वीपवासी 'श्रीमान् पण्डित' महाप्रभुके प्रथम कीर्तनके सङ्गी थे। वेषसज्जाके दिन महाप्रभुके देवीभावमें और सर्वत्र महाप्रभुके नृत्यकालमें ये जलती हुई मशाल धारण करते थे। (चैःभाः मध्यखण्ड, 18/154,157 संख्यामें)— “आद्याशक्ति-वेशे नाचे प्रभु गौरसिंह। सुखे देखे ताँर यत चरणेर भृङ्ग॥ 154॥ सम्मुखे देउटी धरे पण्डित श्रीमान्॥ 157॥” “आद्याशक्तिके वेशमें प्रभु गौरसिंह नृत्य कर रहे थे। उनके चरणकमलोंके भ्रमररूपी भक्त बड़े आनन्दसे उस नृत्यको देख रहे थे। सामने हाथमें मशाल लेकर श्रीमान् पण्डित खड़े थे॥” 37॥ (16) श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी :— शुक्लाम्बर-ब्रह्मचारी बड़ भाग्यवान्। याँर अन्न मागि' काड़ि' खाइला भगवान्॥ 38॥ अनुवाद—श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी बड़े भाग्यवान् हैं, जिनकी भिक्षा-झोलीमेंसे प्रभुने अन्न निकालकर खाया था॥ 38॥ अनुभाष्य—'श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी'—श्रीनवद्वीपवासी थे और महाप्रभुके प्रथम कीर्तनके सङ्गी थे। (चैःभाः मध्यखण्ड, प्रथम अध्याय)—गयासे लौटनेके पश्चात् महाप्रभुने इनके घरमें सभी भक्तोंको मिलकर इनसे श्रीकृष्ण-कथा सुनानेका अनुरोध किया था। (चैःभाः मध्यखण्ड, सोहलवाँ और पच्चीसवाँ अध्याय)— नवद्वीपलीलामें महाप्रभु इनको भिक्षामें मिले चावलको छीनकर परमानन्दसे खाते थे। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 191वें श्लोकमें— “शुक्लाम्बरो ब्रह्मचारी पुरासीद् यज्ञपत्निका। प्रार्थयित्वा यदन्नं श्रीगौराङ्गो भुक्तवान् प्रभुः। केचिदाहुर्ब्रह्मचारी याज्ञिकब्राह्मणः पुरा॥” 191॥ “जो पहले यज्ञपत्नी थीं, वे ही अब श्रीशुक्लाम्बर ब्रह्मचारी हैं। श्रीगौराङ्ग महाप्रभु इन्हींसे अन्नकी प्रार्थनाकर भोजन करते थे। कोई-कोई कहते हैं कि ये पहले याज्ञिक ब्राह्मण थे॥” 38॥ (17) श्रीनन्दन-आचार्य-शाखा :— नन्दन-आचार्य-शाखा जगते विदित। लुकाइया दुइ प्रभुर याँर घरे स्थित॥ 39॥ अनुवाद—श्रीनन्दनाचार्य-शाखाको सारा जगत् जानता है। इन्हींके घरमें दोनों प्रभु (श्रीचैतन्य-श्रीनित्यानन्द) छिपकर रहे थे॥ 39॥ अनुभाष्य—'श्रीनन्दन आचार्य'—श्रीनवद्वीपवासी थे और महाप्रभुके कीर्तनके सङ्गी थे। श्रीनित्यानन्द प्रभु अवधूत वेशमें अनेक तीर्थ-भ्रमणके उपरान्त सर्वप्रथम इन्हींके घरमें आये थे। वहींपर ही उनका महाप्रभु और भक्तोंसे मिलन हुआ था। महाप्रकाशके दिन महाप्रभुने श्रीअद्वैताचार्यको लानेके लिये श्रीरामार्इ पण्डितको भेजा था। श्रीअद्वैताचार्य श्रीनन्दनाचार्यके घरमें आकर छिपे थे और सर्वान्तर्यामी श्रीगौरसुन्दर यह जान गये थे। महाप्रभु भी एक दिन इनके घरमें छिपे थे। (चैःभाः मध्यखण्ड, छठा और सतरहवाँ अध्याय द्रष्टव्य है)॥ 39॥ (18) श्रीमुकुन्द दत्त-शाखा :— श्रीमुकुन्द-दत्त शाखा—प्रभुर समाध्यायी। याँहार कीर्त्तने नाचे चैतन्य-गोसाञि॥ 40॥ अनुवाद—श्रीमुकुन्द दत्त नामक शाखा महाप्रभुके सहपाठी हैं, जिनके कीर्तनमें महाप्रभु स्वयं नृत्य करते थे॥ 40॥ अनुभाष्य—श्रीमुकुन्द दत्त चट्टग्राम जिलेके पाटिया थानेके अन्तर्गत 'छनहरा' ग्राममें आविर्भूत हुए थे। यह स्थान श्रीविद्यानिधिके श्रीपाट 'मेखला ग्राम' से दस कोसकी दूरी पर है। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकाके 140वें श्लोकमें)— दसवाँ अध्याय | 51

[ 10/40

“व्रजे स्थितौ गायकौ यौ मधुकण्ठ-मधुव्रतौ। मुकुन्द-वासुदेवौ तौ दत्तौ गौराङ्ग-गायकौ॥” “व्रजके मधुकण्ठ नामक गायक अब श्रीगौराङ्गदेवके गायक श्रीमुकुन्द दत्त हैं।” विद्या-शिक्षाके समय निमाइ अपने सहपाठी मुकुन्दके साथ न्यायशास्त्रकी पहेलियोंको लेकर झगड़ा किया करते थे (चैःभाः आदिखण्ड, सातवाँ और आठवाँ अध्याय)। गयासे लौटनेके पश्चात् श्रीकृष्णप्रेममें मत्त महाप्रभुको मुकुन्द भागवतके श्लोक पढ़कर आनन्द प्रदान करते थे। इनकी ही चेष्टासे सङ्गी श्रीगदाधर पण्डितने श्रीपुण्डरीक विद्यानिधिसे दीक्षा प्राप्त की (चैःचः मध्यलीला सातवाँ अध्याय)। श्रीवास-अङ्गनमें जब ये कीर्तन करते थे, तब महाप्रभु नृत्य करते थे। और महाप्रभुके ‘सातप्रहरिया’ भावकालमें इन्होंने ‘अभिषेक’ नामक गीत गाया था। मुकुन्दके प्रति दण्ड और कृपा (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय द्रष्टव्य है)। श्रीचन्द्रशेखर-भवनमें महाप्रभुके द्वारा लक्ष्मी-वेषमें नृत्यके समय इन्होंने कीर्तन आरम्भ किया था। संन्यास ग्रहण करनेका निर्णय श्रीनित्यानन्द प्रभुको बतलानेके पश्चात् महाप्रभु मुकुन्दके घरमें उपस्थित हुए थे। सब बातोंसे अवगत होकर इन्होंने महाप्रभुसे कुछ और दिन तक नवद्वीपमें कीर्तनलीला करनेका अनुरोध किया था (चैःभाः मध्यखण्ड, पच्चीसवाँ अध्याय)। श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा महाप्रभुके संन्यास लेनेका समाचार श्रीगदाधर, चन्द्रशेखरके साथ मुकुन्दको भी मिला और वे उनके साथ कटोआ गये। वहाँ मुकुन्द कीर्तन और संन्यासोचित क्रियाओंको सम्पादनकर महाप्रभुके संन्यासके उपरान्त उनके पीछे-पीछे श्रीनिताइ, श्रीगदाधर और श्रीगोविन्दके साथ गये (चैःचः मध्यलीला, छब्बीसवाँ अध्याय; अन्त्य, प्रथम अध्याय) और इस प्रकार महाप्रभुके पीछे-पीछे पुरुषोत्तम तक गमन किया (चैःचः अन्त्यलीला, द्वितीय अध्याय)। जलेश्वर जाते समय श्रीनित्यानन्द प्रभुके द्वारा महाप्रभुका दण्डभङ्ग करनेके समय मुकुन्द भी उपस्थित थे, कुछ समय बाद महाप्रभु भी जलेश्वरमें उपस्थित हुए। मुकुन्द प्रतिवर्ष भक्तोंके साथ नवद्वीपसे प्रभुके दर्शनोंके लिये नीलाचल आते थे॥40॥ अमृतानुकणिका—महाप्रभुने महा-प्रकाश-लीलामें सभी भक्तोंको मनोवाञ्छित वर प्रदान किये। उस समय मुकुन्द बाहर ही खड़े थे। श्रीवासने जब मुकुन्दके लिये कृपाकी भिक्षा माँगी, तब महाप्रभुने कहा,—“मुकुन्द उनके दर्शनका अधिकारी नहीं है, क्योंकि मुकुन्द प्रत्येक सम्प्रदायसे मिलकर विभिन्न सम्प्रदायोंके भावोंको ग्रहण किया करता है। उसकी मति अभी अस्थिर है एवं भक्तिके प्रति उसकी निष्ठा नहीं है। वह ‘खड़-जठिया’ है,—कभी दाँतोंमें ‘खड़’ (तृण) धारण करता है, तो कभी ‘जाठि’ (लाठी) भी उठा लेता है। भक्ति ही सर्वश्रेष्ठ है,—इस बातको न मानना ही भगवान्के अङ्गमें ‘जाठि’ (लाठी) मारना है।” यह बात सुनकर मुकुन्दने उसी दिन अपने देह त्याग देनेका सङ्कल्प कर लिया और श्रीवाससे कहा कि आप महाप्रभुसे पूछकर आओ कि क्या मैं कभी उनका दर्शन कर पाऊँगा या नहीं? श्रीवासने आकर उत्तर दिया कि कोटि जन्मके पश्चात् दर्शन मिलेगा। यह सुनकर मुकुन्द आनन्दपूर्वक स्वयंको भूलकर नृत्य करने लगे कि कोटि जन्मके पश्चात् तो मुझे महाप्रभुका दर्शन मिलेगा। तब महाप्रभुने उसे अपने पास बुलाकर उसके सभी अपराध क्षमा कर दिये एवं अपनी पराजय स्वीकार करते हुए कहा,—“मुकुन्द, तुम्हारी जिह्वामें मेरा नित्य अधिष्ठान है।” यह सुनकर मुकुन्दने भक्तिहीनताके लिये अपनेको धिक्कारते हुए भक्तियोगके प्रभाव एवं भक्तिहीनताके भयानक परिणामके बारेमें दृष्टान्त सहित वर्णन किया। मुकुन्दके खेद-दर्शनसे लज्जित विश्वम्भरने अपनी भक्तिका श्रेष्ठत्व बतलाते हुए वेदोंमें उल्लिखित कर्मकाण्डके फलस्वरूप सभी प्रकारके कर्म-बन्धनोंसे मुक्ति दिलानेके लिये केवल अपनी भक्तिका ही प्रभुत्व स्थापित किया एवं मथुरावासी अभक्त धोबीकी भाग्यहीनताकी कथाका उल्लेख करते हुए मुकुन्दको यह वर दिया कि उनके सभी अवतारोंमें मुकुन्द उनके गायक बनेंगे॥40॥

52 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/41-47 ] (19) श्रीवासुदेवदत्त ठाकुरकी गुणराशि :- वासुदेव दत्त—प्रभुर भृत्य महाशय। सहस्र-मुखे याँर गुण कहिले ना हय॥ 41 ॥ अनुवाद—श्रीवासुदेव दत्त महाप्रभुके सेवक हैं। हजार मुखोंके द्वारा भी उनके गुणोंको कहा नहीं जा सकता॥ 41 ॥ अनुभाष्य—श्रीवासुदेव दत्तका जन्म चट्टग्राममें हुआ था और ये श्रीमुकुन्द दत्तके भाई हैं। (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 8/14)— “याँर स्थाने कृष्ण हय आपने विक्रय।” “जिनके प्रेमके कारण श्रीकृष्ण उनके हाथों बिक गये हैं।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 5वाँ अः)— “हेन से प्रभुर प्रीति दत्तेर विषय। प्रभु बले,—“आमि वासुदेवेर निश्चय॥” 26 ॥ आपने श्रीगौरचन्द्र बले बार बार। “ए शरीर वासुदेव दत्तेर आमार॥ 27 ॥ दत्त आमा' यथा बेचे, तथाइ बिकाइ। सत्य, सत्य, इहाते अन्यथा किछु नाइ॥ 28 ॥ सत्य आमि कहि, शुन, वैष्णवमण्डल। ए देह आमार वासुदेवेरे केवल॥” “वासुदेव दत्तसे महाप्रभुकी इतनी प्रीति थी कि महाप्रभु कहने लगे—“मैं निश्चित रूपसे वासुदेवका हूँ। मेरा यह शरीर वासुदेवका है। दत्त मुझे जहाँ बेचता है, मैं वहीं बिक जाता हूँ। यही सत्य है, सत्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं है। हे वैष्णव मण्डली! सुनिये, मैं सत्य कह रहा हूँ कि मेरा यह शरीर केवल वासुदेवका है।” इनके ही अनुगृहीत श्रीरघुनाथदास गोस्वामीके दीक्षा गुरु श्रीयदुनन्दन आचार्य थे (चैःचः अन्त्यलीला, 6/161)। इनमें प्रचुर धन व्यय करनेकी प्रवृत्तिको देखकर महाप्रभुने श्रीशिवानन्द सेनको इनका 'सरखेल' (प्रबन्धक) बनाकर व्ययके समाधानके लिये आदेश दिया (चैःचः मध्यलीला, 15/93-96)। जीवोंके दुःखोंको देखकर महाप्रभुसे इनकी प्रार्थनाके लिये (चैःचः मध्यलीला, 15/159-180) द्रष्टव्य है॥ 41 ॥ जगते यतेक जीव, तार पाप लञा। नरक भुञ्जिते चाहे जीव छाड़ाइया॥ 42 ॥ अनुवाद—(वासुदेव दत्तने महाप्रभुसे प्रार्थना की)— “जगत्के समस्त लोगोंके पापोंको लेकर मैं स्वयं नरक भोग करूँ और वे सब पाप-बन्धनसे मुक्त होकर सुखको प्राप्त करें॥” 42 ॥ (20) नामाचार्य ठाकुर हरिदासकी गुणराशि और उनकी शाखा :- हरिदास ठाकुर—शाखार अद्भुत चरित। तिनलक्ष नाम तेंहो लयेन अप्रतित॥ 43 ॥ ताँहार अनन्त गुण,—करि दिङ्मात्र। आचार्य गोसाञि याँरे भुआय श्राद्धपात्र॥ 44 ॥ प्रह्लाद-समान ताँर गुणेर तरङ्ग। यवन-ताड़नेओ याँर नाहिक भ्रूभङ्ग॥ 45 ॥ तेंहो सिद्धि पाइले ताँर देह लञा कोले। नाचिल चैतन्यप्रभु महाकुतूहले॥ 46 ॥ ताँर लीला वर्णियाछेन वृन्दावनदास। येबा अवशिष्ट, आगे करिब प्रकाश॥ 47 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुर नामक शाखाका अद्भुत चरित्र है। वे नित्य ही नियमपूर्वक तीन लाख नाम करते थे। इनके अनन्त गुण हैं, किन्तु मैं उनका केवल दिग्दर्शन करा रहा हूँ। श्रीअद्वैताचार्यने सर्वप्रथम इन्हें अपने पिताके श्राद्धपात्रका अन्न भोजन कराया। इनमें प्रह्लादके समान गुण हैं, यवनोंके द्वारा अत्याचार किये जानेपर भी इनकी भृकुटि जरा भी टेढ़ी नहीं हुई। इनके तिरोभावपर महाप्रभुने स्वयं इनकी चिन्मय देहको गोदमें लेकर महा-आनन्द सहित नृत्य किया था। श्रीवृन्दावनदास ठाकुरने इनकी लीलाओंका वर्णन अपने ग्रन्थ श्रीचैतन्यभागवतमें किया है। जो कुछ शेष रह गया है, उसका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥ 43-47 ॥ दसवाँ अध्याय | 53

[ 10/43-51

अमृतप्रवाह भाष्य—'अपतित' अर्थात् विधिभङ्ग किये बिना॥ 43 ॥ अनुभाष्य—(चैःभाः आदिखण्ड, द्वितीय अध्याय)— “बूढ़ने हइला अवतीर्ण हरिदास॥” 37॥ (चैःभाः आदिखण्ड, सोलहवाँ अध्याय)— “कतदिन थाकि' आइला गङ्गातीरे। आसिया रहिल फुलियाय शान्तिपुरे॥” 19॥ “इनका आविर्भाव 'बूढ़ने' ग्राममें हुआ था। कुछ समयके बाद वे शान्तिपुरमें गङ्गातटपर फुलिया ग्राममें रहने लगे।” यवनोंके द्वारा अत्याचारका प्रसङ्ग (चैःभाः आदिखण्ड 16वें अध्याय) में वर्णित है। श्रीहरिदासकी दैन्योक्ति और महाप्रभुकी कृपा (चैःभाः मध्यखण्ड, 10वाँ अध्याय); द्वार-द्वारपर नाम प्रचार (चैःचः मध्यलीला, 13वाँ अध्याय); चन्द्रशेखर-भवनमें अभिनयके समय श्रीहरिदासका कोतवालवेष (चैःभाः मध्यखण्ड, 18वाँ अध्याय); बेनोपोलमें हरिनाम-भजन और परीक्षा (चैःचः अन्त्यलीला, 3रा अध्याय) और श्रीहरिदास ठाकुरका निर्याण—(चैःचः अन्त्यलीला, 11वाँ अध्याय) द्रष्टव्य हैं॥ 43-47 ॥ (20क) हरिदास-शिष्य सत्यराज खाँ (बसु) आदि :- ताँर उपशाखा,—यत कुलीनग्रामी जन। सत्यराज आदि—ताँर कृपार भाजन॥ 48 ॥ अनुवाद—श्रीहरिदास ठाकुरकी एक उपशाखा सभी कुलीन ग्रामके निवासी हैं, जिनमें सत्यराज खान आदि उनके कृपाके विशेष पात्र हैं॥ 48॥ अनुभाष्य—सत्यराज खान कुलीन ग्रामके गुणराज खानके पुत्र और रामानन्द बसुके पिता हैं। एक समय श्रीहरिदास ठाकुरने चातुर्मास्यके समय कुलीन ग्राममें रहकर भजन किया था और बसु-वंशजनोंको कृपा प्रदान की थी। कुलीन ग्रामवासियोंको श्रीमन्महाप्रभुने प्रतिवर्ष रथयात्राके समय श्रीजगन्नाथदेवके लिये रेशमी डोरी लानेके लिये आदेश दिया था (चैःचः मध्यलीला, 14वाँ अध्याय)। इन्होंने श्रीमन्महाप्रभुसे गृहस्थ-भक्तोंके कर्त्तव्यके विषयमें जिज्ञासा की और उनसे वैष्णव (कनिष्ठ), वैष्णवतर (मध्यम) और वैष्णवतम (उत्तम) के अधिकार-तारतम्य और उनके लक्षणोंका श्रवण किया था (चैःचः मध्यलीला 15/102-109, 16/67-75 संख्या द्रष्टव्य है)। इनकी भजनस्थलीपर आज भी श्रीमन्महाप्रभुका विग्रह विराजमान है। कुलीनग्रामके माहात्म्यके सम्बन्धमें महाप्रभुकी उक्तिके लिये चैःचः आदिलीला 10/82-83, मध्यलीला 10/100-101 संख्या द्रष्टव्य है॥ 48॥ (21) श्रीमुरारि गुप्त-महिमा और शाखा :- श्रीमुरारि गुप्त-शाखा—प्रेमेर भाण्डार। प्रभुर हृदय द्रवे शुनि' दैन्य याँर॥ 49 ॥ प्रतिग्रह नाहि करे, ना लय कार धन। आत्मवृत्ति करि' करे कुटुम्ब भरण॥ 50 ॥ चिकित्सा करेन यारे हइया सदय। देहरोग, भवरोग,—दुइ तार क्षय॥ 51 ॥ अनुवाद—श्रीमुरारी गुप्त नामक शाखा प्रेमका भण्डार है। इनकी दीनताको सुनकर महाप्रभुका हृदय द्रवित हो जाता था। वे किसीसे भी दान ग्रहण नहीं करते थे और न ही किसीसे धन लेते थे। केवल चिकित्सा व्यवसायसे अपने कुटुम्बका पालन करते। वे दयापूर्वक जिसकी भी चिकित्सा करते, उसका शरीरका रोग और भवरोग (संसार-बन्धन) दोनों ही दूर हो जाते थे॥ 49-51 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य—'आत्मवृत्ति'—स्व-वर्णवृत्ति, श्रीमुरारीगुप्तका व्यवसाय कविराजी (चिकित्सा) था॥ 50॥ अनुभाष्य—श्रीमुरारीगुप्त 'श्रीचैतन्यचरित' ग्रन्थके लेखक हैं। इनका जन्म श्रीहट्टके वैद्यवंशमें हुआ था और बादमें ये नवद्वीपमें आकर रहने लगे। वे आयुमें महाप्रभुसे बड़े थे। इनके घरमें महाप्रभुने अपना वराह रूप दिखाया था (चैःभाः मध्यखण्ड, तीसरा अध्याय) और महाप्रकाशके समय महाप्रभुने इन्हें श्रीरामरूपके

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10/49-53 ] दर्शन कराये थे (चैःभाः मध्यखण्ड, दसवाँ अध्याय)। श्रीवासके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभुके साथ बैठे हुए श्रीगौरसुन्दरको देखकर इन्होंने सर्वप्रथम श्रीगौरको प्रणाम निवेदन किया और तत्पश्चात् श्रीनित्यानन्द प्रभुको दण्डवत् किया। यह देखकर महाप्रभुने मुरारीगुप्तसे कहा- “तुमने व्यवहारका व्यतिक्रम करके नमस्कार किया है" और महाप्रभुने रातमें स्वप्नमें इनको श्रीनित्यानन्द-तत्त्वकी महिमा बतलायी। तब अगले दिन प्रातःकाल इन्होंने पहले श्रीनित्यानन्द प्रभुके और उसके बाद महाप्रभुके चरणोंकी वन्दना की। यह देखकर महाप्रभुने प्रसन्न होकर अपना चर्वित ताम्बुल इन्हें प्रदान किया। एक दिन इन्होंने महाप्रभुको अधिक घीमें निर्मित अन्न खिलाया। अधिक मात्रामें अन्न खाकर महाप्रभुको अगले दिन अपच हो गया और चिकित्साके लिये वे इनके पास आये। 'मुरारीके जलपात्रका जल ही उसकी औषधि है', यह कहकर इन्होंने महाप्रभुको जल पीनेके लिये दिया, जिससे महाप्रभु स्वस्थ हो गये। एक दिन श्रीवास-भवनमें महाप्रभुने चतुर्भुज रूप धारण किया, तब इन्होंने गरुड़ भावका प्रदर्शन करते हुए महाप्रभुको अपने कन्धोंपर चढ़ाया। 'महाप्रभुके अप्रकटका विरह असहनीय होगा', ऐसा सोचकर महाप्रभुके प्रकटकालमें ही इन्होंने देहत्यागका सङ्कल्प किया और अन्तर्यामी महाप्रभुने उनके सङ्कल्पका निवारण किया (चैःभाः मध्यखण्ड, 20वाँ अः)। एक दिन इनके घरपर महाप्रभुने भावावेशमें अपनी वराह-मूर्ति प्रकट की और उसे देखकर इन्होंने उनकी स्तुति की (चैःभाः मध्यखण्ड, 3रा अः)। इनकी दैन्योक्ति (चैःचः मध्यलीला 11/152-158) और इनकी श्रीरामनिष्ठा (चैःचः मध्यलीला 15/137-157 द्रष्टव्य है) ॥ 49 ॥ (22) श्रीमान् सेन :- श्रीमान् सेन प्रभुर सेवक प्रधान। चैतन्य-चरण बिनु नाहि जाने आन ॥ 52 ॥ अनुवाद-श्रीमान् सेन महाप्रभुके एक और प्रधान सेवक हैं, जो श्रीचैतन्य महाप्रभुके चरणकमलोंके अतिरिक्त और कुछ नहीं जानते हैं॥ 52 ॥ अनुभाष्य-श्रीमान् सेन नवद्वीपवासी और महाप्रभुके सङ्गी थे॥ 52 ॥ (23) श्रीगदाधरदास-शाखा :- श्रीगदाधरदास-शाखा सर्वोपरि। काजीगणेर मुखे येंह बोलाइल हरि ॥ 53 ॥ अनुवाद-श्रीगदाधरदास नामक शाखा सर्वप्रधान है। इन्होंने काजीके मुखसे भी हरिनाम उच्चारण कराया था॥ 53 ॥ अमृतप्रवाह भाष्य-श्रीगदाधरदास ऐँड़ियादहवासी थे ॥ 53 ॥ अनुभाष्य-कोलकातासे चार कोस उत्तरमें 'ऐँड़ियादह' ग्राम है। श्रीगदाधरदास महाप्रभुके अप्रकट होनेके पश्चात् नवद्वीपसे कटोआमें आ गये (भक्तिरत्नाकर 7वीं तरङ्ग) और उसके बाद ऐँड़ियादह ग्राममें रहने लगे। जिस प्रकार श्रीगदाधर पण्डित श्रीमती वृषभानुनन्दिनीरूपा हैं, श्रीगदाधरदास भी उसी प्रकार ही श्रीमतीकी अङ्गशोभा हैं। ये 'श्रीराधाभावद्युति-सुवलित' श्रीगौराङ्गकी द्युति स्वरूप हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिकामें इन्हें श्रीवृषभानुनन्दिनीकी विभूतिरूप कहकर निर्देश किया है। इनकी श्रीगौर और श्रीनित्यानन्द, दोनोंके परिकरोंमें गणना होती है। श्रीगौराङ्ग महाप्रभुके जन सभी व्रजके मधुररसके रसिक हैं और श्रीनित्यानन्द प्रभुके जन शुद्ध-भक्ति प्रधान सख्यादि रसके रसिक हैं। श्रीगदाधर दास श्रीनित्यानन्दके जन होते हुए भी सख्यभाव गोपाल न होकर मधुर रसिक हैं। कटोआमें इनके पास श्रीगौरसुन्दरका अर्चा-विग्रह था। 1434 शकाब्दमें जब श्रीनित्यानन्द प्रभु महाप्रभुके अनुरोधपर भक्ति-प्रचारके लिये नीलाचलसे गौड़देश गये, तब श्रीगदाधर दास उनके प्रचार कार्यमें एक प्रधान दसवाँ अध्याय | 55

[ 10/53-55 सहायक बने (चैःचः आदिलीला 11/13-14)। ये सबको हरिनाम करनेका उपदेश देते थे, किन्तु वहाँका काजी कीर्तन-विरोधी था। एक दिन रातके समय कीर्तन करते-करते ये काजीके घर उसके उद्धारके उद्देश्यसे जा पहुँचे और उससे हरिनामका उच्चारण करनेके लिये अनुरोध करने लगे। यह सुनकर काजी कहने लगा—“मैं कल हरि बोलूँगा।” ऐसा सुनकर श्रीगदाधरदास प्रेमसुखपूर्ण होकर बोले-“कल क्यों? अभी तो तुमने अपने मुखसे हरि कहा है।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 154-155वें श्लोकमें)— “राधाविभूतिरूपा या चन्द्रकान्तिः पुरा व्रजे। सः श्रीगौराङ्ग-निकटे दासवंशयो-गदाधरः ॥ 154 ॥ पूर्णानन्दा सद्य व्रजे यासीत् बलदेवप्रियाग्रणीः। सापि कार्यवशादेव प्राविशत्तं गदाधरम् ॥ ”155 ॥ “जो पहले राधिकाकी विभूति स्वरूपा अर्थात् श्रीमतीकी अङ्गशोभा चन्द्रकान्ति थीं, वे अब श्रीगौराङ्गके निकट दासवंशके गदाधर अर्थात् श्रीगदाधर दास हैं। व्रजमें श्रीबलरामकी प्रियाओंमें श्रेष्ठ पूर्णानन्दा भी किसी कारणवश इन्हीं श्रीगदाधर दासमें प्रविष्ट हुई हैं।” नीलाचलसे गौड़देश आते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुने देखा कि श्रीगदाधरदास श्रीराधाभावमें जोरसे अट्टहास करते हुए स्वयंको दही बेचनेवाली समझकर अपना बाहिरी परिचय भूल गये। कभी ये गोपीभावमें विभोर होकर गङ्गाजलसे भरे घड़ेको सिरपर लेकर दूध बेचने लगते। (चैःभाः अन्त्यखण्ड 5वाँ अः)—श्रीमन्महाप्रभु गौड़देशसे वृन्दावन जाते हुए जब पाणिहाटीमें श्रीराघव-भवनमें आये थे— “राघव-मन्दिरे शुनि’ श्रीगौरसुन्दर। गदाधरदास धाइ’ आइला सत्वर ॥ 92 ॥ प्रभुओ देखिया गदाधर सुकृतिरे। श्रीचरण तुलिया दिलेन ताँर शिरे ॥ ”94 ॥ “तब उनके आगमनका समाचार सुनकर श्रीगदाधर दास भागकर वहाँ पहुँचे। महाप्रभुने इनकी सुकृतिको देखकर अपने चरणकमल इनके मस्तकपर स्थापित किये थे।” ऐँड़ियादहमें इनके घरमें इनके प्रकटकालमें ‘बाल-गोपाल’ की मूर्ति थी। श्रीमाधव घोषने गोपाल-विग्रहके सामने श्रीनित्यानन्द प्रभु और श्रीदास गदाधरके साथ ‘दानखण्ड’ (दानकेलि-लीलाके) अभिनयके द्वारा नृत्य किया था (चैःभाः अन्त्यखण्ड 5/378)। श्रीगदाधरके तिरोभावके पश्चात् उनको उसी गाँवमें समाधि दी गयी। यह समाधि संयोगि-वैष्णवोंके अधिकारमें थी। कालनाके सिद्ध श्रीभगवान् दास बाबाजीने कोलकाताके नारिकेलडाङ्गाके निवासी मधुसूदन मल्लिकके द्वारा सिंहासन-भवन स्थापित करवाकर 1256 सालमें ‘श्रीराधाकान्त’की विग्रह-सेवाकी व्यवस्था की और उनके पुत्र बलाइ मल्लिकने 1312 सालमें ‘श्रीगौर-नित्यानन्द’की एक सेवा प्रतिष्ठित की। मन्दिरके सिंहासनपर श्रीगौर-नित्यानन्द-विग्रह और श्रीराधाकृष्णकी मूर्ति विराजमान है, सिंहासनके नीचे एक संस्कृत श्लोक खुदा है। एक गोपेश्वर शिवलिङ्ग भी वहाँ प्रतिष्ठित है। मन्दिरके द्वारके पास एक पत्थरके पटलपर उपरोक्त कथा खुदी है। वैष्णव- मञ्जूषा-समाहृति (प्रथम संख्या) द्रष्टव्य है॥ 53 ॥ (24) श्रीशिवानन्द सेन-शाखा :— शिवानन्द सेन—प्रभुर भृत्य अन्तरङ्ग। प्रभुस्थाने याइते सबे लयेन याँर सङ्ग ॥ 54 ॥ प्रति वर्षे प्रभुर गण सङ्गेते लइया। नीलाचले चलेन पथे पालन करिया ॥ 55 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दसेन महाप्रभुके अन्तरङ्ग सेवक हैं। ये महाप्रभुसे मिलनेके लिये उनके स्थान नीलाचल सब भक्तोंको साथ लेकर जाते थे। प्रत्येक वर्ष भक्तोंको साथ लेकर गौड़देशसे नीलाचल जाते समय मार्गमें उन सबके भोजन-निवासादिका प्रबन्ध अपने धनके द्वारा करते थे ॥ 54-55 ॥ 56 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/56-60 ] महाप्रभुकी तीन रूपोंमें अवतीर्ण होकर कृपा :- भक्ते कृपा करेन प्रभु ए तिन स्वरूपे। 'साक्षात्', 'आवेश' आर 'आविर्भाव'-रूपे॥ ५६॥ अनुवाद—भगवान् तीन स्वरूपोंसे अपने भक्तोंपर कृपा करते हैं, 'साक्षात्' रूपसे, 'आवेश' रूपसे और 'आविर्भाव' रूपसे॥ ५६॥ अमृतप्रवाह भाष्य—सभी भक्तोंके समक्ष एक रूपका दर्शन देकर भगवान् 'साक्षात्' कृपा करते हैं, किन्तु श्रीनकुल ब्रह्मचारीकी देहमें समय-समयपर आविष्ट होते हैं; प्रद्युम्न ब्रह्मचारीकी देहमें श्रीचैतन्यका आविर्भाव होता है॥ ५६॥ अनुभाष्य—'साक्षात्'—स्वयंरूप श्रीगौरसुन्दर; 'आवेश'—नकुल और प्रद्युम्न ब्रह्मचारीमें। 'आविर्भाव'—(चैःचः अन्त्यलीला 2/34-35)— “शचीर मन्दिरे आर नित्यानन्द-नर्त्तने। श्रीवास-कीर्त्तने, आर राघव-भवने॥ एइ चारि ठाँइ प्रभुर सदा 'आविर्भाव'। प्रेमाविष्ट हय प्रभुर सहज स्वभाव॥” “शची माताके गृहके मन्दिरमें, जहाँ श्रीनित्यानन्द प्रभु नृत्य करते हैं, श्रीवास पण्डितके गृहमें सङ्कीर्त्तनमें और श्रीराघव पण्डितके गृहमें श्रीगौरसुन्दरका सदा आविर्भाव होता है।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 73-74वें श्लोकोंमें)— “आविर्भावो गौरहरेर्नकुल-ब्रह्मचारिणि॥ 73(ख)॥ आवेशश्च तथा ज्ञेयो मिश्रे प्रद्युम्नसञ्ज्ञके॥ 74(क)॥ “श्रीनकुल ब्रह्मचारीमें श्रीगौरहरिका आविर्भाव और श्रीप्रद्युम्न मिश्रमें उनका आवेश जानना चाहिये॥” 56॥ 'साक्षाते' सकल भक्ते देखे निर्विशेष। नकुल ब्रह्मचारी-देहे प्रभुर 'आवेश'॥ ५७॥ अनुवाद—सभी भक्त अपने समक्ष प्रकट महाप्रभुको जब देखते हैं, तब उसे 'साक्षात्' कहा जाता है। नकुल ब्रह्मचारीके शरीरमें महाप्रभुकी शक्ति-विशेष सञ्चारित होनेपर उसे 'आवेश' कहते हैं॥ ५७॥ अनुभाष्य—प्रत्यक्ष रूपसे सभी भक्तोंको परस्पर वैशिष्ट्य-विहीन अर्थात् एक ही प्रकारके सेवक अथवा अभिन्न रूपमें देखा जाता है, किन्तु नकुल ब्रह्मचारीमें महाप्रभुका आवेश होनेपर उनको श्रीगौरसुन्दरके समान, अन्य सभी भक्तोंसे अधिक अलौकिक ईश्वर-चेष्टायुक्त श्रीकृष्णप्रेममय-रूपमें श्रीशिवानन्द सेन आदि भक्तोंने दर्शन किया। नकुल ब्रह्मचारीका पूर्व निवास कालनाके निकट 'पियारीगञ्ज' नामक पल्लीमें था। चैःचः अन्त्यलीला 2/3-83 संख्यामें इस प्रसङ्गका उल्लेख है॥ ५७॥ 'प्रद्युम्न ब्रह्मचारी' ताँर आगे नाम छिल। 'नृसिंहानन्द' नाम प्रभु पाछे त' राखिल॥ ५८॥ अनुवाद—पहले उनका नाम श्रीप्रद्युम्न ब्रह्मचारी था, परन्तु बादमें महाप्रभुने उनका नाम 'नृसिंहानन्द' रख दिया॥ ५८॥ अनुभाष्य—चैःचः आदिलीला 10/35 और चैःभाः अन्त्यखण्ड 3रा तथा 8वाँ अध्याय द्रष्टव्य है॥ ५८॥ ताँहाते हइल चैतन्येर 'आविर्भाव'। अलौकिक ऐछे प्रभुर अनेक स्वभाव॥ ५९॥ अनुवाद—इनकी देहमें श्रीचैतन्यदेवके आविर्भावके लक्षण दिखलायी देते थे। महाप्रभु इस प्रकार अनेक अलौकिक लीलाएँ करते हैं॥ ५९॥ आस्वादिल एसब रस सेन शिवानन्द। विस्तारि' कहिब आगे एसब आनन्द॥ ६०॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्द सेनने इन सभी रसों (साक्षात्, आवेश और आविर्भाव) का आस्वादन किया। इन सब आनन्दमयी लीलाओंका आगे विस्तारपूर्वक वर्णन करूँगा॥ ६०॥ दसवाँ अध्याय | 57

[ 10/61 (24क) शिवानन्दके पुत्र-सेवकादि-शाखा :- शिवानन्देर उपशाखा—ताँर परिकर। पुत्र-भृत्य-आदि करि' चैतन्य-किङ्कर ॥ 61 ॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दकी उपशाखा उनके परिकर हैं। इनके पुत्र-सेवकादि सभी श्रीचैतन्यदेवके दास हैं॥ 61 ॥ अनुभाष्य—श्रीशिवानन्दसेन कुमारहट्ट या हालिसहरके निवासी और महाप्रभुके भक्त थे। वहाँसे डेढ़ मील दूर काँचड़ापाड़ामें इनके द्वारा प्रतिष्ठित श्रीगौरगोपालके विग्रह हैं और ये श्रीकृष्णरायके मन्दिरमें अभी वर्तमान हैं। इनके पुत्र श्रीपरमानन्द (पुरीदास) ने श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका (176 श्लोक) में लिखा है— “पुरा वृन्दावने वीरादूती सर्वाश्च गोपिकाः। निनाय कृष्णनिकटं सेदानीं जनको मम।” “पहले जो वृन्दावनमें गोपियोंको श्रीकृष्णके निकट ले जाती थीं, वे वीरा दूती ही अब मेरे पिता श्रीशिवानन्द हैं।” ये प्रतिवर्ष गौड़देशसे भक्तोंका पथप्रदर्शन करके यातायातका सारा व्यय स्वयं वहन करते हुए और उनके रहनेकी व्यवस्था करते हुए उन्हें महाप्रभुके पास नीलाचल ले जाते थे (चैःचः मध्यलीला 16/19-26)। इनके तीन पुत्र—श्रीचैतन्यदास, श्रीरामदास और श्रीपरमानन्द (कविकर्णपूर) थे। कविकर्णपूरके दीक्षा गुरुदेव (इनके गुरु-पुरोहित) श्रीनाथ पण्डितके सम्बन्धमें इसी अध्यायकी 107 संख्या द्रष्टव्य है। वासुदेव दत्तकी अधिक व्यय करनेकी प्रवृत्तिको देखकर महाप्रभुने इनको उनका सरखेल (प्रबन्धक) के रूपमें बने रहनेके लिये आदेश दिया था (चैःचः मध्यलीला 15/93-97)। महाप्रभु ‘साक्षात्’, ‘आवेश’ और ‘आविर्भाव’—इन तीन उपायोंसे अपने भक्तोंपर कृपा करते हैं, इन तीनों रसोंको श्रीशिवानन्दसेनने परीक्षा करके आस्वादन किया (चैःचः अन्त्यलीला, 2रा अः)। इनके श्रीगौरचरण-दर्शन पिपासु कुत्तेका विवरण चैःचः अन्त्यलीलाके प्रथम अध्यायमें वर्णित है। श्रीरघुनाथदास गोस्वामी जब गृह त्यागकर महाप्रभुके दर्शनके लिये नीलाचलमें भागकर आ गये थे, तब उनके पिता श्रीगोवर्धन मजूमदारने अपने पुत्रके कुशल-मङ्गलका संवाद जाननेके लिये पत्र भेजा। इनसे श्रीरघुनाथका समाचार पाकर प्रति वर्ष इनके द्वारा वे अपने पुत्रकी सुख-सुविधाके लिये रसोइया, सेवक और बहुतसा धन नीलाचल भिजवाते थे (चैःचः अन्त्यलीला 6/245-267)। एक बार नीलाचलमें इन्होंने महाप्रभुको निमन्त्रितकर गरिष्ठ (कठिनतासे पचनेवाला भारी) भोजन खिलाया, जिस कारण महाप्रभुका चित्त प्रसन्न नहीं हुआ। अगले दिन इनके पुत्र श्रीचैतन्यदासने महाप्रभुको पाचक औषधि देकर उनके सन्तोषका विधान किया (चैःचः अन्त्यलीला 10/124-151)। एक बार नीलाचल जाते हुए घाटका ‘कर’ आदि देनेमें इनके व्यस्त हो जानेसे श्रीनित्यानन्द प्रभु और अन्य भक्तोंको गङ्गा पार करनेके उपरान्त ठहरनेका स्थान न मिलनेके कारण वहीं पासमें स्थित गाँवके एक वृक्षके नीचे रहना पड़ा। श्रीनित्यानन्द प्रभुने भूखसे पीड़ित और क्रोधित होनेका अभिनय करते हुए अभिशाप दिया—“शिवानन्दके तीनों पुत्र मर जाँय।” यह सुनकर इनकी पत्नी अमङ्गलकी आशङ्काकर विलाप करने लगी। इन्होंने घाटसे लौटकर जब सारा वृत्तान्त सुना, तो वे अपने अपूर्व भाग्यकी प्रशंसा करते हुए श्रीनित्यानन्द प्रभुके पास आये और उनसे लात खानेका सौभाग्य प्राप्त किया। इनके भाज्जे श्रीकान्त यह देखकर अभिमानी होकर अकेले ही महाप्रभुके पास पहुँचे। अन्तर्यामी महाप्रभु सब जान गये और उन्हें क्षमाकर सान्त्वना प्रदान की। उसी यात्राके समय ही महाप्रभुने इनके छोटे पुत्र श्रीपुरीदासके मुखमें अपने पाँवका अंगूठा दिया, तब वे मौन रहे, परन्तु बादमें किसी दिन महाप्रभुकी आज्ञासे उन्होंने श्लोककी रचना 58 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/61–64 ] की (चैःचः अन्त्यलीला, 13/15-74)। उसी समय महाप्रभुने गोविन्दको आज्ञा दी— “शिवानन्देर प्रकृति, पुत्र यावत् हेथाय। आमार अवशेष-पात्र तारा येन पाय॥” “शिवानन्दसेन और उनके स्त्री-पुत्र जब तक यहाँ रहें, मेरा उच्छिष्ट भोजन उनको प्रतिदिन प्रदान करना (चैःचः अन्त्यलीला, 12/15-53)॥61॥ उनके तीन पुत्र :— चैतन्यदास, रामदास, आर कर्णपूर। तिन पुत्र शिवानन्देर प्रभुर भक्तशूर॥62॥ अनुवाद—श्रीशिवानन्दके तीन पुत्र—श्रीचैतन्यदास, श्रीरामदास और श्रीपरमानन्द महाप्रभुके भक्तोंमें प्रधान हैं॥62॥ अनुभाष्य—'श्रीचैतन्यदास'—शिवानन्दके ज्येष्ठ पुत्र हैं। इनके द्वारा रचित 'श्रीकृष्णकर्णामृत' की टीका सहित श्रील भक्तिविनोद ठाकुरका अनुवाद 'श्रीसज्जनतोषणी' पत्रिकामें प्रकाशित हुआ है। जानकार व्यक्तियोंके अनुसार ये ही संस्कृत भाषामें रचित महाकाव्य 'श्रीचैतन्यचरित' के प्रणेता हैं, कविकर्णपूर नहीं। 'श्रीरामदास'—शिवानन्दसेनके मंझले पुत्र हैं। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 145वाँ श्लोक)— “वृन्दावने यौ विख्यातौ शुकौ दक्ष-विचक्षणौ। तावद्य जातौ मज्ज्येष्ठौ चैतन्य-रामदासकौ॥” 145॥ “वृन्दावनके दक्ष और विचक्षण नामक दो शुकपक्षी अब मेरे ज्येष्ठ भ्राता श्रीचैतन्य और श्रीरामदास हुए हैं।” 'कर्णपूर'—परमानन्ददास अथवा पुरीदास अथवा कविकर्णपूर। ये श्रीअद्वैतशाखामें श्रीनाथ पण्डितके शिष्य हैं। इन्होंने 'आनन्दवृन्दावन'-चम्पू, 'अलङ्कार-कौस्तुभ', 'श्रीचैतन्यचरित' (?) महाकाव्य, 'श्रीचैतन्य-चन्द्रोदय'-नाटक, 'श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका' आदि ग्रन्थोंकी रचना की है। इनका जन्म 1448 शकाब्दमें हुआ था और इन्होंने 1498 शकाब्द तक ग्रन्थोंकी रचना की थी॥62॥ (24ख) शिवानन्दसेनके दो भाञ्जे :— श्रीवल्लभसेन, आर सेन श्रीकान्त। शिवानन्द-सम्बन्धे प्रभुर भक्त एकान्त॥63॥ अनुवाद—श्रीवल्लभसेन और श्रीकान्तसेन, श्रीशिवानन्दके सम्बन्धसे महाप्रभुके एकान्त भक्त हैं॥63॥ अनुभाष्य—'श्रीवल्लभसेन और श्रीकान्तसेन'— श्रीशिवानन्दके भाञ्जे थे। पुरी आते हुए अपने मामा श्रीशिवानन्दको श्रीनित्यानन्द प्रभुकी गाली, शाप और लात खाते देखकर वे सहन नहीं कर सके और उस दलको त्यागकर पहले ही महाप्रभुके पास पहुँचे। सर्वज्ञ महाप्रभुने यह पहले ही जान लिया था और उसका समाधान किया। महाप्रभुने उनके नीलाचलमें वास करनेके समय तक सेवक गोविन्दको उन्हें अपना महाप्रसाद देनेकी अनुमति दी। रथ-यात्राके समय सात सम्प्रदायोंमेंसे श्रीमुकुन्द दत्तके सम्प्रदायमें ये दोनों भाई कीर्तनीया थे (चैःचः मध्यलीला, 13/41)। (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 174वाँ श्लोक)— “व्रजे कात्यायनी यासीदद्य श्रीकान्तसेनकः॥” 174॥ “व्रजकी कात्यायनी अब श्रीकान्तसेन हैं॥” 63॥ (25) श्रीगोविन्दानन्द और (26) श्रीगोविन्द दत्त :— प्रभुप्रिय गोविन्दानन्द—महाभागवत। प्रभुर कीर्त्तनीया आदि—श्रीगोविन्द दत्त॥64॥ अनुवाद—महाभागवत श्रीगोविन्दानन्द महाप्रभुके प्रिय हैं और श्रीगोविन्ददत्त महाप्रभुके मूल कीर्तनीया हैं॥64॥ अनुभाष्य—'श्रीगोविन्दानन्द'—प्रथम कीर्तनके समय महाप्रभुके कीर्तनके सङ्गी थे। श्रीधरके घर जलपानके दिन इन्होंने क्रन्दन किया था। रथयात्राके समय ये श्रीजगन्नाथ पुरी जाते थे। 'श्रीगोविन्ददत्त'—नवद्वीपमें महाप्रभुके कीर्तनके सङ्गी थे, मूल गायक होकर महाप्रभुके सङ्गमें दसवाँ अध्याय | 59

[ 10/64-69

कीर्तन करते थे (चैःभाः अन्त्यखण्ड 9वाँ अः) — “मूल हजा ये कीर्तन करे प्रभुसने।” इनका घर खड़दहके दक्षिण सीमापर स्थित 'सुखचर' ग्राममें था ॥ 64 ॥

(27) श्रीविजयदास और (28) अकिञ्चन कृष्णदास :— श्रीविजयदास-नाम प्रभुर आखरिया। प्रभुरे अनेक ग्रन्थ दियाछे लिखिया ॥ 65 ॥ 'रत्नबाहु' बलि' प्रभु थुइल ताँर नाम। अकिञ्चन प्रभुर प्रिय कृष्णदास-नाम ॥ 66 ॥

अनुवाद—श्रीविजयदास महाप्रभुके ग्रन्थ-लेखक थे। इन्होंने महाप्रभुको अनेक ग्रन्थ लिखकर दिये। महाप्रभुने 'रत्नबाहु' कहकर इनको यह नाम प्रदान किया था। अकिञ्चन श्रीकृष्णदास भी महाप्रभुके परमप्रिय हैं ॥ 65-66 ॥

अनुभाष्य—'श्रीविजयदास'—नवद्वीपवासी लिपिकार हैं; ये नवनिधिमें एक मुख्य हैं। इन्होंने महाप्रभुको अनेक ग्रन्थ लिखकर दिये। इसलिये श्रीगौरहरिने इनको 'रत्नबाहु' नाम दिया था। श्रीशुक्लाम्बरके घरमें महाप्रभुने इनपर कृपा की—चैःभाः मध्यखण्ड, 25वाँ अः द्रष्टव्य है। 'अकिञ्चन श्रीकृष्णदास'—नवद्वीपवासी और प्रभुके सङ्गी थे। ये रथयात्रामें श्रीजगन्नाथ पुरी आते थे। चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वाँ अः द्रष्टव्य है ॥ 65-66 ॥

(29) श्रीधरकी गुणराशि :— खोला-बेचा श्रीधर प्रभुर प्रियदास। याँहा-सने प्रभु करे नित्य परिहास ॥ 67 ॥ प्रभु याँर नित्य लय थोड़-मोचा-फल। याँर फुटा-लोहपात्रे प्रभु पिला जल ॥ 68 ॥

अनुवाद—केलेके तनेको बेचने वाले श्रीधर महाप्रभुके प्रिय दास हैं, जिनके साथ महाप्रभु नित्य परिहास करते थे। महाप्रभु उनसे नित्य थोड़-मोचा-फल (केलेके वृक्षका गूदा, फूल, फल) लेते थे और जिनके लोहेके टूटे हुए बरतनमें महाप्रभुने जलपान किया था ॥ 67-68 ॥

अनुभाष्य—'श्रीधर'—नवद्वीपवासी, केलेके बागानमें उत्पन्न वस्तुओंसे ही अपना जीवन चलाने वाले एक दरिद्र ब्राह्मण थे। (चैःभाः आदिखण्ड, 8वें अः) में महाप्रभुकी इनके साथ खींचातानी, (चैःभाः मध्यखण्ड, 9वें अः) में महाप्रभुकी 'सात-पहरिया' भावमें इनके प्रति कृपा और (चैःभाः मध्यखण्ड, 23वें अः) काजीदलनके समय कीर्तन सुनकर श्रीधरके द्वारा नृत्यमें इनके छिद्रयुक्त जीर्ण लोहेके पात्रसे महाप्रभुका परमानन्दसे जल पीना तथा (चैःभाः मध्यखण्ड, 28वें अः)में महाप्रभुके संन्यास ग्रहण करनेकी पूर्व रात्रिमें इनके द्वारा दी हुई लौकी शचीमाताके द्वारा बनवाकर भोजनका प्रसङ्ग द्रष्टव्य हैं। ये रथयात्राके उपलक्ष्यमें पुरुषोत्तम धाममें गये थे। कवि कर्णपूरके मतमें ये बारह गोपालोंमें अन्यतम सखा कुसुमासव गोपाल हैं। श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 133वाँ श्लोक— “खोलाबेचातया ख्यातः पण्डितः श्रीधरो द्विजः। आसीद्व्रजे हास्यकरो यो नाम्ना कुसुमासवः ॥ 133 ॥ “व्रजमें हँसने-हँसानेवाले कुसुमासव नामक सखा अब ब्राह्मणवंशमें उत्पन्न केले बेचनेवाले श्रीधरके नामसे विख्यात हैं”॥ 67 ॥

(30) श्रीभगवान् पण्डित :— प्रभुर अतिप्रिय दास भगवान् पण्डित। याँर देहे कृष्ण पूर्वे हैल अधिष्ठित ॥ 69 ॥

अनुवाद—भगवान् पण्डित महाप्रभुके अतिप्रिय दास हैं। इनके शरीरमें पूर्वकालमें श्रीकृष्णका अधिष्ठान हुआ था ॥ 69 ॥

अनुभाष्य—'भगवान् पण्डित'—चैःभाः अन्त्यखण्ड, 9वाँ अः— “चलिलेन लेखक पण्डित भगवान्। याँर देहे कृष्ण हइयाछिला अधिष्ठान॥”

60 | श्रीचैतन्यचरितामृत

10/69-72 ] “जिनके शरीरमें श्रीकृष्णका अधिष्ठान हुआ था, वे लेखक श्रीभगवान् पण्डित चले॥” ६९॥ (31) श्रीजगदीश पण्डित और (32) हिरण्य :— जगदीश पण्डित, आर हिरण्य महाशय। यारे कृपा कैल बाल्ये प्रभु दयामय॥ ७०॥ एइ दुइ-घरे प्रभु एकादशी-दिने। विष्णुर नैवेद्य मागि' खाइल आपने॥ ७१॥ अनुवाद—जगदीश पण्डित और हिरण्य महाशय, इन दोनोंपर महाप्रभुमें अपने बाल्यकालमें कृपा की थी। इन दोनोंके घर महाप्रभुने एकादशीके दिन विष्णुके नैवेद्यको माँगकर खाया था॥ ७०-७१॥ अनुभाष्य—'जगदीश पण्डित'—श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 192वाँ श्लोक— “अपरे यज्ञपत्न्यौ श्रीजगदीश-हिरण्यकौ। एकादश्यां ययोरन्नं प्रार्थयित्वाऽघसत् प्रभुः॥” 192॥ “अन्य दो यज्ञपत्नियोंने श्रीजगदीश और श्रीहिरण्यक नाम धारणकर जन्म ग्रहण किया है, श्रीमन्महाप्रभुने एकादशीके दिन इन्हींसे अन्न माँगकर भोजन किया था।” (श्रीगौरगणोद्देश-दीपिका 143वाँ श्लोक)— “आसीद्व्रजे चन्द्रहासो नर्त्तको रसकोविदः। सोऽयं नृत्यविनोदी श्रीजगदीशाख्य-पण्डितः॥ 143॥ “व्रजके चन्द्रहास नामक विख्यात रसज्ञ नर्त्तक अब नृत्यविनोदी श्रीजगदीश पण्डित हैं।” (चैःचः आदिलीला, 11/30, 14/39 और चैःभाः आदिखण्ड, 4था अः)—एकादशी तिथिपर महाप्रभुके द्वारा हिरण्य-जगदीशके गृहमें स्थित विष्णु भगवान्के नैवेद्यके भोजनका वर्णन है। (चैःभाः अन्त्यखण्ड, 6ठा अः)— “जगदीश पण्डित परम ज्योतिर्धाम। सपार্ষदे नित्यानन्द याँर धनप्राण॥” “जगदीश पण्डित परम ज्योतिके धाम हैं। परिकर सहित श्रीनित्यानन्द प्रभु इनके प्राणधन हैं।” 'हिरण्यपण्डित'—(चैःभाः अन्त्यखण्ड, 5वाँ अः)—नवद्वीपमें हिरण्य पण्डित नामक एक सुब्राह्मणके घरमें श्रीनित्यानन्द प्रभु एक बार बहुमूल्य अलङ्कार पहनकर विराजमान थे। एक डाकुओंके सरदारने उनके श्रीअङ्गसे उन सब अलङ्कारोंको अपहरण करनेकी बार-बार चेष्टा की, परन्तु वह इसमें सफल नहीं हुआ। तब श्रीनित्यानन्द प्रभुकी महिमाको जानकर वह उनके शरणागत हुआ॥ ७०-७१॥ (33) श्रीपुरुषोत्तम और (34) श्रीसञ्जय :— प्रभुर पड़ुया दुइ,—पुरुषोत्तम, सञ्जय। व्याकरणे दुइ शिष्य—दुइ महाशय॥ ७२॥ अनुवाद—महाप्रभुके दो व्याकरणके छात्र पुरुषोत्तम और सञ्जय थे। ये दोनों महान् व्यक्ति हैं॥ ७२॥ अनुभाष्य—'पुरुषोत्तम और सञ्जय'—ये दोनों नवद्वीपके वासी थे; पहले ये महाप्रभुके छात्र थे तथा बादमें वे महाप्रभुके कीर्त्तनके आरम्भसे उनके सङ्गी बने। (चैःभाः आदिखण्ड, 15/5-7)— “अनेक जन्मेरे भृत्य मुकुन्द सञ्जय। पुरुषोत्तम दास हेन (हन) याँहार तनय॥ ५॥ प्रतिदिन सेइ भाग्यवन्तेरे आलय। पड़ाइते गौरचन्द्र करेन विजय॥ ६॥ चण्डीगृहे गिया प्रभु वसेन प्रथमे। तबे शेषे शिष्यगण आइसेन क्रमे॥ ७॥” “मुकुन्द सञ्जय महाप्रभुके अनेक जन्मोंके सेवक हैं और पुरुषोत्तमदास उनके पुत्र हैं। प्रतिदिन महाप्रभु उनके घर पढ़ानेके लिये जाया करते थे। पहले महाप्रभु चण्डीमण्डपमें जाकर विराजमान होते, तब धीरे-धीरे उनके शिष्य वहाँ आते।” (चैःभाः अन्त्यखण्ड 8वाँ अः)— “पुरुषोत्तम सञ्जय चलिला हर्षमने। ये प्रभुर मुख्य शिष्य पूर्व अध्ययने॥” “पहले अध्ययनमें जो महाप्रभुके मुख्य शिष्य थे, वे पुरुषोत्तम सञ्जय हर्षित मनसे चले।” इसलिये श्रीचैतन्यभागवतके वर्णनके अनुसार मुकुन्द-सञ्जयके दसवाँ अध्याय | 61